पथ के साथी

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Thursday, February 26, 2026

1496

 

1-कैसे घोलूँ रंग/    शशि पाधा 

 


सुनियो  रे रंगरेज !

सिखा दो  कैसे घोलूँ रंग 

बता दो कैसे घोलूँ रंग ।



एक रंग अम्बर का घोलूँ 

चुनरी नील रंगाऊँ

दूजा मैं किरणों का घोलूँ 

मेहंदी हाथ रचाऊँ 

तीजा रंग संध्या का घोलूँ 

अंजन नैन लगाऊँ 



   बिजुरी बिंदिया माथे सोहे  

   जूही चम्पा अंग 

  बताना कैसे हैं यह रंग ।



चौथे रंग में घुली चाँदनी 

पायलिया गढ़वाऊँ 

पाँच रंग का पहनूँ लहंगा 

लहरों सी लहराऊँ 

 छटा रंग केसर का घोलूँ 

  खुश्बू में मिल जाऊँ।

     हरी दूब सी पहनूँ चूड़ी 

        खनके प्रीत उमंग 

            बोल रे कैसे घोलूँ रंग ।



रंग सातवाँ ओ रंगरेजा

तू ही आकर  घोल 

तेरी डलिया में वो पुड़िया

मैं क्या जानूँ मोल 

बस इतना ही जानूँ मैं तो 

प्रेम- रंग अनमोल ।  

   रंग वही बरसाना प्रियतम 

     भीगूँ तेरे संग ।

    सुनियो कैसा प्रीत का रंग  


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-शशि पाधा, वर्जीनिया. यूएसए 

Email:  shashipadha@gmail.com

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गीत

2-पाषाणों के शहर में/ डॉसुरंगमा यादव

 


पाषाणों के शहर में किसको

 अपने घाव दिखाऊँ मैं

 बीत गए जब प्यार के पल-छिन

 अब क्या गीत सुनाऊँ मैं

 

जब तक पाँव थे मखमल पर

  कदम मिलाने वाले भी थे

 पीत-पात के मौसम में अब

 पास न कोई पाऊँ मैं

 

 सच पिंजरे में फड़-फड़ करता

  झूठ चहकता डाली- डाली

 नीम- बबूल के वन-बागों में

 आम कहाँ से पाऊँ मैं

 

 जल भी उसका, मीन भी उसकी

 जाल उसी ने डाला रे

 जग के झंझा छोड़ उसी की

 ओर न क्यों मुड़ जाऊँ मैं

 

पाषाणों के शहर में किसको

 अपनी पीर दिखाऊँ मैं।

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3- सॉनेट/अनिमा दास


1-नीरव

मध्यरात्रि की शय्या पर मृत स्वप्न के शव 

अश्रुसिक्त तमस का अपरिभाषित विलाप 

कहो किसको दूँ आश्वासन..वक्ष में आर्त्तरव 

स्पर्श करते, व्यथा के निरुत्तर शब्द अमाप 

 

देखो ..शिखर पर उदित शोणित शशांक 

आहत पक्षिणी के गीतों में तरंगित नीलरंग 

वह कहती, "मुझे दे दो मुक्ति, मकारांक,

प्रेम-प्रदेश के कुंज में...मैं हूँ अत्यंत निःसंग " 

 

समग्र क्षिति है... इस मध्यरात्र में योगिनी 

सघन स्वर में जन्म लेता शेष प्रबल प्रलय 

निर्वस्त्र होती अति अधीर यामा विजयिनी  

मोक्ष की मन्दाकिनी में... तर्पणरत पर्युदय 

 

तमसा के तट पर..शायित अंतिम कल्यब्द 

समय के अनय से क्यों है... नीरव निःशब्द?

 

2-उन्माद

कदाचित् इन ऋतुओं के उत्सव में

मैं हो रही हूँ स्वयं के अर्थ से पृथक 

जीवित हूँ..इतना ही है संज्ञान मुझे 

अन्यथा काया है केवल नील धूमक 

 

जीर्ण पर्णों की चिता पर यूँ दहकती 

संपूर्ण अरण्य की गहन तीर्ण वेदना,

तपस्वी के अश्रु से काकली महकती 

जैसे अभ्र में अस्पष्ट भ्रमित कल्पना 

 

दीर्घ यात्रा पर है...उसका प्रत्यावर्तन

उसके अन्वेषण में है आत्मा व्याकुल 

आगंतुक का होगा..भव्य अभिनंदन

ज्योत्स्ना में होंगे स्वरित... गीत मृदुल 

 

पाषाणों में हो रहा आज मौन संवाद 

कौन करेगा नियंत्रित ध्वंस का उन्माद?

