पथ के साथी

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Monday, June 1, 2015

डॉ पुष्करणा के काव्य का सरोकार



रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
    समाज के अन्य लोगों की तरह साहित्यकार भी अन्तत: एक व्यक्ति ही है। उसमें भी वे सभी अच्छाइयाँ अथवा क्षुद्रताएँ हैं ; जो किसी दूसरे व्यक्ति में हो सकती हैं। वह स्वयं अन्तर्विरोधों में जी रहा है;अत: उसे युग विशेष का मसीहा मानना भूल होगी। आज के विघटित होते मूल्यों के समाज में यह संभव नहीं कि कोई साहित्यकार का अनुवर्तन करे । अपने लफ़्फ़ाजी विरोध के कारण वह खुद भी विश्वसनीयता खो चुका है। खण्डित व्यक्तित्व लेकर जो साहित्यकार जी रहा है, वह परम्परा और परम्परामुक्ति दोनों स्थितियों में मिसफ़िट है। उसकी आवेशमयी वाणी प्रमाता को चमत्कृत भले ही कर दे, उसमें नया भावबोध जगाने में असमर्थ रही है।
समकालीनता परम्परा से नितान्त भिन्न नहीं है, परन्तु साहित्यकार जितना परम्परामुक्त हुआ है, उससे उसकी परस्पर सम्बद्धता उतनी ही खंडित हुई है। इसका मुख्य कारण हैदो अतिवादी ध्रुवों की ओर लक्ष्यबेध । आज़ादी के बाद की कविता भी इसका अपवाद नहीं है। जनतंत्र का जन्म (दिनकर) पन्द्रह अगस्त (गिरिजाकुमार माथुर) जैसी कविताओं को छोड़ दें, तो अधिकतर कविताओं में चुनौती के स्थान पर सामंजस्य के ही दर्शन होते हैं। चुनौतियों और संघर्ष के कंटकाकीर्ण पथ की तुलना में आवेग और आवेश का मार्ग अधिक  सुगम समझा गया । आवेग और आवेश के पथ का अनुसरण उन गीतों में आज भी बहुतायत से मिलता है जो गले की कलाबाजी से मंचों पर भीड़ जुटाते हैं। इसके ठीक विपरीत कविता को दुर्बोधता की अंधी सुरंग में ढकेलने की जिम्मेदारी से वे कवि मुक्त नहीं हो सकते, जो सिर्फ़ नीरस गद्य की अतुकान्तता को ही कविता समझने के मुग़ालते में मुब्तिला हैं। क्रियाशील जीवन से दूरी के कारण ये कविताएँ अपना मार्दव बरकरार नहीं रख पाई हैं। कवि का अन्तर्मुखी होना उसको समूह अनुभव से नहीं जोड़ पाता है। खण्ड अनुभव से जुड़ा उसका रचना संसार सामाजिक संघर्ष के सौन्दर्य को शब्द नहीं दे पाता है।
कविता की सार्थकता पर विचार करने से पहले यह प्रश्न उभरकर आता है कि आखिरकार कविता का सरोकार किससे है? जो संघर्ष कर रहा है, उससे है या जो कवि को अबोध बच्चा समझकर दिशानिर्देश करने की हिमाक़त करता रहता है, उससे है? सम्मानों और पुरस्कारों के प्रलोभन कविता को जनसामान्य और उसके दु:दर्द से काटते जा रहे हैं। कवि के अनुभव, लेखन और जीवन की दूरी निरन्तर बढ़ती जा रही है। साहित्य अब किसी की प्राथमिकता नहीं, कविता तो और भी नहीं । यही कारण है कि बदलते हुए जीवनमूल्यों में अच्छी कविता की पहचान का संकट और भी अधिक गहराता जा रहा है।
बुद्धिजीवी वर्ग का समस्याओं से पलायन आज के युग की सबसे बड़ी दुर्घटना है। दुर्नीति पर चलकर भी नीति पर लगातार बहस करते रहना, दुराचरण में लिप्त रहकर सदाचार की चर्चा चलाए रखना, कथनीकरनी और जीवन में पूर्णतया असत्य होने पर भी सत्य के लिए मरमिटने की बात करना (तीसरा रास्ता : श्रीकान्त वर्मा) जैसी स्थिति है तो दूसरी ओर जनशोषण, भ्रष्टाचार जैसी स्थिति में भी निर्द्वन्द्व होकर मुस्कुराने की बेहयाई (आपकी हँसी: रघुवीर सहाय) रोटी से खेलते रहने का दानवी अधिकार (रोटी और संसद : धूमिल) चिन्ता उत्पन्न करते हैं। भीड़ में होने पर भी अकेलापन और असुरक्षा (रामदास : रघुवीर सहाय) विचलित करते हैं, लेकिन उत्तेजित होने और चीखने पर आज का आदमी और भी अकेला हो जाता है। (अकेले पेड़ों का तूफ़ान : विजयदेव नारायण साही) इस अकेलेपन का एक कारण है जब बोलना था, तब स्वार्थ के कारण चुप रह जाना या संवादहीन होकर रह जानाजो बोलना चाहते हैं, उससे उलट कुछ और ही बोल देना । यही मृत्यु है
          एक गलत भाषा में / गलत बयान देने से / मर जाना बेहतर है(छीनने आए हैं वे : सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)
आज़ादी के बाद हमने एकजुट होने की बजाय टुकड़ों में बँटना बेहतर समझा। राष्ट्र के प्रति हमारी निष्ठा जितनी कम हुई है, स्वार्थपरता की ओर उतनी ही अग्रसर हुई है।
देश कागज पर बना / नक्शा नहीं होता / कि एक हिस्से के कट जाने पर / बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें (कभी मत करो माफ1 : सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)
बन्दूक की नली से शासन चलाना किसी शासन का नहीं वरन् पूरे राष्ट्र का पतन है। सर्वेश्वर जी ने कभी मत करो माफ2 कविता में अपने इस विचार को दृढ़तापूर्वक प्रस्तुत किया है।
