पथ के साथी

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Friday, May 16, 2025

1463- सन्नाटे के ख़तों की आवाज़


भीकम सिंह


लम्हों का सफर, नवधा, झाँकती खिड़की के साथ प्रवासी मन (हाइकु- संग्रह) और मरजीना (क्षणिका- संग्रह) को जोड़कर डा. जेन्नी शबनम का यह छठा काव्य- संग्रह (सन्नाटे के खत) आया है। व्हाट्सएप के समय में हम सन्नाटे के खतों से गुजरते हुए अचरज से भर जाते हैं; क्योंकि इन खतों (कविताओं) में समय और समाज का यथार्थ और फेंटेसी अनेक भंगिमाओं में व्यक्त हुई है, कहीं सपाट कथन के साथ, तो कहीं रूपक के साथ। यही कारण है कि जेन्नी शबनम की कविताएँ सीधे पाठक मन को कोमलता से छूती है।

प्रस्तुत पुस्तक की पहली कविता- ‘अनुबंध’ यह कविता जीवन में अनेक तरह के अनुबन्धों का काव्यात्मक दस्तावेज है, जिनमें जीवन अनुबन्ध की खिड़की के पीछे साथ-साथ गतिमान दिखाई देता है-

एक अनुबन्ध है जन्म और मृत्यु के बीच

कभी साथ-साथ घटित न होना

एक अनुबन्ध है प्रेम और घृणा के बीच। (पृष्ठ संख्या 15)

जेन्नी शबनम की कविताओं को पढ़ने पर वे ज्यादा स्पष्ट दिखाई देती हैं। उनका समय से आशय बेहद स्पष्ट और मुखर है-

बेवक्त खिंचा आता है मन

बेसबब खिल उठता था पल

हर वक्त हवाओं में तैरते थे

एहसास जो मन में मचलते थे

अब इन्तिजार है। (पृष्ठ संख्या 29)

जो यह होने को एक निजी इन्तिजार भी हो सकता है। जिसका अब इन्तिजार है और अब नहीं है। बस इसके लिए मन में आ बदलाव महत्त्वपूर्ण हैं। जेन्नी शबनम अपनी भावनाओं को अनेक चित्रों और वर्णनों से व्याख्यायित करती हैं। उनकी कविताओं से गुजरते हुए हम सहज ही लक्षित कर सकते हैं कि यहाँ भावनाएँ घायल हैं; इसलिए खुद पर कविता लिखना मुश्किल है। समय का यथार्थ जेन्नी शबनम की कविताओं में विस्तार के साथ आता रहता है। इसके साथ ही क्षेत्रीय हवा, जो राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ बनाती है उस तरफ भी जेन्नी शबनम का बराबर ध्यान गया है-

जाने कैसी हवा चल रही है

न ठण्डक देती है, न साँसें देती है

बदन को छूती है

तो जैसे सीने में बरछी-सी चुभती है

अब हवा बदल ग। (पृष्ठ संख्या 52)

अपने गाँव से जुड़ना, अपनी जड़ों से जुड़ना, अपनी परम्परा से जुड़ना है। शायद इसलिए जेन्नी शबनम का मन उचट जाता है-

मन उचट गया है शहर के सूनेपन से

अब डर लगने लगा है

भीड़ की बस्ती में अपने ठहरेपन से

चलो लौट चलते हैं अपने गाँव। (पृष्ठ संख्या 58)

अपना गाँव एक केन्द्रीय कथ्य के बतौर इस कविता में है। उसी गाँव में खड़ा किसान और उससे रिश्ता बरकरार रखती एक मजदूर के लिए एक अदद रोटी-

सुबह से रात, रोज सबको परोसता

गोल-गोल, प्यारी, नरम रोटी

मिल जाती, काश!

