पथ के साथी

Saturday, April 4, 2020

966-डॉ. रत्ना वर्मा की कविताएँ


डॉ. रत्ना वर्मा ( सम्पादक उदन्त्ती मासिक  http://www.udanti.com/)

1.ये पता ना था 

ये तो पता था कि
मौत तो इक दिन आनी है
जो उम्र लिखा है ओ जीना है 

पर ये ना पता था
कि 
यूँ चुपके से आ जाएगी
बिना किसी से कुछ कहे सुने
चुपके से ले जाएगी 

अपनों से गले मिलने का 
मौका दिए बगैर 
उन्हें 
बिना देखे बिना सुने 
अलविदा कैसे कह दें 

ये कैसी लड़ाई है 
अपने आप से 
जीने-मरने का
हिसाब करने का 
वक्त तो दो 

ऐसे कैसे आ सकती हो 
बगैर दस्तक दिए 
यूँ ही चुपचाप
-0-
2.कह दो

हवाओं से कह दो
तुम भी 
बहो ज़रा सम्भलके
इंसान की बदनियती ने
घोल दिया है ज़हर ।
तुम तो हर कण में बसे हो 
भला हमें छूऐ बगैर 
कैसे  बहोगे ।

मेरा बस चले तो 
तुम्हें भी बंद कर लूँ 
अपने घर के एक कमरे में
21 दिन बाद 
खोल दूँगी खिड़की दरवाज़े
फिर बहना पंख फैलाकर 
बेख़ौफ़
जहाँ तहाँ , यहाँ वहाँ ।
-0-
3. चिरैया

इन दिनों 
मेरे  आँगन  की चिरैया भी 
चहकने से डरने लगी ।
वह आदी नहीं है 
इस सन्नाटे की
दाना डालो तो 
इधर- उधर तकती हुई 
चौकन्ना होकर
एक दाना चुगती है 
और फुर्र से उड़ जाती है ।

दूर किसी पेड़ की डाल पर बैठी 
टटोलती है 
हम इंसानों की हरकतों को
जैसे पूछ रही हो
क्यों छिपा लिया है चेहरा तुमने 
क्या किया है कोई अपराध
या है पकड़े जाने का डर ।

यदि जीना है बेख़ौफ़ 
तो आ जाओ  हमारी 
दुनिया में
और उड़ जाओ 
जहाँ भी मन चाहे 
ना कोई रोकेगा ना कोई  टोकेगा 
-0-
4.आज की सुबह

रोज़ सुबह 
बगीचे में खिले 
रंग- बिरंगे फूलों को देख 
मन भी खिल उठता था 

पर आज 
फूल भी कुछ उदास थे 
रंग भी उनका कुछ
मुरझाया-सा था ।

तितली और भौंरे भी 
पास आने से कतरा रहे थे 

हवा मद्धम मद्धम 
बह तो रही है 
पर  जैसे 
उनकी गति पर भी 
कर्फ्यू का पहरा लगा हो 

क्या उन्हें भी 
अहसास हो गया है 
इस सन्नाटे का राज़ 

और 
थोड़ी दूरी बनाते हुए 
आ गए हैं 
हमारा साथ देने 
लॉक डाउन 
का पालन करने ।

-0-
5. तितली 

एक तितली ना जाने कैसे 
आज 
कपड़ों के संग भीतर आ गई
मैं घबरा गई
झटका देने पर भी 
नहीं उड़ी 
मैंने धीरे से पकड़ा
और
एक गमले में 
फूलों पर बैठा दिया
वह उड़ नहीं पाई 
पर 
अपने खूबसूरत
रंग- बिरंगे पंख 
बंद करके खोल रही थी 
मैंने  प्रार्थना की उसके लिए 
कहा 
बीमार होने की सजा 
तुम्हें नहीं मिल सकती 
फूलों का रस ले 
और 
उड़ आसमान की खुली हवा में 
घर के भीतर रहने की सज़ा तो 
हम इंसानों को मिली है !
फिर 
मैंने डरते हुए 
बाहर झाँका 
मन ही मन मनाती रही 
और 
मेरी मन की मुराद पूरी हुई 
तितली उड़ गई थी ।
-0- udanti.com@gmail.com 