एक ओर देश प्रेम का लबादा ओढ़कर लूटने वाले सक्रिय हैं (नया तरीका : नागार्जुन) दूसरी ओर वे निर्लज्ज हैं जिनकी मर्यादा वह हाथी का पैर है, जिसमें / सब की मर्यादा समा जाती है / जैसे धरती में सीता समा गयी थी ।-(जियो मेरे : अज्ञेय)  यही कारण है कि आदमी की विश्वसनीयता रेत की तरह ढह गई है। रोटियों का हिसाब वातानुकूलित भवनों की फाइलों में क़ैद है (पटाक्षेप : केवल गोस्वामी) तब मेहनत करने वाले के लिए फुटपाथ और जेल की सलाखें एक जैसा महत्त्व रखती हैं। ये कवि कविता के तेवर बनाए रखने में सफल सिद्ध हुए हैं। आत्म विस्मृति की कविता को परे धकेलकर समाज की नब्ज पर अपनी पकड़ बनाई है।
          यह मेरा उत्तर है में डॉ सतीशराज पुष्करणा की कविताएँ संवेदना की विविधता, आधुनिक भावबोध और यथार्थ के बहुआयामी और बहुस्तरीय अनुभव को मौलिक ढंग से प्रस्तुत करती हैं। इन कविताओं में दायित्वबोध, आस्था, संघर्ष, क्रियाशील जीवन, मूल्यों का विघटन, वैचारिक टकराव, सुखदु:ख आदि से जुड़े बहुत सारे प्रश्नों का उत्तर मिलता है। पुष्करणा जी यद्यपि लघुकथाकार के रूप में अधिक चर्चित हुए हैं, कवि के रूप में नहीं। इन कविताओं से गुजरते हुए मुझे लगापुष्करणा जी का कवि, लघुकथाकार से ज्यादा प्रौढ़ है। इनका चिन्तन लघुकथाओं की अपेक्षा इन कविताओं में अधिक मुखर हुआ है।
जीवन के प्रति कवि की गहरी आस्था है। हिम्मत हार कर आस्था को जीवित नहीं रखा जा सकता। जीवन का शाश्वत सत्य क्या है? इसका उत्तर कवि बखूबी देता है
 रात जितनी गहरी होगी / दिन उतना ही चमकीला होगा ।-(सुबह दूर नहीं 42)

चट्टानों को तोड़ो / शीतल पानी / तुम्हारी प्रतीक्षा में है।- (आशा 55)
कवि की कविताएँ युगबोध के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करने में पीछे नहीं है, पंजाब की धरती को जैसे किसी नामुराद की नज़र लग गई है। इसका प्रभाव झेलम पर भी पड़े बिना नहीं रह सका है
झेलम आज अपने गर्भ में
पानी की जगह क्यों लाशें समेटे
सिसक रही है?-(आज का पंजाब9)
संघर्ष के बिना अस्तित्व नहीं बचाया जा सकता । जो कल्पनाजीवी हैं वे संघर्ष से पलायन करने का रास्ता ढूँढ़ते रहते हैं। कटु यथार्थ से साक्षात्कार करने वाले निरन्तर संघर्ष का ही वरण करते हैं-
हम संघर्षरत हैं / और संघर्ष ही हमारा पर्याय है!
क्योंकि हमें परछाई पकड़ने की आदत नहीं है।-(कवि से 9)
संघर्ष के मूल में आक्रोश होता है। सामाजिक संघर्ष के बिना हमें हमारे हिस्से की हवा भी नहीं मिल सकती है, इसीलिए पक्षपात (26) कविता में कवि कहता है
हे हवा ! / तुम्हें भी बाँटा जाएगा / तुम्हें बँटना ही होगा ।
-खंडित व्यक्तित्व जिसका आधार हो, वह संघर्ष नहीं कर सकता । उसका विश्वास धूप में नहीं वरन् निरन्तर स्फीत होती जाती खुशफहमी की छाया में होता है। कुंठित व्यक्ति इससे अधिक कुछ कर भी नहीं सकता
धूप भागती जा रही है। और मेरी छाया,
धूप को पकड़ने हेतु लम्बी होती जा रही है।-(खुशफ़हमी 9)
आत्ममुग्ध कवि अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह नहीं कर सकता । इस तरह की कविता लिखना केवल मानसिक ऐयाशी कही जाएगी । परन्तु यह कवि निष्क्रिय, निश्चेष्ट लोगों पर तीखा कटाक्ष करता है
और उल्लू / अपनी कोटर में बैठा
अपनी विजय का डंका पीट रहा है।-(ग़लतपफहती 10)
जो अपनी जड़ों से कट गया है, अन्तर्मुखी है वह भी समूह चेतना की उपेक्षा नहीं कर सकता
पानी में सड़ते हुए आदमी की गंध
तुम्हें ऊपर तक भी नहीं छोड़ेगी ।-(संभावना11)
सबसे अलगथलग रहने का नाम कुछ भी हो, जीवन नहीं हो सकता
दोस्त ! अपने का अलग काटकर /चलने का नाम क्या जीवन है ?-(44)
शोषक वर्ग विभिन्न लुभावने रूप में जन सामान्य के जीवन को गुमराह करता रहा है। मजदूरी पर आश्रित रहने वाला किसी इमारत की कक्षा से नहीं जुड़ पाता। कवि के मन में उसके लिए विशिष्ट स्थान है-
अपने बच्चों को / किसी सम्राट या ऐसे ही
किसी बनवाने वाले के बारे में नहीं /
तुम्हारे ही बारे में बताता हूँ।-(प्रेरणा स्रोत 14)
कवि की आम आदमी के लिए सहानुभूति है। वह इस आदमी के विरोध में खड़े असली मुखौटों को बेदर्दी से नोच डालता है। पुष्करणा जी की यह कविता सशक्त अभिव्यक्ति का प्रतिदर्श है,वे एक्सरे नहीं कराएँगे, क्योंकि
वे जानते हैं
एक्सरे के बाद ऑपरेशन होगा
और ऑपरेशन में / निगले गए आदमी वाला
रहस्य खुल जाएगा ।-(अस्तित्व आम आदमी का 36)
वैचारिक टकराव और जीवन की विद्रूपता से कवि आहत हो उठा है। पेट की आग ने हसीन चेहरे को झुर्रियों से भर दिया है
और रोटियाँ / मुँह बिचकाते हुए / आगे बढ़ रही हैं।-(आज का कल 56)
वैचारिक टकराव के कारण आदमी की संवेदना भोथरी हो गई है। वह निर्बल से जीने का अधिकार भी छीन लेना चाहता है जीने का हक़ / उसे न तब था / न अब है।- (गुलाम53)
कवि ने इसका कारण बताया है
भावना और अनुशासन की / नदियाँ सूख गई हैं /
इन पर बना / आदमियत का पुल / टूट गया है।-(वही 53)
इस विसंगति का कारण है आत्मविश्लेषण का अभाव । आत्मविश्लेषण के बिना चरित्र और आचरण में संगति नहीं बैठ पाती
जो स्वयं दिशाहीन हो / जो समझता ही न हो / वो समझाएगा क्या?
