पथ के साथी

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Friday, July 31, 2015

552-कथ्य और पथ्य


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु


     कुछ लोग पहले तोलते हैं , फिर बोलते हैं। कुछ सिर्फ़ बोलते हैं,वह सार्थक हो या निरर्थक , इससे उनका कुछ भी लेना-देना नहीं। वे फुँफकारते हैं, दुत्कारते हैं; सुनते नहीं; क्योंकि उनके कान नहीं होते। कुछ और भी आगे होते हैं ,वे अपनी बात का वज़न खो चुके होते हैं , इसलिए  वे न तोलते हैं, न बोलते हैं , वे सिर्फ़ भौंकते हैं। ऐसे लोग धन्य हैं; क्योंकि वे एक ही योनि में दो-दो जन्मों का आनन्द  ले लेते हैं। कोई सुने न सुने , गुने न गुने । जो पैदा ही बोलने के लिए हुए हैं , तो उनको बोलना ही है। इस तरह के बोलने वालों की श्रेणियाँ तय की जानी ज़रूरी हैं। गलती से अगर आपने फोन कर दिया ,तो वे आपके कान गर्म होने तक (उनकी बातों से या फोन की गर्मी से) आपकी जान नहीं छोड़ेंगे। अगर वे खुद फोन कर रहे हैं; तो अपनी बात आपके सामने पटककर बिदा हो जाएँगे।
          कुछ कानून की बात करते हैं ; लेकिन जब उन्हें मौका मिलता है , मर्यादा के पन्ने फ़ाडकर  हवा में उछाल देते हैं। कुछ को जब  मिर्गी का दौरा पड़ता है, तभी बोलते हैं । क्या बोलते हैं ,इन्हें खुद भी पता नहीं। कुछ दिनों बाद ये सींग पूँछ दबाकर गायब हो जाते हैं।जिह्वा की मिर्गी के दौरे से पीड़ित इन लोगों के बारे में किसी कवि ने कहा है-
     जिह्वा ऐसी बावरी , कह गई सरग पताल।

     आपुन तो भीतर गई , जूती खात कपाल ।
अब खोंपड़ी जूती खाए या पुचकारी जाए , इनको फ़र्क नहीं पड़ता।इन बोलने वालों में से कुछ ने दस्ताने पहन रखे हैं, धर्मनिरपेक्षता के ,बुद्धिजीवी के, मानवाधिकार के । मानव अधिकार का मतलब किसी आम आदमी के अधिकार की चिन्ता से नहीं है। आम आदमी के साथ जीना-मरना लगा ही रहता है।यही उसकी नियति है।   इस आम आदमी को जो सरे राह अचानक हलाक़ कर  देता है, उसे न्याय मिलना चाहिए , उसे सज़ा नहीं होनी चाहिए , उसके लिए आवाज़ उठानी चाहिए । उसके लिए लल्लू से लेकर बल्लू तक सभी गला फ़ाड़ बहस करने लगते हैं।बेचारा आम आदमी तो प्राथमिकी लिखवाने से भी वंचित कर दिया जाता है। दस्ताने पहनकर बात करने वाले लोगों के दस्ताने नहीं उतरवाइए । ऐसा करेंगे, तो इनके खून रंगे हाथ नज़र आ जाएँगे। इनको बहुत से काम करने हैं । दुनिया को अहिंसा का सन्देश देना है,अखबारों में नाम आना है, विवादों को हवा देनी है, हाय-हाय और मुर्दाबाद के नारे लगाने हैं । अगर इनका कोई सगा और बेकसूर मारा जाता ,तो इनकी ज़बान पर ताले लग जाते।जिनका कोई सगा आतंकवाद की भेंट चढ़ा है, जिनका घर बार और पूरा भविष्य बर्बाद हुआ है , उनसे पूछा जाए कि फाँसी देना गलत है या सही ? करौन्दे की तो बात ही छोड़िए ,जिसको कभी झरबेरी का काँटा भी न चुभा हो , उसके मुँह से साधु-महात्माओं जैसी बात अच्छी नहीं लगती। आम जन की मौत या हत्या पर इन भौंकने वालों की आँखें नम नहीं होतीं। किसी क्रूरतम व्यक्ति के मारे जाने पर इनका मानव-धर्म वाला  ज़मीर कैसे जाग उठता है ! इसके डी एन ए  का परीक्षण होना चाहिए।
बीमार आदमी को दवाई दी जाती है , कुछ पथ्य ( परहेज़) भी बताया जाता है । बोलने वालों को भी चाहिए वे सिर्फ़ भोंपू नहीं हैं  ,ईश्वर ने उनको कान भी दिए हैं, जनमानस को भी समझें और कुछ सुनना भी सीखें। यह उनको छूट है कि कोई उनके सगे सम्बन्धी को मारे ,तो चादर ओढ़कर सो जाएँ । पुलिस को खबर न करें और न कोर्ट के चक्कर लगाएँ।क़ातिल पड़ोसी से प्रेम जताने के लिए सीमा पर जाकर कैण्डिल जलाएँ, देश में सुरक्षा में तैनात जवान शहीद हो जाएँ ,तो सहानुभूति के दो शब्द भी न कहें। हिंसा करने वाले की निन्दा न करें, बल्कि उससे डरकर चुप रहें।
         यह देश सबका है , लेकिन उनका नहीं है ,जो इस देश का कल्याण नहीं सोचते। जो देश का कल्याण न सोचकर पूरी ताकत इसे कमज़ोर  करने  में लगाते हैं, जिनको अपना घर भरने से ही फ़ुर्सत नहीं, जिनके पास अपने दाग धोने या उनको देखने का समय नहीं है, वे भौंककर अपने फ़ेफ़ड़े कमज़ोर न करें। कुछ कहना है तो पहले तोल लें। कथ्य के साथ पथ्य ज़रूरी है। अपनी बेहूदी बातों से , बचकानी हरक़तों से देश और समाज को कमज़ोर न करें । दो जून की रोटी जुटाने वाले का जीना हराम न करें , उसे जीने दें। उसे मज़हब की आग में न झोंकें।इस देश का निर्माण बातूनी लोगों ने नहीं किया , कर्मशील लोगों ने किया है। आग जहाँ लगती है , केवल उसी क्षेत्र को जलाती है, लेकिन बातों की आग पूरे समाज को तबाह करती है। वाग्वीर घोड़े नहीं है , फिर भी इनको लगाम देना ज़रूरी है।
                                               -0-
प्रतिक्रिया स्वरूप डॉ अर्पिता अग्रवाल और आदरणीया दीदी  डॉ सुधा गुप्ता जी के पत्र संलग्न हैं-
 

