पथ के साथी

Showing posts with label ताँका. Show all posts
Showing posts with label ताँका. Show all posts

Friday, August 28, 2026

1516

 

तो मिले उपहार 

-डॉ. जेन्नी शबनम  


1.
राखी- त्योहार
भाई है शर्मसार
जेब है ख़ाली

कैसे ले उपहार
मँहगाई की मार।

2.

राखी है आई 

भाई है परदेस 

बहना दुःखी  

वीडियो-कॉल आया 

बहन मुस्कुराई। 

3.

स्नेह का धागा 

जोड़े रखता नाता 

भाई-बहन 

भले हों दूर-दूर 

पर प्रेम अटूट। 

4.

नन्ही बहना 

पहनके गहना 

चहक रही 

राखी पर भइया 

लाया प्यारा तोहफ़ा। 

5.

राखी त्योहार 

क्यों आता एक बार

बहना सोचे

हो हर इतवार   

तो मिले उपहार।

-0-

Wednesday, October 13, 2021

1144-शक्तिस्वरूपा

 रश्मि विभा त्रिपाठी 

1
शक्तिस्वरूपा


स्तुति कल्याणकारी
है भयहारी
तप औ आराधन
माँ मुक्ति का साधन ।
2
नित आह्वान
शुचिता धरे ध्यान
आरती- गान
गाते हैं मन- प्राण
माता करो कल्याण।
3
नहीं जानती
व्रत- पूजा- विधान
माँ मैं अजान
श्रद्धा- दीप से करूँ
तुम्हारा स्तुति- गान ।
4
पाठ,  स्तवन
मंत्रोच्चार, हवन
माता मैं व्रती
न जानूँ पूजा- विधि
स्वीकारो श्रद्धा- निधि ।
5
पूर्ण कामना
कृतकृत्य भावना
माता- वंदन
भगाए बाधा- बला
धन्य ! 'सर्वमंगला'
6
आरती गाऊँ
आस्था- दीप जलाऊँ
मैं अकिंचन
माँ क्या करूँ अर्पण
वारूँ भाव- भूषण ।
7
आरती थाल
शुचि- दीपक बाल
करे अर्चना
मुग्ध मन- मराल
माता करे निहाल ।
8
जगज्जननी
सृष्टि की संचालक
शक्तिदायिनी
तू जीवन आधार
करे भव से भार।
9
मुक्त कण्ठ से
मन करे उच्चार
माता स्तवन
भेंटे जो श्रद्धा हार
खुले मुक्ति के द्वार ।
10
शुभागमन
श्री- पग प्रक्षालन
वरदहस्त
धरो माँ मेरे शीश
दो दिव्य शुभाशीष।
11
पावन पर्व
करें गान गंधर्व
मुग्ध अथर्व
आद्या मंत्रोच्चारण
आधि- व्याधि मारण ।
12
पर्व विशेष
करो गृह- प्रवेश
सिंहवाहिनी
दो आशीष अशेष
माँ हरो दु:ख-क्लेश।

-0-

Monday, April 26, 2021

1094

 

कमला निखुर्पा

1

आशीष हाथ

धरा मेरे सर पे

घनी छाँव पा

पुरसुकून हुई

भरी दुपहरी भी ।

2

दूर से आई

नेहिल पुरवाई ।

चहके पंछी

झूमा तरु- मन ये

नन्ही कली भी खिली ।

-0-

Tuesday, July 23, 2019

सन्देसे भीगे

Thursday, August 18, 2011

सन्देसे भीगे [ताँका ]


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

[ कुबेर ने अपनी राजधानी अलकापुरी से यक्ष को निर्वासित कर दिया था ।यक्ष रामगिरि पर्वत पर चला आया ।वहाँ से मेघों के द्वारा यक्ष अपनी प्रेमिका को सन्देश भेजता है । महाकवि कालिदास ने इसका चित्रण 'मेघदूत' में किया है । मैंने ये सब प्रतीक  लिये हैं। ]
1
बिछी शिलाएँ
तपता  है अम्बर
कण्ठ भी सूखा
 पथराए नयन
घटा बन छा जाओ
2
बरसे मेघा
रिमझिम सुर में
साथ न कोई
सन्नाटे में टपकें
सुधियाँ अन्तर में
3
बच्चे -सा मन
छप-छप करता
भिगो देता है
बिखराकर छींटे
बीती हुई यादों के
4
कोई न आए
इस आँधी -पानी में
भीगीं हवाएँ
हो गईं हैं बोझिल
सन्देसा न ढो पाएँ
5
यक्ष है बैठा
पर्वत पर तन्हा
मेघों से पूछे -
अलकापुरी भेजे
सन्देस कहाँ खोए ?
6
कुबेर सदा
निर्वासित करते
प्रेम -यक्ष को
किसी भी निर्जन में
सन्देस सभी रोकें
7
छीना करते
अलकापुरी वाले
रामगिरि  पे
निर्वासित करके
प्रेम जो कर लेता
8
सन्देसे भीगे
प्रिया तक आने में
करता भी क्या
मेघदूत बेचारा
पढ़करके रोया
9
कोमल मन
होगी सदा चुभन
बात चुभे या
पग में चुभें कीलें
मिलके आँसू पी लें

