पथ के साथी

Wednesday, February 23, 2022

1188-आँसुओं के कारवाँ

 (डॉ. गोपाल बाबू शर्मा से मैं बहुत सालों से परिचित हूँ।प्रस्तुत काव्य- संग्रह 'जिन्दगी के चाँद- सूरज' उनकी बहुआयामी रचनाओं का संग्रह है। इसमें गीत- गजल ही नहीं, बाल- गीत और हास्य- व्यंग्य प्रधान रचनाएँ भी सम्मिलित हैं।

उनकी कुशल लेखनी का ही यह करिश्मा है कि जिस विधा का भी उसने स्पर्श किया है, उसे सुवर्ण में परिवर्तित कर दिया है। लगता है उनकी कलम में पारस का निवास है।

- पद्मश्री कविवर गोपालदास नीरज )

 

 

यह न समझा था कि मेरी जिन्दगी के चाँद- सूरज,




रोज प्रात: साँझ आने से प्रथम ढलते रहेंगे।

 

हृदय- मन्दिर में बिठाकर साधना की थी तुम्हारी,

छोड़ सारे मीत मैंने कामना की थी तुम्हारी।

प्रिय! तुम्हारी आरती को प्राण के दीपक जलाए,

पर तुम्हारे भाव तो पाषाण थे, गलने न पाए।

 

जो लजीले स्वर तुम्हारे पास जाकर लौट आए,

आह बनकर मधुर गीतों में सदा पलते रहेंगे।

 

इन अँधेरी बस्तियों से दूर ही भागे सवेरे,

वह नहीं मधुमास आया, जो कभी सौरभ बिखेरे।

मोतियों के हार कितनी बार नयनों ने सजाए,

तृषित अधरों पर कभी मेरे न तुम मुस्कान लाए।

 

फल मिलें मीठे न चाहे, पर तुम्हारे हाथ से,

अनजान में सींचे गए अंकुर सभी फलते रहेंगे।

 

आत्मा की भावना को कल्पना ही मान पाए,

जान सारा जग गया, पर तुम न किंचित जान पाए।

देखने न आए न लोचन एक पल को भी तुम्हारे,

मिल गई मझधार मुझको, पर किनारे मिल न पाए।

 