/ दिशा बताएगा क्या?- (17)
साम्प्रदायिक सौहार्द में इसी विसंगति के कारण निरन्तर कमी आती जा रही है। यदि आदमी की सही तलाश कर ली जाए तो लक्ष्यविहीन जीवन जीने से बचा जा सकता है
पहले स्वयं अपने को तो / मंदिर या मस्जिद बना लो /
और फिर उससे भी / अधिक  आवश्यक है
कि उसमें एक अदद आदमी बैठा लो ।- (16)
विश्वसनीयता का अभाव जनसामान्य के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बना हुआ है, क्योंकि
आज का धर्मराज / ऊँचे सिंहासन पर बैठकर भी / गुनाहों का फैसला नहीं करता ।- (22)
किसी को न्याय से वंचित करना उसको अपराधजगत् की ओर धकेलना है। ऐसे लोगों को बारूद की गंध अच्छी लगती है। ये आदमी और जानवर में भेद नहीं कर पाते । यद्यपि वे यह ज़रूर जानते हैं-
बारूद किसी का अपना नहीं होता / निशाना एक दिन वे भी बनते हैं /
जो दूसरों को निशाना बनाते हैं।- (41)
आतंक के इस माहौल में आदमी की जान की कीमत निरन्तर घटती जा रही है। युद्ध के बाद क्या बच पाता है ? इस प्रश्न का उत्तर कवि ने आखिर किसलिए- कविता में युद्ध की विभीषिका का यथार्थ स्वरूप चित्रित किया है
युद्ध के बाद शेष रह जाती है केवल राख /
जो उड़उड़ कर करती है उपहास / क़ातिलों का- (38)
आदमी की जान लेने वाली गोली तो निरपेक्ष है । उसकी न किसी से शत्रुता है, न मैत्री
यह विडम्बना ही तो है कि / आदमी की जान की कीमत /अब मात्र एक गोली है /
जिसकी न किसी से दुश्मनी है और न किसी से दोस्ती ।- (विडम्बना47)
कवि ने विद्रूप स्थितियों के प्रति अपना विरोध दर्ज़ कराया है। कुछ कविताओं में धरदार व्यंग्य अपना मारक प्रभाव स्थापित करने में सक्षम हैं। यह चोट कभी मशीनी औपचारिकता पर पड़ती है तो कहीं ओढ़े गए छिन्नमूल आदर्शों पर-
मैंने / तुम्हें पाया भी तो कब !
(1)जब तुम्हारी / पुण्यतिथियाँ मनाई जा रही थीं ।- (66)
(2)भारत ! / रोटी का देश है / पेट भरना चाहिए ।- (74)
मूल्यों के विघटन के प्रति कवि की चिन्ता वाजिब है, इसीलिए वह कहता है-
आसमान को और नंगा मत करो,
धरती के अस्तित्व पर ख़तरा है।- (सूत्रधर 25)
जड़ता की स्थिति को कैसे बदला जाए ? प्रतिगामी ताक़तें इतनी मजबूत हो चुकी हैं कि प्रतिरोध का स्वर अब अकेले कंठ की पुकार बनकर रह गया है। चमड़ी की मुलामियत खुरदराहट में बदल रही है।
दाँत गड़ाने से / टूटने का भय होगा।- (78)
इन निर्लज्ज परिस्थितियों का प्रतिरोध केवल दो प्रकार से संभव है-
पहलाचमड़ी को / मुलायम करो / पोलसन (मक्खन) रगड़कर /
और दाँतों को अधिक  तेज करो ।- (आत्म संतोष 78)
तमाम विकृतियों से जूझती हुई पुष्करणा की कविता ने अपना मार्दव नहीं खोया है। नितान्त आत्मीय क्षणों में सहजता दर्शनीय है
कभीकभी मुझे ये एहसास होता है, जैसे तुम दुनिया की तमाम /
जे़रोज़बर से गुज़र कर /चुपचाप मेरे पास आकर बैठ गई हो ।- (50)
शिल्प की दृष्टि से पुष्करणा जी की कविताएँ प्रौढ़ एवं सशक्त हैं। आसमान और धरती का बिम्ब अपने संश्लिष्ट रूप में उपयुक्त छाप छोड़ता है
धरतीआसमान मुँह लटकाए /
एक दूसरे से चिपक गए हैं ।-(सूत्राधर 25)
समय सापेक्ष की बात में हठी लोगों की मन:स्थिति को उभारने के लिए काली चादर का उपमान सार्थक एवं सशक्त है-
और हठ / मस्तिष्क पर पड़ी / एक काली चादर है।- (33)
प्रतीक प्रयोग से कवि ने उच्च एवं निम्न वर्ग के भेद को प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत किया है
हे ! ऊँचे एवं घने / वृक्षो! / अपने नीचे उगे हुए /नन्हें पौधें पर दया करो ।- (69)
चौराहा उस संवेदनशील व्यक्ति का प्रतीक है जो अपने परिवेश में घटित होती अनचाही घटनाओं पर दुखी एवं उद्वेलित होता है, परन्तु साधनशून्य होने के कारण प्रतिकार नहीं कर पाता
ठहरता है गवाह / तू ही /
उनके हर गुनाह का / पर मौन रहता है /
भीतरहीभीतर लहूलुहान होता है।- (49)
पुष्करणा की इन कविताओं का सरोकार आज की रंग बदलती, जनमानस में अँगड़ाई लेती विविध भंगिमाओं से है। भाषा एवं भाव दोनों ही दृष्टियों से समृद्ध ये कविताएँ पाठक से अनायास तादात्म्य स्थापित कर लेती हैं।आशा करता हूँ कि काव्यजगत् इन ताज़ा कविताओं की ताज़गी का समादर करेगा।
-0-
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
(रचनाकाल : 5 अगस्त, 1992-बरेली)

Friday, October 12, 2007

लघुकथा में सामाजिक बोध

लघुकथा में सामाजिक बोध

