पथ के साथी

Thursday, September 28, 2023

1374

 दोहे

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1

गर्म तवे पर बैठकर, खाएँ कसम हज़ार ।

दुर्जन सुधरें ना कभी, लाख करो उपचार॥

2

चाहे तीरथ घूम लो, पढ़ लो  वेद, पुराण ।

छल -कपट मन  में भरे, हो कैसे कल्याण ॥

3

वाणी में ही प्रभु बसे, मन में कपट- कटार ।

लाख भजन करते रहो, जीवन है बेकार ॥

4

आचमन कटुक वचन का, करते जो दिन -रात ।

घर -बाहर वे बाँटते, शूलों की सौगात ॥

5

उऋण कभी होना नहीं, मुझ पर बहुत उधार।

 कभी चुकाए ना चुके, इतना तेरा प्यार

6

जीवन में मुझको मिले, केवल तेरा प्यार

जग में फिर इससे बड़ा, कोई ना उपहार

7

श्वास -श्वास प्रतिपल करे, इतना सा आख्यान।

जीवन में हरदम मिलेतुम्हें प्यार सम्मान.                 

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Friday, September 22, 2023

1373-शलभ ने त्यागे फिर-फिर प्राण!

 डॉ. सुरंगमा यादव


                  शलभ ने त्यागे फिर-फिर प्राण!
                 दीप को अपना सब कुछ मान
         दीप निशा का साथी बनता
         तम से घिरा तनिक ना डरता
         तूफ़ानों से आँख मिला
         संग हवा के झूमे जा
         पर ना जाने प्रिय की पीर
        प्रेम का कर न सका प्रतिदान
                शलभ ने त्यागे फिर-फिर प्राण!
                 दीप को अपना सब कुछ मान
       प्रेम तुम्हारा अतिशय प्यारा
       तन-मन तुमने मुझ पर वारा
    प्रेम पाश में मैं बँध जाऊँ
        फिर कैसे कर्त्तव्य निभाऊँ
        तम की सीमा पर सुन प्यारे
         प्रहरी सजग तू मुझको जान
                   शलभ ने त्यागे फिर-फिर प्राण!
                    दीप को अपना सब कुछ  मान
          जब तक मुझमें ज्योति है ये
          राह दिखाना  ही बस ध्येय
           जीवन पल-पल बीता जाता
          पल में हँसता जी भर आता
          मैं तो तब तक जलता जाऊँ
           जब तक आ ना जाये विहान
                     शलभ ने त्यागे फिर-फिर प्राण!
                       दीप को अपना सब कुछ मान।




         

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Monday, September 18, 2023

1372

 

1-तुम्हें पता है / अनीता सैनी 'दीप्ति'

 


तुम्हें पता है? ये जो तारे हैं ना  

ये अंबर की

हथेली की लकीरों पर उगे 

चेतना के वृक्ष के फूल हैं

झरते फूलों का 

सात्विक रूप है  काया।

 

प्रकृति के

गर्भ में अठखेलियाँ करते भाव 

जन्म नहीं लेते, गर्भ बदलते हैं

जैसे गर्भ बदलता है प्राणी 

सागर में तिरते चाँद का प्रतिबिंब

बुलावा भेजता है इन्हें।

 

तभी, तुम्हें बार-बार कहती हूँ 

निर्विचार आत्मा पर जीत हासिल नहीं की जाती 

उसे पढ़ा जाता है

जैसे-

पढ़ती हैं मछलियाँ चाँद को

और चाँद पढ़ता है, लहरों को।

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2-बंद आँखों से छलकता ख़्वाब हूँ मैं

-प्रणति ठाकुर

 


 

हूँ तुम्हारी हमनफ़स, हमराज़ हूँ मैं,

अनकही और अनसुनी आवाज़ हूँ मैं,

ख़ून -ए- दिल से खुद -ब-खुद शादाब हूँ मैं

बंद आँखों से छलकता ख़्वाब हूँ मैं ।

 