उसे भी कभी खाने को गरम-गरम रोटी। (पृष्ठ संख्या 66)

भूमिका’ कविता कोई निजी दुःख कातरता नहीं है। होने को तो यह एक निजी भूमिका है, जैसे कि हर किसी की होती है; लेकिन इस भूमिका के कारण और इसका स्वरूप नितांत पारिवारिक है। एक संवेदनशील महिला के लिए यह भूमिका असह्यय हो जाती है-

अब दो पात्र मुझमें बस गए

एक तन में जीता, एक मन में बसता

दो रूप मुझमें उतर गए। (पृष्ठ संख्या 70)

और कोई नया रास्ता खुलने की प्रक्रिया में स्थितियाँ प्रतिरोध के बजाय किसी वक़्त के चमत्कार में की समर्थक होती चली जाती हैं-

इन सभी को देखता वक़्त, ठठाकर हँसता है

बदलता नहीं कानून

किसी के सपनों की ताबीर के लिए

कोई संशोधन नहीं

बस सजा मिलती है

इनाम का कोई प्रावधान नहीं

कुछ नहीं कर सकते तुम

या तो जंग करो या पलायन

सभी मेरे अधीन, बस एक मैं सर्वोच्च हूँ। (पृष्ठ संख्या 73)

और फिर जेन्नी शबनम की कविताएँ एक बदलाव की उम्मीद में रुमानी जिन्दगी का वर्णन करती हैं। ‘जी उठे इन्सानियत’ कविता में ऐसे प्रभावी चित्र मिलते हैं और फैंटेसी सीधे-सच्चे रस्तों से भटकाकर अपने जाल में फँसा लेती है। फैंटेसी की कोई नीति नहीं, कोई दायरा नहीं यह भावनाओं का आखेट है, जो इसकी जद में आ जाए सभी को सूँघ लेती है-

एक कैनवास कोरा-सा

जिस पर भरे मैंने अरमानों के रंग

पिरो दिए अपनी कामनाओं के बूटे

रोप दिए अपनी ख्वाहिशों के रंग। (पृष्ठ संख्या 86)

और धीरे-धीरे कविता का रूप लेती है। एक तरह से देखा जाए, तो जेन्नी शबनम की तरह हरेक रचनाकार इसकी चपेट में आ जाते हैं, फिर दो ही रास्ते बचते हैं- या तो फैंटेसी के पहले रास्ते पर हम हार जाएँ या हम इसमें फँस जाएँ और फँसते जाएँ-

मन चाहता

भूले-भटके

मेरे लिए तोहफा लिये

काश! आज मेरे घर एक सांता आ जाता। (पृष्ठ संख्या 89)

जेन्नी शबनम इसकी चकाचौंध से उबरने का रास्ता नहीं खोजती; बल्कि इसकी हिमायती हो जाती है और म़गज के उस हिस्से को काट देना चाहती है, जहाँ विचार जन्म लेते हैं। ढूँढ लेती है अलमारी का निचला खाना, जहाँ बचपन बैठा है रूठा हुआ।

इस फैंटेसी के साथ जेन्नी शबनम की कविताओं में एक चीज और नत्थी है, वह है सरलता! फैंटेसी को समझने और यथार्थ को समझने, उसे अभिव्यंजित करने की पूरी प्रक्रिया के केन्द्र में है। सरलता यहाँ कविताओं को समझने- समझाने में है, जो जेन्नी शबनम की कविताओं का प्लस पाइंट है और पाठकों के लिए जरूरी है। जेन्नी शबनम इस सरलता को गंभीरता में भी नहीं छोड़ती; बल्कि उसी के सहारे अपनी कविता की नदी को बढ़ाती है-

नीयत और नियति समझ से परे है

एक झटके में सब बदल देती है

जिन्दगी अवाक्। (पृष्ठ संख्या 98)

जेन्नी शबनम अपनी एक कविता ‘चाँद की पूरनमासी’ में बात की बात में इस सरलता को ऐसे पकड़ती है कि आश्चर्य होता है कि इस तरह इतनी आसानी से इतनी गूढ़ बात को किस तरह कहा जा सकता है-

किस्से-कहानियों से तुम्हें निकालकर

अपने वजूद में शामिल कर

जाने कितना इतराया करती थी

कितने सपनों को गुनती रहती थी

अब यह बीते जीवन का किस्सा लगता है

हर पूरनमासी की रात। (पृष्ठ संख्या 109)