Saturday, September 8, 2018

844



नदी के आगोश में
डॉ कविता भट्ट
1
लिपटा वहीं
घुँघराली लटों में
मन निश्छल,
चाँद झुरमुटों में
न भावे जग-छल ।
 2
चित्र :रमेश गौतम 
ढला बादल
नदी के आगोश में
हुआ पागल
लिये बाँहों में वह
प्रेमिका -सी सोई।
3
मन वैरागी
निकट रह तेरे
राग अलापे,
सिंदूरी सपने ले
बुने प्रीत के धागे।
4
मन मगन
नाचता मीरा बन
इकतारे -सा
बज रहा जीवन
प्रीत नन्द नन्दन!
5
रवि -सी तपी
गगन पथ  लम्बा
ये प्रेमपथ ,
है बहुत कठिन
तेरा अभिनन्दन!

Sunday, April 9, 2017

725

ताँका :डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
1
घिरी घटाएँ
हो गया था आकाश
गहरा काला
संकल्पों के सूरज
देते रहे उजाला ।
2
पवन संग
नाच उठीं पत्तियाँ
कली मुस्काई
सुनहरा झूमर
पहन कौन आई ?
3
डोरी से बँधी
पतंग हूँ मैं प्यारी
ऊँचाइयों पे
दिखो न दिखो तुम
पर लीला तुम्हारी ।
-0-


Saturday, November 2, 2013

मिटें सब सन्ताप

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
सुमन खिले
दीपों के घर-घर
उजियारे के
होश उड़े पल में
घोर अँधियारे के ।
2
ज्योति - धारा में
डूब-डूब बहना
खुश रहना
मिटें सब सन्ताप

रोम-रोम पुलके।
-0-

Tuesday, December 27, 2011

ओस की तरह


ओस की तरह (ताँका)
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
हथेली छुए
तुम्हारे गोरे पाँव
नहा गया था
रोम-रोम पल में
गमक उठा मन।
2
समाती गई
साँसों में वो खुशबू
मिटे कलुष
तन बना चन्दन
मन  हुआ पावन।
3
तपी थी रेत
भरी दुपहर -सा
जीवन मिला
मिली छूने भर से
शीतल वह छाँव
4
आज मैं जाना-
मन जब पावन
खुशबू भरे
ये मलय पवन
ये तुम्हारे चरन।
-0-

Tuesday, December 20, 2011

काँच के घर ( ताँका)


छाया:हिमांशु

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
काँच के घर
बाहर सब देखे
भीतर है क्या
कुछ न दिखाई दे
न दर्द सुनाई दे ।


2
काँच के घर
काँपती थर-थर
चिड़िया सोचे-
हवा तक तरसे
जाऊ कैसे भीतर।
3
छाया: हिमांशु
बिछी है द्वार
बर्फ़ की ही चादर
काँच के जैसी
चलना सँभलके
गिरोगे फिसलके ।

Wednesday, December 7, 2011

झरना बहाएँगे (ताँका)


झरना बहाएँगे (ताँका)
-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
किसे था पता-
ये दिन भी आएँगे
अपने सभी
पाषाण हो जाएँगे
चोट पहुँचाएँगे।
2
जीवन भर
रस ही पीते रहे
वे तो जिए
हम तो मर-मर
घाव ही सीते रहे।
3
वे दर्द बाँटें
बोते रहे हैं काँटे
हम क्या करें?
बिखेरेंगे मुस्कान
गाएँ फूलों के गान।
4
काटें पहाड़
झरना बहाएँगे
भोर लालिमा
चेहरे पे लाएँगे
सूरज उगाएँगे ।
5
उदासी -द्वारे
भौंरे गुनगुनाएँ
मन्त्र सुनाएँ-
जब तक है जीना
सरगम सुनाएँ।
6
ओ मेरे मन !
तू सभी से प्यार की
आशा न रख
पाहन पर दूब
कभी जमती नहीं ।
7
मन के पास
होते वही हैं खास
बाकी जो बचे
वे ठेस पहुँचाते
तरस नहीं खाते
8
ये सुख साथी
कब रहा किसी का
ये हरजाई
थोड़ा अपना दु:ख
तुम मुझको दे दो।
9
पीर घटेगी
जो तनिक तुम्हारी
मैं हरषाऊँ
तेरे सुख के लिए
दु:ख गले लगाऊँ ।
-0-