पथ के साथी

Thursday, April 30, 2020

979-अनुभूतियाँ


प्रीति अग्रवाल
1.
पाबन्दी गुनहगार ठहरा रही है
चलो हम ही कह दें कि फ़ुरसत नहीं है!!
2.
दे चुका है बहुत, जो दिया वही काफ़ी
ऐ परवरदिगार! कुछ न दे, बस दे माफ़ी।
3.
ज़्यादा है या कम, खुशी है या ग़म
तेरे हिस्से का जो है, तुझे मिल रहा है।
4.
प्यार के बदले, मैंने सिर्फ प्यार माँगा
'सिर्फ' नहीं पगली, तू माँग बैठी खज़ाना!
5.
हसरत बहुत थी, इक बार करके देखें
इश्क आग दरिया, हम डरे डूबने से!
6.
हम अकेले भले या दुकेले भले
आज़माइश सफ़र में, चलो आज कर लें!
7.
ऐ सुकूँ तू न जाने, कहाँ जा बसा है
पूछा करूँ सबसे, किसी को न पता है!
8.
ऐ दोस्त तू हौले से, दिल पे दस्तक़ दिया कर
जाग जाती हैं यादें, फिर सोने नहीं देतीं!
9.
राहें सिर्फ दो, पर दोराहे गज़ब हैं
कहाँ को ले जाएँ, ये किस्से अजब हैं।
10.
बातों में चली बात, ज़िक्र तेरा भी आया
हमनें नज़रें झुका लीं, कोई पढ़ न पाया!
11.
क्या हुआ जो तुमने अलग राह चुनी है
तुम्हारी खुशी, अब भी मेरी खुशी है!
12.
मजबूर ये हालात, उधर भी थे इधर भी
तुम्हें बेवफ़ा मैं, भला कैसे कह दूँ!
13.
छलनी हो रहे हैं, हम सहते सहते
तुम्हारी तरकश के तीर न थके हैं!
14.
वो बचपन का राजा, वो बचपन की रानी
बड़े मज़े की होती थी उनकी कहानी।
15.
आपबीती का छोटा-सा इतना फ़साना
'सहा भी न जाए, कहा भी न जाए'!!
-0-

Monday, April 27, 2020

978-कह दो न इक बार


कृष्णा वर्मा
  
ज़रा सोचो तो
तुम्हारी ज़िद के चलते
इस रूठा-रूठी के दौर में
जो मैं हो गई धुँआ
तो कसम ख़ुदा की
छटपटाते रह जाओगे
क्षमा के बोल कहने को
लिपटकर मेरी मृत देह से
गिड़गिड़ाओगे माफ़ी को
पर अफसोस
चाहकर भी कर न पाऊँगी
तुम्हारी इच्छा को पूरा
नाहक ढह जाएगा तुम्हारा पौरुष
हं की टूटी खाट पर
और तुम्हारे दुख का कागा
लगातार करेगा काँय-काँय
तुम्हारे मन की मुँड़ेर पर
अनुताप में जलते तुम
जुटा न पाओगे हिम्मत उसे उड़ाने की
मुठ्ठी भर मेरी राख को
सीने से लगाकर
ज़ार-ज़ार रोएगी तुम्हारी ज़िद
और मेरी असमर्थता
पोंछ न पाएगी
तुम्हारे पश्चात्ताप के आँसू
सुनो, समय रहते अना को त्याग
समझा क्यों नहीं लेते अपनी
छुई-मुई हुई ज़ुबान को कि बोल दे
खसखस -सा लघुकाय शब्द
जिसका होठों पर आना भर
मुरझाते रिश्ते को कर देते है
फिर से गुलज़ार
सुनो, कह क्यों नहीं देते इक बार
सॉरी।


Friday, April 24, 2020

977



1-जीतेगी जिंदगी
परमजीत कौर 'रीत' ( श्री गंगानगर)

