पथ के साथी

Thursday, October 15, 2026

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बूढ़ी हो गई अम्मा 

                शशि पाधा 



कुछ धीरे- धीरे चलती है 

कदम-कदम पर रुकती है 

पाँव कभी थर्राए तो 

गिर न जाऊँ, सँभलती है 

 क्या बूढ़ी हो गई अम्मा!


 बालों में चाँदी की लड़ियाँ 

अँखियाँ कुछ धुंधलाई- सी 

 गीतों की कड़ियाँ भूल गई 

 बैठी चुप झुंझलाई सी 

 

ताने बाने बुनती है

 पहेली और उलझती है

 क्या बूढ़ी हो  गई अम्मा!

            

 पास-दूर के चश्मे दोनों 

अभी तो रखे यहीं- कहीं 

 कोना-कोना छान के मारा 

लौट आई फिर वहीं- कहीं  

 

सर पर दोनों रखती है 

इत-उत ढूँढा करती है 

 क्या बूढ़ी हो गई अम्मा!

 

उसने ही चलना सिखलाया 

गाकर लोरी रात सुलाया 

मीठी चूरी बुरकी- बुरकी 

गोदी में ले रोज़ खिलाया 

 

भूख उसे कम लगती है 

थोड़ा-थोड़ा चखती है 

क्या बूढ़ी हो गई अम्मा ! 


पीहर की बातें वह हँसकर  

कितनी बार सुनाती है 

कहाँ धरा चाबी का गुच्छा 

अक्सर भूल ही जाती है 


मन की मन में रखती है 

तभी तो चुप- चुप रहती है 

क्या बूढ़ी हो गई अम्मा! 

 

सखी-सहेली तुलसी से नित 

संझा को बतियाती है 

भूली नहीं वह नियम पुराना 

दीपक रोज़ जलाती है 

 

 पूजा, अर्चन करती है 

 नेम, व्रत सब रखती है 

ना! बूढ़ी कैसे  अम्मा !

 

 यादों की बँधी  पिटारी में 

कितने वर्षों की निधियाँ

 पर कभी कहीं खो जाती है 

 उसकी अपनी ही दुनिया 

   

  सुधियों में जा बसती है   

 अपने कल से डरती है

थोड़ी बूढ़ी हो गई अम्मा।

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