डॉ. वन्दना
शर्मा
‘भूलना’ वरदान है या शाप। एक सामान्य व्यक्ति दिन में कई बार इस समस्या का सामना करता है। पाठकगण आप भी मेरी बातों से सहमत जरूर होंगे। बल्कि आप ये सोच रहे होंगे हाँ मैं भी अक्सर भूल जाती हूँ।
सबसे ज्यादा हम जो
भूलते हैं - 'समय पर दवाई खाना।' कितना ही लिखकर दे डॉक्टर,
भोजन से पहले,
भोजन के बाद। फिर भी
भूल ही जाते हैं। कुछ व्यक्ति चश्मा सिर पर लगाकर चश्मा ढूँढते रहते हैं। कुछ अपनी छतरी भूल जाते
हैं। जब घर से निकले तो बारिश हो रही थी,
महोदय ने छतरी उठाई
चल दिए। कहीं किसी से बात करने रुके, या किसी के पास बैठे तब तक बारिश रुक गई और बातों ही बातों
में छतरी वहीं छूट गई। बच्चे कॉपी-किताब बैग में रखना भूल जाते हैं। कुछ महिलाएँ
एक साथ बहुत सारे काम करती हैं। एक काम शुरू किया,
बीच में दूसरा पकड़
लिया। दूध गैस पर रखकर भूल गई। कभी गैस बंद करना भूल गई। कुछ अपनी चाबी भूल जाते
हैं, कुछ
अपना पर्स भूल जाते हैं।
मैं आपको भूलने के
कुछ किस्से साझा करना चाहती हूँ। पढ़कर आपको भी लगेगा हाँ यह हमारे साथ भी होता
है। पहले मैं बता दूँ आपको, भूलना तभी होता है जब हम एक साथ कई विचार पर कार्य कर रहे
होते हैं या किसी कार्य में इतना फोकस कर देते हैं कि अन्य बातें भूल जाते हैं।
महान वैज्ञानिक आइंस्टीन तो अपने विचारों में इतना खोए रहते थे कि कोई अचानक से
उनका नाम पूछ ले, तो
वो अपना नाम भी भूल जाते थे।
पर एक बात सोचने की
है, जो
चीज़ें हमने बचपन में सीखी पाँच-छह साल तक, वे कभी नहीं भूलते। जैसे दो का पहाड़ा,
ए बी सी डी,
कोई कविता - मछली जल
की... या हो सकता है जब कोई हमसे ये सब पूछता है तो हमारा दिमाग सतर्क हो जाता है,
तुरंत संदेश पहुँचता है दिमाग में कि दो का पहाड़ा सुनाना
है और हम सही सुना देते हैं।
एक बार एक आदमी अपने
छोटे बच्चे को घुमाने ले गया पार्क में। बच्चा पार्क में अन्य बच्चों के साथ खेलने
लगा। वह आदमी फोन पर किसी से बात करने लगा। बातों में इतना व्यस्त हुआ कि फोन पर
बात करता हुआ घर पहुँच गया। घर पहुँचकर उसकी बीबी ने देखा, बच्चा साथ नहीं है। अपनी बीबी का क्रोधित और चिंताग्रस्त
हाव-भाव देख उसने फोन काटा और उसे याद आया कि उसका बच्चा तो पार्क में ही रह गया।
फिर उसके साथ क्या हुआ होगा आप कल्पना कर आनंद ले सकते हैं।
एक बार एक प्रोफेसर
एक समारोह में अतिथि बनकर गए। मंच पर अन्य अतिथि भी आसीन थे। महोदय ने अपना फोन
अपनी जेब में रख दिया। उनके पास बैठे महोदय फोन पर बिजी रहे और उन्होंने अपना फोन
काटकर मेज पर रख दिया। उनका फोन भी रंग-रूप में महोदय के फोन जैसा ही था।
प्रोफेसर महोदय ये
भूल गए कि उनका फोन जेब में है। और मेज पे रखे फोन को उठा उसे खोलने का प्रयास
करने लगे। पासवर्ड होने के कारण उनसे नहीं खुला, तो उसी पास वाले महोदय से पूछने लगे –
‘‘भाई देखना फोन को क्या हो गया, हर बार पासवर्ड गलत बता रहा है,
खुल ही नहीं रहा।’’
जिनका फोन था,
सज्जन थे,
उन्होंने पासवर्ड बता
दिया। जब फोन की स्क्रीन खुली, उस पर उनका फोटो नहीं था। तब प्रोफेसर महोदय को अपनी भूल का एहसास हुआ।
झेंपते हुए बोले – ‘‘बहुत अच्छा फोन है तुम्हारा।’’
ऐसी ही एक घटना एक
महाविद्यालय की है, मैंने वहाँ पाँच साल तक प्रवक्ता के रूप में कार्य किया।
लंच के समय दूसरे विभाग की प्रवक्ता भी आ गई हमारे विभाग में। उन्होंने अपना बैग