 लॉकडाउन में
बंद दरवाजों 
मुँह चिढ़ाती गलियों
सिर मुँडा बाज़ारों
और
रूठे चौराहों के बीच ।
अपने जीवन की परवाह किए बग़ै
धन्य है-
 इधर-उधर दौड़ता मैडिकल-पैरामेडिकल स्टॉफ।
धन्य है-
क्वारेंटाइन ,आइसोलेशन 
सँभालती पुलिस ,सेना ,और सभी नींव की ईंटे।
धन्य है-
लॉकडाउन के नियम और
अनुशासन को पालते लोग ।
इस उम्मीद के साथ कि 
कुछ दिन घर रहकर ही सही
कुछ दिन सबसे दूर रहकर ही सही
ज़िन्दगी जीतेगी ज़रूर.
ज़िन्दगी जीतेगी ज़रूर....
-0-
-0-
2-डॉ.सुरंगमा यादव
1
सर्द मौसम,उस पर ये लम्बी रातें
दिल कितना करे खुद से बातें ?
2
ऐसी बरसात भला किस काम की?
एक हो जाएँ नदिया-पोखर ।
3
तेरी चाहत हमें ले आ कहाँ तक
र का पता ही ना चला ।
4
जब से तारीफ़ तुमने हमारी कर दी
हम भी इतराके चलना सीख ग
5
औरत हूँ ,जानती हूँ बखूबी
होठों को सी लेना भी ।
6
ज़िदगी में काँधे तो बहुत मिले
दिल को भरोसा तेरे काँधे पे हुआ।
7
तन्हाई यूँ गुज़ार देती हूँ
तेरी बाहों की तरह यादों से लिपट जाती हूँ ।
8
डायरी में दबे फूल की तरह तुमने
इक माने बाद याद किया मुझको ।

9
किसी से उम्मीद लगाना छोड़ दिया जबसे
जीना बड़ा आसान हो गया तबसे ।
10
ये जुब़ान भी अजीब है
फिसलकर छिप जाती है।
11
तुम्हारे इंतज़ार में सदियां गुज़र गईं
तुम पास आ भी , मगर गै़रों की तरह ।
12
बस इतनी गुज़ारिश  है तुमसे
तुम मेरे हो ,ये व़हम ना तोड़ देना ।
13
हम तुम्हें अपना समझकर हक़ जताते रहे
तुमने हमें  मुकाबिल समझ लिया ।
14
प्यार तो रगो में बहता है
कोई काँटा नहीं है , जो काँटें से निकल जागा।
15
बुढ़ापे का तोहफा
लंबे  हो गये दिन-रात
गुज़रते ही नहीं ।
-0-

Tuesday, April 21, 2020

975-बहुत बोल चुके [ मेरी पुरानी कविता]



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

बहुत बोल चुके, अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो।

गाँठ खोलकर अब तक तुमने
जितना भी था, सभी गँवाया।
मेरे यार ज़रा बतला दो
बदले में तुमने क्या पाया ?

बहुत तोल चुके, अब न तोलो
जिसको अब तक तुमने तोला
उन सबको पाया है पोला
वार किया उसने ही छुपकर
जिसको तुमने समझा भोला।

अब सबके मन अमृत न घोलो
अमृत घोला,  जिनके मन में
उनका मन विषबेल हो गया।
धोखा देकर, खिल-खिल हँसना
उन लोगों का खेल हो गया।

बहुत बोल चुके, अब न बोलो
अपने मन की गाँठ न खोलो।

Monday, April 20, 2020

974


पूनम सैनी
 दोहा

जैसी जिसकी कामनावैसी उसकी प्रीत ।
जग माया का जाल है ,जीत सके तो जीत 

-0-
2-कविता
कभी नहीं एक सी होती 
जिंदगी बहता पानी है 
जो दिल में ही दफन अच्छी 
वो सुख- दुख की कहानी है ।