Saturday, May 16, 2015

बातों की बीमारी



साधना मदान
     ऐसा क्यों लगता है कि आज बच्चे,जवान और बूढ़ों के लिए बातचीत एक
बीमारी बनती जा रही। हर व्यक्ति जैसै यह जिद्द पकड़ कर बैठा है कि वह अपनी बातों से यह सिद्ध करेगा कि केवल वह सही सोचता है, वह ही सही करता है और वह ही बात करना जानता है। इसलिए वह बातों का सहारा लेता है। एक प्रश्र ज़हन में उठता है कि आख़िर इतनी बातें क्यों? बातें करना शायद श्रम करने से ज़्यादा प्रिय काम है। काम करना,व्यस्त रहना,स्वयं को ही कोई लक्ष्य देकर अपने मौलिक चिंतन में मग्न रहना, सकारात्मक सोच; ये कुछ ऐसी दवाइयाँ हैं,जो बातों की बीमारी का इलाज हो सकती हैं। कभी -कभी व्यक्ति बहुत बातें अपने अहं की तुष्टि के लिए भी करता है। अपने वजूद में शायद कहीं कुछ जैसे बह -सा गया है। वे अपनी बातों में प्रशंसा की चाशनी में लपेटते रहते हैं। बातें बढ़ती तब हैं ,जब हम बीती बातों में उलझते हैं।
      अपने साथ अपने सम्बन्धियो के व्यवहार को याद करना भी बातों की ललक को बढ़ावा देना है। कभी -कभी हम अपनी जिम्मेदारी से यहाँ -वहाँ सरकते हैं या काम से पल्ला छुड़ाने के रास्ते ढूँढते हैं।तब लच्छेदार बातों से शायद अपने आलसीपन को सहलातें हैं।बातों का नशा भी तो एक बीमारी से कम नहीँ। निरंतर बातें और उन बातों का नतीजा क्या होगा व नशे जैसा ही तो है। बातों का भूत जब चिपटता है तो वह बीमार करके ही छोड़ता हैं।
व्यक्ति जब अपनी आत्मिक शक्ति खोने लगता है ,तब भी व्यक्ति बातों के संक्रमण से अछूता नहीं रह पाता । स्वभाव में नकारात्मकता भी बातों की गलियों में भटकने जैसा है। दूसरों की कमी -कमजोरी तो बातों में जैसे चार चाँद लगा देती है।इस बीमारी में निंदा तो मीठे-मीठे दर्द का अहसास कराती है। आज के जादुई तंत्र-मंत्र-यंत्र का तो सबको पता ही हैँ...मोबाइल फोन, फेस बुक,इंटरनेट और वॉट्स एप ये संगी -साथी साथ हों तो बातों के विषाणु फैलते देर नहीं लगती। बातों का चक्रव्यूह  लू के थपेड़ों जैसा हमें आहत करता रहता है। ज्यादा बातें बातचीत के आनन्द को कम कर देती हैं। विचार- विमर्श हो या फिर चाटुकारी या गपशप ये तो संग साथ के स्वाद है; पर बहुत बातें तो अपच का काम करती है । जब कभी बच्चों की कक्षा का चक्कर लगाती हूँ ,तो सब तरफ बतियाने की ही हवा का अहसास होता है।
