पथ के साथी

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Sunday, January 28, 2018

795


बसंत        
पुष्पा मेहरा

उतरी ओढ़नी धुंध की
निखरा  रूप धरा का
डाल-डाल पर खिल गईं  कलियाँ
नव जीवन मुस्काया,
रंग मन में भर आया  

फूल–फूल पर किरण नाचती
हवा सुखद मनभावन बहती
राग-रंग से भर कर उड़ती
रंगीं पाखों की टोली ,
प्रेम-रंग में भीगी छतरी
गुलमोहर ने तानी ,
रोम–रोम हरषाया
सखि ! बसंत आया ।

अमलतास ने माँगी हल्दी
पीताम्बर रंग लाया
लो बसंत आया ।

बूट–बाल की झाँझ बज उठी
खेतों ने भी झूम-मल्हार गाया,
तान मदिर भौरों ने छेड़ी
अम्बर भी मुस्काया
मन झूम–झूम हरषाया
लो ! अनंगआया ।

हवा रच रही छंद मधुर
मन धरती का डोला
फूले पलाश की चितवन से
नशा निराला छाया
काम ने मन में राग भर दिया
मन विरही-दहकाया
सखि!बसंत आया ।

आमों की डालों पर
सजे देख बौरों के झूमर
कोकिल विरही कूका,
पा सुगंध भरा झोंका
पात–पात बौराया
देख के,मन हरषाया
सखि!बसंत आया ।

शीत के आँसू पोंछ बसंत
प्रीति की रीति निभाता
फ़गुआ गाता,विरहा गाता
रंगों के डोल बहाता
प्रकृति-नूर रंग लाया
देखो फिर बसंत आया । 
 -0-
Pushpa.mehra @gmail.com


Tuesday, July 18, 2017

749


1-दूर जाते हुए
                       डा कविता भट्ट

दूर जाते हुए मन सीपी-सा उसकी यादों के समंदर में खोया था
जिसके सीने को मैंने कई बार अपने आँसुओं से भिगोया था

खोज रही थी आने वाले हर चेहरे में उसका निश्छल चेहरा
भोली आँखें- जिनकी नमी वो ज़माने से छिपाता ही रहा

बस इसलिए कि कहीं मेरी आँखें फिर से बरसने न लगें
दोनों का दर्द एक-सा है, कहीं दुनिया समझने न लगे
 
झूठे-बनावटी सम्बन्धों के महलों की नींव न हिल जा
तथाकथित सभ्यता-नैतिकता कहीं धूल में न मिल जा

रिश्तों के महल बस बाहर से ही सुन्दर होते हैं दिखने में
उम्र गुरी बेशकीमती सम्बन्धों-रिवाजों के सामान रखने में
    
इन सामान की झाड़-पोंछ में रखी नहीं कभी तनिक भी कमी ।
खो देते हैं अपनी बात ,कहने का हुनर, आँखों की नमी

बन जाते हैं मात्र मशीन सम्बन्धों के लिए नोट छापने वाली
एक ही छत तले रहते रोबोट; आकृति- मानव -सी दिखने वाली

नम आँखों वाला वो  शख़्स क्या फिर से मन की खाई भरेगा
मेरे कंधे पर अपनी हथेली से हमदर्दी के हस्ताक्षर करेगा

मुझे गले लगाकर; क्या सच्ची बात कहने का हुनर दोहराएगा 
जो सभ्यता में नहीं; क्या वह उस सम्बन्ध की धूल हटाएगा

जो मिलकर नम होती हैं ,बरस सकेंगी वो आँखें क्या दूर जाते हुए ?
या समेटे रखेंगी ज्वार-भाटा सभ्यता-नैतिकता का घुटते-घुटाते हुए ?

-0-(हे०न०ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड)
-0-
2-तुम और मैं
                   मंजूषा मन

किसी सोते -से फूट पड़े
और बहने लगे
विचारों में, लहरों में,
तुम्हारी झर -झर की आवाज़
बस यही सुनाई देती है
तुमने ऊँची- ऊँची चट्टानें काट
अपने लिए राह बना ली...
तुम अपने पानी से धोने लगे
पैरो की खुरदुराहट,
बिवाइयों पर ठंडा लेप बनकर
देने लगे राहत,
तुम्हारी शीतलता बुझाने लगी जलन
तवे से तपते आँगन की...
तुम अपने दोनों हाथों में पानी भर
सुध -बुध खो चुके
थके-हारे चेहरे पर छिड़कते हो
एक सिहरन के बाद
हौले से खुलतीं है आँखें
तुम मुस्करा देते हो
वो भी मुस्कुरा देती है....