कहीं कभी भूल से तुमने  
जगत का लिया सहारा हो 
भरोसा करके दुनिया पर 
ईश से किया किनारा हो 
समझ लेना ये दुनिया की 
तो फितरत ही रवानी है । 

आँख जो भर के बह जाए 
पूछे दुनिया कि गम क्या है 
जख्म दिल चीर उभर आए 
तुम पे बीते सितम क्या है 
बता देना यूँ हँस करके 
नहीं आँसू, ये पानी है
-0-

Sunday, April 19, 2020

973


मेशराज की रचनाएँ
1-जनक छन्द  की तेवरी
1
क्या घबराना धूप से
ताप-भरे लू-रूप से, आगे सुख की झील है।
दुःख ने घेरा, क्यों डरें
घना अँधेरा, क्यों डरें, हिम्मत है-कंदील है।
भले पाँव में घाव हैं
कदम नहीं रुक पायँगे, क्या कर लेगी कील है।
खुशियों के अध्याय को 
तरसेगा सच न्याय को, ये छल की तहसील है।
है बस्ती इन्सान की
हर कोई लेकिन यहाँ बाज गिद्ध वक चील है।
पीड़ा का उपचार कर
भाग लिखें की’ आज सुन, चलनी नहीं दलील है। 
-0-
2-*गीतिका छंद में ग़ज़ल* 

सादगी पै, दिल्लगी पै, इक कली पै, मर मिटे 
दोस्ती की रोशनी पै, हम खुशी पै, मर मिटे।

फूल-सा अनुकूल मौसम और हमदम ला इधर 
 प्यार की इकरार की हम चाँदनी पै मर मिटे।

हम मिलेंगे तो खिलेंगे प्यार के मौसम नये
हम वफा  की, हर अदा की, वन्दगी पै मर मिटे।

रूप की इस धूप को जो पी रहे तो जी रहे
नूर के दस्तूर वाली हम हँसी पै मर मिटे।

फिर  उसी अंदाज में तू ‘राज’ को आवाज दे
नैन की, मधु  बैन की हम बाँसुरी पै मर मिटे।
-0-
3- हाइकु विन्यास में ग़ज़ल     

भूल चुके हैं / प्रियतम को जब / बेचैनी कैसी ?
माना सुख-सा / हर ग़म को जब / बेचैनी कैसी ?

उसके लब की / इक जलधर की / रंगीं रातों की 
प्यास नहीं है / अब हमको जब / बेचैनी कैसी ?

आज प्रीति का / भोग न रुचिकर / प्राणों को लागे 
माना नीरस / मधुसम को जब / बेचैनी कैसी ?

बेगानों हित / सहज प्रफुल्लित / रातों-बातों में 
हमने देखा / हमदम को जब / बेचैनी कैसी ?

दूर-दूर हैं / हम उपवन की / हूकों-कूकों से 
आज न चाहें / छम-छम को जब / बेचैनी कैसी ?
-0-
3- तेवरी

तभी बिखेरे बाती नूर, ये दस्तूर
मोम सरीखा गल प्यारे । 

दुःखदर्दों से किसकी मुक्ति? कोई युक्ति??
क्या होना है कल प्यारे

अब तू जिस संकट के बीच, भारी कीच
थोड़ा-बहुत निकल प्यारे । 

रैंग, हुआ जो पाँव विहीन, बनकर दीन
सर्प सरीखा चल प्यारे । 

जग में उल्टे-सीधे  काम, ओ बदनाम
क्यों करता है छल प्यारे ।
-0-
4- नम हैं बहुत वतन की आँखें 

हिन्दू-मुस्लिम बनना छोड़ो
बन जाओ तुम हिन्दुस्तानी,
अपना भारत महाकाव्य है
टुकड़ो में मत लिखो कहानी।

क्यों होते हो सिख-ईसाई
साथ जियो बन भाई-भाई,
धर्म  नहीं वह जिसने सब पर
हिंसा के बल धाक जमा