      ज्यादा बातें भी बच्चों की एकाग्रता भंग करने का कारण होती हैं। कक्षा आदि में बातें जहाँ बालमन के मेल -मिलाप में सामाजिकता का रंग भरती हैं; वहीं ज्यादा बातें बच्चों को कक्षा में बातूनी भी बना देती है।यह सच है कि चुलबुली बातें बचपन की अमूल्य सौगात होती हैं ; पर बातें ही बातें बच्चों को यहाँ वहाँ डाँट ही खिलाती हैँ। शायद इसका कारण भी हम बड़े ही हैं।बड़े भी जब दिन-रात बातों की चक्करी चलाते हैं ; तो बच्चे भी इस चक्करी में झूलते हैं। किशोरावस्था की भी बातें मौज- मस्ती के वसंत जैसी होती हैं। यह उम्र ही सच पूछो तो बातों पर खुलकर ठहाके लगाने की कला जानती है ;पर समस्या तब आती है ,जब यही बातें घुमावदार रास्तों की तरह जिंदगी को उलझा देती हैं। कहते हैं साठ वर्ष के बाद वानप्रस्थ अवस्था को स्वीकार करो। काश वानप्रस्थ का भाव वाणी से परे हो जाना ही होता। जितना कम बोलेंगे ,उतने ही कम सुझाव, उतने ही अनुभवों के किस्से कम छेड़ेंगे। कम बात वालों के अनुभव और सुझाव में बड़ा वज़न होता है। ऐसे जीवन के अभ्यास से हम मानसिक तनाव की गिरफ्त से बच सकते हैं।
जीवन रहते मधुर वाणी की तान से अपनी स्वर लहरी जोड़ लें तो बातों की गूँज व्यर्थ नही ,समर्थ बन जाएगी। पर यह बीमारी तो हमें अपनों से दूर ले जाती है। अब इस बीमारी से निज़ात भी पाना जरूरी है। सबसे पहले अपनी दिनचर्या पर जाँच रखना जरूरी है।सारा दिन क्या- क्या करना है। अपने लिए योगासन ,सैर , ध्यान ,अपने शौक अथवा पठन -पाठन ये सब काम हम अपनी खुशी से करते या नहीं। फोन की बातों से बचने का अभ्यास भी आवश्यक है। मन से सकारात्मक बातचीत की आदत भी इस बीमारी से राहत पाने  तरीका हो सकती है।बीती को बिंदु लगाना और न काहू से दोस्ती न काहू से बैर का मंत्र समझने का अभ्यास।
सच्चे मित्र एक दूसरे को व्यर्थं के वार्तालाप से किनारा करना सिखाते हैं। जहाँ नकारात्मक बातें और अति बातूनी होना हानिकारक होता है ,वहीं सकारात्मक बातें संजीवनी के समान होती है।वृद्धों की बातचीत उनमें ताज़गी भरती है।जब पुत्र अपने वृद्ध पिता के साथ बैठकर बातें करता है, तो पिता के लिए वह सुकून देने वाला होता है। बातें करना, कुछ तुमने कही, कुछ मैने सुनी, अपने दिल को हलका करना हो तो हाले- दिल बयाँ करना किसी भी हाल में अच्छा ही है।अपनी खुशी की अभिव्यक्ति भी बातों की शहनाई से ही गूँजती है पर बातों का चस्का तो बदहाल ही करता है। कई बार नासमझी भी बातों के पासे खेलने से नहीं चूकती।
जब अपनों से अपनों की सार्थक बात होगी
सकारात्मक सोच से तभी मुलाकात होगी
जब बीती बातों को ग जाए पूर्ण विराम
तब ही बातों की बीमारी की मात होगी
-0-
साधना मदान
प्रवक्ता हिंदी ,कुलाची हंसराज मॉडल स्कूल,अशोकविहार दिल्ली- 110052