Monday, March 30, 2020

965-संस्मरण


अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों----
            शशि पाधा
सैनिक पत्नी होने के नाते मुझे लगभग तीन वर्ष फ़िरोज़पुर छावनी में रहने का अवसर मिला । वहाँ रहते हुए जो अनुभव मेरे मन मस्तिष्क में अमिट चिह्न छोड़ गए हैं, उनमें से सब से अनमोल था मेरा बार-बार शहीद
भगत  सिंह, राजगुरु और सुखदेव की समाधि पर जाकर पुष्पांजलि अर्पित करना । जो भी मित्र, पारिवारिक सदस्य, वरिष्ठ सैनिक परिवार फ़िरोज़पुर आता, हम उन्हें इस समाधि स्थल पर अवश्य ले जाते। पंजाब राज्य में बहने वाली  पाँच नदियों में से सतलुज नदी के किनारे बसे हुसैनीवाला गाँव में बनी झील के किनारे समाधि बनी हुई है । इस स्थान से भारत-पाक सीमा एक किलोमीटर दूर भी नहीं है । जो भी लोग हुसैनीवाला सीमा पर भारत-पाक की परेड देखने आते हैं , वे इस महत्त्वपूर्ण  समाधि-स्थल पर अवश्य आकर पुष्प आदि चढ़ाते हैं ।
मैं  कई बार शाम को वहाँ जाकर उन्हें मौन श्रद्धांजलि देती थी; लेकिन एक दिन का अनुभव मुझे आज तक  कँपा देता है । मेरे वृद्ध माता-पिता कुछ दिनों के लिए मेरे पास फिरोजपुर में रहने के लिए आए थे । उन्हें मैं एक दिन शाम के समय इस समाधि स्थल पर ले गई। जैसा कि हर बार होता था, हमारे घर में रहने वाले सहायक भैया ने हमारी गाड़ी में कुछ पुष्पहार और कुछ पुष्प रख दिए थे । मैं अपने माता -पिता को लेकर समाधि- स्थल पर पहुँची, तो उन दोनों ने वे पुष्पहार तीनों शहीदों की प्रस्तर मूर्तियों पर चढ़ाए और हाथ जोड़कर नमन की मुद्रा में खड़े रहे । पास ही हमारी सेना की छोटी- सी पोस्ट है । उसमें धीमा-धीमा संगीत चल रहा था । गाना था – कर चले हम फिदा जानो-तन साथियो , अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो । हम सब की आँखें बंद थी और हम उस अलौकिक पल में पूरी तरह डूबे थे । अचानक मैंने महसूस किया कि मेरे पिता की आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी और वो गीता के किसी मन्त्र का जाप कर रहे थे ।  यह मेरे लिए अभूतपूर्व अनुभव था । मैंने अपने धीर, मितभाषी पिता को कभी रोते हुए नहीं देखा था । ऐसा क्या हुआ होगा कि वो इस समाधि स्थल पर खड़े होकर इतने विचलित हो गए । जब थोड़े संयत हुए, तो स्वयं ही हमसे बोले, “ लगभग मेरी ही उम्र के थे शहीद  भगत सिंह । मुझे एक बार इनसे मिलने का अवसर भी मिला था । वो बहुत ही सौम्य नौजवान था । देश -प्रेम की भावना उसके रोम- रोम से प्रकट हो रही थी । आज इन वीरों की समाधि देख कर मैं गर्वित भी हो रहा हूँ और ग्लानि भी हो रही है कि हम देशवासी इन्हें बचा नहीं सके । 23 वर्ष भी उम्र होती है किसी नौजवान के जाने की ? थोड़ी देर बाद फिर हाथ जोड़कर वे इस त्रिमूर्ति के सामने सिर झुकाकर खड़े रहे । जाते समय बोले-कृतज्ञ हूँ, अभिभूत हूँ । उन्होंने वहाँ चढ़ाए फूलों में से कुछ फूल उठाए और अपने रूमाल में बाँध कर रख लिये
उस शाम हम अपने माता -पिता के साथ बहुत देर तक हुसैनीवाला झील पर नौका विहार करते रहे । मेरे पिता स्वतन्त्रता संग्राम की बातें सुनाते रहे और मैं धनी होती रही । जब भी 23 मार्च का दिन आता है , मैं शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को श्रद्धा सुमन तो अर्पित करती ही हूँ; किन्तु पर्वत जैसा हौसला रखने वाले अपने धीर  पिता के साथ बिताए इन अनमोल पलों को याद करते हुए अंदर तक भीग जाती हूँ ।
-0-