रक्तपात यह हल देता है
बस हिंसक जंगल देता है,
जातिवाद का मीठा सपना
मानवता को छल देता है।

जब मजहब उन्मादी होता
बस लाशों का आदी होता,
चीत्कार ही दे सकता है 
अमन देश का ले सकता है।

अतः धर्म  का मतलब जानो
मानवता सर्वोपरि मानो,
नम हैं बहुत वतन की आंखें
इसके मन का दुःख पहचानो।
-0-

Saturday, April 18, 2020

972

1.प्रीति अग्रवाल
1.
ऐ दोस्त तेरे काँधे में कुछ ऐसी कशिश है
दिखते ही जी चाहे, मैं जी भर के रो लूँ!
2.
तुम तो ऐसे न थे, जो सताते मुझको
पर यादें तुम्हारी, बड़ी बैरी निकलीं!
3.
हमराज़ चुना है, हमने तुम्हीं को
ये राज़ किसी से कह तो न दोगे?
4.
गुमनामी से अभी तो यारी हुई थी
तुमने वो भी छीनी, मशहूर करके!
5.
आँखों में लाल डोरे, बोझिल- सा तन है
बीमार नहीं हूँ, बस रोने का मन है।
6.
ऐ टूटते तारे, तेरी खामोशी से याद आया
टूट था मेरा दिल भी, कुछ तेरी तरह ही!
7.
एक प्यार- भरा दिल, और वो भी टूटा हुआ,
अब गीत और ग़ज़लों के काफिले बढ़ेंगें!
8.
क़ुर्बानी सारी, औरत के हिस्से आईं
और शोहरत, 'कुर्बानी के बकरे' ने पाई!!
9.
खुद को समझा सुनार, और दाता को लुहार
अब देख! सौ सुनार की, सिर्फ एक लुहार की।
10.
आज़ादी पे कुछ दिन से पाबन्दी क्या लगी है
न चाहकर, परिंदों से, जलन हो रही है।
11.
बुझ चुकी थी आग, धुआँ तक नहीं था
अंगारे मनचले थे, सुलगने की ठानी!
12.
न जाने क्यों मंज़िल की परवाह नहीं है
हसीं है सफर, हम चले जा रहे हैं!
13.
ऐसा भी नहीं कि बिन तेरे, मर मिटेंगें
बस जीने की कोई खास, वजह न रहेगी।
14.
सोचती हूँ, बस हुआ, ये रूठना मनाना
मैं मना मना थकी, तुम रूठके न हारे।
15.
तू जानता है सब, फिर भी बुत बना खड़ा है
नाइंसाफ़ी करने वालों की, फिर ऐसी क्या ख़ता है
-०-
2-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
दूर रहकर पास आने की उम्मीद में जिए
पास आए तो दूरियाँ और गहरी हो गईं।
2
हम क्या हैं, समझाने में उम्र गुज़र गई।
ना वे समझ पाए ,न हम ही समझा सके