(चित्र :गूगल से साभार)

Wednesday, April 15, 2015

साहित्य और काव्य-भाषा

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
कविता किसी भी कवि के हृदय की गहन अनुभूति विचारों का मन्थन और कल्पना का अनुरंजन है।कवि का चिन्तन जितना गहन होगा,अनुभूति जितनी सान्द्र होगी ,कल्पना जितनी बहुरंगी होगी, भाषा जितनी ज़मीन से जुड़ी और बहुआयामी होगी , कविता उतनी ही प्रभविष्णु और प्रामाणिक होगी ।भर्तृहरि के वाक्यपदीय के  अनुसार शब्द और वाक्य देशकाल में हैं,जबकि अर्थ देशकाल से परे है ।उन्होंने अपने वाक्यपदीय ग्रन्थ में कहा भी है-
            स्तुतिनिन्दा प्रधानेषु वाक्येष्वर्थो न तादृश:
            पदानां प्रतिभागेन यादृश: परिकल्पयते ॥-2-247
शब्दकोशीय अर्थ की एक सीमा है। जब शब्द का वाक्य में प्रयोग किया जाता है ,तभी उसके अर्थ का निर्धारण होता है । स्तुति या निन्दा प्रधान वाक्यों में अर्थ वह नहीं होता , जो उसका अभिधेय अर्थ है, वह उससे हटकर होता है।वह लक्ष्यार्थ हो या व्यंग्यार्थ हो, परन्तु शब्दकोशीय नहीं होता । क्या जल और पानी समान अर्थ वाले हैं? कदापि नहीं । गंगाजल को गंगापानी नहीं कहा जा सकता । बेशर्म आदमी को आप कह सकते हैं कि उसकी आँखों का पानी ही मर गया । कभी कोई किए–कराए पर पानी फेर देता है और विफलता ही हाथ लगती है। किए –कराए पर जल फेर देना तो होगा नहीं। कभी कोई शर्म के मारे पानी-पानी हो जाता है , जल -जल कभी नहीं होता।गहनों पर सोने-चाँदी का पानी चढ़ाने का काम होता है ,जल चढ़ाने का नहीं। जल चढ़ाने का के साथ एकप्रकार की आस्था जुड़ी है। तेज़ –तर्रार लोग अच्छे-भलों का पानी उतार देते हैं।घड़ों पानी पड़ना ,घड़ों जल पड़ना नहीं हो सकता ।चेहरे की ताज़गी तो आब(पानी ) का तो कहना ही क्या , वह न पानी है और न जल। पानी के और भी बहुत सारे अर्थ प्रचलित हैं। एक पुरानी कहावत है-
                काबुल गए तुरक बन आए , बोलें गिटपिट बानी ।
             आब-आब कह मरे मियाँ जी रखा सिरहाने पानी ॥
एक मियाँ जी काबुल गए थे।लोगों पर रौब जमाने के लिए वहाँ की भाषा के शब्दों का प्रयोग करने लगे । यह प्रयोग उनकी आदत बन गया। बहुत बीमार हो गए।प्यास लगी तो आब-आब चिल्लाते रहे । परिचर्या करने वालों की समझ में नहीं आया कि वे क्या कह रहे हैं ? उनको क्या चाहिए ? प्यास के कारण मर गए ,जबकि उनके सिरहाने पानी रखा हुआ था । बांग्ला में पीने का पानी , पानी न होकर ‘खाबार जोल(जल)’ है तो असमिया में दूध अलग अर्थ में प्रयुक्त होता है। सामान्य दूध के प्रचलन में ‘गौखीर’ ( यानी गाय का क्षीर) है। भैंस वहाँ नज़र ही नहीं आती ।कबीर को हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी ने भाषा का डिक्टेटर कहा था क्योंकि कबीर ने तो बहुत सीधी बात की है।उन्होंने भाषा को बहता नीर कहा है।जो शब्द प्रयोग में आते हैं , वे ही जीवित रहते हैं । जो प्रयोग में नहीं आते , वे काल के प्रवाह में नहीं टिकते वे भाषा से बाहर हो जाते हैं । भाषा की जीवन्तता का सबसे बड़ा आधार प्रयोग ही है। यदि कोई शब्दकोश खोलकर बैठ जाए और उसमें से शब्द चुन-चुनकर रखता जाए , तो वह काव्यरूप धारण नहीं कर सकता ।
