डॉ. पूनम चौधरी
पूरे साल तौली जाती है
उसकी निष्ठा,
परखी जाती है उसकी
ईमानदारी,
हर रोज़ नई कसौटी पर
कसी जाती है उसकी नीयत।
फिर पाँच सितम्बर को
कुछ फूल और
सम्मान-पत्रों के साथ
एक दिन के लिए
तय कर दिया जाता है कि
शिक्षक आदर के योग्य
है।
अजीब है यह समय—
जहाँ इज़्ज़त भी
कैलेंडर देखकर आती है।
पूरे दिन
मोबाइल की स्क्रीनें
जगमगाती हैं—
‘Happy Teacher’s Day’
संदेश, कुछ सुंदर शब्द,
कुछ तस्वीरें,
कुछ औपचारिक
शुभकामनाएँ—
और सबको लगता है
इतना ही पर्याप्त है।
शायद शिक्षक की गरिमा
इतने भर से अपनी जगह
लौट आएगी,
एक दिन की शुभकामनाओं
से
मिट जाएगी वर्षों की
उपेक्षा।
जिसकी आवाज़ बरस भर
सवालों, आदेशों और जाँच के
दायरे में
दबती रही,
क्या एक दिन का
स्तुतिगान
उसके हिस्से का मान लौटा सकता है?
एक ओर
सुविधाओं से सुसज्जित
कक्षों में
निर्धारित समय,
और काम की निश्चित
सीमाओं के साथ
वे बना रहे हैं मानक,
कस रहे हैं कसौटियाँ,
कर रहे हैं आकलन
उस शिक्षक का—
जो दुर्गम रास्तों से
गुजरता हुआ,
चिलचिलाती दोपहर में
बिना पंखे, बिना बिजली
उस कक्षा में बैठा है
जहाँ हवा से पहले
बच्चों तक पहुँचती है
उनके घरों की विवशता।
वे बच्चे
जो सिर्फ़ पढ़ने नहीं
आए—
किसी के घर में रोटी का
प्रश्न है,
किसी के माँ-बाप
मज़दूरी के लिए गए हैं,
कोई घर की कामों से
बचने
के लिए आ बैठा है,
किसी का भाई पढ़ेगा
वो देखभाल के लिए आई है।
वह पढ़ाता है—
और पढ़ाते-पढ़ाते
उनकी आँखों में वह सब
पढ़ता है
जो किताबों में नहीं
लिखा।
वह अक्षर देता है,
तो साथ में आत्मविश्वास
भी।
वह गणित सिखाता है,
तो जीवन का हिसाब भी।
वह गलती सुधारता है,
तो कभी-कभी
टूटता हुआ मन भी
सँभालता है।
इसके अलावा भी
उसके
कामों की फेहरिस्त है लंबी —
कभी मध्याह्न भोजन की
व्यवस्था,
कभी जनगणना,
कभी बी. एल. ओ. का दायित्व,
कभी सर्वे,
कभी छूटे हुए बच्चों की
तलाश,
कभी टीकाकरण की चिंता,
कभी गाँव की किसी दूसरी
सरकारी ज़िम्मेदारी का
बोझ।
काग़ज़ और काम बढ़ते
जाते हैं,
दिन छोटा पड़ता जाता
है।
फिर भी उसके कंधों पर
है जिम्मेदारी—
इन अधूरी जिंदगियों को
निपुण बनाने की।
उसकी दो मिनट की देरी
घड़ी देख लेती है,
उसकी एक गलती
कार्यालय तक पहुँच जाती
है,
उसकी छुट्टी
बहुतों की नज़र में आ
जाती है,
उसकी तनख़्वाह तो
गाँव वालों को भी
मुँहज़बानी
याद रखते हैं ।
बस भूल गए हम
कितनी बार
वह अपने हिस्से का
विश्राम
किसी बच्चे की ज़रूरत
पर
छोड़ आया है।
हाँ, शिक्षक भी मनुष्य है।
उससे भी भूल होती है।
जो अपने दायित्व से
विमुख है,
उसे अपने भीतर
कठोरता से झाँकना
चाहिए।
पर एक की भूल से
पूरे वर्ग की निष्ठा पर
संदेह करना भी
कहाँ का न्याय है?
किसी शिक्षक को
उसके वेतन से मत आँकिए,
उसकी छुट्टियाँ गिनना
बंद कीजिए,
उसकी घड़ी से
मत जाँचिए उसकी
उपस्थिति—
कभी उस बच्चे की आँख से
देखिए
जिसने पहली बार
उसी के हाथों
सीखा है अपना नाम
लिखना।
तब शायद समझ आए—
शिक्षक का सबसे बड़ा
पुरस्कार
किसी मंच पर नहीं,
किसी सम्मान-पत्र में
नहीं;
बल्कि बच्चे के भविष्य
में लिखा होता है।
इसलिए इस शिक्षक दिवस
मोबाइल पर एक और
शुभकामना
भेजने से पहले
अपने भीतर पूछिए—
क्या सचमुच हम शिक्षक
का आदर करते हैं?
नहीं,
एक दिन के संदेश
एक शिक्षक का समय नहीं
बदल सकते,
एक दिन की तालियाँ
उसकी परिस्थितियाँ नहीं
बदल सकतीं।
समय तब बदलेगा
जब आदर
संदेश से निकलकर
व्यवहार में आएगा।
जब उसके अधिकारों के
साथ
उसके उत्तरदायित्व की
भी
न्यायपूर्ण बात होगी।
और जब सरकारी विद्यालय
की
दूरस्थ, तपती हुई कक्षा में
खड़ा शिक्षक
सिर्फ़ व्यवस्था का
कर्मचारी नहीं;
बल्कि राष्ट्र के
भविष्य का
विश्वस्त संरक्षक समझा
जाएगा।
बनानी है नियमावली—
तो सरल बनाइए।
स्थानांतरण की नीतियाँ
सरल और पारदर्शी बनाइए।
पदोन्नति की व्यवस्था
न्यायपूर्ण बनाइए।
शिक्षकों के लिए
एक स्वस्थ शैक्षिक
वातावरण बनाइए;
क्योंकि
शिक्षक को केवल
कर्तव्यों की सूची नहीं,
गरिमा के साथ काम करने
का अधिकार भी चाहिए।
तभी असल में
हम कर पाएँगे
शिक्षक का मान।
और फिर नहीं बचेगी
आवश्यकता
साल में एक दिन
उसके लिए मंच सजाने की—
क्योंकि
जिस शिक्षक का मान
हर दिन उसके काम में
होगा,
उसे मान देने के लिए
एक दिन की ज़रूरत नहीं
होगी।