-0-

हाइकु
1
प्यारा अम्बर
ये था इनका घर
हमने छीना।

Wednesday, April 15, 2020

971-महादान -महिमा



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

    दोहा-एक दिन कहने लगे, हमसे कफ़नखसोट ।
‘महादान से ही मिटें, जनम -जनम के खोट॥’
चपरासी, गुरु या अधिकारी। दारोगा , बाबू , पटवारी ।
रिश्वत इनको जो दे आता । मुँह-माँगा फल जग में पाता।
आशु फलदायिनी सुखकारी । महादान की यह बीमारी ॥
सच्चा साधक कभी न डरता । दुनिया भर का धन वह हरता ॥
वेतन अपना घर में धरता । घूस नोंच बैंकों में भरता ॥
बिना दिए जो काम कराता । केवल वही नरक में जाता ।
चाहे जितने पाप कमाओ । रिश्वत देकर छुट्टी पाओ ।।
जब तक भेंट नहीं चढ़ती  है। फ़ाइल आगे ना बढ़ती है ॥
बिना खिलाए साहब लड़ता । खा लेने पर बाँह पकड़ता ॥
     दोहा-पिटते इनके हाथ से, क़ायदे व क़ानून ।
इनकी कलम छुरी बने, करदे सौ-सौ खून ॥
 शिव के गण भी इनसे डरते । यमदूत यहाँ पानी भरते।
ज्ञान और गुण धक्के खाते। उल्लू घर-घर पूजे जाते ।
साहब के घर भेज मिठाई । नहीं किसी ने मुँह  की खाई॥
इनकी छाया जिस पर पड़ती । मौत न उसके आगे अड़ती ।
गुण्डे ,बनकर  साँड टहलते ।  चौराहों पर सुरती मलते ।
लूट-खसोट व चोरी-जारी । इसी से है सभी की यारी ॥
बेईमानी जो भी करता ,भव-सागर से पार उतरता ।
रिश्वत लेता पकड़ जाए । रिश्वत देकर वह छुट जाए ।
जो भी इनकी निन्दा करता। नरक लोक में सदा विचरता ।
   दोहा-कुछ न पता परलोक का , हे मूरख इंसान ।
जीवन बीता जा रहा, एक पथ महादान
-0-

Friday, April 10, 2020

970-लघुकथा का सृजन



 रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ से परिचर्चा
परिचर्चाकार ( योगराज प्रभाकर-सम्पादक -लघुकथा कलश)
1.आप अपनी लघुकथा के लिए कथानक का चुनाव कैसे करते हैं?