जेन्नी शबनम की रचना प्रक्रिया का यह बेहद सीधा-सच्चा रास्ता है, यहाँ सयानापन कतई नहीं है, ‘अति सूधौ  सनेह को मारग है घनानन्द के मार्ग की तरह। सच्ची और अच्छी कविता इसी प्रक्रिया में लिखी जा सकती है। फिर-फिर उगने और उड़ने के लिए पुरजोर कोशिश करती, अनुभूतियों के सफर में कड़वे-कसैले शब्दों की मार झेलती जेन्नी शबनम की कविता बेहिसाब जिजीविषा, जिंदादिली की सूचक है। अपनी पीठ छुपाकर जीना, मीठा कहकर आँसू पीना पूर्ण समर्पण है। मन के किसी कोने में अब भी गूँजती हैं कुछ धुनें, जिन्हें जेन्नी शबनम ने सपनों में बचा रखा है। शायद अवतार सिंह संघू ‘पाश’ की ‘सबसे खतरनाक’ कविता आपने पढ़ी होगी; इसलिए अपनी कविताओं में जेन्नी शबनम सपनों को जिंदा रखती है और उम्मीद करती है-

शायद मिल जाए वापस

जो जाने-अनजाने बन्द मुट्ठी से फिसल गया। (पृष्ठ संख्या 138)

काव्य में द्वंद्वात्मकता को पकड़ना जेन्नी शबनम का कौशल है-

प्रेम की पराकाष्ठा कहाँ तक

बदन के घेरों में

या मन के फेरों में?

सुध-बुध बिसरा देना प्रेम है

या स्वयं का बोध होना प्रेम है। (पृष्ठ संख्या 139)

अलगनी’ उस वातावरण के बारे में है, जो हमारे बहुत पास पसरा हुआ है; लेकिन हम उस पर ध्यान नहीं देते-

सन्नाटे के खत (काव्य-संग्रह) में कुल 105 कविताएँ हैं, भाषा शैली की चित्रात्मकता तो इस काव्य संग्रह में सराहनीय है ही, इसका सबसे सबल पक्ष यह भी है कि इसे बार बार पढ़ने को मन करता है और भूमिका में जैसे रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ ने कहा है कि पाठक इन खतों को पढ़कर अर्न्तमन में महसूस करेंगे। थोड़े में कहें, तो इन खतों की आवाज़ साहित्यिक जगत में सुनी जाएगी। पुस्तक का मुद्रण सुन्दर और आवरण आकर्षक है।

-0-सन्नाटे के खत-डा. जेन्नी शबनम, प्रथम संस्करण- 2024,मूल्य- 425 रुपये, पृष्ठ- 150

प्रकाशकः अयन प्रकाशक, जे-19/139, राजापुरी,उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059

 


Sunday, September 3, 2023

1367-चाँद


जेन्नी शबनम



 1-मेरे मीत

 

देखती हूँ तुम्हें

चाँद की काया पर

हर रोज़ जब भी चाहा कि देखूँ तुम्हें

पाया है तुम्हें

चाँद के सीने पर।

 

तुम मेरे हो और मेरे ईश भी

तुम मेरे हो और मेरे मीत भी

तुम्हारी छवि में मैंने खुदा को है पाया

तुम्हारी छवि में मैंने खुद को है पाया।

 

कभी चाँद के दामन से

कुछ रौशनी उधार माँग लाई थी

और उससे तुम्हारी तस्वीर

उकेर दी थी चाँद पर

जब जी चाहता है मिलूँ तुमसे

देखती हूँ तुम्हें चाँद की काया पर।

 -0-

2-चाँद के होठों की कशिश

 

चाँद के होठों में जाने क्या कशिश है

सम्मोहित हो जाता है मन

एक जादू-सा असर है

मचल जाता है मन।

अँधेरी रात में हौले-हौले

क़दम-क़दम चलते हुए

चाँदनी रात में चुपचाप निहारते हुए

जाने कैसा तूफ़ान आ जाता है

समुद्र में ज्वार -भाटा उठता है जैसे

ऐसा ही कुछ-कुछ हो जाता है मन।

कहते हैं चाँद की तासीर ठंडी होती है

फिर कहाँ से आती है इतनी ऊष्णता

जो बदन को धीमे-धीमे

पिघलाती है

फिर भी सुकून पाता है मन।

उसकी चाँदनी या चुप्पी

जाने कैसे मन में समाती है

नहीं मालूम ज़िन्दगी मिलती है

या कहीं कुछ भस्म होता है

फिर भी चाँद के संग

घुल जाना चाहता है मन।

-0-

2-चंदा मामा / आशा पाण्डेय

       