3-श्रावणी

 

करो परिपूर्ण मुझे.. वसंतकुंज के चित्रकार 

मैं युगों की अप्सरा,करती रही यह अभिसार 

पुष्पों की सुरभि में रहती, ,वाष्पीय कल्पना 

प्रलंबित केशों से.. विकीर्ण कृष्णरंग अल्पना 

 

करो परिपूर्ण मुझे.. मैं हूँ युगों की तृषित मृदा 

श्वेत शीकर की हूँ मैं .. श्यामल स्मृति समृद्धा 

शून्यकाल के, ..स्वर्णिम वंशी के सप्त स्वर 

इस अग्निवर्षा में क्यों है अर्धदग्ध यह अध्वर?

 

हृत्ताप से भस्म है होता मधुपाली का उन्माद 

दिग्भ्रमित दिवस का दृश्य,दृगनिस्सृत विषाद

प्रिय,असह्य है अनुनय का...मिथ्या अभिनय 

मंत्रों के अंतराल में ध्वस्त होता यह शिवालय।

 

उदयास्त की यात्रा में...हो तुम गतिमय तरणी 

मृत्यु के पश्चात् भी... मैं रहूँगी तुम्हारी श्रावणी।

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Tuesday, September 30, 2025

1473

 अनिमा दास, सॉनेटियर , कटक, ओड़िशा 

  

1-क्लांति 

 


इस तृष्णा से तुम हो क्यों अपरिचित
  

इस अग्नि से तुम हो क्यों अवरोधित  

मेरे शून्य महाग्रह का यह तृतीय प्रहर 

है मौन विभावरी का यह शेष अध्वर 

 

इस क्षुधा से भी तुम हो ऐसे अज्ञात 

इस श्रावण से हो तुम जैसे प्रतिस्नात 

मेरी परिधि में नहीं अद्य उत्तर तुम्हारा 

मेरे परिपथ पर नहीं कोई शुक्रतारा।

 

इस एकांत महाद्वीप पर है ग्रीष्मकाल 

भस्मसात निशा...व पीड़ा-द्रुम विशाल 

समग्र सत्व है निरर्थक...अति असहाय 

मृत-जीवंत, स्थावर-जंगम सभी निरुपाय

 

 

इस अंतहीन मध्याह्न की नहीं है श्रांति

ऊषा के दृगों से क्षरित अश्रुधौत क्लांति।

 

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 2-प्रत्यंत 

 

मोहवश मैंने कहा, ऐ नीड़ हो जाओ अदृश्य 

क्षण में ही शून्य हुआ ग्रह -विग्रह.. समग्र अंतरिक्ष 

क्षुब्ध हो कहा मैंने, मेरी एकाकी अभीप्सा रहे अस्पृश्य

सर्ग से निसर्ग पर्यंत लंबित,हो जाए तिक्तता का वृक्ष,

 

संभव हुआ अकस्मात्। विक्षिप्त उल्काओं की वृष्टि,

स्तंभित आत्मा की आर्तध्वनि,नीलवर्ण में हुई द्रवित।

व्यासिद्ध अंतरीप की पूर्व दिशा में थी उसकी दृष्टि 

चीत्कार! चीत्कार! अनाहूत पीड़ाओं में अद्य स्वरित 

 

वह समस्त अभियाचनाएँ हुईं जीवित.. तत्क्षणात् 

वह नहीं हुआ संभव.. देह की सुगंध में था गरल 

वारिदों के घोर निनाद में लुप्त हुआ था क्रंदन स्यात्

समग्रता का एक अंश क्या था.. स्थल अथवा जल?

 

मैं शून्य की मंदाकिनी..किंतु अप्राप्ति की तृष्णा अनंत 

कहाँ है आदि-अंत की वह अदिष्ट ज्यामितिक प्रत्यंत?