वो तपती धरती है
तुम बादल फाड़कर बहे जल
या मैं हूँ धरती
और तुम बस तुम हो.....
-0-
3-यह जीवन   
पुष्पा मेहरा                       

यह  जीवन है मनहर उपवन, मधुर गंध का झोंका है।
भाँति-भाँति के फूल यहाँ हैँ, मलय पवन मनभावन है।।

एक ही वीणा है, पर इसके सुर सभी निराले हैं।
ढल जाते जब ये रागों में, गीत मधुर बन जाते हैं ।।

मिल कर रहते, मिल कर बजते, मिलकर चोटें सहते हैं ।
चोटों से कभी न ये घबराते, तान सुमधुर लेते  हैं ।।

इस जीवन का संगीत मनोहर, हमसे रूठ न जाए।
जीवन की बजती वीणा के तार  बिखर ना जाएँ ।।

वीणा के तारों पर नित, हम तान मिलाप की लेते रहें ।
सत भावों की स्वर लहरी में,डूब-डूब मन हर्षाएँ ।।

इन्द्रधनुष -सी जीवन-छवि है, बूँदों का मात्र छलावा है ।
धूप मोह है, सत्य है छाया, ये जग मात्र भुलावा है  ||

रंगों का ये कैनवस न्यारा, सुख-दुख ने चित्र उकेरा है ।।
ऊँची-नीची राहें हैँ,पर सबका एक ठिकाना है ।।

पानी के बुलबुले-सा जीवन , जाने कब मिट जाना है |
टकराती इन लहरों में ही, सबको पार उतरना है ||

मिल कर रह लें,मिल कर जी लें,मिल कर ही चोटें सह लें |
चोटों से कभी न घबराएँ, हौंसलों  को पस्त न होने दें ||
-0-
पुष्पा मेहरा,बी-201,सूरजमल विहार,दिल्ली-110082

फ़ोन: 011-22166598

Monday, May 15, 2017

736

4-पुष्पा मेहरा
1

जनम दिया माँ ने हमें,पाला,लिया न मोल ।
 बल आशीषों का दिया,स्वार्थ तुला न तोल ।।
2
 नयन बरौनी -सी रहे,सदा हमारे साथ ।
 ऐसी माँ के चरण में,झुके सदा यह माथ ।।
3
 माँ की समता ना कहीं,वह बरगद की छाँव ।
 आशीषों की सघनता,मिलती उसके ठाँव ।।
4
शरबत बन कर ढल गई,माँ की कटु फटकार ।
भटका मन पथ पा गया,माँ का मिला दुलार ।।
5
माँ ने चिट्ठी में लिखा,मीठा -मीठा प्यार ।
पढ़-पढ़ आँखें तर हुईं,आखर थे रसधार ।।
6
मातृ दिवस में याद कर,फिर ना जाना भूल ।
वृद्धाश्रम में डाल उसे,भेंट न देना शूल ।।
-0-
5- एक खास दिन
कमला घटाऔरा

माँ के लिये एक खास दिन
है चुन रखा पश्चिम ने कह -'मदर्स डे'
देते फूलों के गुलदस्ते और सोगातें
बच्चे से बड़े तक जुट जाते
माँ को अपना प्यार जताने
या फिर प्यार का फर्ज निभाते
उनके मन की वो ही जाने ।
हमारा तो हर दिन माँ के लि है
पूजनीया आराधनीया है ।
नित्य सुबह चरण स्पर्श कर
आशीर्वाद लेने का देवी रूपा जननी का ।
माँ चल दे जहाँ छोड़ के
पिता भी पिता नहीं रहता
बन जाता पराया ।
अफसोस है इतना
जाने क्यों ,
किस प्राप्ति की होड़ मे जुटकर
सन्तानें हमारी जमाने के संग चल पड़ी ।
छोड़ माँ -बाप को ।
माँ पीड़ा में जीती है ,
परवरि पा पैरों पर खड़े होते ही
क्यों बच्चों द्वारा भुलाई जाती है  ?
कटे बुढ़ापा रो -रो कर
पुरानी चीजों की तरह
क्यो ठुकराई जाती है ?
जो जन्म से माँ होती है
माँ बनते ही वह और महान हो जाती है
ममता के घन से घिर वह दिन रात
ममता रस बरसाती है
उसके त्याग , तपस्या , सेवा को भूल
क्यों बच्चों द्वारा झुठलाई जाती है ?
भूलते हैं क्यों, जिससे जन्म मिला
जिसके दम से यह जगत्
निरन्तर चल रहा
अमर बेल- सा बढ़ रहा
क्यों उसकी महत्ता बिसराई जाती है
काश ! सब को मिले वो आँख
हर बच्ची में देखे रूप माँ का
बुरी नियत से उसे छूने से पहले
जागे उसके अंदर का बच्चा
जिसने पय-पान किया माँ का
दुष्कर्म करने से पहले
आँख खोले यदि वह जाने
मन ही मन दुत्कारेगा खुद को
नहीं सूखने देगा नेह की पावन नदी को
औरों से बचाने हित दे दे जान अपनी
आगे मिलने वाली ठंडी छाँ को
भविष्य की माँ को ।
' निर्भय' नहीं  निर- भय हो कर जिए
जन्म ले आने से जाने तक वह
वृद्धावस्था में उसे सेवा और सत्कार मिले

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