·      सायास किसी कथन का चयन नहीं करता। कोई घटना, प्रसंग मन में कौंध छोड़ जाए, बेचैनी भर दे, तो वह कथानक बन जाता है। ‘आज लघुकथा लिखनी है’ ऐसा निश्चय करके कभी कुछ नहीं लिखा।
2.क्या कभी कोई कथानक किसी विचार अथवा सूक्ति पढ़ते हुए भी सूझा है?
·      विचार / सूक्ति को पढ़ते हुए कभी कोई कथानक नहीं सूझा।
3.कथानक सूझने के बाद ज़ाहिर है कि लघुकथा की एक अपुष्ट- सी रूपरेखा स्वत: ही बन जाती है। आप क्या उसे बाकायदा कहीं लिख लेते हैं या केवल याद ही रखते हैं?
·      लिखने का प्रयास ज़रूर किया , लेकिन वह  किसी काम नहीं आया । आज तक इस तरह की लिखी सांकेतिक पंक्तियाँ ज्यों की त्यों आराम कर रही हैं।
4.क्या कभी ऐसा भी हुआ कि कथानक सूझते ही लघुकथा का अंत सबसे पहले दिमाग में आया हो और आपने उसी के इर्द-गिर्द लघुकथा बुनी हो?
·      कथानक सूझते ही अन्त सबसे पहले दिमाग़ में नहीं आया। कथा के स्वाभाविक विकास से जो सहज अन्त बना, वही रखा गया। गढ़े गए अन्त  मुझे प्राय: नहीं जमे।
5.कथानक चुनने के बाद आप यह निर्णय कैसे करते हैं कि उस पर लघुकथा किस शैली में लिखनी है?
·      कथ्य के विकास की जैसी माँग होती है, भाषा और शैली उसी के अनुरूप अपनानी पड़ती है। बात को बेहतर ढंग से कहना ही  शैली है। कथ्य के अनुरूप  शैली का होना ज़रूरी है। कमज़ोर भाषा और शैली  बहुत अच्छे विषय को भी लचर बना सकती हैं।
6.लघुकथा का पहला ड्राफ्ट लिखकर आप कब तक यूँ ही छोड़ देते हैं? आप सामान्यत: लघुकथा के कितने ड्राफ्ट लिखते हैं?
·      पहला ड्राफ़्ट छह-सात दिन तक तो पड़ा ही रहता है। कई बार महीनों हो जाते हैं। जब तक सन्तुष्टि नहीं मिलती, तब तक ड्राफ़्ट को आराम करने देता हूँ। भेजने की हड़बड़ी में  ड्राफ़्ट के आराम में ख़लल नहीं डालता।
7.क्या कभी ऐसा भी हुआ कि कथानक सूझते ही तत्क्षण उस पर लघुकथा लिखी गई हो?
·      बहुत कम बार ऐसा हुआ है कि तत्क्षण लघुकथा लिखी गई हो। फिर भी मैंने उसको तुरन्त प्रकाशन हेतु नहीं भेजा। बाद में भाषा आदि का कुछ न कुछ बदलाव ज़रूर हो गया।
8.लघुकथा लिखते हुए क्या आप शब्द सीमा भी ध्यान में रखते हैं?
·      मैं कभी शब्द सीमा का ध्यान नहीं रखता। यह तो लघुकथा के कथ्य पर निर्भर है कि  वह कितना आकार लेता है।  रचना की पूर्णता उसके सम्प्रेषण में निहित है , न कि आकार  में। लम्बी और बेदम लघुकथाएँ बहुत मिल जाएँगी  तथा अत्यन्त लघु आकार की  अधूरी  और चुटकुलानुमा रचनाएँ भी बहुत सामने आई हैं।
9.लघुकथा लिखते हुए आप किस पक्ष पर अधिक ध्यान देते हैंशीर्षक पर, प्रारंभ पर, मध्य पर या फिर अंत पर?
·      मेरा ध्यान अच्छी प्रस्तुति पर रहता है।  शीर्षक से लेकर अन्त तक सभी का समान महत्त्व है। कमज़ोर शीर्षक अच्छी लघुकथा  का मुकुट नहीं बन सकता। लचर आरम्भ रोचकता को नष्ट करता है। कमज़ोर मध्य  को कमज़ोर रीढ़ कहा जाए ,तो उपयुक्त होगा। कमज़ोर अन्त लघुकथा को ले डूबता है।
10.लघुकथा लिखते समय ऐसी कौन सी ऐसी बाते हैं ,जिनसे आप सचेत रूप से बचकर रहते हैं?
·      सचेत  रूप से बचकर लिखना तो नहीं कहूँगा। फिर भी स्वभाववश एक बात मेरे मन में यह रहती है कि लघुकथा किसी वर्ग को ठेस पहुँचाने वाली न हो। कमज़ोर का मज़ाक उड़ाने वाली न हो। सद्भाव को हानि पहुँचाने वाली न हो। सर्वोच्च तो मानव है, उसकी मर्यादा को सुदृढ़ करने वाली हो।