         कवि अपने प्रयोग के माध्यम से सरल से सरल शब्दों को भी अभिमन्त्रित कर देता है। भाषा बहता नीर है ,वह रास्ते में आने वाले कंकड़-पत्थर और रेत को छोड़ता जाता है। भाषा भी यही काम करती है ।प्रयोग के कारण ही शब्द अपने पुराने अर्थ को छोड़कर एकदम नए अर्थ भी ग्रहण कर लेते हैं ।‘साहस’ का अर्थ कभी लूटपाट , हत्या बलात्कार हुआ करता था , आज यह शब्द अर्थ उत्कर्ष के कारण उस अर्थ से कोसों दूर है।दूसरी ओर ‘बज्रबटुक’ , पाखण्ड जैसे अच्छे अर्थ वाले शब्द अपना पुराना अर्थ छोड़कर अर्थ अपकर्ष के कारण अपने दूसरे रूप में प्रयुक्त होने लगे हैं।अच्छा-भला तत्सम ‘भद्र’ शब्द तद्भव रूप धारण करके भद्दा हो गया । आज दोनों अर्थ प्रचलन में हैं।नेताजी जैसा शब्द तो पिछले कुछ दशक में ही अपना गरिमामय अर्थ छोड़ चुका है। तत्सम या तद्भव शब्द की छटा अलग दिखाई देती है । मृत्तिका शब्द को ही लीजिए।इससे मिट्टी और माटी तद्भव रूप बने हैं। जहाँ माटी या मिट्टी शब्द आएगा वहाँ मृत्तिका विकल्प के रूप में आ जाए , सम्भव नहीं।इन वाक्यों को देखिए-
1-माटी का चोला माटी में मिल जाएगा।
2-अरे भाई , पुरानी बातों पर मिट्टी डालो। अब मिलकर काम करो।
3-माटी कहे कुम्हार से , तू क्या रौंदे मोय ।
4-तुम ठहरे मिट्टी के माधो, लोग तुम्हें उल्लू बनाते रहेंगे
यहाँ अगर कोई मृत्तिका का प्रयोग करेगा , तो उसे अनाड़ी ही कहा जाएगा ।किसी भी भाषा या बोली के शब्दों की ताकत तत्सम शब्दों से कई गुना ज़्यादा होती है।लोग टोपी पहनते हैं,यह सम्मान का सूचक भी है , क्योंकि टोपी  उतारने की बात अपमान करना ही है। धूर्त्त लोगों को क्या कहेंगे ! वे अपना उल्लू सीधा करने के लिए न जाने कितने भले लोगों को टोपी पहना देते हैं।यहाँ टोपी पहनाना ठगने के अर्थ में आया है ।
      जो शब्द जनमानस के जितने निकट होते हैं वे उतने ही सशक्त होते हैं। ढाढ़ू –वह ठण्डी बर्फ़ीली हवा ( हिमवात) जो सर्दियों में उत्तर की ओर से हरिद्वार , सहारनपुर के क्षेत्रों की ओर चलती है। इस शब्द का कोई और पर्याय नहीं हो सकता । नदी आम बोलचाल का सबका जाना –पहचाना साधारण-सा शब्द है । अब यह कवि पर निर्भर है कि वह उसका प्रयोग किस रूप में करता है । जीवन भी नदी है और सुख-दु:ख उसके दो किनारे हैं। नदी प्रेयसी है, जो अपने प्रियतम समुद्र से मिलने को आतुर होकर बहती है । नदी दु:ख से भी भरी है , जिसको हमें तैरना है । नदी प्रेम की भी है , जिसमे जो डूब गया , वह सफल हो गया वह तैर गया । कहीं कबीर उसे ज्ञान रूप भी मानता है – मैं बपुरा डूबन –डरा , रहा किनारे बैठ । जो डूबने से डरेगा , वह किनारे पर बैठा रहेगा , कुछ नहीं पाएगा।भाषा संस्कार से मिलती है, संस्कार -जन्मजात और अर्जित दोनों होते हैं । ये सुनार से गहनों की तरह उधार में नहीं मिलते ।उधार के गहने तन की शोभा बन सकते हैं,वाणी की नहीं।दूसरे सप्तक के प्रथम कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा था-
जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख,
और उसके बाद भी , हमसे बड़ा तू दिख।
इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि आप सरल भाषा के नाम पर हर जगह सब्जी मण्डी की भाषा ही प्रयोग में लाएँ । साहित्यकार होने के नाते साथ ही इतना भी तय करना पड़ेगा  कि आप पाठक तक क्या पहुँचाना चाहते हैं- भाव , विचार , कल्पना आदि या शब्दजाल ! शब्दजाल के लिए काव्य की दुर्गति करना ज़रूरी नहीं । इसके लिए आप नहीं , शब्दकोश पर्याप्त है।नामी गिरामी बदमाश जब पुलिस की पकड़ में आया तो दारोगा ने सिपाहियों से कहा-
‘देखो भाई ! ये महापुरुष आज हमारे मेहमान हैं । इनके सत्कार में कोई कमी नहीं रखना।’ ।
अब आप समझ सकते हैं कि महापुरुष , मेहमान से कौन-सा अर्थ ध्वनित होता है और सत्कार का मतलब क्या है ? जिसका सत्कार हुआ होगा , उसको क्या-क्या झेलना पड़ा होगा !