जन जीवन में उठने वाली तरंगों को रूपायित करना, किसी भी विधा की शक्ति का अहसास कराता है। लघुकथा के लिए हम लम्बी–चौड़ी बातें न करके इसके विषय क्षेत्र पर दृष्टिपात करें तो पता चलता है कि यह विधा समाज के दु:ख–दर्द से अन्य विधाओं की तरह ही जुड़ी है। काल के निरन्तर प्रवाह में परम्परा उतनी ही स्वीकार्य हो सकती है जितनी समसामयिक हो, जितनी भावी स्थितियों के लिए उत्तरदायी बन सकती हो। अतीत में जो समस्याएँ थीं, वे ज्यों की त्यों वर्तमान फलक पर नहीं है। कुछ समस्याओं के समाधान खोजे गए हैं तो कुछ नई समस्याएँ भी दिन प्रतिदिन उपजती जा रही हैं। अतीत के सन्दर्भ कभी भटकाव में राह सुझा रहे हैं ,तो कुछ ऐसे भी हैं जो नया भटकाव पैदा कर रहे है। चाहे शिक्षा हो चाहे राजनीति, चाहे व्यक्तिगत जीवन हो, चाहे व्यक्ति से आगे बढ़कर पूरे मानव समाज को समेटने की आतुरता, चाहे चिन्तन हो चाहे कार्यरूप; सभी में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। ये परिवर्तन शुभ संकेत एवं अपशकुन दोनों ही रूपों में हैं। लघुकथा ने शुभ संकेत देकर जहाँ आगे बढ़ने के लिए मार्ग प्रशस्त किया है, वहाँ उन अपशकुनों से भी हमें सावधान किया है; जो सामाजिक संवेदना के लिए भयावह हैं।
लघुकथा के क्षेत्र में ऐसे लेखकों की लम्बी सूची है; जिन्होंने सार्थक रचनाओं का सर्जन किया है। इनमें विष्णु प्रभाकर, रमेश बतरा, बलराम, सतीशराज पुष्करणा जगदीश कश्यप, मधुदीप मधुकांत, सुकेश साहनी, अंजना अनिल,शकुन्तला किरण, प्रतिमा श्रीवास्तव,अशोक भाटिया, रूपदेवगुण,शंकरपुणताम्बेकर, उपेन्द्र प्रसाद राय, श्यामसुन्दर अग्रवाल डा0 श्यामसुन्दर दीप्ति, सुभाष नीरव ,युगल ,कृष्णानन्द कृष्ण ,बलराम अग्रवाल आदि प्रमुख हैं।
लघुकथाओं में नारी के विविध रूपों का चित्रण किया गया है। माँ,बहिन,प्रेमिका माँ,बहिन,प्रेमिका,मित्र,पतिता,शोषिता,बेटी, परिवार के लिए रोटी का जुगाड़ करती संघर्षरता ,संतान–पति–प्रेमी आदि द्वारा उपेक्षिता एवं वंचिता। रिश्तों के दायरे को नकारती गुण–दोष की प्रतिमा किन्तु सहजता का जीवन जीने वाली समाज के उपालम्भ सहने वाली। प्रेम करने वाली आनन्दी (कायर: कमलेश भारतीय) से राजीव की यह भावना जैसे ही प्रकट होती है, वह उसकी कठोर भर्त्सना करती है। सुकेश साहनी की लघुकथा ‘मृत्युबोध’ में बूढ़ी सुमित्रा के साथ ठण्डी पथराई पारिवारिक संवेदना केवल मृत्यु का इंतजार कर सकती है, दूसरी ओर ‘गुठलियाँ’ की बिट्टो और बूढ़ी माँ के लिए उपेक्षा को सींचने वाली भी नारी ही है। ‘हिस्से का दूध’ (मधुदीप) की पत्नी तमाम अभावों के बीच पारिवारिक सम्बन्धों की उष्मा बनाए हुए है। ‘जगमगाहट’ (रूपदेवगुण) की नौकरी पेशा युवती हर समय वासना भरी नज़रों से अपना अस्तित्व बचाए रखने के अन्तर्द्वन्द्व को झेलती रहती है। यद्यपि उसकी आशंका निराधार सिद्ध होती है तो भी दफ्तरों में हो रहे यौन शोषण को नकारा नहीं जा सकता है। ‘विश्वास’ (पुष्करणा) की पत्नी को अपने पति की लम्पटता का पता नहीं । वह उस पर इतना विश्वास करती है कि उसके हाथ से जहर भी पी सकती है।
डॉ. कमल चोपड़ा ने ‘सीधी बात’ में लड़की की सामाजिक उपेक्षा को रेखांकित किया है तो ‘खेल’ में देहशोषण की त्रासद स्थितियों को चित्रित किया है। ‘पाप और प्रायश्चित’ (बलराम) में उन तथाकथित धार्मिक विधि निषेधों पर उंगली उठाई है जिनके कारण प्यार और मातृत्व को पाप मानने की भावना पनप सकती है। ‘लड़की (डॉ.उपेन्द्र प्रसाद राय) में विभिन्न स्तरों पर शोषित एक लड़की की करुण कथा है। लड़की को उपभोग की सामग्री समझने वालों के मुँह पर एक करारा तमाचाहै । ‘नारी’ में नारी को भोग्या मानने वाले रुग्ण संस्कारों पर चोट की है। डॉ.शकुन्तला किरण ने ‘रूपरेखा’ और ‘मौखिक परीक्षा’ में छात्राओं के शोषण के जिम्मेदार शिक्षकों पर चोट की है। ‘तार’ में प्रेम की गहराई को, रिश्तों के अपरिभाषित सूत्रों को व्यंजित किया है। सारे सिद्धान्त इसकी गूँज के सामने मूक हो जाने के लिए बाध्य हैं।
धर्म का स्थान कट्टरता और उग्र साम्प्रदायिकता ने ले लिया है। राजनीति इन दोनों में फर्क नहीं करती। वह स्वार्थ पूर्ति के लिए किसी भी विषबेल को मानवमात्र की आवश्यकता कहकर रोप सकती है। जनमानस को दूषित करने वाले लोग असहिष्णुता को बढ़ाने वाले अवसर तलाशते रहते हैं। घोर साम्प्रदायिकता का घिनौना जानवर जब हमारे मन को विकृति की ओर ले जाता है, तभी नफरत फैलती है। हम इस जानवर को न मारकर, उस बेचारे सीधे–सादे आदमी को कत्ल करने में इतिश्री मान बैठते हैं, जो किसी विशेष वर्ग से जुड़ा है। रमेश बतरा की लघुकथा ‘सूअर’ बड़ी सादगी से साम्प्रदायिक प्रश्नों का उत्तर देती है। ‘‘मस्जिद में सूअर घुस आया’’ का उत्तर करवट लेकर फिर से सोता आदमी देता है–‘‘यहाँ क्या कर रहे हो?.....जाकर सूअर को मारो न!’’ ‘छोनू’ (कमल चोपड़ा) का बच्चा जब साम्प्रदायिकता का शिकार होने लगता है तो भयाक्रांत हो उठता है–‘‘मैं छिक्ख–छुक्ख नई ऊँ...मैं तो छोनू हूँ...।’’ न जाने कितने निरीह सोनू अन्धी सुरंग में ढकेले जा रहे हैं। साम्प्रदायिक विद्वेष के मूल में प्राय: भय और अफवाहें होती है। ‘आइसबर्ग’ (सुकेश साहनी) में भीड़ के इस मनोविज्ञान का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। उसकी शहादत (जगदीश कश्यप) ‘आदमी’ (बलराम) दिशा (पुष्करणा) भी प्रभावशाली लघुकथाएँ हैं।
