पथ के साथी

Thursday, May 16, 2024

1417-दो कविताएँ

 1- ताप सघन है 

निर्देश निधि

 


ताप सघन है 

गौरैया बना रही है रेत में समंदर

नहा रही है डूब- डूब  

रख दूँ परात में पानी  

कि सूरज का ताप सघन है 

 

सरसों की पीली कनातें सिमट गई हैं खेत से 

अब आ पसरी हैं घेर की गोदी में 

उसके महीन, पीले दानों वाली नदी 

कि सूरज का ताप सघन है 

 

खेत की मेढ़ बाँधते 

बाबा की कनपटी से रिस रहा है पसीना 

या है यह मेहनत का अजस्र सोता 

सिर बँधा गमछा भिगो दूँ  

कि सूरज का ताप सघन है 

 

सरसों की सूखी लकड़ियों में अम्मा

सेक रही है पानी के हाथ की रोटियाँ 

उसके गालों पर उग आए हैं दो दहकते सूरज 

लगा दूँ प्यार की बरफ उन पर

कि सूरज का ताप सघन है 

 

बाबा ने बो दिए हैं बीज ईख के 

धरती की कोख में 

सह नहीं पाएँगे वे घुटन देर तक 

जल्दी ही चमकाएँगे मुँह कुलबुलाते, इतराते 

धरती की सतह पर 

कि सूरज का ताप सघन है 

 

सोना बन गई हैं गेहूँ की सब बालियाँ 

करधनी बनकर सज गई हैं खेत के कूल्हे पर 

अब भरेंगे भंडार माँ के 

ड़ौंची तले की ठंडी दूब पर पसरा रहेगा दिन भर शेरू 

कि सूरज का ताप सघन है ।

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2-श्रद्धा और मनु की संतानों

- निर्देश निधि

 

 

श्रद्धा और मनु की संतानों 

इस निरीह पृथ्वी पर तनिक दया करो 

 

तुम बीज की तरह फूटे इसी की कोख में 

इसी की कोख में रखकर परमाणु बम 

करते हो इसका अंतस् घायल 

 

इस ग्रहों से लदे ब्रह्मांड में सदियों से भटक रहे हो 

पर नहीं खोज पाए पृथ्वी की कोई दूसरी बच्ची 

 

कोई दूसरी सहोदरा, कोई दूसरी सखी 

दया करो इस इकलौती पर 

दया करो खुद पर

श्रद्धा और मनु की संतानों 

कुछ तो दया करो अपनी आने वाली संततियों पर भी

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