Friday, March 27, 2020

964-कोरोना का पहरा हुआ है

डॉ.शैलजा सक्सेना

सड़कों का मन ज़रा ऐंठा हुआ है।
बाद अर्से, साथ घर बैठा हुआ है।
        
पाँवों की हड़बड़ी बंद है तालों में,
समय पसरा बिस्तरों में, आँगन में,
तितलियों सी मँडराने लगी पुरानी कथाएँ,
पुष्पगन्धी, बचपनी, बिसरी हवाएँ,
बात दुनिया भर की लेकर उड़ रही है,
बच्चे, बड़ों के संग बैठे दाएँ-बाएँ,
युगों का इतिहास जैसे खुल रहा है।
बाद अर्से, साथ घर बैठा हुआ है॥

मृत्यु के बादल अगर मँडरा रहे हों,
सहनशक्ति कदाचित बढ़ ही जाती,
कौन जाने, कौन-सा क्षण आखिरी हो,
मति भूल दुख-वैर, सब संग त्राण पाती।
बात बच्चों को भी लगती मीठी,  भली सी
क्योंकि पढ़ने को, नहीं कोई कह रहा है।
बंधनों में भले आज, हम सिकुड़े-बैठे
ताप सिगड़ी, घर संग- संग सो रहा है।
बाद अर्से साथ, घर बैठा हुआ है॥

एक नई दृष्टि मिल रही जैसे हमें अब,
देखते हैं, जोड़ते क्या? क्या टूटता था?
इस मिली फुरसत में फिर तौल लें हम
देख लें क्या तोड़ना, क्या जोड़ना है।
थामकर मति-गति, सो़चें तृप्ति से हम,
प्राप्त जो भी रहा, कितना भला है।
आँकड़ों को छोड़. देखें आइने में,
है वही यह आदमी जो मीलों चला है।
एक अनदेखे विषाणु का त्रास जग पर,
इस सदी की प्रगति से जेठा हुआ है।
बाद अर्से, साथ घर बैठा हुआ है॥

परछाइयाँ खत्म होंगी नाराज़गी की,
इबारतें प्यार की जो हम लिखेंगे,
साथ इतने दिन, घर में बंद होंगे
अनकहे डर, क्रोध भी सब कहेंगे।
धैर्य रख, खुले मन जो बात बाँचें,
संबंध फिर से मधुरता को खोज लेंगे।
एक नया आकाश होगा, बाद इसके
फिर नए परवाज़ से पंछी उड़ेंगे।
काल के इस विषम में, ’सम’ ढूँढने को
विद्वान हर एक देश का पैठा हुआ है।
बाद अर्से, साथ घर बैठा हुआ है॥
-0-
परिचय
डॉ.शैलजा सक्सेना

शिक्षा: एम. ए., (हिंदी), एम फिल, पी.एच.डी. ( दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली), मानव संसाधन डिप्लोमा (ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट) (मैक मास्टर यूनिवर्सिटी, हैमिल्टन, कनाडा)

