पथ के साथी

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Wednesday, September 16, 2015

मेरी बीमार माँ




डॉ.कविता भट्ट

मेरी नींद खुली तो दिल में हलचल बड़ी थी,
घबरा के देखा मैं अस्पताल के सामने खड़ी थी
उसी समय नर्स ने रजिस्टर देखकर पुकार लगाई
‘हिन्दी’ नाम की औरत के साथ कौन आया है भाई
 आस-पास मेरे तथाकथित भाई- बहन चिल्ला रहे थे
‘आईसीयू में हमारी बुढ़िया माँ है’ ऐसा बता रहे थे
जिसे हमारे पूर्वज वर्षो पहले ओल्ड-एज होम छोड़ आए थे
वही के कर्मचारी आज सुबह ही उसे अस्पताल लाए थे

ऑक्सीजन लगी बुढ़िया कभी भी मर सकती थी
अपनी वसीयत ओल्ड एज होम के नाम कर सकती थी
समझी नहीं फटेहाल बुढ़िया को माँ क्यों बता रहे थे
घड़ियाली आँसुओ से मेरे भाई बहन क्या जता रहे थे

वहीं  जींसटॉप में “इंग्लिश” नामक औरत मुस्करा रही थी
जो कई सालों से खुद को हम सबकी माँ बता रही थी
क्या है, गड़बड़ झाला मुझे समझ ही नहीं आया
और मैंने पास खड़े डॉक्टर से माज़रा पुछवाया

सौतन है वो तुम्हारी माँ की जिसने साजिशन डेरा जमाया है
डॉक्टर बोला इसी ने तुम्हारी माँ को ओल्डएज होम भिजवाया है
पर मुझे लगा की डॉक्टर को भी अधूरी जानकारी थी
मात्र सौतन की नहीं, वो हम सबकी साजिश की मारी थी

लोरियाँ याद रही हमें लेकिन हम माँ को भूल गए
अपनी माँ की कुटिल सौतन के गले में ही झूल गए
मैं पास गई माँ के, नर्स खड़ी थी वार्ड के दरवाजे खोलकर
पोते पोतियों से मिलवाओ बीमार माँ रो पड़ी ये बोलकर

मैंने कहा वो अमेरिका तो कुछ इंग्लैण्ड में पढ़ रहे है
लेकिन वो तुम्हारी चिंता छोड़कर आपस में ही लड़ रहे हैं
खुद को अलग अलग परिवारों का बता रहे हैं
तुम्हारी भावी पीढ़ी हैं ऐसा कहने में घबरा रहे हैं

माँ बोली उनके साथ मुझे रखो मैं उन्हें दुलार दूँगी
सहला के जीवन, रंग, रस और संस्कार उपहार दूँगी
मेरी ममता और लोरियों का कर्ज चुकाओगे क्या
ओल्ड एज होम से वापस मुझे ले जाओगे क्या

मेरे जवाब के लिए अब भी वह बिस्तर पे पड़ी है
मेरे उत्तर की प्रतीक्षा में उसकी धड़कन बढ़ी है
मैं निरुत्तर कभी अपने तमाशबीन भाई बहनों को देखती हूँ
कभी अपनी बीमार माँ को देख जोरों से चीखती हूँ-...
क्या हम उसे घर ला सकेंगे...
या
उसे तड़पते हुए मरने देंगे ?
(दर्शन शास्त्र विभाग,हे०न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड)

Monday, September 14, 2015

मन हिन्दी मुस्काई !



डॉ ज्योत्स्ना शर्मा


बरस बीतते एक दिवस तो

मेरी सुध आई

मन हिन्दी  मुस्काई ।



गिट-पिट बोलें घर बाहर सब

नाती और पोते

नन्ही स्वीटी रटती टेबल

खाते और सोते

खूब पार्टी घर में अम्मा

बैठी सकुचाई

मन हिन्दी  मुस्काई !



ओढ़े बैठे अहंकार की

गर्द भरी चादर

मान करें मदिरा का छोड़ी

सुधामयी गागर

पॉप,रैम्प के संग डोलती

बेबस कविताई

मन हिन्दी  मुस्काई !



अपनों में अपनापन लगता

झूठा- सा सपना

कहाँ छोड़ आए हो बोलो

स्वाभिमान अपना

गौरव गाथा दीन-हीन की

जग ने कब गाई

मन हिन्दी  मुस्काई !




Saturday, September 14, 2013

हुई कण्ठहार हिंदी !!


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

भारत का ,भारती का 
शोभन शृंगार हिंदी ,
माँ! अनेक आभरण हैं ,
हुई कण्ठहार हिंदी !

प्रगति का ,परम्परा का 
सुखदायी योग तुझमें ,
ममता और त्याग ,भक्ति 
ओजस नियोग तुझमें ।
पीयूष-पयोधि, रस का ,
अतुलित आगार  हिंदी ।।

भारत का, भारती का 
शोभन शृंगार हिंदी ,
माँ ! अनेक आभरण हैं ,
हुई कण्ठहार हिंदी !

बढ़कर विजय के पथ पर 
अब कहीं कदम न ठहरे ,
जग में पताका यश की 
दिग-दिगंत मात फहरे ।
प्रतिपल हृदय का तुझसे 
जुड़े तार-तार हिंदी ।।

भारत का , भारती का 
शोभन शृंगार हिंदी ,
माँ ! अनेक आभरण हैं ,
हुई कण्ठहार हिंदी !
-0-

...और ...एक ..कहन मुकरी...
1
गीत , रुबाई .ग़ज़ल सुनावे 
विविध विधा से मन सरसावे 
हृदयहार ,माथे की बिंदी 
क्या सखि साजन ?? न सखि ‘हिन्दी’
-0-
हिंदी दिवस पर हार्दिक शुभ कामनाएँ .. :)



Friday, September 14, 2012

कुछ गीत मधुर गुनगुनाएँ-कमला निखुर्पा


रस की गंगा बहती कल -कल ,
शब्दों के अनगिन  दीप जले|
भाव-लहरिया  उठती -गिरती 
जब छंद-घंटिका  मधुर बजे |
आओ इंडिया वालो अब भारत के रंग में रंग जाएँ
मिलकर  अपनी भाषा के कुछ गीत मधुर गुनगुनाएँ |

हो वेद मन्त्रों से भोर सुहानी
मन में गीता का ज्ञान बसे |
ममता के आँगन में खेले 
हर बालक कान्हा बन जाए|
आओ इंडिया वालो फिर बंशी की धुन सुन मुसकाएँ
मिलकर अपनी भाषा के कुछ गीत मधुर गुनगुनाएं |

आओ ओढ़ें  कबीरा की चादर,
मंदिर-मस्जिद के भेद भुलाएँ|
रसखान के गिरिधर नागर संग
मीरा के मन की पीर हरें|
हम गंगा तट  के वासी, क्यों सागर से अपनी प्यास बुझाएँ,
अपनी भाषा के परचम को लहरा, क्यों न विश्वगुरु कहलाएँ |



Tuesday, September 15, 2009

संस्कार है हिन्दी ।



सूर-मीरा के पदों की झंकार है हिन्दी ।
देश का स्वाभिमान है,संस्कार है हिन्दी ।
यह दिवस सप्ताह मास की अवधि है बहुत कम
बरसों नहीं ,सदियों का व्यवहार है हिन्दी।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'