पथ के साथी

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Sunday, September 28, 2025

1472

 1-अनुपमा त्रिपाठी ‘सुकृति

1


कल- कल बहती हुई नदी

यूँ ही तराशती है

तिकोने पत्थरों को

और ले जाती है चुभन

हर बार

अपने साथ

इस तरह

कि तराशते रहने से ही

गोल पत्थरों के होने का वजूद है

-0-

2

रात फिर नींद नहीं आई

कि अनायास महकती रही यादें

कि हरसिंगार बरसता रहा टप- टप

भीनी- भीनी ख़ुशबू से

शब्दों का बरसना देखती रही

और बुनती रही नायाब सी

अपनी प्रेमासक्त कविता...!!!

-0-

2-जीवन की कीमत/ डॉ. सुरंगमा यादव

 


चंद सिक्के बड़े जिंदगी से हुए,

जीवन की कीमत सिफर हो गई

पत्थरो के कलेजे पिघलते नहीं

मिन्नतें तो सभी बेअसर हो गईं

गिड़गिड़ाई बहुत हाथ भी जोड़कर,

अनसुनी हरेक याचना हो गई

 जिस गुलिस्ताँ में उसने खिलाए सुमन

हर क्यारी सामने ही धुआँ हो गई

सात फेरों की अग्नि चिता थी बनी

जिसमें जीते जी राख कामना हो गई

न सती वो हुई, न ही जौहर किया,

मैं सुहागन मरूँ यही की थी दुआ

वो सुहाग के हाथों होलिका हो गई

जान पर  बनी, पाँव देहरी लाँघ चले

पर ज़माने की नजरें, की बेड़ियाँ हो गईं

सुलह समझौतों के कितने चले सिलसिले

आखिरी घड़ी भी आज आ खड़ी हो गई

कितनी चीखें दीवारों से टकराती रहीं

देहरियों पे जिंदगी स्वाहा हो गई।

-0-

Saturday, February 22, 2025

1450-दो कविताएँ

 

अनुपमा त्रिपाठी 'सुकृति'

1


भोर का बस इतना

पता ठिकाना है
कि भोर होते ही
चिड़ियों को दाना चुगने
पंखों में भर आसमान
अपनी अपनी उड़ान
उड़ते जाना है...!!!
-0-

2

आकंठ आमोद संग

प्रमुदित प्रभास का

सुगन्धित स्पर्श...

मृदुमय शांत वातावरण में अमृत घोलता...

चहचहाते पक्षियों का कलरव...

स्वयं से स्वयं तक की यात्रा का

प्रथम पड़ाव...

प्रात इस तरह हो

तो जीवन की गाथा लिखना

हृदयानंदित करता है...!!!

-0-

 

Tuesday, June 27, 2023

1336

 पुलिया 

भीकम सिंह 

 


गाँव के सिवानों पे 

खेतों के बीचों- बीच 

ईंट और सीमेंट से 

सम्बंध तोड़ चुकी

एक पुलिया थी।

 

इस पुलिया पर 

घास के गट्ठर ढोते 

धूप में तपते बैल

जुआ उतारकर

अपना मुँह धोते

 

इस पुलिया से ही

खेतों की रंगीनी 

परवान चढ़ती 

और सड़क की दौड़ 

रफ्तार पकड़ती।

 

इस पुलिया से ही 

खाँसते बूढ़ों की

बेरुखी के ढोल बजते 

और उनमें डर की

बारात चती 

 

सब अपने-अपने बूते

पुलिया पर ही रोते 

पुलिया के कंधों पर

बहते ही रहते 

आँसुओं के सोते।

 

रात के नंगे पैर 

यहीं पर गायब होते 

सूर्य के घोड़े 

किरणों के बीज

इसी पुलिया से बोते

 

एक तरह से पुलिया 

गाँव की तिथि रेखा-सी

सबका समय बदलती

खेतों का आर्त्तनाद  

नाली से बयाँ करती 

 

निरर्थक और मिथ्या 

सार्थक और समृद्ध 

पुलिया के जबड़ों तक

जब पहुँचता पानी

तो फाइलें ही भरतीं 

 जब -जब सारा गाँव 

दुःख की तरह टूटता 

ये पुलिया ही एक ,

ठौर थी

यह बात और थी।

-0-

2-अनुपमा त्रिपाठी सुकृति


1

काँपते हाथों से लिखे अक्षर

कह गए बीते हुए जीवन की

अधूरी -सी पूरी कहानी

कहीं वो छिपा- छिपा सा दर्द

कहीं वो नदिया की बहती- बहती सी रवानी

 