जातिवाद ने साम्प्रदायिकता की तरह ही घृणा का प्रसार किया। धनी–निर्धन, धर्म–विधर्म के बीच पिसते लोग अब ऊँच–नीच के दायरे में बँटकर उपेक्षा,शत्रुता का प्रतिशोध आदि अमानवीय चिन्तन से विभाजित होने लगे हैं। शोषित ओर पीड़ित की व्यथा को लघुकथा ने स्वर प्रदान किया है। ‘पहला आश्चर्य’ (चोपड़ा) गरीबी की करुण पीड़ा को व्यक्त करती है तो आँधी (चित्रेश) में गरीब बनाने की तिकड़म का कड़ा प्रतिरोध उभरा है। ‘मृगजल’ (बलराम) में भविष्य के असंभावित सुख की कल्पना में खोया वर्तमान में दुर्दशाग्रस्त जीवन जीने वाला कृष्ण का परिवार है। ‘प्रश्नहीन’ (कमलेश भट्ट कमल) में बेरोजगारी की छटपटाहट, बैकुंठ लाभ (कुमार नरेन्द्र) में दिहाड़ी की विवशता में घुटता सामाजिक दायित्व ‘पेट पर लात’ (विक्रम सोनी) में मजदूर की दयनीय दशा का चित्रण किया गया है।
हमारे समाज में बहुत सारी विद्रूपताएँ हैं। हम उन्हें देखकर सतही तौर पर हँस सकते हें परन्तु गहराई से सोचें तो छटपटाहट होती है। हमारे आसपास के बहुत सारे चेहरों, परिस्थितियों एवं सिद्धान्तों के खोखले आदर्श का मिथक टूटता नज़र आता है। शिक्षा–जगत को ही लेँ–अभिभावक की जल्दबाजी बच्चे के बचपन को छीन ले रही है। ‘सपना’ में (अशोक भाटिया) ने इस स्थिति पर करारा व्यंग्य किया है। चिडि़याघर (श्यामसुन्दर अग्रवाल) में स्कूलों की दुर्दशा, बैल (साहनी) में बाल मानसिकता को न समझ पाने की भूल, ‘कितना बड़ा मूल्य’ (डा0राय) में अनुशासन के ढोंग की ओट में नन्हे–मुन्नों की कुचली सहज भावनाओं की प्रतिध्वनि मन पर खरोंच छोड़ जाती है।
आर्थिक और सांस्कृतिक दबाव में आकर मनुष्य का स्वार्थ और प्रबल हुआ है। यही कारण है कि पारिवारिक रिश्तों की गर्माहट कम होने लगी है। कमल चोपड़ा ने ।माँ पराई लघुकथाओं में इस टूटन को उजागर किया है तो ‘अंत तक’ में उसी टूटन को जोड़ने का प्रयास किया है। बलराम,शंकर पुणताम्बेकर और डा0 राय की लघुकथाओं में राजनैतिक छल- प्रपंचों पर कड़ा प्रहार किया गया है।
इस प्रकार लघुकथा के बहुआयामी विषय चयन के आधार पर हम कह सकते हैं कि यह विधा सामाजिक बोध से अन्य विधाओं की तरह अन्तरंगता से जुड़ी है।

Friday, August 3, 2007

हिन्दी लघुकथा: बढ़ते चरण

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
लघुकथा पर प्राय: ये आरोप लगते रहे हैं कि इसका विषय क्षेत्र नितान्त सीमित है। यह एक आंशिक सत्य है, पूर्ण सत्य नहीं। आंशिक सत्य इस रूप में कि लघुकथा के क्षेत्र में रातों–रात प्रसिद्ध प्राप्त करने की ललक सँजोए एक भीड़ आ घुसी है। इस भीड़ को न जीवन–जगत का गहरा अनुभव है और न अनुभव प्राप्त करने की लालसा । भाषा के मामले में यह वर्ग नितान्त लापरवाह है । फिलर की तरह रचनाओं को इस्तेमाल करने वाले सम्पादकों का इस वर्ग को भरपूर स्नेह मिला है । यही कारण है कि समय–समय पर लघुकथा को चुटकुलेबाजी के आरोप भी झेलने पड़े हैं। दूसरा वर्ग उन लेखकों का है जो रचनात्मक स्तर पर अत्यन्त सजग हैं। हिन्दी की अन्य विधाओं में विषय की जितना विविधता मिलती है, लघुकथा भी उतनी ही वैविध्यपूर्ण हैं।
लघुकथा के क्षेत्र में ऐसे लेखकों की लम्बी सूची हैं जिन्होंने सार्थक रचनाओं एवं कुशल सम्पादन से लघुकथा को दिशा प्रदान की है। इन लेखकों में विष्णु प्रभाकर,रमेश बतरा ,बलराम,सतीशराज पुष्करणा, मधुदीप,मधुकांत, सुकेश साहनी,कमलेश भारतीय, शकुन्तला किरण,अशोक भाटिया, अशोकलव, रूपदेवगुण,शंकर पुणताम्बेकर,उपेन्द्र प्रसाद राय,कमल चोपड़ा,सुभाष नीरव,विक्रम सोनी, माधव नागदा, संतोष दीक्षित, सतीश दुबे, पूरन मुद्गल, पृथ्वीराज अरोड़ा,श्यामसुन्दर दीप्ति,श्यामसुन्दर अग्रवाल , अंजना अनिल, बलराम अग्रवाल, रामयतन प्रसाद यादव आदि प्रमुख हैं।
सम्पादित संकलनों एकल संकलनों की तीन–चार वर्षों में भरमार रही है परन्तु उनमें से ऐसे संकलन गिने चुने हैं जो सार्थक लघुकथाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
1.डॉ0 श्यामसुन्दर दीप्ति द्वारा सम्पादित संकलन ‘गवाही’ में पंजाबी लघुकथाओं के साथ हिन्दी लघुकथाओं की उपस्थिति सुखद प्रयोग है। इस संकलन में फर्क (विष्णुप्रभाकर), बीमार (सुभाष नीरव) नतीजा (शंकर पुणताम्बेकर) रास्ते (साबिर हुसैन) सराहनीय लघुकथाएँ हैं। ‘एक वोट की मौत’ (श्याम सुन्दर अग्रवाल) में भ्रष्ट राजनीति का नंगापन प्रस्तुत है। ‘खत को तार समझना’ में कमल चोपड़ा ने भावी स्थिति की कल्पना पाठकों पर छोड़ दी है, सतीश दुबे की लघुकथा ‘कुत्ते’ प्रतीकात्मक शीर्षक में मनुष्य की पतनशीलता को चित्रित करती है। सुकेश साहनी की लघुकथा ‘गोश्त की गंध’ सफल प्रयोग एवं प्रतीक का श्रेष्ठ उदाहरण है। ‘दीप्ति’ की चेहरा में आतंकवाद की अनुगूँज सुनाई पड़ती है।
