पथ के साथी

Sunday, October 25, 2026

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 महापर्व (सॉनेट)/अनिमा दास

 


है मन आज उदीप्त कि हुआ तुम्हारा आगमन,

जल उठें सहस्र दीप कि उज्ज्वल हुआ है गगन।

अरण्य था हृदय में कहीं, काया हुई है तपोवन,

स्मृतियों के स्फुटित शतदल में रच गया जीवन।

 

प्राण में प्रणय की धारा, प्रणय में प्रलिप्त प्रभा,

अमिय-बूँद के अर्णव की ऊर्मियों में नर्तित रंभा।

पर्वमय है समग्र सृष्टि, झंकृत है वृष्टि में छटाभा,

ओ, तंद्रित तमिस्र! देखो, तनु में आए नव गाभा।

 

ज्योतिर्मय, काव्यमय है आज स्वेच्छा का स्वर्ग,

मंत्रमुग्धा है मंदार-मंथित मृत्यु, मुदित निसर्ग।

कल्प-कल्प की कथा में है निमग्न विहग-वर्ग,

हे अयोध्या के अधिप! है यह तुम्हारा ही अभिसर्ग।

 

ध्वस्त हुआ अभिशस्ति का देह-दुर्ग, हे विशालाक्षी!

अंतर्द्वंद्व के अंधकार में आज प्रकाश ही है साक्षी।

-0-कटक, ओड़िशा

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