मेरे पास वाली कुर्सी पर रखा था। बातों ही बातों में अगले कालांश की घंटी बज गई और
वे महोदया हड़बड़ी में मेरा पर्स लेकर क्लास
में चली गई। जब उन्होंने पढ़ाने के लिए चश्मा निकालना चाहा पर्स से, तब अपनी भूल का एहसास हुआ। बाद में विभाग में आकर उन्होंने अपनी भूल बताई
तो सब हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए।
मैं भी अक्सर कुछ
चीज़ें भूल जाती हूँ। जैसे मैं कोई लिखने का काम कर रही हूँ,
कहानी-कविता लिखने का
और तभी मम्मी का फोन आ जाए, उनके पूछने पर
–“क्या खाया आज' मुझे बहुत देर तक सोचना पड़ता है।”
बचपन में भी ऐसा होता
था अक्सर कोई मेहमान आया और मुझसे पूछा-
“बेटा आज क्या खाया?” मुझे बहुत सोचना पड़ता क्या खाया - क्या
खाया। और सब हँसने लगते खाकर भी भूल जाती है क्या खाया।
जब मैं नौ साल की थी,
मम्मी ने मुझे मूँग की छिलके वाली दाल लेने भेजा पड़ोस की
दुकान पर। मैं याद करते हुए ही गई थी दाल का नाम; लेकिन दुकान पर बहुत भीड़ थी। दुकानदार पहले
उनको सामान देने में लगा हुआ था। मैं खड़ी उनकी बात सुन रही थी। जब मेरा नम्बर आया
तो मैं भूल ही गई दाल का नाम। बहुत याद करने पर भी नहीं याद आया कौन सी दाल मंगाई
थी। पुनः घर गई दाल का नाम पूछने। इस बार रटते हुए गई और सही सामान लिया।
ऐसी ही घटना तब हुई
जब मैं अपने बेटे के साथ बाजार गई थी। आते हुए दर्जी की दुकान पर सूट सिलने को
दिया। कपड़ा बैग से निकालते हुए चाबी वहीं मेज पर दी और घर आकर ताला खोलने के लिए
जैसे ही पर्स देखा पर्स में चाबी ही नहीं मेन गेट की। मैं तो घबरा गई । अब अंदर कैसे जाएँगे?
तुरंत दिमाग पर जोर डाला, किस दुकान पर गए थे आते हुए अंत में। फिर याद आया -दर्जी की दुकान पर रह गई। तुरंत चाबी लेकर
आई और घर में प्रवेश किया।
मुझे भीड़ से बहुत डर
लगता है; इसलिए भीड़ वाले
बाजार में नहीं जाती। एक दिन एक महिला मित्र के साथ सब्जी लेने गई। सब्जी तुलवाई,
पैसे दिए और आगे चले
गए। दुकानदार से सब्जी लेना ही भूल गई। पुनः उसी दुकान पर जाकर देखा- सब्जी वहीं रखी थी। दुकानदार ईमानदार था।
पहचान लिया और सब्जी दे दी।
एक बात गौर करने की
है- महिलाएँ कुछ भी
भूल जाएँ; लेकिन अपना अपमान नहीं भूलतीं। जेठानी ने कब क्या
कहा, सास ने कब क्या कहा- सब याद रहता है। भले ही भूलने का नाटक करें।
कभी-कभी जिंदगी में
आगे बढ़ने के लिए पुरानी कड़वी बातों को भूलना ही बेहतर होता है। हर समय अतीत की
यादों में खोए रहकर वर्तमान नष्ट करना सही नहीं है। जो बीत गया,
वो बीत गया। अपने
वर्तमान में ही जीना चाहिए और खुश रहने का प्रयास करना चाहिए।
नेकी कर दरिया में
डाल। अर्थात्
दूसरों की भलाई कर उस बात को भूल जाना चाहिए; क्योंकि
अपेक्षा करोगे तो उपेक्षा होगी। निस्वार्थ होकर किसी की सहायता करें और भूल जाएँ।
कभी रिश्ते निभाने के लिए दूसरों की गलतियों को भूलना ही पड़ता है। गलती शब्द से
एक उदाहरण याद आया, मेरे पापा अक्सर सुनाते हैं -
समझ-समझकर समझ को
समझना भी
एक समझ है
समझ-समझकर जो न समझे
मेरी समझ में
वो ना समझ है
और
जो गलती ही न करे,उसे भगवान कहते हैं
गलती कर जो सुधर जाए,
उसे इंसान कहते हैं
गलती पर जो करे गलतीऔर
अड़ जाए
उसे शैतान कहते हैं।
पाठकगण क्षमा करें- मुझे आगे क्या लिखना था, भूल गई। भूलना भी ना... बड़ा परेशान करता है। भूलकर जो भूल हुई,
क्षमा करें पाठकगण।
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