तत्सम-तद्भव शब्द के बारे में कुछ शिक्षकों को बहुत भ्रान्ति है। संस्कृत के या किसी भाषा के शब्द से बार-बार प्रयोग के कारण उसी शब्द का  जो बदला हुआ रूप है, वह तद्भव कहा जाएगा। उदाहरण के लिए संस्कृत के दो शब्द हैं –पर्वत और पाषाण । पर्वत का तद्भव परबत/ पर्बत प्रचलन में है, पाषाण के दो तद्भव हैं- 1-पाहन , 2 –पहाड़ । कुछ लोग व्युत्पत्ति पर ध्यान न देकर पर्वत का तद्भव रूप  ‘ पाहन’ शब्द को समझ लेते हैं। कुछ शब्द ऐसे हैं , जो तत्सम और तद्भव दोनों रूपों में अलग-अलग अर्थ में प्रयुक्त होते रहते हैं। जैसे –पत्र । पत्र –चिट्ठी के रूप में भी प्रच्लित है  और इसके दो तद्भव रूप –पता और पत्ता दोनों रूप में प्रचलित है।

हाइकु, ताँका, सेदोका, माहिया आदि रचनाओं के सन्दर्भ में भी मैं इस ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा कि भाव, कल्पना आदि के अनुकूल भाषा का प्रयोग करें ।कोल्हू के बैल की तरह शब्दों के सीमित दायरे में न घूमें। भाषा हमारे आसपास पल्लवित –पुष्पित हो रही है, उस पर ध्यान दें। उसकी धड़कन सुने और पढ़ें । कुछ वर्ष पहले हमने (डॉ भावना कुँअर , डॉ हरदीप सन्धु और मैंने) यादों पर आधारित हाइकु –संग्रह सम्पादित किया था।हमने संग्रह का नामकरण ‘यादों के पाखी’ साथी रचनाकारों को भेज दिया; क्योंकि हमने अपने एक हाइकु में उसका प्रयोग किया था । फिर क्या था , कुछ साथियों ने जो हाइकु लिखे, उनमें बलपूर्वक ‘यादों के पाखी’ ठूँस दिया । परिणामस्वरूप हमें इस तरह के बहुत सारे निर्जीव हाइकु हटाने पड़े । सरलता के नाम पर इस तरह के प्रयोग की ‘अति’ से बचें । कुछ साथी जब निर्धारित विषय पर हाइकु, ताँका , सेदोका या माहिया भेजते हैं, तो सभी में भाव और भाषा के दोहराव के शिकार हो जाते हैं । किसी वैद्य ने नहीं बताया है कि हमें एक ही विषय को रौंदकर गीत , ग़ज़ल , हाइकु आदि सभी लिखकर शूरमा बनना है ।जब दोहराव होने लगे तो कुछ समय के लिए लेखनी को आराम दीजिए । इसके बाद जो लिखा जाएगा , वह प्रभावशाली होगा । आज इतना ही बाकी फिर कभी !
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Sunday, March 8, 2015

