पथ के साथी

Monday, September 23, 2019

932-हिम्मत हमारी


 रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

1
पता चला कोई मुझसे  क्यों दूर था।
बुरा न सोचा कभी ,इतना कुसूर था।
2
पीठ में खंज़र मारा और  फिर हँस दिए।
दोस्ती का यह सिला कोई आपसे सीखे।
3
आँधियाँ, और लहरें तोड़ती किश्ती
चाहकर हिम्मत हमारी तोड़ ना पाई।
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