उपलब्धियाँ: 2014 और 2015 न्यूयार्क और न्यू जर्सी के 'अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन' में कनाडा का प्रतिनिधित्व तथा 'कनाडा में हिन्दी साहित्य'; 'कनाडा में नाटक लेखन और प्रस्तुति' पर पत्र प्रस्तुति तथा कविता और कहानी सभा में प्रस्तुति; काउंसलेट ऑफ इंडिया ऑफिस तथा अन्य हिन्दी की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मान, टोरोंटो की संस्था'डांसिग डैमसैल्स' के माध्यम से प्राविंशियल सरकार द्वारा 'वूमैन अचीवर अवार्ड-2018' की प्राप्ति
प्रकाशित कृतियाँ, वर्ष एवं प्रकाशक
पुस्तकें: # क्या तुम को भी ऐसा लगा? (काव्य संग्रह), 2014 हिन्दी राइटर्स गिल्ड, कनाडा से प्रकाशित, 2014 द्वितीय संस्करण, अयन प्रकाशन, भारत
संग्रहों में प्रकाशित रचनायें:'अष्टाक्षर' (1992, काव्य-संग्रह) में आठ कवितायें,'काव्योत्पल' (2009) (कविता-संग्रह) में कविताएँ,'हाशिये उलाँघती औरत: प्रवासी' 2013 कहानी-संग्रह (रमणिका फाउंडेशन, दिल्ली) में कहानी,'इतर' कहानी-संग्रह (2015, नेशनल बुक ट्रस्ट) में कहानी तथा अन्य संग्रहों में कहानियाँ;
वैश्विक रचनाकार: कुछ मूलभूत जिज्ञासाएँ- भाग-2(2017) में 'साक्षात्कार' प्रकाशित
महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय, वर्धा और ज्ञानपीठ से प्रकाशित 'विश्व में हिन्दी' पुस्तक में 'कनाडा में हिन्दी' लेख दिल्ली विश्वदिद्यालय की ई-लर्निंग साइट (ILL) पर निर्मल वर्मा के'अंतिम अरण्य' लेख,अनेक पत्रिकाओं तथा वेब पत्रिकाओं में समीक्षाएँ, साहित्यिक निबंध तथा रचनायें प्रकाशित (सारिका,पांचजन्य, शोध दिशा, क्षितिज, अनभै साँचा, गर्भनाल, साहित्यकुंज, रचना समय, दस्तक, अनुभूति-हिन्दी.ओर्ग, अभिव्यक्ति-हिन्दी.ओर्ग आदि)
संपादन-'काव्योत्पल'- 2009 सह-संपादन- हिन्दी साहित्य सभा, साहित्यकुंज.नेट- वेब पत्रिका साहित्यिक परामर्श दाता
प्रकाशनाधीन:'अंत से पहले अनंत गाथा: भीष्म' (खंड काव्य)'थोड़ी देर और तथा अन्य कहानियाँ' (कहानी संग्रह)
नाटक निर्देशन: अंधायुग, रश्मिरथी, मित्रो मरजानी, संत सूरदास-जीवन, संत जनाबाई
अभिनय: अंधायुग में गांधारी, अपनी-अपनी पसंद में माँ, उनकी चिठ्ठियाँ (तुम्हारी अमृता का संक्षिप्त रूप), आई एम स्टिल मी
मेंटल और इमोशनल हैल्थ अवेयरनैस थ्रू आर्ट रेनैंसा (MEHAR) संस्था के साथ नाटक द्वारा डिप्रैशन आदि बीमारियों के बारे में प्रस्तुति
संप्रति: स्वतंत्र लेखन,'हिन्दी राइटर्स गिल्ड' की सह-संस्थापक निदेशिका; हिन्दी साहित्य सभा की आजीवन सदस्या और भूतपूर्व उपाध्यक्षा
निवास: (2288, डेलरिज ड्राइव, ओकविल, कनाडा- एल 6 एम, 3 एल 5) 2288, Dale Ridge Dr. Oakville, Ontario-L6M 3L5
E-mail: shailjasaksena@gmail.com

Thursday, March 26, 2020

963-आदमी लापता


1-तेवरी*(विमोहा -( राजभा राजभा)
रमेशराज

ज़िन्दगी लापता
रोशनी लापता।

फूल जैसी दिखे
वो खुशी लापता।

होंठ नाशाद हैं
बाँसुरी लापता।

लोग हैवान-से
आदमी लापता।

प्यार की मानिए
है नदी लापता।
-0-
2-आजकल-डॉ.पूर्वा शर्मा
1 
कुछ दिनों से हवाओं का रुख बदला है
खुश है परिंदे कि पूरा आसमाँ सिर्फ उन्हें मिला है ।
2  
आजकल सहर में इक नशा-सा है 
गुम हुआ शोर,
पंछियों की चहचहाट से मौसम खुशनुमा-सा है ।
3  
घरों में बंद सभी इंसान 
दूर हुए काले धुएँ के निशान
आसमाँ के चेहरे पर खिली मुस्कान ।
4  
एक नन्हे- से प्राणी ने छेड़ी ऐसी  विध्वंसक तान
मनुष्य सहमा, थमा फिर उसने गाया एकांत गान 
तुच्छ प्राणी ने धरा से चाँद तक अपना हक़ जताया
उसके अहंकार को देख प्रकृति ने उसे घर पर बैठाया ।
6
दूसरों से बातें तो हमेशा ही करते आया
बड़े अरसे बाद अपनों से बतियाने का अवसर पाया ।
7
थोड़ा परेशान और मुश्किलों से घिरा हूँ
बड़े दिनों बाद थोड़ा ठहरा हूँ
इसलिए कल का सूरज देखने को जिंदा हूँ

