पथ के साथी

Monday, April 13, 2026

1501

 साझा संसार:  एक झलक


कला, साहित्य, संगीत आदि क्षेत्रों में जन्मजात  यानी नैसर्गिक प्रतिभा ही व्यक्ति को आगे बढ़ाती है। निरन्तर प्रयास और अभ्यास से इस प्रतिभा को निखारा जा सकता है। अर्जित प्रतिभा इसे बल प्रदान करती है। जन्मजात और अर्जित प्रतिभा  मिलकर साहित्यकार की लेखनी का परिमार्जन करते हैं। नैसर्गिक प्रतिभा का अपन स्थान है। विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन और व्यवहार -कला के माध्यम से इसको निखारा जा सकता है। संवेदना-शून्य हृदय से  केवल बुद्धिबल के आधार पर साहित्य नहीं रचा जा सकता। संसार और अपने परिवेश को समझने की जितनी जितनी शक्ति होगी, साहित्यकार का सृजन उतना ही मुग्ध करने वाला होगा। कविता, कहानी या गद्य की कोई भी विधा हो, उसकी गुणवत्ता पर्यवेक्षण शक्ति पर ही निर्भर है। डॉ जेन्नी शबनम मूलतः कवयित्री हैं, जिनका  काव्य-सृजन अभिभूत करता है। आपकी कविताएँ,  क्षणिकाएँ हों या जापानी काव्य-विधाओं के अनेक रंग, सभी प्रभावित करने  वाले होते हैं। आचार्य दण्डी ने कहा है-‘गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति’ अर्थात् गद्य कवियों की कसौटी  है।  आपके  ब्लॉग पर आधारित  संग्रह ‘साझा-संसार’ आपकी गम्भीर अभिव्यक्ति का साक्षात् उदाहरण है।

 

‘साझा-संसार’ की रचनाएँ विभिन्न समय पर सम्प्रेषित आपके गहन चिन्तन का प्रतिफलन है।  आपका यह संग्रह  -1. कथा/कहानी, 2. स्त्री, 3. समाज, 4. संस्मरण, 5. व्यंग्य, 6. फ़िल्म   7. आत्मन् इन सात इन्द्रधनुषी रंगों से  रँगा है। रचनाओं के इस वैविध्य में नारी की स्थिति, उसकी मर्मान्तक पीड़ा, हर युग में किया जाने वाला उसका शोषण, उसके अस्तित्व का संकट, असमानता की दृष्टि गहरे तक छू जाती है। ‘कथा-कहानी’ में  लघुकथाएँ -माँ हो ना, जेनेरेशन गैप और पहचान नारी के संघर्ष की ही कथा कहते हैं। उसी  संघर्ष को ‘ ‘मुझे नहीं जीना इस दुनिया में’ नारी-व्यथा की मार्मिक कथा है; वह गरीब हो या सम्भ्रान्त इस मोर्चे पर शोषण और पीड़ा का शिकार सबको होना पड़ता है।

 

सामाजिक शोषण और आडम्बर पर आपने कड़ा प्रहार किया है। ‘स्त्री’ में  आधी दुनिया की विसंगतियों की शल्य चिकित्सा की गई है। इस अध्याय में आधी दुनिया की पूरी बातें, नारी के श्रम की अवहेलना,बलात्कृत दामिनियों का दर्द , बलात्कार की स्त्रीवादी परिभाषा, स्त्री का उपभोग की वस्तु मात्र माना जाना  व्यथित करता है। जेन्नी शबनम तीखे कटाक्ष के माध्यम से छद्म रूप धारी समाज सेवकों का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत करती हैं। यही कारण है कि आपकी रचनाओं में आए विचार केवल शब्द नहीं होते, बल्कि वे स्पन्दित हृदय की धड़कन की तरह होते हैं-अर्थ की विभिन्न छटाओं से सज्जित, आक्रोश और तार्किक चिन्तन के साथ। जेन्नी जी ने इस अध्याय में अकाट्य तर्कों से नारी के प्रति किए जा रहे भेदभाव के यथार्थ चित्र उकेरे हैं।  बल देकर कहूँ, तो इनका चिन्तन सड़े-गले विचारों और प्रथाओं के प्रति सशक्त विद्रोह झलकता है। ‘आधी दुनिया की पूरी बातें में’ 'ज़र, ज़मीन, जोरू ज़ोर की, नहीं तो किसी और की।' इस कहावत से आक्रोश और अधिक मुखर हुआ है। लेखिका पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों को भी मानसिक ग़ुलामी की शिकार मानती हैं। तात्पर्य है बौद्धिक चर्चा में कोई कुछ भी कहे, स्त्री की स्थिति में  अधिक बदलाव नहीं हुआ है।

 ‘समाज’ में युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हिन्दी की स्थिति, बचपन और लुप्त होते लोकगीत पर भी अपनी चिन्ता व्यक्त की है। यद्यपि यू ट्यूब के माध्यम से आज लुप्तप्राय लोकगीतों की वापसी का विश्वास जगा है।

 

 संस्मरण विधा में -रहस्यमय शरत, शान्तिनिकेतन की स्मृतियाँ, कठपुतलियों वाली श्यामली दी  प्रभावशाली रचनाएँ हैं, जिनमें जेन्नी जी की भावप्रवणता दृष्तिगोचर होती है।

 

‘व्यंग्य’ में ‘स्त्री रोबोट’ केवल व्यंग्य ही नहीं लिखा; बल्कि रुग्ण सामाजिक सोच की शल्य क्रिया भी की है।

 

‘फ़िल्म’ स्तम्भ में  डंकी, बोल के बोल सधी हुई समीक्षाएँ हैं। संक्षेप में कहना चाहूँगा कि जेन्नी शबनम सशक्त कवयित्री ही नहीं  एक मँजी हुई गद्य रचनाकार भी हैं। संग्रह की 59 रचनाएँ इसका सशक्त प्रमाण हैं।

[23-11-2025 ]

 

साझा संसार (गद्य विविधा ):  डॉ. जेन्नी शबनम

प्रथम संस्करण : 2025,मूल्य : 680.00 रुपये, पृष्ठ :228,

(SBN: 978-93-6423-518-1, अयन प्रकाशन, जे-19/39, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

मोबाइल : 9211312372, 8920573345,

e-mail: ayanprakashan@gmail.com,

website: www.ayanprakashan.com