पथ के साथी

Sunday, August 23, 2026

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1-परदेसी मन /  शशि पाधा 

पता- ठिकाना पूछता 

जड़ें पुरानी ढूँढता

  घूम रहा परदेसी मन ।



काकी, चाची, मामा, मौसा 

एक गली का इक परिवार 

बीच सजा वो चाट खोमचा 

आसपास बसता संसार

     रोज़ हवा को सूँघता

   खुश्बू वो ही ढूँढता 

   तड़प रहा परदेसी मन ।



जुड़ी- सटी सब छत, मुँडेरें 

आधी रातें, कथा- कहानी 

खाट, दरी, बस चादर, तकिया 

माटी-रची सुराही –पानी 


        
यादों में ही झूमता 

        छत वही फिर ढूँढता 

       पछताया परदेसी मन ।


दोपहरी की धूप गुनगुनी 

आँगन, तकिया लंबी तान 

पके रसोई चाय, पकौड़ी 

सर्दी से तब बचते प्राण 

 

     उनींदा- सा ऊँघता 

     हरी चटाई ढूँढता 

     पगला सा परदेसी मन । 



संग मनाए मेले- ठेले

चौगानों में तीज, त्योहार

आपस में बाँटे थे कितने 

चूड़ी, रिब्बन के उपहार



   बिन झूले के झूलता

   ठाँव वही फिर ढूँढता

   बेचारा एकाकी मन

    -0-  वर्जीनिया, यू एस ए ,  shashipadha@gmail.com

2-

2-वर्तमान के दाग़/ डॉ.सुरंगमा यादव

 

बिना दवा के मर जाते हैं, कितने ही बीमार

कहीं नोट गद्दों में भरकर, सोते जिम्मेदार

​हाय गरीबी ! उठी न डोली, देखो फिर इस बार

​कबाड़ तक में जलते देखे, नोटों के अंबार

​


न्याय तुला पर धन- बल भारी, किससे करें पुकार

​कोर्ट -कचहरी के चक्कर में, बिक जाते घर-द्वार

​लगे मुखौटे कई- कई, पहचान हुई दुश्वार

​बड़े निवाले खाने वाले, बच जाते हर बार

​वर्तमान के दाग़ छिपाए, जाते बारम्बार

​इतिहासों के काले पन्ने, दिखलाकर सौ बार।

 

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