-0-
 3-मुश्किल बड़ी घड़ी है - डॉ.सुरंगमा यादव 


मुश्किल बड़ी घड़ी है 
संयम बनाए रखना 
एक फ़ासला बनाकर 
खुद को बचाए रखना 

है जिन्दगी नियामत 
असमय ये खो ना जाए
इस देश पर कोरोना
हावी ना होने पाए
ये वक्त कह रहा है 
घर से नहीं निकलना 

कुछ देर योग करके 
निज शक्ति को बढ़ाना 
संकल्प से ही अपने 
इस रोग को भगाना
हाथों को अपने साथी 
कई बार धोते रहना 

उनको नमन करें हम 
सेवा में जो लगे हैं 
सब कुछ भुलाके अपना 
दिन-रात जो जुटे हैं 
रहकर सजग हमेशा 
अफ़वाहों से भी बचना 

मुश्किल आज घड़ी है 
संयम बनाए रखना 
-0- असि. प्रो.महामाया राजकीय महाविद्यालय महोना लखनऊ
-0-
4- माना खता हुईं -प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'

माना ख़ता हुईं, हमसे भी कईं
ख़ुद को न किया माफ़, सबसे बड़ी यही!

अपना ये हाल तो होना ही था,
ग़ैरों के हाल जो छोड़ दिया!!

आज़मा न इतना, मुझे ए दोस्त
कि ऐतबार से ऐतबार ही उठ जाए!

लौट आते हैं  गूँजके, ये जो तंज़ तेरे
कहीं इर्द गिर्द दीवारों का असर तो नहीं?

जो मिलने का बहाने ढूँढते थे कभी
'फिर मिलेंगें' कहकर न लौटे कभी।

सादगी की सुगंध का क्या कहिए!
ये इत्र अब सरेआम नहीं मिलता।

बहुत थोड़े में खुश हो जाती हूँ मैं
शायद इसलिए मुझे थोड़ा ही मिला!

दर-ब-दर भटका किए, दोस्तों की तलाश में,
खामोशियों से करें बातें, कभी सोचा ही नहीं!
-0-

Wednesday, March 25, 2020

962कोरोना और मधुशाला( पैरोडी)