सत्य है यह, आज रोकी जा रही है राह मेरी,

आँसुओं के कारवाँ लेकिन सदा चलते रहेंगे।

-0-

Saturday, February 19, 2022

1187- देवता ऐसे नहीं होते

 रश्मि विभा त्रिपाठी 


देवता दोगले नहीं होते


कि प्रथम दर्शन- बेला पर 

मधु मुस्कान के मोती लुटाएँ 

फिर हँसी की केंचुल उतारें 

बड़ा- सा अजगरी फन उठाएँ,


देवता लालची नहीं होते

मन्दिर में भाव की भेंट 

करते आए हैं स्वीकार 

भक्तिन से नहीं माँगते 

नकद पैसे, बंगला व कार


देवता नहीं देते 

शरणागत को यातना 

वे तो सदैव हरते हैं 

उसका दुख- संताप घना 


देवता नहीं करते 

दानवों- सा व्यवहार 

कि मारें, पीटें

घसीटकर देहरी के पार 

पटक दें मरने के लिए 



देवता बोलते ही नहीं 

मुँह से एक भी अपशब्द 

कि आँखों से उमड़े पश्चाताप

आस्था रह जाए स्तब्ध


देवता झूठे- मक्कार नहीं होते

कि मानवता माटी में मिला दें

अपना ईमान गिराकर 

सत्य को झूठ का गरल पिला दें



देवता आततायी नहीं

जो बनें कारण विध्वंस का

निरीह को ले जाए मृत्यु की ओर

परिणाम उनके दिए दंश का 


देवता भोगी- विलासी नहीं होते

कि एक को जी चाहे तब तक नोचें

फिर कामुकता- पूर्ति हेतु

अगले शरीर को पाने की सोचें 


देवता अपराधी नहीं होते 

कि तोड़ दें जीने की उमंग

भक्तिन को कर अपंग 

फिर अदालत में जमाएँ अपना रंग 


देवता नहीं होते 

दशानन- से अहंकारी

कि रचना उजाड़ दें 

अपने ही हाथ से सँवारी


देवता नहीं होते हत्यारे

कि पौंछ दें माँग का सिन्दूर

अपनी विधवा भक्तिन पर 

दिखाएँ निर्ममता भरपूर



देवता भूखे- नंगे नहीं होते

कि जिसके टुकड़ों पर जिएँ 

उसका सर्वस्व चाहें भीख में 

नहीं मिले, तो खून पिएँ। 


देवता नहीं होते निर्बुद्धि

भली-भाँति करते हैं गृह- प्रबंधन

नहीं तोड़ते नश्वर पदार्थ के लिए

जन्मों का पवित्र- बंधन


देवता शिकारी नहीं होते 

कि किसी को जाल में फँसाएँ

कतर दें पंख सारे

उड़ान पर प्रतिबंध लगाएँ 


देवता कायर नहीं होते 

कि जग- जंगल में शरणागत को 

भेड़ियों के हवाले छोड़ें 

निज उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़ें


देवता तानाशाह नहीं होते 

कि कुचल दें शरणागत की इच्छाएँ

उच्छृंखलता का पट्टा बाँध गर्दन में

उसे निर्जला धूप में नंगे पाँव दौड़ाएँ

रुकें तो पीठ पर कोड़े बरसाएँ 


छि:! देवता ऐसे कभी नहीं होते


स्त्री! तूने किस आधार पर 

पति की प्रजाति को

परमेश्वर घोषित किया है 

मानव के धर्म- आचरण को

क्या उसने तृण-मात्र भी जिया है

यदि हाँ!

तो हे सौभाग्यवती! 

तू लीन रह

उसकी आराधना में आमरण 

हर जनम में माँग उससे उसका ही वरण

वह भी किंचित चाहे न अन्यान्य वस्तु

एवमस्तु! एवमस्तु! एवमस्तु!

Thursday, February 10, 2022

1185-हरभगवान चावला की कविताएँ

 1-ख़त / हरभगवान चावला

 

मैंने तुम्हारा ख़त पढ़ा

उलट पलट कर देखीं

सारी ख़ाली जगहें

कि शायद कुछ और भी

लिखा हो कहीं

फिर कहा-

बस इतना ही!

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2- मंत्र /हरभगवान चावला

 

घने जंगल में हिंस्र पशुओं का डर हो

रास्ता भटक जाने की सम्भावना हो

भयावह तूफ़ान के आने की आशंका हो

अकाल में भूख पसरने के हालात हों

बाढ़ से पैदा हुई दलदली फिसलन हो

या फिर ज़ालिम निज़ाम में जीने की चुनौती

बचने का एक ही मंत्र है- एक दूसरे का हाथ थामें।

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3-कहानियाँ / हरभगवान चावला

1.

कहानियाँ अगर फाँस- सी कसकने लगें

तो उन्हें हर हाल में सुना जाना चाहिए

कहानियाँ अगर अनसुनी मर जाएँ

तो समाज मर जाता है उनके साथ

सभ्यता और संस्कृति भी।

2.

बड़ी-बड़ी हवेलियों के तहख़ानों में

बहुत- सी चीख़ती कहानियाँ ज़िन्दा हैं

जिस दिन तहख़ानों में हवा दाख़िल होगी

बादल प्रलय की तरह बरसेंगे

और आलीशान हवेलियाँ ढह जाएँगी।

3.

राजाओं की कहानियों में युद्ध थे

जीत का दर्प था या हार की शर्मिंदगी

इन कहानियों को पढ़ते हुए

लाशों की गंध आती है

उँगलियाँ लहू से लिथड़ जाती हैं।

4.

कुछ कहानियाँ भरी जवानी में

दीवारों में ज़िन्दा चुनवा दी गईं

प्रेत हो गईं ये कहानियाँ जब रोती हैं

तो इनके साथ रोता है इतिहास भी

और कातर धरती काँप जाती है।

5.

कुछ कहानियाँ अंकुर की तरह फूटती हैं

ज़रूरी नहीं कि अंकुर पौधे बन ही जाएँ

अक्सर ये अंकुर सूखे से झुलस जाते हैं

उखाड़ दिए जाते हैं खरपतवार की तरह

या डूब जाते हैं बाढ़ के पानी में।

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4-माँ ने भेजीं चीज़ें कितनी - हरभगवान चावला

 

माँ ने भेजीं चीज़ें कितनी

कटोरी भर मक्खन

साड़ी के एक टुकड़े में बँधा सरसों का साग

थैला भर लाल गोलिया बेर 

बहू के लिए काले मोतियों की हरिद्वारी माला

मोमजामे के लिफ़ाफ़े में रखी अरहर की दाल

उसी लिफ़ाफ़े में एक चिट्ठी

पड़ोस की लड़की की लिखी हुई

चिट्ठी में लिखा है बहुत कुछ -

'माँ और बापू ठीक हैं

पड़ोस में सब कुशल है

गणपत के घर लड़का हुआ है

किशन की माँ चल बसी है

खूब बारिश हुई है

घर में अब दूध हो गया है'

चिट्ठी में लिखा है और भी बहुत कुछ

पर वह स्याही से नहीं लिखा।

          (पहले कविता संग्रह 'कोई अच्छी ख़बर लिखना' में से)