                    

एक बार जब चंदा मामा,

रूठ गए अपनी बहना से।

छोड़ दि उसके घर आना,

तोड़ दि सब नाते-रिश्ते ।

बहन उदास रहा करती थी,

भूल गई वह हँसना-गाना।

कैसे मानेंगे भइया अब,

शुरू करेंगे कब घर आना ?

हरदम सोचा करती थी वह,

कह डालूँ सब दिल की बातें।

लिखूँ एक प्यारी-सी चिठ्ठी,

भूले कैसे नाते-रिश्ते?

इतने दिन का रक्षाबंधन,

इतने दिन का प्यार-दुलार।

भूल गए ऐसे तुम कैसे,

छोटी बहना का घर-द्वार?

बहन उदास सोच में डूबी,

टहल रही थी छत के ऊपर।

देखा चंदा चला आ रहा,

इसी ओर को बैठा रथ पर।

दौड़ी बहन ख़ुशी में डूबी,

भइया का स्वागत करने को।

देखो मेरा भइया आया,

मन से मेरे दुःख हरने को।

यह इतना मजबूत प्रेम है,

टूट कभी ना यह पागा।

बहन और भाई दोनों में,

रूठ नहीं कोई पागा।                      

आशा पाण्डेय ,कैंप,अमरावती महाराष्ट्र ,

 

 

 

Sunday, July 2, 2023

1339-चार रचनाकार

 

1- शशि पाधा

मन से संवाद

 


दर्पण ने पूछा

   **

दर्पण ने पूछा  ---

कहाँ  झाँकते हो ?

किसे ढूँढते  हो ?

 

मुझे  चुप देख

हँस  कर कहा ---

तुम तो वही हो

फ़र्क  बस  इतना

कल तक आदमकद थे

आज बौने हो गये

 

परछाईं ने पूछा ------

किसे ढूँढते  हो ?

किसे नापते हो ?

मुझे चुप देख

हँस  कर कहा ---

तुम तो वही हो

फ़र्क बस इतना

कल तक थे पूरे

आज पौने हो गए

 

जग  ने  कहा  ---

क्या सोचते हो

क्या तोलते हो

मुझे चुप देख

हँस कर कहा

तुम  तो वही हो

फ़र्क बस इतना

कल तक बड़े थे

आज छौने हो गये

चाबी भरे तुम

खिलौने हो गये

-0-

2-डॉ. शिप्रा मिश्रा


1

चले गए

सब चले गए

जाने दो चले गए

अच्छा हुआ चले गए

क्या करना जो चले गए

 

अब मैं आराम से खाऊँगी

अपने हिस्से की रोटी

पहले तो एक ही रोटी के

हुआ करते थे कई-कई टुकड़े

 जाने दो चले गए

बहुत अच्छा है चले गए

 

उनके पोतड़े धोते- धोते

घिस गईं थीं मेरी ऊँगलियाँ

अब तो इन उँगलियों पर

जी भर के करूँगी नाज

 चले गए तो चले गए

 

पूरे बिस्तर पर सोऊंँगी अकेली

अब गीले- सूखे का झंझट न होगा

आराम से पसर कर बदलूँगी

सारी रात सुकून चैन की करवटें

 जाने दो जो चले गए

 

बनाऊँगी ढेर सारी पकौड़ियाँ

और रोज एक नया पकवान

जो खा न पाए थे अब तक

बचते ही न थे थोड़े से भी

 चले गए जाने दो

 

और हाँ..सिला लेंगे एक सुन्दर सी

मखमली जाकिट फूलों वाली

और पैरों के पाजेब भी

छमकती रहेंगे घुँघरू मेरे पाँव में

 चले गए जाने दो चले गए

 

कह देना कभी लौट आएँ तो

इसी चौखट पर काटना है उन्हें भी

अपने हिस्से का वानप्रस्थ

जहाँ वे छोड़ गए हैं अपनी बूढ़ी माँ को

 चले गए जाने दो चले गए

 