कौन है जो जीवन की धूप में मुझे

छाँव देता है

जीवन की नदिया में उस पार जाने

मुझे नाव देता है

 

भटक- भटकके जब थक जाते कदम

फिर सपनों को पनाह

मेरी लेखनी को ठाँव देता है

2

सुरभिमय फाल्गुन की उन्मद बयार

बहती भर लाती युग- युग जीवन सार

प्रस्फुटित पल्लवित धरा का रुप मनोहर

सुगुम्फित भावों का हो रहा शृंगार

और लेता मन पंख पसार

अभिनव गीत गाता खुश हो बार- बार

बार- बार !!

 

श्यामल बादल से आच्छादित घन

नव स्वप्न उल्लसित मन

घन घन घनन घनन

बिजुरिआ चमके

थिरके ये तन

सखीरी आज घर आए सजन !!

-0-

3

विपदा की असंख्य सीढियाँ लाँघते हुए

मुखरित होता है जब मौन

चंद शब्दों में सिमटा- सिमटा -सा

भावों में बिखरा- बिखरा- सा

तुम्हारे और मेरे बीच का वही सेतु

सजीव हो उठता है

और नारंगी आसमान चहक उठता है

नीड़ की ओर

उड़ते हुए पंछियों से.....!!!

-0-

Thursday, June 22, 2023

1332-प्रकृति के विविध रंगों में डूबी हृदयस्पर्शी कविताएँ : 'अनुगूँज'

 

डॉक्टर उपमा शर्मा


समय के साथ, साहित्य में परिवर्तन अवश्यंभावी है। मनुष्य के रुझान समय- समय पर बदलते हैं। साहित्यिक रुझान बदलना भी कोई आश्चर्य का कारण नहीं। छंदों के माधुर्य और सम्मोहन से निकल हिंदी में नई कविता का अवतरण हुआ। किसी भी भाषा में नई विधा का आविर्भाव अर्थात् किसी विधा में नए रूपों का उद्भव एक शुभ संकेत है। यह उस भाषा के निरंतर सृजनशील सामर्थ्य का परिचायक है। हिंदी कविता भी इसका अपवाद नहीं। यह सत्य है कि अनुशासन में रहकर प्रायः उत्तम कार्य संभव है; परंतु उतना ही बड़ा सच यह भी है कि कठोर अनुशासन की मर्यादा- सीमा को लांघकर ही कुछ नया कुछ आश्चर्यजनक रचा जा सके।

नई कविता के साहित्य- जगत् में आगमन से ऐसा ही हुआ। पाठकों को इस नई अतुकांत कविता का तीखा- कसैला स्वाद रुचिकर लगा। एक के बाद एक अनेक रचनाकारों की रचनाओं ने पाठक वर्ग को अपनी और खींचा। अनुपमा त्रिपाठी की कविताओं में पाठकों को गीत का माधुर्य और अतुकांत का तीखापन दोनों ही बखूबी मिलते हैं। उनकी प्रत्येक कविता अनुभव की तपती भट्टी से गुजरी हुई प्रतीत होती है। कवयित्री को प्रकृति से बेहद प्रेम है। उन्होंने अपनी कविताओं में बारिश,बादल ,सागर और पर्यावरण पर खुलकर कलम चलाई है। वे मानव के विभिन्न आडम्बरों पर भी कटाक्ष करती हैं। 

कभी पूजा

कभी इबादत कभी आराधन

जब भी मिलती है मुझे

भेस नया रखती क्यूँ है

ए बंदगी तू मुझे

नित नये रूप में मिलती क्यों है।

 

यूँ तो इस संग्रह की सभी कविताएँ दिल को छूती हैं। कवयित्री की कलम ने जिंदगी के कोमल और तीखे दोनों एहसासों को बड़ी कुशलता से पृष्ठों पर उकेरा है। कविता का बुनियादी उसूल है कि आपबीती को जगबीती और जगबीती को आपबीती बनाकर किसी भाव को पन्नों पर उतारा जाता है। लेकिन अनुपमा त्रिपाठी ने जगबीती को बहुत कुशलता से शब्दों में ढाला है। जीवन के हर रंग उनकी कविता में द्रष्टव्य होते हैं। उनकी रचनाएँ सीधी सरल भाषा में हैं जो सीधे मन को छूती हैं

