शब्द
खामोश क्यों हो जाते हैं / डॉ. वंदना शर्मा
एक
उम्र पर आकर
शब्द
खामोश क्यों हो जाते हैं
अक्सर
बहुत बोलने वाले
मौन
क्यों हो जाते हैं
आसमाँ वही है, वही है
धरती
मौसम
के मायने बदल क्यों जाते हैं
जिसको
पाने की जिद में उम्र गुजारी
उसको
पाकर भी हाथ खाली रह जाते हैं
खुशी
एक छलावा है पल भर का
वो
पल बीतते ही भाव खुशी के
नीरस
हो जाते हैं
जाने
किस अंधी दौड़ में
दौड़
रही है दुनिया सारी
जब
सब कुछ खो जाए
कुछ
पाने के अर्थ व्यर्थ हो जाते हैं
कभी
जिससे बात करने को
तरसता
था मन सारे दिन
सामने
पाकर उसे अपने
लब
खामोश क्यों हो जाते हैं
चारों
तरफ मेला है भीड़ का
फिर
भी क्यों हम खुद को
भरे
मेले में अकेला पाते हैं
गलत
कहते हैं लोग अक्सर
अज्ञानता
दुख का कारण है
मैंने
तो देखा है अक्सर
सब
जानकर रिश्ते टूट जाते हैं।
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