2.अपरोक्ष (1989–डॉ0कमल चोपड़ा ) में 1985–86 की श्रेष्ठ लघुकथाएँ संकलित है। इस पुस्तक में डॉ0 गंगा प्रसाद विमल, डॉ0 विश्वम्भरनाथ उपाध्याय, डॉ0 हरदयाल, डा0 ललित शुक्ल प्रभृति विद्वानों के लघुकथा के आलोचना पक्ष पर सुलझे हुए विचार प्रस्तुत किए हैं। रचनाओं के चयन में डॉ0 चोपड़ा से सावधानी बरती है। रंग (अशोक भाटिया) कफन का कुरता (ईश्वरचन्द्र) तनाव (पृथ्वीराज अरोड़ा) विकलांग (माधव नागदा) काई (रमाकांत श्रीवास्तव),खुशनसीब (रतीलाल शाहीन) दंगाई(पुणताम्बेकर), सहानुभूति (पुष्करणा), श्रेयपति (सुकेश साहनी), दिहाड़ी (सुभाष नीरव), प्रदूषण (सूर्यकान्त नागर), आदि प्रभावित करती हैं।
3.डॉ. राम कुमार घोटड़ का लघुकथा संग्रह ‘तिनके–तिनके (1989) अपनी कुछ रचनाओं के कारण ध्यान आकर्षित करता है। मनुष्य की दुर्बलताओं को इन्होंने कुछ लघुकथाओं में सफलतापूर्वक उद्घाटित किया है। असलियत, छोटी भैणा, खुदगर्ज लोग, अस्तित्व सीख, गरीब लोग, भय खालीपन, लघुकथाओं के केन्द्र में सामान्य जन और उसकी विवशताएँ हैं। इस संकलन में मनोवृत्ति दंश का दायरा, संतोषी जीव, नए घर के लिए, मर्दानगी की बू ऐसी रचनाएँ हैं जो लघुकथा नहीं बन पाई हैं। ‘शीर्षक’ की दृष्टि से देखा जाए तो लेखक का उपेक्षा भाव प्रकट होता है। ‘समय का फेर’ लघुकथा यशपाल की कहानी ‘पर्दा’की नकल है। लेखक को इस तरह के प्रयास से बचना चाहिए।
4. तुलसी चौरे पर नागफनी (1989) डॉ0 उपेन्द्र प्रसाद राय– की 61 लघुकथाओं का संग्रह है। डॉ0 राय ने निरन्तर पनपती हुई अवमूल्यन की नागफनी की ओर ध्यान दिलाया है तथा साथ ही मानवीय मूल्यों के प्रति अपना सकारात्मक दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किया है। अखबारी घटनाओं खोखले नैतिक उपदेशों, लेखकीय निर्णयों से लघुकथाओं को बचाकर रखा है। शोषण की पीड़ा, व्यवस्था की हृदयहीनता, दफ्तरी प्रणाली की जड़ता, कलुषित साम्प्रदायिकता, शिक्षा की दिशाहीनता और उपेक्षा डॉ. राय के प्रमुख विषय रहे हैं। कितना बड़ा मूल्य,प्यार,मापदंड, लड़की, नस्ल,कारगर हल, लोग ,रोने की शर्त सशक्त लघुकथाएँ हैं। व्यंग्य अधिकतर रचनाओं में मुख्य स्वर के रूप में उभरा है। भाषा की दृष्टि से ये लघुकथाएँ काफी चुस्त-दुरुस्त हैं।
5.दैत्य और अन्य कहानियाँ (1990) सुभाष नीरव– इस संग्रह में कहानियों के साथ सुभाष नीरव की चर्चित लघुकथाएँ भी संगृहीत हैं, पता नहीं क्यों सुरेश यादव ने इन्हें ‘लघुकहानियाँ’ कहा है। दिहाड़ी, वाकर,बीमार अभावग्रस्त जीवन की विवशता का खाका हैं। अपनी श्रेष्ठता में ये लघुकथाएँ किसी बड़े कहानीकार की श्रेष्ठ रचना से टक्कर ले सकती हैं। ‘धूप’ अपेक्षाकृत नए विषय पर लिखी कृत्रिम आवरण की छटपटाहट को रेखांकित करने वाली मनोवैज्ञानिक कथा है। इस तरह के नवीन विषयों का संधान लघुकथा को निश्चित रूप से दिशा प्रदान करेगा ।
6. दूसरा सत्य (1990) रूप देवगुण– की 51 लघुकथाओं का संग्रह है। इस संकलन की ‘मानवीय सम्बन्धों की लघुकथाएँ’ ‘के तीन खण्डों में विभाजित किया गया है। ‘और व’ लघुकथा में बेरोजगार युवक का अन्तर्द्वन्द्व है । युवक की विकृत सोच पिता के स्नेहसिक्त चेहरे को देख कर बदल जाती है। दो परस्पर विरोधी भाव लघुकथा को विश्वसनीय बनाने में सफल हुए है। ‘जगमगाहट’ हिन्दी की बेहतर लघुकथाओं में से एक है। बॉस के प्रति आशंकित युवती के अन्तर्द्वन्द्व का देवगुण जी ने सूक्ष्म विश्लेषण किया है। ‘और तब’ में रिश्तों में आए ठण्डेपन और ठहराव पर तीखी चोट की गई है। एक ही वाक्य, दूसरा सच, एक सुलझा हुआ दृष्टिकोण सोच आदि लघुकथाएँ भी विषयवस्तु एवं प्रस्तुति दोनों ही प्रकार से मंजी हुई रचनाएँ हैं। भाषा संयत एवं शालीन है।
7.अभिप्राय (1990) डॉ0 कमल चोपड़ा– इस संग्रह में कमल चोपड़ा की 70 लघुकथाएँ हैं। दलित शोषित,प्रताडि़त और उपेक्षित वर्ग के प्रति गहरी चिन्ता इनकी लघुकथाओं का मुख्य स्वर है। यह स्वर कहीं–कहीं कड़वाहट में बदल गया हैं। राजनीति के दोगलेपन और मक्कारी पर लेखक ने कठोर प्रहार किया है। मैं छोनू हूँ,डाका असलियत जीने वाले, पिता, किराया, पहला आश्चर्य, खेल, सोहबत, सीधी बात, समाज चुपचाप निर्जन बन इनकी श्रेष्ठ लघुकथाएँ हैं। इन्होंने परिस्थितियों एवं उनके प्रतिफलन को अपनी रचनाओं में समाविष्ट किया है। उद्देश्यपरक लघुकथाएँ इस संकलन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