दर्द की इबारतें



दर्द की इबारतें
                                    डा.सुरेन्द्र वर्मा                    
  
   ऐसा शायद ही कोई मानुष हो जिसने अपने जीवन काल में कभी न कभी दर्द महसूस न किया हो. वह न केवल अपना दर्द महसूस करता है, बल्कि दूसरों की पीड़ा भी उसे आहत करती है. वह दूसरे के दर्द से भी द्रवित होता है. दूसरों का दर्द प्राय: उसका अपना दर्द हो जाता है. दूसरों के दर्द को महसूस कर पाने की यह क्षमता संभवत: केवल मनुष्य में ही होती है और यही बात उसे अन्य जीवों से अलग करती है. संवेदनशीलता इसी का नाम है. ज़ाहिर है हम यहाँ व्यक्ति के शारीरिक दर्द की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि उसकी अपनी मानसिक पीड़ा की और इशारा कर रहे हैं जो अपने और दूसरों के दर्द से उत्पन्न होती है. शारीरिक चोट को तो हम प्राय: भुला देते हैं. लेकिन मानसिक आघात का दर्द कुछ ऐसा होता है कि उसे हम न चाहते हुए भी पाले रखते हैं.
    मनुष्य बेशक एक संवेदनशील प्राणी है. लेकिन कुछ लोग अपेक्षाकृत कम या अधिक सवेदनशील होते हैं. जो  अधिक संवेदनशील हैं वे दूसरों के दर्द से द्रवीभूत होकर उन उपयों की भी तलाश करते हैं जिनसे उन्हें उनके दर्द से कुछ राहत दिलाई जा सके. यह प्राय: आर्थिक, चिकित्सकीय, सामाजिक और राजनैतिक उपायों /साधनों से ही संभव हो पाता है. जो लोग ऐसा नहीं कर पाते वे भी अपने साथियों के दर्द की ओर इशारा तो कर ही सकते हैं और सक्षम लोगों को दर्द-निवारण की दिशा में प्रेरित कर सकते हैं. साहित्यकारों और कवियों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि ये अत्यंत संवेदनशील प्राणी होते हैं किन्तु उनके पास दर्द निवारण के लिए कोई उपाय नहीं होता. वे अपने पाठकों को अपनी संवेदनाओं का भागीदार बनाने में ही प्रसन्नता का अनुभव करते हैं हैं. डा. शकुन्तला तँवर इसे मखमली छुअन कहती हैं.-
अक्षर शिल्पी
अपनी संवेदना                                                                                        
बाँट प्रसन्न   (मखमली छुअन)
अधिक से अधिक वे अपनी पीड़ा के स्थलों की तलाश कर सक्षम लोगों को उन स्थलों की ओर संकेत भर सकते हैं कि यहाँ-यहाँ जो दर्द के ठौर हैं और उन्हें समाप्त किया जाना चाहिए. हाइकुकारों ने अपनी रचनाओं में अपने इस इंसानी दर्द को महसूस किया है और उसे वाणी दी है.
    मनुष्य अपनी पीड़ा आसानी से भूल नहीं पाता. यदि भूलने का प्रयत्न भी करे तो स्मृतियाँ उसे बार बार दर्द की याद दिलाती रहती हैं. सुप्रसिद्ध कवयित्री, डा. सुधा गुप्ता अपने एक हाइकु में कहती हैं
स्मृति बुनती
दु:खों के करघे में                                                                                       
पीड़ा का थान        (यादों के पांखी)
और तब, आँसू रोके नहीं रुकते. आसुओं के माध्यम से निर्जीव पड़े दर्द को एक बार फिर गति मिल जाती है, इसी भाव को प्रकट करते हुए वरिंदरजीत सिंह बराड़ कहते हैं
यादें बहती / बन आँख का पानी / दर्द-रवानी (यादों के पाखी)
डा.शकुन्तला तँवर भी अपनी हाइकु रचनाओं में लगभग यही बात कहती दिखाई देती हैं.-
छाले याद के / जब भी फूट जाते / दर्द बढ़ता   (मखमली छुअन)
    लेकिन क्या किया जाए? हर व्यक्ति के अपने अपने दुःख हैं. अगर जीवन है तो उसके साथ सुख-दुःख भी है. बचा नहीं जा सकता. मन मुखिया में रेखा रोहतगी कहती हैं-
लिखे निबंध /जीवन पुस्तक में /सुखदुःख के
इसी तरह रमेश चन्द्र सोनी का भी कहना है कि
 समय रथ / सुख-दुःख उसमें / चढ़ें-उतरें. (हाइकु, 2009)