11.एक गम्भीर लघुकथाकार इस बात से भली-भाँति परिचित होता है कि लघुकथा में उसे ‘क्या’ कहना है, ‘क्यों’ कहना है और ‘कैसे’ कहना है, निस्संदेह आप भी इन बातों का ध्यान रखते होगे। इसके इलावा आप ‘कहाँ’ कहना है (अर्थात किस समूह, गोष्ठी, पत्रिका, संकलन अथवा संग्रह के लिए लिख रहे हैं) को भी ध्यान में रखकर लिखते हैं?  
·        किसी समूह, गोष्ठी, पत्रिका, संकलन अथवा संग्रह  को ध्यान में रखकर नहीं लिखता।  इतना ज़रूर है कि ‘क्या’ लिखना है ,क्यों’ लिखना है और ‘कैसे’ लिखना है, इसे ध्यान में रखता हूँ।
12.लघुकथा में आंचलिक भाषा का प्रयोग करते समय आप किन बातों का ध्यान रखते हैं?
·      आंचलिक भाषा  का प्रयोग संवाद और उसके पात्र की मन: स्थिति के अनुकूल हो  और कथा में अपरिहार्य हो,इसका ज़रूर ध्यान रखता हूँ। आंचलिक शब्दों की अपनी त्वरा और तीव्रता होती है, जिसका स्थान  दूसरा ( भले ही कितना साहित्यिक हो) शब्द नहीं ले सकता।
13.लघुकथा लिखते हुए क्या आप पात्रों के नामकरण पर भी ध्यान देते हैं? लघुकथा में पात्रों के नाम का क्या महत्व मानते हैं?
·      नामकरण पर ध्यान देता हूँ, लेकिन इतना भी नहीं कि पूरी कथा ‘नाम’ के इर्द-गिर्द  ही घूमती रहे।
14.क्या लघुकथा लिखकर आप अपनी मित्र-मंडली में उस पर चर्चा भी करते हैं? क्या उस चर्चा से कुछ लाभ भी होता है?
·      परिवारीजन या मित्र जो भी उस समय निकट हो ,उसको ज़रूर सुनाता हूँ। भाई सुकेश साहनी जी से सम्पर्क होने पर , सभी लघुकथाएँ उनको ज़रूर सुनाईं। सुझाए गए सुधार भी किए ।
15.क्या कभी ऐसा भी हुआ कि किसी लघुकथा को सम्पूर्ण करते हुए आपको महीनों लग गए हों? इस सम्बन्ध में कोई उदाहरण दे सकें तो बहुत अच्छा होगा।
·      ‘ऊँचाई’ लघुकथा के साथ ऐसा ही हुआ। उसे अन्तिम रूप देने में कई महीने लग गए ।
16.आप अपनी लघुकथा का अंत किस प्रकार का पसंद करते हैं? सुझावात्मक, उपदेशात्मक या निदानात्मक
·      सहज स्फूर्त्त  निदानात्मक
17.आप किस वर्ग को ध्यान में रखकर लघुकथा लिखते हैं, यानी आपका ‘टारगेट ऑडियंस’ कौन होता है?
·      कोई भी वर्ग  हो सकता है। वर्ग विशेष को ध्यान में रखकर नहीं लिखा।
18.अपनी लघुकथा पर पाठकों और समीक्षकों की राय को आप कैसे लेते हैं? क्या उनके सुझाव पर आप अपनी रचना में बदलाव भी कर देते हैं?
·      समीक्षकों की राय सिर माथे। बदलाव करने का कभी अवसर नहीं आया ।
19.क्या कभी ऐसा भी हुआ कि आपने कोई लघुकथा लिखी, लेकिन बाद में पता चला कि वह किसी अन्य लघुकथा से मिलती-जुलती है। ऐसी स्थिति में आप क्या करते हैं?
·      आश्चर्यजनक रूप से ऐसा हुआ है। मैंने जो कथानक सोचा था, ठीक वैसी ही रचना मुझे सुनने का अवसर मिला। उस लघुकथा को पूरा करने का विचार छोड़ दिया ।
20.क्या कभी आपने अपनी लिखी लघुकथा को खुद भी निरस्त किया है? यदि हाँ, तो इसका क्या कारण था?  
·      बहुत -सी लघुकथाएँ निरस्त करनी पड़ीं। कहीं भेजी जातीं, तो छप सकती थीं;  लेकिन मन ने  स्वीकार नहीं किया। जब मैं ही सन्तुष्ट नहीं, फिर उन लघुकथाओं को पाठकों के बीच में लाना  श्रेयस्कर नहीं।
-0- सम्पर्क: 13 मेपल सीरप स्ट्रीट, ब्रम्पटन, एल 8 पी 4 सी 5 ( कैनेडा)
·      21-03-2019 भारतीय समय 3-09 बजे प्रात: ( ब्रम्पटन-5-39 अपराह्न)