8.मृगजल (1990) बलराम– इस संकलन में लेखक ने अपनी रचनाओं की तीन खण्डों में प्रस्तुति की है–लघुकथाएँ,व्यंग्य लघुकथाएँ और विविधा । ‘पाप और प्रायश्चित’ में कर्मकाण्ड की कुरूपता और क्रूरता दर्शाई गई है। लोग इसी को धर्म समझ बैठते हैं। प्यार और मातृत्व की उष्मा इस क्रूरता की शिला को पिंघलाने में असमर्थ है। आदमी,गंदी बात, बहू का सवाल सिद्धि सशक्त एवं सफल लघुकथाएँ हैं। शीर्षक कथा ‘मृगजल’ ग्रामीण परिवेश को बारीकी से उकेरने में सक्षम है। कृष्ण जैसे भटके युवक अपने स्वप्नजीवी परिवार को चूस रहे हैं।
9.अलाव फूँकते हुए : स कुलदीप जैन–इस संकलन में बलराम अग्रवाल,कुलदीप जैन एवं सुकेश साहनी की 25–25 लघुकथाएँ तथा जगदीश कश्यप की 26 लघुकथाएँ हैं। श्री कुलदीप जैन के अनुसार–डॉ0 किरन चन्द्र शर्मा ने लघुकथाओं पर न के बराबर काम किया है परन्तु साहित्यक दृष्टि से इनके सोचने का ढंग बिल्कुल निष्पक्ष कहा जा सकता है।’ भूमिका लिखते समय शर्मा जी की यह प्रमाणित निष्पक्षता पक्षपात में बदल गई है। पाठक रचनाओं को पढ़ कर स्वयं इस बात की पुष्टि कर सकते हैं। अस्तु इस संग्रह में अंतिम गरीब, रिश्ते (कश्यप),नागपूजा गो भोजनं कथा (बलराम अग्रवाल),शंकाग्रस्त (कुलदीप जैन), वापसी ,दादाजी, इमीटेशन ,हारते हुए, गाजर घास, तृष्णा,मृत्युबोध,आइसबर्ग, (सुकेश साहनी) अच्छी लघुकथाएँ हैं। खेद इसी बात का हैं कि जगदीश कश्यप लघुकथा में बरसों से कसरत करते रहे हैं ; फिर भी अधिक अच्छी लघुकथाएँ देने में असमर्थ रहे हैं।
10.हिस्से का दूध (1991) मधुदीप– इस संग्रह में 7 कहानियों के साथ मधुदीप की तीस लघुकथाएँ हैं। कथ्य में कसाव,पात्रों का अन्तद्र्वन्द्व उद्देश्य पर कला, भाषिक संयम, क्षित्रता अभाव एवं दैन्य की पराकाष्ठा ‘हिस्से का दूध’ में प्रखर रूप से चित्रित हुई है। बंद दरवाजा, नियति, एहसास, उसका अस्तित्व एवं ‘ऐसे’ लघुकथाएँ विषय एवं शिल्प की दृष्टि से सराही जा सकती हैं। ऐलान–ए–बगावत’ में लेखक ने दफ्तरी मुठमर्दी को साकार कर दिया है। ‘फाइल मरे हुए चूहे के समान उसके हाथ में झूल रही थी’ जैसे भाषिक प्रयोग इस लघुकथा को तीखी धार प्रदान करते हैं। अच्छी लघुकथाओं के लिए इस संग्रह का विशिष्ट स्थान रहेगा।
11.डरे हुए लोग (1991) : सुकेश साहनी– इस संग्रह की भूमिका में जगदीश कश्यप् ने कहा है–सुकेश साहनी का यह लघुकथा–संग्रह लघुकथा से परहेज करने वाले समीक्षकों और विद्वानों को लघुकथा–समीक्षा की नई भाषा लिखने के लिए मजबूर करेगा।’ कमलेश भारतीय के अनुसार–‘डरे हुए लोग,दो तरह की लघुकथाएँ लिये हुए है परन्तु इनका मूल स्वर कच्चा चिट्ठा खोलना ही है–चाहे उनकी लघुकथाएँ भ्रष्टतंत्र पर लिखी गई हों, चाहे पारिवारिक पृष्ठभूमि पर ।’ गुठलियाँ,पेण्डुलम,कुत्तेवाले घर, अपने लोग, यही सच है, प्रदूषण,कस्तूरी मृग जैसी लघुकथाएँ अपने लघुकलेवर में घर–परिवार एवं समाज की समस्याओं को समेटे हुए है। विषयों की विविधता और शिल्प के प्रति सचेतना के कारण यह संग्रह मील का बनेगा, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
12.साँझा हाशिया (1991) सम्पा0 कुमार नरेन्द्र–इस संग्रह में तीस प्रतिनिधि लघुकथाकारों की तीन–तीन लघुकथाएँ हैं। सम्पादक ने रचनाओं के चयन में सूझबूझ का परिचय दिया है। विषयों की विविधता प्रस्तुति की नवीनता एवं भाषा–कौशल इसका सशक्त प्रमाण है। इस संग्रह की रचनाओं में ‘रंग’ (अशोक भाटिया), मृत्यु की आहट (अशोक लव) उपहार (पारस) गुब्बारा (डॉ0 दीप्ति), दरिया दिली (सतीश शुक्ल) साफ्टी कार्नर(कुमार नरेन्द्र) भीतर का कलाकार(वेद हिमांशु), ड्रांइगरूम(पुष्करणा), आखिरी पड़ाव का सफर(सुकेश साहनी), वाकर (सुभाष नीरव) आदि लघुकथाएँ प्रभावित करने वाली हैं।
13.हिन्दी की जनवादी लघुकथाएँ (1991) : सम्पा0 राम यतन प्रसाद यादव–इस संग्रह में विभिन्न लेखकों की 96 लघुकथाएँ हैं। सम्पादक ने एक ही स्वर की अनेक रचनाएँ संकलित कर अच्छा कार्य किया है। संस्कार(सतीश दुबे) ,जिजीविषा(वेद हिमांशु), अन्तर(राजेश हजेला),बीच बाजार(रमश बतरा), पेट की खातिर(सुकेश साहनी), लघुकथाएँ सशक्त हैं। सम्पादक ने भूमिका में जिस अश्लीलता पर कटाक्ष किया है उनकी लघुकथा भी इसी श्रेणी की है। रचनाओं के चयन में सम्पादक को और निर्मम होना था।
14.हिन्दी की सशक्त लघुकथाएँ (1991) सम्पा0 रूप देवगुण– इस संग्रह में 91 लघुकथाएँ हैं। विभिन्न तेवरों की रचनाएँ इस संग्रह को सार्थक बनाती हैं। व्यथा कथा (अशोक भाटिया), माँजी(अशोक लव), परदेसी पाँखी(कमलेश भारतीय), जानवर भी रोते हैं(जगदीश कश्यप),पहला झूठ (पूरन मुद्गल),कथा नहीं(पृथ्वीराज अरोड़ा), माँ (प्रबोध गोविल),स्नेहज्वर(रतीलाल शाहीन),शोर (शराफत अलीखान),रास्ते(साबिर हुसैन)लघुकथाएँ पाठक के हृदय पर अपनी छाप छोड़ने में सक्षम हैं।