हूँ सरापा नज़्म -ए-रुसवाई मैं तो,

हूँ ख़यालों में क़फ़स तन्हाई मैं तो,

इन्तहा -ए-हिज़्र का आदाब हूँ मैं 

बंद आँखों से छलकता ख़्वाब हूँ मैं

 

रोक ले मुझको कि मैं गिरने न पाऊँ,

गिर हक़ीक़ी हर्फ़ से मिलने न पाऊँ,

ख्वाहिशों के चश्म का बस आब हूँ मैं

बंद आँखों से छलकता ख़्वाब हूँ मैं

 

रख मुझे, मैं मुफ्लिसी -ए-इश्क की ज़िन्दा इबारत,

चंद रातों में न बुझ जाऊँ,हूँ जुगनू की हरारत,

आसमाँ तू है नहीं फिर कैसे आफ़ताब हूँ मैं

 बंद आँखों से छलकता ख़्वाब हूँ मैं

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Saturday, September 16, 2023

1371

  मैं नेह - लता हूँ/ प्रणति ठाकुर

 




नहीं तुम्हारी पग -बाधा मैं नेह - लता हूँ...

 

स्नेह - छाँव बनकर मैं तेरे साथ चली हूँ

 बन निर्झरणी प्रति- पल स्नेह अगाध झरी हूँ

जीवन के झंझावातों से  क्लांत पड़ा जब अंतस् तेरा  

भर पाई अनुराग प्रबल मैं वो अपगा  हूँ

नहीं तुम्हारी पग -बाधा मैं नेह - लता हूँ...

 

तेरे मौन जगत् में तेरा राग बनी हूँ

हर तेरी पीड़ा सतरंगी फाग बनी हूँ

शमित,तृषित तेरे अंतर की व्यथा बढ़ी जब

बन परछाई गंधसार की साथ सदा हूँ 

नहीं तुम्हारी पग -बाधा मैं नेह - लता हूँ...

 

अपना तन -मन वार - वार हूँ नहीं अघाई

अपने शोणित से गढ़ती तेरी परछाई

बने द्वारकाधीश अगर तुम मोहन मेरे

तेरी खातिर युग -युग से मैं ही राधा हूँ

नहीं तुम्हारी पग -बाधा मैं नेह -लता हूँ....

 

यशोधरा मैं ही थी,मुख तुम मोड़ गए थे

मैं ही थी उर्मिल ,दुख से उर जोड़ गए थे

अग्निकुण्ड में कितनी बार मुझे परखोगे 

बस कर दो अब ,आज नहीं मैं जनक सुता हूँ

नहीं तुम्हारी पग -बाधा मैं नेह -लता हूँ

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Thursday, September 7, 2023

1369

 1-आया नहीं बसन्त

डॉ. उपमा शर्मा  

  



साँसों के आरोह-अवरोह

चलते रहे दिग्दिगन्त। 

कितने मौसम बीत ग हैं। 

फिर भी आया नहीं बसन्त। 

 

पेड़ों पर पतझड़ का मौसम

रुक गया आकर क्यों इस बार

कोमल कोंपलें देखने को

थक गईं अँखियाँ पंथ निहार

स्वागत में अब इस आगत के

लिख डाले मैंने गीत अनन्त

कितने मौसम बीत ग हैं

फिर भी आया नहीं बसन्त

 

लिपट तितलियाँ ठूँठों से ही

करती रहती बस मनुहार। 

बसंत बिना सूने हैं मौसम

पुष्प बिना है  सूना संसार। 

अगन धरा पर बरस रही है

सूरज बन गया आज महन्त

 

कितने मौसम बीत ग हैं

फिर भी आया नहीं बसन्त

 

रूठ ग बागों से भँवरे

डाली कितनी हुईं  उदास

फूलों के मौसम में पतझड़

मिलने की टूटी है आस

अब पतझड़ नहीं जाने वाला

रुक गया हो जैसे जीवन पर्यन्त

कितने मौसम बीत ग हैं

फिर भी आया नहीं बसन्त

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चूक / अनीता सैनी 'दीप्ति'