 

उठती हुई पीड़ा हो

या हो 

गिरता हुआ

मुझ पर अनवरत बरसता हुआ

सुकूँ

 

उनकी कविता 'चमेली के क्षुप को' पाठक के मन को सीधे छूती है-

कुछ प्रयत्न ऐसे भी होते हैं

समूचे जीवन को जो गढ़ते हैं

कुछ आशाएँ ऐसी भी होती हैं

नित सूर्य संग उठती हैं।

 

 कवयित्री की कविता की भाषा सहज परिमार्जित है। अतुकांत कविता की विशेषता यही होती है कि इसमें सिर्फ भावनाओं को महत्त्व दिया जाता है। इस कविता में कोई नियम की पाबंदी नहीं होती; लेकिन लिखने का तरीका महत्व रखता है। अतुकांत कविता छंदमुक्त कविता के अंतर्गत आती है। अतुकांत कविता हमेशा सरल शब्दों में लिखी जाती है, जिसमें रचनाकार सीधी सरल भाषा में अपने भाव रखता है। इस कविता को पढ़ते-पढ़ते पाठक जब अंत में आते हैं, तो अंत का हिस्सा पढ़कर उन्हें इस कविता के पूर्ण होने का अहसास हो जाता है। यही अतुकांत कविता की बहुत बड़ी विशेषता होती है। अनुपमा की कविताओं में यह विशेषता स्पष्ट द्रष्टव्य है। अंत तक आते आते पाठक पूरी तरह कविता के भाव में खो जाता है। यथा

सुबह से शाम होती हुई जिंदगी को

लिख भी डालो लेकिन

रात तलक सूर्योदय न हो हृदय का

रात की सियाही को

उजाले से जोड़ोगे कैसे… . . ?

 हाइकु  एक ऐसी कविता है जिसमें अर्थ ,गंभीरता एवं भावों का सम्प्रेषण इतना गहन एवं तीव्र होता है कि वह पाठक के सीधे दिल में उतर जाता है। तीन पंक्तियों की पाँच सात पाँच के वर्णक्रम में लिखी जाने वाली इस कविता में भावों की उच्चतम सम्प्रेषण क्षमता एवं अति स्पष्ट बिम्बात्मकता स्थापित होती है। 

हाइकु केवल तीन पंक्तियों और कुछ अक्षरों की कविता नहीं है; बल्कि कम से कम शब्दों में लालित्य के साथ लाक्षणिक पद्धति में विशिष्ट बात करने की एक प्रभावपूर्ण कविता है।’

जिस हाइकु में प्रतीक खुले एवं बिम्ब स्पष्ट हों वह हाइकु सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में रखा जाता है। हाइकु अपने आकर में भले ही छोटा हो किन्तु घाव करे गंभीर चरितार्थ करता है। यह अनुभूति का वह परम क्षण है जिसमें अभिव्यक्ति ह्रदय को स्पर्श कर जाती है।कवयित्री के हाइकु इस कसौटी पर खरे उतरते हैं-