डा. महावीर सिंह अपने काव्यात्मक अंदाज़ में कहते हैं-
पैबंद लगे / जीवन चादर में / सुख दुःख के. (वही)
 ललित मावर इसीलिए दर्द को ज्यादह तवज्जह नहीं देते-
 दर्द अपना /लँगोटिया यार है /देखा परखा  (वही) 
डा. रामनिवास मानव सुख दुःख को अस्थायी मानते हुए कहते हैं-
 सुख दुःख हैं /केवल पर्यटक/ आए थे, गए!
 ऐसे में दुःख-दर्द से भला घबराना क्या? दर्द तो जीवन की निशानी है. गिरीश पांडे दार्शनिकता का पुट देते हुए कहते हैं.
दर्द निशानी/ हमेशा  जीवन की , / मौत की नहीं   (हाइकु, २००९)
 रचनाकारों ने इसीलिए अपने दर्द का उदात्तीकरण करते हुए उसे हाइकु में एक रचनात्मक दिशा प्रदान की है. मन मुखिया में रेखा रोहतगी कहती हैं-
 पीड़ा को बोया / आंसुओं से जो सींचा / उगे हाइकु  
या फिर,
पीड़ा निचोड़/ समय को मैं भूलूँ/ हाइकु लिखूँ 
दुःख दर्द का कोई एक कारण नहीं होता. कारणों की दृष्टि से यह बहुरंगी है. कुछ दर्द व्यक्तिगत और शारीरिक होते हैं और कुछ भौतिक वातावरण की उपज होते है. अपने अपने कारणों के अनुसार दर्द की अनेक किस्में हैं. एक दर्द है जो प्रेम की वजह से होता है. उसे उर्दू के कवियों ने दर्दे-दिल कहा है. प्यार का यह दर्द प्रिय के मिलन और विरह दोनों ही स्थितियों में देखा जा सकता है. श्याम खरे कहते हैं
मिले तो बढे/न मिले तो सताए/ दर्द प्यार का   (सरस्वती सुमन, हाइकु विशेषांक)
इसीलिए हरकीरत हीर, शिकायत करती हैं,
 रब्बा क्यों देते / मुहब्बत के रिश्ते / दर्द अनोखा । (वही).
लेकिन प्रेम की पीड़ा कुछ ऐसी होती है कि आसानी से जाती नहीं,
 कैसा ये दर्द /उम्र खो गई कहीं / आँख न हंसी ! वे मनुहार करती हैं,
 सिल दो कभी / बरसों से कटी है / दर्द की चुन्नी. हरकीरत हीर ने अपनी रचनाओं में दर्द की इबारत बड़े रचाव से लिखी है. वे दर्द संबंधी नए नए काव्यात्मक उपमान ढूँढ़ती हैं. दर्द संबंधी उनके कुछ अन्य हाइकु.देखिए
रोया ये मौन / पत्तों से लिपटी हैं / दर्द की बूँदें                                                                
दर्द की रात / छलकी है आँखों में / अक्षर रोये                                                         
दर्द के हर्फ़ / रहे कलम संग / नज़्म न लिखी                                                               
रात ये कैसी / दर्द का घूँट-घूँट / पिलाए जाम
लेकिन फिर भी वे चुप रहती हैं,और अंतत: चुप्पियों में बँधा दर्द का रिश्ता टूट ही जाता है! -
टूट ही गया/चुप्पियों में बँधा,वो / दर्द का रिश्ता 
लेकिन रचनाचारों और कवियों की कलम से दर्द का सम्बन्ध चिरस्थायी है. वे दर्द के नए नए आयामों से अपनी रचनाएं सदा संवारते ही रहेंगे. 
   कुछ ऐसे सामाजिक दर्द भी होते है जो भौतिक और वातावरण संबंधी कारणों से होते हैं. जैसे उत्तराखंड की त्रासदी, भूकंप, सूखा और बाड़ आदि. सुनामी जैसे तूफानों से उत्पन्न तकलीफों ने भी हाइकुकारों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है. इसी प्रकार उत्तराखंड में हुई त्रासदी भी है. प्रसिद्ध हाइकुकार नलिनीकान्त ने तो उत्तराखंड में महाप्रलय र तो पूरा एक हाइकु काव्य ही लिख दिया है. अनेकानेक साहित्यकारों ने शोषण, असमानता, दरिद्रता, धार्मिक और जातीय कट्टरता, तथा भ्रष्टाचार आदि मानवी बुराइयों से उत्पन्न इंसानी-दर्द को भी अपनी रचनाओं में उभारा है किन्तु ये रचनाएँ स्वयं दर्द के स्वभाव को कम ही रेखांकित कर पाती हैं. वे हाइकु कम सेंर्यु अधिक हैं. उनके बारे में फिर कभी.                           
   -सुरेन्द्र  वर्मा,
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