 


प्रिय ने

बादलों पर घोर अविश्वास जताते हुए

खिन्न हृदय से चिट्ठी चाँद को सुपुर्द की

मैंने कहा- यक्ष को पीड़ा होगी

उसने कहा-

बादल भटक जाते हैं

तब यही कोई

रात का अंतिम पहर रहा होगा

चाँद दरीचे पर उतरा ही था

तारों ने आँगन की बत्ती बुझा रखी थी

रात्रि गहरा काला ग़ुबार लिये खड़ी थी

जैसे आषाढ़ बरसने को बेसब्र हो

और कह रहा हो-

'नैना मोरे तरस गए आजा बलम परदेशी।'

ऊँघते इंतज़ार की पलकें झपकीं

मेरी चेतना चिट्ठी पढ़ने से चूक गई

चुकने पर उठी गहरी टीस

उस दिन जीवन ने नमक के स्वाद का

पहला निवाला चखा था।

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Tuesday, September 5, 2023

1368

 1-गुरु/ लिली मित्रा

 


गुरु बिना नहीं तर सके, तम सागर का छोर

कारे आखर जल उठे, उजियारा सब ओर।।

 

धर धीरज धन ज्ञान का, मिलती गुरु की छाँव

ज्यों पीपर के ठाँव में , बसे विहग के गाँव।।

 

ज्ञान मिले ना गुरु बिना, ज्ञान बिना ना ईश

सूने घट सा मन फिरे, बूँद-बूँद की टीस।

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2-योग और श्वास / मंजु मिश्रा


 

सुनो....

अब मैंने भी शुरू कर दिया है योग करना 

रोज सुबह , ‘प्राणायामकरते हुए मैं...

 जब साँसों का योग वियोग करती हूँ,

तो छोड़ती जाती हूँ  वे सारी साँसें,

जो तुमसे अलग होने के बाद महसूस करती थी।

और खींचती जाती हूँ वातावरण से

 वह सारी शुद्ध वायु, जो तुम्हारे सानिध्य की थी ,

अब बनने लगी है मेरी प्राण-चेतना ।

 

भरस्रिकाके माध्यम से झटके से फेंकती जाती हूँ

अंतस् में बसी सारी शिकायतें।

भ्रामरीकरते हुए गुँजा देती हूँ रोम- रोम को

तुम्हारी सुखद स्मृतियों से।

कभी कभी कुंभकलगाकर बैठ जाती हूँ ,

रुक जाती हूँ कुछ पलों में

 कुछ यादों को स्थिर कर लेती हूँ उन पलों में।

अचानक हाथ उठ जाते हैं,

कहते हैं मानो तुम भी तो हो यहीं कहीं इसी भूमंडल में ।

दोनों हाथ जोड़कर झुक जाती हूँ तुमको प्रणामकरने ।

 और फिर शांत निश्चेष्ट- सी पड़ जाती हूँ ‘शवासनमें

 एक बार फिर से अपनी सारी चेतना को तुम्हारी यादों से झंकृत करके

 जीने की एक नई आस लिये ...

अपनी साँसों में आत्मविश्वास और प्राणों में

अपनी और तुम्हारी चेतना का योगकरके।

-0-manjumishra67@gmail.com

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 3-गुरु / रश्मि लहर

  



बदल देते हैं जीवन-मूल्य,

विस्मृत कर देते हैं 

बड़ी से बड़ी भूल।

सुलझा देते हैं  मन का हर उलझा-भाव,

लुप्त हो जाते हैं जीवन के अभाव

जब मेरे पास होते हैं गुरु!

 

भले अदृश्य होते हैं

पर..

प्रतिपल विचारों को सहेजते हैं।

 

त्रुटियों का आकलन

वहम का निराकरण,

मृदुल स्वर से कर जाते हैं।

बनकर मार्गदर्शक..