खिली लालिमा//देती अब संदेश/मिटी कालिमा

पर्यावरण को/दूषित नहीं करो/सचेतो जन

कुसुम खिले/पंखुड़ियाँ बोलतीं/खिलता मन

महके मन/भीगी सी है पवन /गुनगुनाऊँ

प्रेम जगाए /अनछुई भावना/सुनो तो सही

ये जिजीविषा/साथ नहीं छोड़ती/जियो तो सही

चाहे मनवा/आस घनेरी जैसी/शीतल छाँव

तपन बढ़े/कैसे दुखवा सहूँ/जियरा जले

सुनो न तुम/मेरी मन बतियाँ/नैना बरसे

ढलक जायें/आँसू रुक न पायें /छलके पीर

कविता का पूर्ण माधुर्य समेटे इन हाइकु में अनेक संकेत और बिम्ब छुपे हैं जो कवयित्री की प्रांजल काव्य-भाषा में मार्मिक ढंग से ध्वनित और अभिव्यक्त हुए हैं। पुस्तक में संग्रहित सारे ही हाइकु में , उसकी काव्यात्मक, मार्मिकता के साथ महत्ता उजागर हुई है । प्रथम हाइकु प्रकृति-बोधक है। यह सूरज, रोशनी और अँधेरी रात के अंतर्संबंध और प्रकृति-सौंदर्य का सुन्दर चित्र है । कवयित्री ने फूलों के खिलने पर मन प्रसन्नता को सुंदरता से बिम्बित किया है। प्रकृति मानव मन को आह्लादित करती है । कवयित्री इसे यूँ कहती हैं कि सुगंधित पवन से महका मन गुनगुना रहा  है । इन हाइकु से सिर्फ प्रकृति चित्रण के नहीं अपितु इससे अधिक के संकेत ध्वनित होते हैं - गहरे मानवीय संबंध जन्य दुःख-सुखानुभूति भी बिम्बित होती है। वियोगाकुल डबडबाई आँखों विरह वेदना दीख पड़ती है। इन हाइकु के तीनों पद अलग-अलग होकर भी एकार्थ केंद्रित हैंसाथ ही, प्रथम और तृतीय पद ईकारांत होने के कारण अतिरिक्त भाषागत लय का सुख भी देते हैं। इसी प्रकार अन्य उद्धृत हाइकु भी कवयित्री की क्षण की अनुभूति में गहरे और व्यापक सत्य के दर्शन कराते हैं। कवयित्री पर्यावरण सहेजने पर भी भरपूर ध्यान दिलाती हैं।उनके ये हाइकु निर्विवाद रूप से उत्तम हाइकु कविता की कोटि में आते हैं। स्थानाभाव के कारण सबका विश्लेषण यहाँ सम्भव नहीं है, फिर भी उद्धृत छठे हाइकु से ध्यान नहीं हटता जिसमें कवयित्री जिजीविषा का सुंदर बिम्ब खींचती हैं।

 


अनुपमा त्रिपाठी के संग्रह 'अनुगूँज' की कविताओं में अभिव्यक्ति के मुखर स्वर हैं।इन कविताओं में समय का एक तीखा बोध भी है। कविताओं में निहित प्रश्नों की आकुलता, संवाद, आश्चर्य और विस्मय की खूबियां उन्हें बार बार पढ़ने और सोचने पर मजबूर करती हैं।

अनुगूँ ( काव्य-संग्रह): अनुपमा त्रिपाठी,  मूल्य:250, पृष्ठ संख्या:127,प्रकाशन संस्थान 4268बी-3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110011 - 23253234/43549101/43704384

-0-डॉक्टर उपमा शर्मा,बी-1/248, यमुना विहार, दिल्ली110053


 

Thursday, April 21, 2022

1199

  1-अनुपमा त्रिपाठी सुकृति’ की कविताएँ

1

शब्द अपने कितने स्वरूपों में


अवतरित ,

खटखटाते हैं

मन चेतन- द्वार ,

लिये निष्ठा अपार ,

झीरी से फिर चली आती है

धरा के प्राचीर पर

रक्तिम .....

पलाश वन- सी ....

रश्मि  की कतार

नवल वर्ष  प्रबल  विश्वास

सजग  है मन

रचने नैसर्गिक उल्लास,

हँसते मुसकुराते से

 भीत्ति चित्र ,

प्रभात का स्वर्णिम  उत्कर्ष,

शबनमी वर्णिका का स्पर्श ,

एक विस्तृत आकाश का विस्तार ,

बाहें पसार ...

चल मन उड़ चल पंख पसार ....!!

-0-

2

उमड़ते हुए भावों की वीथी से ,

चुनते हुए शब्द की प्रतीति से ,

रचना से रचयिता तक ,

खिलते कुसुमों से अनुराग लिये ,

पल- पल बढ़ता है मन ,

गुनते हुए क्षण क्षण ,

अभिनव  आरोहण ,

बुनते हुए रंग भरे कात से ,

रंग भरा ,

उमंग -भरा जीवन ....!!

-0-

3

विजन निशा की व्याकुल भटकन ,

थिका का ऐसा जीवन,

मलयानिल का वेग सहनकर ,

मुख पर कुंतल करें आलिंगन ,

बढ़ती जाती पथ पर अपने ,

 

उषा का स्वागत करता मन

रात्रि की निस्तब्धता में

कुमुदिनी कलिका का किलक बसेरा

प्रातः के ललाम आलोक में

उर सरोज- सा खिलता सवेरा !!

री पथकिनी तू रुक मत

नित  प्रात चलती चल ,

धरा पर सूर्य की आभा से

मचलती चल !!

-0-

4

आज भी .. ...