इसी चौखट पर नरकंकाल बन

अगोरती रहूँगी अपने पड़पोतों को

मेरी आँखों को तृप्त करने कभी तो आएँगे

उस दिन मेरी एक नहीं कई आँखे होंगी

 चले गए तो चले गए

 

नहीं मिलेंगी तब उनके हिस्से की लकड़ियाँ

ना उन्हें वन मिलेंगे जिसे छोड़ गए

सूखने, मुरझाने, जलने, मरने के लिए

मिलेंगे केवल आच्छादित बरगद की शाखाएँ

 चले गए जाने दो चले गए

-0-

 2- अनारक्षित डिब्बा

 

भीड़ में जैसे -तैसे

स्वयं को ढकेलती

बेटे की पकड़े उँगलियाँ

और बिटिया को

गोद में थामे,

दूसरे हाथ से

चेन की जगह

सेफ्टीपिन लगे

चार- चार बैगों को

लगभग घसीटते

भारत की एक

तथाकथित

शिक्षित, सशक्त महिला

अपने जीर्ण-शीर्ण

अस्तित्व को तलाशते

एक अनारक्षित डिब्बे में

अकेली जूझ रही थी

 

न आगे बढ़ने की

कोई गुंजाइश

न पीछे उतरने का

अप्रत्याशित विकल्प

 

पीछे से लगातार

दारू से भभकते बदबू

और पसीने में सने

एक बुजुर्ग का

ब्लाउज की पीठ पर

खुरदरी उँगलियों से

दिल का निशान बनाना

उसके दिल-दिमाग में

निशान के साथ -साथ

एक ख़ौफनाक मंजर भी

आँखों के सामने

उभर आता है..

 

जलती निगाहों से

पीछे मुड़कर देखा उसने -

"क्या बदतमीजी है!"

लेकिन

उस बुजुर्ग की आँखों में

शर्म के बदले

एक वीभत्स नंगापन ही

तैरता नज़र आया

 

भीड़ में धक्के खाती

जैसे-तैसे थकी- हारी

बर्थ के पास पहुँची

सज्ज-न से दिखने वाले

एक व्यक्ति ने

स्वयं खड़े होकर

बच्ची के साथ उसे

बैठ जाने का इशारा किया

उसके पत्थर जैसे

भारी कलेजे में

थोड़ी राहत-सी हुई

और

मन ही मन उसने

उदार सज्जन को

धन्यवाद दिया

 

अगला स्टेशन आते ही

उतरे कुछ लोग

धक्का - मुक्की, ठेलमठेल

कम हुई थोड़ी

खड़े सज्जन को भी

निश्चिंत होकर

बैठने की थोड़ी-सी

जगह मिल गई

 

बैठे लोगों में

छिड़ चली थी एक

निठल्ली तर्कहीन

राजनीतिक बहस

उदार सज्जन भी

अपने अधजल

राजनीतिक ज्ञान को

छलकने से रोक न सके

 

ट्रेन पूरी रफ्तार से

चल पड़ी थी

कुछ देर बाद ही

महिला ने महसूस किया

एक अनधिकृत स्पर्श

और ढेरों चिकोटियाँ

उदार सज्जन शायद

अपनी उदारता का

कुछ मोल चाहते थे;

लेकिन

महिला को यह मोल

स्वीकार्य नहीं हुआ

यहाँ क्रिया के बराबर

और उसके विपरीत

अगणित प्रतिक्रियाएँ

तमतमाहट के साथ हुईं

बाकी लोग भी

अनायास चौकन्ने हो गए

पूरे डिब्बे में

एक अजीब सा सन्नाटा

धुँधलके की तरह

कुछ देर तक छाया रहा

 

उदार सज्जन

अपना तिरस्कार

झेल नहीं सके

और..