Saturday, February 5, 2022

1184-भूल न जाना

 शशि पाधा

 

सुना है पूरब देस कहीं पर

तेरा है अब ठौर-ठिकाना

सुनियो रे ऋतुराज! कहीं फिर

पश्चिम नगरी भूल न जाना।

 

सात समन्दर पार देस में

दूर बसा है मेरा गाँव

बादल से तुम पता पूछना

वो तो जाने मेरा ठाँव

 

जंगल. पर्वत रोकेंगे पर

सूरज के संग चलते रहना

दिया वचन फिर भूल न जाना ।

 

केसर कलियाँ भरो जो झोली

पुरवा बाँध के लाना संग

मिट्टी की वो सौंधी खुशबू

पुड़िया में होली के रंग

 

 पीहर की गलियों से मेरी

 माँ  की मीठी यादें लाना

  सौगंध तुम्हें कुछ भूल न जाना ।

 

तुझसे ही सब उत्सव मेले

तुझसे ही कोकिल के गीत

ओढूँगी जब पीत चुनरिया

अधर सजें वासन्ती गीत

 

द्वार खड़ी मैं बाट जोहती

चिर प्रीति की रीत निभाना

राह-डगर फिर भूल न जाना ।

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Friday, February 4, 2022

1183

 

 

1-अफसाने -भीकम सिंह 

 

भोर-दोपहर

गोधूलि और रात

सभी के अफसाने 

 

कुछ सुलगते रहते 

कुछ गूँजकर

विस्मित करते 

 

कुछ दिलों में 

कुछ को हम

जूतों पे रखते 

 

कुछ पिस्सुओं-से

चिपके रहते 

कुछ शिशुओं-से रोते 

 

कुछ अछूत

खीज़ पैदा करते

कुछ लम्बे चुम्बन भरते 

 

कुछ धर्म उकेरते

कुछ मुँह फेरते

निरपेक्ष दिखा करते 

 

कुछ उलझ

स्वार्थ की डोर से 

बेबसी में सुलझा करते 

 

कुछ क्षितिज पार के 

असीमित 

कुछ गिन लो पोर  पे

 

अफसाने -

हमारे 

और आपके 

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2-शारदे जी की वंदना -परमजीत कौर 'रीत

 

ओ! माँ! वाणी , विनती सुन लो, द्वार तुम्हारे आए हैं

बुद्धि विवेक की याचना करने हाथ पसारे आए हैं

 

हे! करुणा की सागर मैया  दया दृष्टि हम पर डालो 

ज्ञान भरी लहरों को पाने मूढ़ किनारे आए हैं

 

हर दुर्गुण से दूर रहें और सद्गुण हर  अपनाएँ

बस इतनी सी कामना लेकर लाल तुम्हारे आए हैं

 

सन्मार्ग पे चलते जाएँ डगमग न हों पाँव कभी

ऊबड़-खाबड़ राहों पर बस तेरे सहारे आए हैं

 

दोष पराये ढूँढके हँसना जगती की है 'रीत' ये माँ !

तव चरणों की गंगा में  तन-मन को पखारे आए हैं

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3-क्यों रोता सारी रैन है-  निधि भार्गव मानवी

 

 

बोल मेरे व्याकुल मनुआ तू , इतना क्यों बेचैन है ।

दिन भर खोया खोया रहता,रोता सारी रैन है ।।

 

सबको सब कुछ नहीं मिलता इस मायावी संसार में

सदा उजाले न रहते रे, कुदरत के व्यवहार में

होंठ मचलते कुछ कहने को, सहमें सहमे बैन हैं

दिन भर खोया-खोया रहता, रोता सारी रैन है

 

मनचाहा यदि मिल भी गया रे, तो ही क्या हो जाएगा।

हाथ  पसारे  आया  था  तू, हाथ पसारे जाएगा।।

एक घड़ी को भी रे पगले, क्यों न तुझको चैन है

दिनभर खोया-खोया रहता, रोता सारी रैन है ।।

 

कर्म का लेखा अरे अभागे,जैसे-तैसे काट ले ।

अपने जीवन की ये खाई, किसी जुगत से पाट ले ।।

किस उलझन में फँसा हुआ तू,भीगे-भीगे नैन हैं ।

दिन भर खोया खोया रहता,रोता सारी रैन है ।।

 

जो मिला जितना भी मिला उतने में ही संतोष कर ।

कोसा मत कर परिस्थितियों को, ईश्वर पे मत दोष धर ।

पडे़ भोगनी पी बावरे, विधना की यह दैन है ।

दिन भर खोया खोया रहता,रोता सारी रैन है ।।

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