15.हिन्दी की चर्चित लघुकथाएँ (1992)सम्पा0 पुष्करणा एवं यादव– इस संकलन में 129 लघुकथाएँ हैं। भूमिका में पुष्करणा जी ने लघुकथा के अवरोधों पर करारी चोट की है। इस संकलन में कमलेश भारतीय (किसान), कृष्णानन्दन कृष्ण(जागरूक), चित्रा मुद्गल(बोहनी), पृथ्वीराज अरोड़ा(अनुराग), महावीर प्रसाद जैन(श्रम), रमेश बतरा(दुआ) शंकर पुणताम्बेकर(मरियल और मांसल), डॉ. शकुन्तला किरण (बेटी), शिवनारायण (जहर के खिलाफ), सुकेश साहनी(नरभक्षी), सुभाष नीरव(कमरा), की लघुकथाएँ उल्लेखनीय हैं। इस संग्रह में कुछ ऐसी लघुकथाएँ भी हैं जो इस संग्रह से पूर्व अच्छी लघुकथाओं के रूप में चर्चित नहीं रही हैं।
16.दहशत:(1992) सम्पा. अमरनाथ चौधरी–‘अब्ज’ यह 59 लघुकथाकारों की साम्प्रदायिकता विरोधी 71 लघुकथाओं का संग्रह है। लघुकथाओं का विभाजन आहुति,सद्भावना विश्रान्ति इन तीन खण्डों में किया गया है। घोर साम्प्रदायिकता के माहौल में इन रचनाओं की सार्थकता से इंकार नहीं किया जा सकता। आहुति (अब्ज),सद्भाव (कमल चोपड़ा), फर्क(तरुण जैन), यह घर किसका है? (कमलेश भारतीय) बीच की दीवार(विजय रंजन)आदि लघुकथाएँ प्रभावशाली हैं। सम्पादक यदि प्रयास करता तो इसमें और अधिक सशक्त रचनाएँ शामिल की जा सकती थीं।
17.इस बार: (1992): कमलेश भारतीय–इस संग्रह में कमलेश भारतीय की 45 लघुकथाएँ हैं। सकारात्मक सोच और संवेदनशीलता इनकी लघुकथाओं के प्रमुख आधार रहे हैं। संवेदनशील दृष्टि के कारण साधारण स्थिति या प्रसंग को भी असाधारण प्रभाव से अभिमंत्रित कर सकते हैं। भारतीय की लघुकथाएँ इसका उदाहरण हैं। बदला हुआ नक्शा, मन का चोर सर्वोत्तम चाय,सुना आपने एवं जन्म दिन ऐसी लघुकथाएँ हैं जो बिना किसी टीका–टिप्पणी के मन पर अपना प्रभाव छोड़ती हैं। ‘सर्वोत्तम चाय’ लघुकथा जीवन के किसी तर्क पर नहीं वरन् संवेदना की अतार्किक पृष्ठभूमि पर टिकी हैं युवक का यह कथन–‘सच,चाय सिर्फ़ चाय नहीं होती’सत्य ही है। चाय बनाकर पिलानेवाले की आत्मीयता का स्पर्श ही प्रमुख होता है। यह संकलन लघुकथा–जगत में एक महत्त्वपूर्ण कार्य के रूप में याद किया जाएगा।
18. सुबह होगी (1992): अशोक विश्नोई–इस संग्रह में विश्नोई जी की 68 रचनाएँ संग्रहीत हैं। इनमें से कुछ लघुकथाएँ लेखक के प्रति आश्वस्त करती हैं। सबक, मोहभंग,एहसास,बदबू,माँ,ममता लघुकथाएँ ध्यान आकर्षित करती हैं। अति संक्षिप्तता के मोह में कुछ रचनाएँ कथन मात्र बनकर रह गई हैं।
19.स्त्री–पुरुष सम्बन्धों की लघुकथाएँ (1992): सम्पा. सुकेश साहनी–इस संकलन में यद्यपि हिन्दी लघुकथाओं का ही बाहुल्य है तथापि उर्दू,पंजाबी,गुजराती आदि भाषाओं के लेखकों को भी शामिल किया गया है। कमलेश भारती के अनुसार–‘संकलन उन आलोचकों को सही जवाब है जो बार–बार कहते हैं कि श्रेष्ठ लघुकथाओं का अभाव है।’ इस संग्रह में आखिरी सफर (अज्ञात), मौसम (कृष्ण गंभीर ), डबल बैड (दिनेश पालीवाल), बेटी (मोहन सिंह सहोता), लड़ाई (रमेश बतरा), अपना–अपना दर्द (श्याम सुन्दर अग्रवाल), गूँज (सुकेश साहनी) लघुकथाएँ मानस–पटल पर अंकित होकर रह जाती हैं।
20 भारतीय लघुकथा कोश : सम्पादक बलराम भारतीय भाषाओं के 113 लेखकों की 816 लघुकथाओं को श्री बलराम ने प्रस्तुत किया। दो खण्डों में छपे इस कोश का निर्विवाद रूप से महत्त्व है। रचनाओं को एक साथ प्रस्तुत करके लघुकथा के अध्ययन का मार्ग प्रशस्त किया है।

पत्र–पत्रिकाएँ –‘आजकल’ जैसी महत्त्वपूर्ण पत्रिका ने 1991 (अक्टूबर) में लघुकथा विशेषांक प्रकाशित कर इस विधा को महत्त्व प्रदान किया । इस विशेषांक में 6 लेख,23 लघुकथाएँ एवं 5 लघुकथा संग्रहों की समीक्षाएँ सम्मिलित की गईं। दूसरा महत्त्व पूर्ण विशेषांक जम्मू कश्मीर अकादमी की पत्रिका (शीराजा अक्टूबर–नवम्बर 91) का रहा। इस विशेषांक में 4 लेख एवं 46 लघुकथाएँ सम्मिलित की गईं। सानुबन्ध (जून 93), स्वाति (जून–जुलाई93), भागीरथी (जुलाई–अगस्त 93) के अंक लघुकथा पर केन्द्रित रहे। सानुबंध के विशेषांक में 66 हिन्दी लघुकथाओं के साथ 4 खलील जिब्रान की लघुकथाएँ एवं 5 पंजाबी लघुकथाएँ, लघुकथा की पुस्तकों की 3 समीक्षाएँ तथा दो लेख छपे हैं। यह एक महत्त्वपूर्ण विशेषांक बन गया है। सम्पादक रमाकांत श्रीवास्तव का सम्पादकीय नया–तुला है। स्वाति के इस विशेषांक में कृष्ण मनु ने 23 लघुकथाएँ प्रकाशित की हैं। भागीरथी (अतिथि सम्पादक–डा.शिवनारायण) में लेख , 44 लघुकथाएँ एवं समीक्षा प्रकाशित की गई है। ‘उत्तर प्रदेश’ मासिक में समय–समय पर लघुकथाएँ एवं तद्विषयक लेख छपते रहे हैं। ‘लघुकथा साहित्य’ (डॉ.अशोक लव) और ‘जनगाथा’ (बलराम अग्रवाल) लघुकथा की जागरूकता के लिए आश्वस्त करती हैं।
बहुत सारे संग्रह एवं पत्रिकाएँ ऐसी हैं जिनका मैं स्थानाभाव एवं अनुपलब्धता के कारण समावेश नहीं कर सका । भविष्य में किसी अन्य लेख में उनका उल्लेख किया जाएगा ।
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