अगला स्टेशन आते ही

लपककर नीचे उतर गए

जैसे किसी थानेदार ने

उनकी चोरी पकड़ ली हो

 

गंतव्य आते ही

तथाकथित

शिक्षित, सशक्त महिला

देश के स्वर्णिम भविष्य की

उँगलियाँ पकड़े,

अंक में मातृशक्ति को

सुरक्षित, संरक्षित करते हुए

श्रम संचित पूँजी वाले

सेफ्टीपिन लगे बैग

बेरहमी से घसीटते

रिक्शे की तलाश में

भीषण गर्मी और धूप में

तर-बतर, पस्त-त्रस्त

बढ़ी जा रही थी

 

उसे मालूम है कि

यूँ ही परिक्रमा

करती रहेगी सदियों तक

पौरुष- सम्पन्न वर्चस्व

और व्यवस्था की..

 

महिला सशक्तीकरण का

इससे बेहतर उदाहरण

भला और क्या हो सकता है!

-0-

3-हरदी गुरदी / डॉ.जेन्नी शबनम

 


 

 

कभी-कभी जी चाहता है  

इतना जिऊँ इतना जिऊँ इतना जिऊँ

कि ज़िन्दगी कहे-

अब बस! थक गई! अब और नहीं जी सकती!

हरदी गुरदी! हरदी गुरदी! हरदी गुरदी!

पर सोचती हूँ

मैं ज़िन्दा भी हूँ क्या?

जो इतना जिऊँ इतना जिऊँ इतना जिऊँ

क्यों जियूँ, कैसे जियूँ, कितना जियूँ?

मैं तो कब की मर चुकी

कभी भाला कभी तीर व तलवार से

सदियों सदियों सदियों से

अभी तेज़ाब आग बलात्कार और चुन्नी के फन्दों से

इसी सदी में इसी सदी में इसी सदी में

आज खून से लथपथ चीख रही हूँ

अभी अभी अभी

न तब किसी ने सुना न देखा न जाना

न अब।

 

दिन महीने साल व सदियाँ

आपस में कानाफूसी करते रहते-

ये ज़िन्दा क्यों रहती है?

ये मरकर हर बार जी क्यों जाती है?

मौत इसको छूकर लौट क्यों आती है

ये औरतें भी न अजीब चीज़ हैं

कितना भी मारो

जीना नहीं छोड़ती।

सोचती हूँ

मैं हँसती हूँ तो प्रश्न

प्रेम करती हूँ तो प्रश्न

अकेलेपन को भोगती हूँ तो प्रश्न

आबरू बचाने के लिए जूझती हूँ तो प्रश्न

हिम्मत दिखाती हूँ तो प्रश्न

हार जाती हूँ तो प्रश्न

अधिकार माँगती हूँ तो प्रश्न

प्रश्न प्रश्न प्रश्न।

उफ!

मेरी ज़ात ज़िन्दा है

यह प्रश्न है

बहुत बहुत बहुत जीना चाहती

यह भी प्रश्न है।

प्रश्नों से घिरी मैं

इतना इतना इतना जिऊँगी

कि ज़िन्दगी कहे-

जीना सीखो इससे

फिर कभी न कहना-

हरदी गुरदी! हरदी गुरदी! हरदी गुरदी!

-0-

4--भावना सक्सैना

 


उनके पास कैंचियाँ थी

आदर्शों, अपेक्षाओं की

कतर दी जाती थीं जिससे

उभरती-पनपती इच्छाएं,

मन के हौसले

और उड़ान...

कि ढलना चाहिए सांचों में

तय मानकों के अनुरूप।

 

अलग-अलग

खूबसूरत कैंचियां

रंग-बिरंगी

प्रेम की, ममता की

कुछ अनुभव की

नक्काशीदार...

छाँटती कुछ ख्वाब

और ख्वाहिशें सारी।

 

पांव के नीचे आती,

वांछाओं, कामनाओं की

कतरनों पर पाँव धरती

कदम दर कदम बढ़ती

कतरे जाने की

इतनी आदी हो गई

कि कब एक कैंची

ले ली अपने हाथ

वो जान ही न पाई!

 

और अब बरसों से

अपने ही आप

कतर रही है

अपने पंख,

अपनी परवाज़

कभी इस कारण

कभी उस कारण

औरों की खुशी को

बनाकर अपनी खुशी

तोलती अपना अस्तित्व

कतरा-कतरा कतरा हुआ...

प्राकृत की कतरन सा

छोटा बहुत छोटा...

-0-