पथ के साथी

Wednesday, September 2, 2026

1518-नेपाल त्रासदी

  अंजू खरबंदा

 




सब कुछ तो बह गया...

पहाड़ों से उतरता पानी

अपने साथ

मिट्टी, पत्थर, पेड़

और कितने ही आशियाने

बहा ले गया!

 

किसी घर की दीवारें ढह गईं,

किसी घर की छत उड़ गई,

किसी घर का आँगन

मलबे में दब गया!

 

मगर देखो...

वह एक घर

अब भी अडिग खड़ा है

 

चारों ओर तबाही है,

पानी का सैलाब है,

मलबे का पहाड़ है,

और उसके बीच

वह चुपचाप खड़ा है!

 

लोग कह रहे हैं

मजबूत नींव रही होगी,

कॉलम-बीम मजबूत रहे होंगे,

पानी का बहाव

शायद दूसरी ओर मुड़ गया होगा।

 

हाँ...

यह सब सच हो सकता है

लेकिन

एक सच और भी तो है,

जिसे विज्ञान

शायद नाप न पाए...

 

कभी-कभी

ईश्वर अपनी उपस्थिति

इसी रूप में भी दिखाते हैं

 

जब चारों ओर

तूफ़ानी बहाव हो,

तब किसी एक छत का

यूँ सुरक्षित रह जाना

महज़ संयोग तो नहीं!

 

शायद किसी माँ की प्रार्थना,

शायद किसी बच्चे की दुआ,

शायद किसी बुज़ुर्ग की

मौन प्रार्थना...

 

कौन जाने,

किसकी दुआ ने

उस घर को थाम लिया हो!

 

यहाँ महसूस होता है

ईश्वर का अद्भुत चमत्कार...

 

प्रलय चाहे जितनी बड़ी हो,

अगर ऊपरवाला

हाथ थाम ले,

तो मलबे के समंदर में भी

एक आशियाना

सुरक्षित रह जाता है।

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