आज भी सूर्यांश की ऊष्मा  ने

अभिनव मन के कपाट खोले ,

देकर ओजस्विता

सूरज किरण चहूँ दिस  ,

रस अमृत घोले ..!!

आज भी चढ़ती धूप  सुनहरी ,

भेद जिया के खोले ,

नीम की डार पर आज भी

चहकती है गौरैया ,

आज भी साँझ की पातियाँ

लाई है संदेसा पिया आवन का ,

आज भी खिलखिलाती है ज़िन्दगी

गुनकर जो रंग ,

बुनकर- सा हृदय आज भी

बुन लेता है  अभिरामिक शब्दों को

आमंजु अभिधा में ऐसे ,

जैसे तुम्हारी कविता

मेरे हृदय  में विस्थापित होती है ,

अनुश्रुति- सी ,अपने

अथक प्रयत्न  के उपरान्त !!

हाँ ..... आज भी ..!!

-0-

2- भीकम सिंह 

1-खेतों के सवेरे

 

पौ फटते ही


कुछ  झाड़ियाँ 

कुछ खरपतवार 

मिल जाते हैं 

खेतों की देह को घेरे हुए।

 

थुलथुल खर-पतवार 

खेतों की देह पे थिरकें

रसायनों के नशे में 

फसलों की बाँह पकड़े

मूर्ख मुद्रा में  ठहरे हुए 

 

दिनचर्या के नीचे 

दबे हुए खेत

गिरवी के डर से 

चुपचाप  -

सहते रहते हैं अँधेरे हुए 

 

धीरे-धीरे 

पुरवा आती 

दिन भर के थके खेत

झाड़ियों के ही कंधे ढूँढते

पर वो खड़ी रहती मुँह फेरे हुए 

 

फिर चाँदनी रात में 

झाड़ियों के साये तले 

साँसें  छोड़ते 

किलकारी मारते 

खेतों के सवेरे हुए।

2-दूब

दूब-1

 

दूब आएँगी 

आँखों में पानी भर देगी

दुर्लभ छींटों से 

सबको धन्य कर देगी 

 

दूब- 2

 

दूब के बारे  में सोचा 

काँपते हुए आती है 

पूजा की थाली में बैठ जाती है 

पालथी मार ।

 

और जंगली घास 

छुपा लेती है 

तपती धूप में 

वैदिक युग  का आर्तनाद 

 

दूब  - 3

 

गाँव में दूब

मिट्टी में मुँह छिपाती 

सोने को ज्यों लेती सहारे 

फैलती जाती पैर पसारे 

 

दूब - 4

 

लॉन की दूब

उगने का अधिकार बताने 

ज्यों ज्यों अपना मुँह उठाती

बेरहमी से काट दी जाती 

 

दूब - 5

 

हरी दूब पर 

नंगे पड़े पैरों के 

बाहर और भीतर 

एक खामोशी-सी ठहरी ।

 

जिसे ऊबकर

यहाँ वहाँ आते-जाते 

चौरस्तों पर

फेंक रहे हैं शहरी 

-0-

3-कपिल कुमार

नभ के नीचे बैठ लिखें प्रेम-विधान प्रिये! 

सबसे पहले दुःख लिखें फिर समाधान प्रिये!

 

नदी का विलाप लिखें रवि का ताप लिखें

समुद्र का मौन लिखें फिर प्रेम-व्यवधान प्रिये!

 

चिड़ियों की चहक लिखें फूलों की महक लिखें

तारों की चमक लिखें सितारों का गुणगान प्रिये! 

 

गालों की चमक लिखें बालों का लिखें गजरा

नयनों का काजल लिखें होठों का आख्यान प्रिये! 

 

नायक का मिलाप लिखें मेघों का आलाप लिखें

इंद्रधनुष के सातों रंग कोयल सा व्याख्यान प्रिये! 

 

जवानी की पीड़ा लिखें बचपन की क्रीड़ा लिखें

हृदय जो बिल्कुल खाली है भर दे खाली स्थान प्रिये

 

नए-पुराने गाँव लिखें पीपल की सी छाँव लिखें

हरा भरा हरियाणा लिखें सूखा राजस्थान प्रिये!

 

हृदय की व्यथा लिखें प्रेमचंद की कथा लिखें

गाँधी जी का अहिंसा युक्त नया हिंदुस्तान प्रिये!

नभ के नीचे बैठ लिखें प्रेम-विधान प्रिये! 

सबसे पहले दुःख लिखें  फिर समाधान प्रिये!

 

-0-