1-परदेसी मन / शशि पाधा
पता- ठिकाना पूछता
जड़ें पुरानी ढूँढता
घूम रहा परदेसी मन ।
काकी, चाची,
मामा, मौसा
एक गली का इक परिवार
बीच सजा वो चाट खोमचा
आसपास बसता संसार
रोज़ हवा को सूँघता
खुश्बू वो ही ढूँढता
तड़प रहा परदेसी मन ।
जुड़ी- सटी सब छत, मुँडेरें
आधी रातें, कथा-
कहानी
खाट, दरी, बस चादर, तकिया
माटी-रची सुराही –पानी
यादों में ही झूमता
छत वही फिर ढूँढता
पछताया परदेसी मन ।
दोपहरी की धूप गुनगुनी
आँगन, तकिया लंबी तान
पके रसोई चाय, पकौड़ी
सर्दी से तब बचते प्राण
उनींदा- सा ऊँघता
हरी चटाई ढूँढता
पगला सा परदेसी मन ।
संग मनाए मेले- ठेले
चौगानों में तीज, त्योहार
आपस में बाँटे थे कितने
चूड़ी, रिब्बन के उपहार
बिन झूले
के झूलता
ठाँव वही
फिर ढूँढता
बेचारा
एकाकी मन
-0- वर्जीनिया, यू एस ए , shashipadha@gmail.com
2-
2-वर्तमान के दाग़/ डॉ.सुरंगमा यादव
बिना दवा के मर जाते हैं, कितने ही बीमार
कहीं नोट गद्दों में भरकर, सोते जिम्मेदार
हाय गरीबी !
उठी न डोली, देखो फिर इस बार
कबाड़ तक में जलते
देखे, नोटों के अंबार
न्याय तुला पर धन- बल भारी, किससे करें पुकार
कोर्ट -कचहरी के चक्कर
में, बिक जाते घर-द्वार
लगे मुखौटे कई- कई, पहचान हुई दुश्वार
बड़े निवाले खाने वाले, बच जाते हर बार
वर्तमान के दाग़ छिपाए, जाते बारम्बार
इतिहासों के काले पन्ने, दिखलाकर सौ बार।
-0-