ममता शर्मा
(यदि आज के कालखण्ड में बच्चन जी होते तो कुछ ऐसे लिखते)
ममता शर्मा
1
कोरोना  से  डरा  हुआ  है हर कोई पीने वाला 
कैसे निकलूँ घर से मन मेँ सोच  रहा  है मतवाला 
सूनी  सड़कें, सूनी गलियाँ, मदिरालय  मेँ सन्नाटा
सिसक रहा है रीता प्याला बिलख  रही  है  मधुशाला 
2
कभी  हाँ हर  दिन सजती थी  मादक प्यालों की माला 
कभी  जहाँ चहका  करताथा हर  मदिरा  पीने  वाला 
मरघट - जैसी खामोशी है आज उसी के आँगन  मेँ 
विधवाओं  सी गुमसुम  बैठी ,अपनी प्यारी मधुशाला 
3
बड़े -बड़े  पंडित  दिन  भर जो  करते थे  प्रवचन  माला 
कोरोना  ने डाल दिया  है  उन  सबके  मुँह  पर ताला 
बंद  पड़े हैँ  मंदिरमस्जिद गुरुद्वारे भी खाली  हैँ
मजबूरी में फेर  रहें हैँ ,सब अपनी -अपनी माला
4
एक  बार जिसके पड़ जाए,कोरोना की वरमाला  
कितने  भी हों इष्ट  मित्र पर एक  ही छूने  वाला  
चाहे  कितना ऊँचा  पंडित, मुल्ला और  पुजारी हो
दूर -दूर सब रहते उससे  घरवाली, सालीसाला 
5
बाजार  भी बंद  ड़े हैं व्याकुल है पीने वाला  
डरा-डरा -सा  दीख  रहा  है , हर आने -जाने वाला,
सदा  चहकने वाले प्याले  औंधे  मुँह सब पड़े हुए
सोच रहा है बंद रहेगी ऐसे कब तक मधुशाला 
6
अपने घर में बैठ गया है हर कोई  देकर ताला 
किन्तु  चिकित्सक  को देखो वह  है  कितना  हिम्मत वाला 
कोरोना से पीड़ित होकर दो आएँ या सौ आएँ 
सबकी जान  बचाने में वह लगा हुआ है मतवाला 
7
सावधान  रहना है सबको ,बच्चा  बूढ़ा मतवाला 
घर  के  भीतर  रहो  भले  ही बाहर  पड़ जाए पाला 
कोरोना की दयादृष्टि  से दूर रहो दुनिया वालो 
बचा नहीं पाएगा तुमको फिर कोई ऊपरवाला 
8
बाहर निकलूँ तो जोखिम है कहता सबसे  मतवाला  
मरने से डरना बेहतर  है सोच रहा पीने  वाला
आग लगे मादक प्यालों  में, पीने  की  अभिलाषा में 
जान  रहेगी फिर  पी लेंगे भाड़ में जाए मधुशाला
9
मास्क लगाकर  घर से निकला  र  बाहर .जाने वाला 
हाथों में  भी ग्लव्स पहनकर आया  है  वह  मतवाला 
और जेब में रखे  हुए है सिनेटाइज़र की शीशी 
बाल न बाँका  कर  पाएगा कोरोना  इटली वाला 
10
खाँसी- और छींक से बचकर,  चलता हर भोलाभाला 
हाथ मिलाने में जोखिम है समझ  रहा  है मतवाला 
दूरी एक बनाकर सबसे रखना बहुत जरूरी  है 
पड़े रहेंगे वरना जग  में हाला  प्याला  मधुशाला 
11
चोर -उचक्के परेशान हैं,अब क्या  है होने वाला 
हर कोई घर में बैठा है बाहर से  देकर ताला 
धंधापानी  बंद रहेगा कब तक इस कोरोना से  
जल्दी इसका नाश करे अब महादेव डमरू वाला 
12
छेड़ छाड़  करने  में  अब तो हिचक रहा है मतवाला 
निर्भय होकर घूम रही है इधर-उधर साकी बाला 
कौन कहे ये भी आई हो  घूमघाम कर इटली  से 
लेने के देने पड़ जाएँ हो जाए गड़बड़ झाला 
13
तितर बितर  हैं सभी जुआरी, जाने क्या  होने वाला 
चाहे जितना फोन  मिलावें,एक नहीं  आने  वाला 
फेंट रहा है सूखे पत्ते ,सारा  दिन मजबूरी में 
राम करे पड़ जाए इस दुश्मन कोरोना पर पाला 
14
कोरोना का रोना लेकर बैठा  है  पीने वाला 
चिंतामग्न  पड़ा  है घर  में,वह सूखासूखा प्याला 
मित्रजन  का जमघट  भी यहाँ  नहीं लगा  है अरसे  से 
मुरझाईसी बंद पड़ी है बेबस  होकर  मधुशाला
15
जिसको भी जीवन  प्यारा  है उसने  घर  में डेरा  डाला 
भूल  गया  सब  धींगा-मस्ती मादक  प्यालों की माला 
कोरोना के डर से अपनी बिसराई  सब  चालाकी 
याद  न आई चंचल हाला भूल गया वह मधुशाला
16
जनता कर्फ्यू की महिमा को  समझ रहा है मतवाला 
इसीलिए बैठा है घर में हर कोई भोला भाला 
अपने हाथों से करनी है अपनी  ही पहरेदारी
अपने  जीवन का  बनना है सबको अपना रखवाला
-0-
ममता शर्मा,टीजीटी हिंदी GBSSS,S U ब्लॉक पीतमपुरा नई दिल्ली