साथ देते हैं गुरु!

 

निराशा की कल-कल बहने वाली 

नदी को,

हृदय का दम घोंटने वाली 

सुधि को,

छुपा लेते हैं अपने शिख पर,

आशा का अनमोल-अमृत 

बाँट देते हैं गुरु!

 

चुन-चुनकर अवसाद के कंकड़,

सुलभ-सहज कर देते हैं,

भावना का पथ।

 

विचारों के विस्थापित अंश हों या

टीस हो अपूर्ण रिश्तों की।

अनंत इच्छाओं का भार हो या..

असंतुष्टि हो अतृप्त-कामना की।

 

वेदना का प्रत्येक कण चुनकर,

जीवन के श्यामपट पर

संतुष्टि से सजी 

सकारात्मकता को,

छाप -देते हैं गुरु!

 

उनके साथ होने से मिलते हैं 

विस्मयकारी

अतुलनीय-अनुभूति के पल!

 

व्यस्तता के मध्य.. 

विचलित-मन की हर हलचल को,

वैचारिक -अवरोध के अपरिपक्व-संघर्ष को

संवेदित-ज्ञान से परे कर

स्नेह-आलंबन देकर

नव-प्रेरणा की अद्भुत आस होते हैं गुरु!

 

मेरी एकाकी-टूटन में 

शांति-दूत बनकर

सदैव मेरे पास होते हैं गुरु।

मेरे हर प्रश्न का जवाब होते हैं गुरु!

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 4-सावन/ अनिता मंडा

 


बाहें खोल तुम जीवन का स्वागत करोगे

सावन चला आएगा

जीवन को सावन की नज़र से देखना

खुशियों की बारिश पाजेब खनका देगी

 

तुम्हारी छतरी को चूमने 

सावन बूँद- बूँद हो जाएगा

बाहें फैला तुम छतरी को उड़ा देना

बूँदों के आँचल को लपेटे हुए झूमना

धरती की कोख आनंद से भर उठेगी

तुम्हारी हँसी-सा इंद्रधनुष देखो तो

आसमान की मुस्कान है ये

 

तुम रोज़ हँसी के पंख जमा करते जाना

एक दिन उड़ना सीखना

ये सपनीले दिन-रात

सपनों में रख कर

कहीं भूल मत जाना

 

झींगुरों की आवाज़ का साज़ बनाकर

रचना मीठी धुनें

कर्कश शोर से भरी है ये दुनिया

 

कोलाहल के बीच सुकून से सोने के लिए

रंग-बिरंगी गोलियाँ नहीं

सितारों की रुपहली अशर्फियाँ चाहिए

 

कड़वी जड़ी-बूटियों का अर्क हैं नसीहतें

कोई दुष्प्रभाव न करेंगी

बहुत ज़रूरी है

नए के साथ पुराने की जुगलबंदी

आषाढ़ के साथ सावन कितना सहज रहता है।

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5-प्रीति अग्रवाल

1-रोशनी

ऊँची इमारतों ने आज
फिर से मुँह चिढ़ाया है,
दिल की झोपड़ी में मैंने
एक दिया जलाया है।

इस दिए कि रोशनी में
दिख रहा ये साफ है,
रौंदके किसी को उठना
ज़ुल्म ये न माफ़ है।

जो दिख रहा है वो नहीं
सच्चाई के करीब है,
ईमान बेचकर जिया
असल में वो गरीब है।

जो पा रहे, जता रहे
जो खो रहे, छुपा रहे,
मोह, माया, साज़िशें
दलदल में धँसते जा रहे।

कब्र पर खड़ी इमारत
दरअसल है तार तार,
बदनसीबी पर मैं उसकी
खूब रोया ज़ार-ज़ार।

वो शर्मसार देखती
झुकी निगाह, लिये मलाल,
दिया मेरे मन का, रोशन
कर रहा है ये जहान!
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