पथ के साथी

Sunday, August 23, 2026

1515

 

1-परदेसी मन /  शशि पाधा 

ता- ठिकाना पूछता 

जड़ें पुरानी ढूँढता

  घूम रहा परदेसी मन ।



काकी, चाची, मामा, मौसा 

एक गली का इक परिवार 

बीच सजा वो चाट खोमचा 

आसपास बसता संसार

     रोज़ हवा को सूँघता

   खुश्बू वो ही ढूँढता 

   तड़प रहा परदेसी मन ।



जुड़ी- सटी सब छत, मुँडेरें 

आधी रातें, कथा- कहानी 

खाट, दरी, बस चादर, तकिया 

माटी-रची सुराही –पानी 


        
यादों में ही झूमता 

        छत वही फिर ढूँढता 

       पछताया परदेसी मन ।


दोपहरी की धूप गुनगुनी 

आँगन, तकिया लंबी तान 

पके रसोई चाय,कौड़ी 

सर्दी से तब बचते प्राण 

 

     उनींदा- सा ऊँघता 

     हरी चटाई ढूँढता 

     पगला सा परदेसी मन । 



संग मनाए मेले- ठेले

चौगानों में तीज, त्योहार

आपस में बाँटे थे कितने 

चूड़ी, रिब्बन के उपहार



   बिन झूले के झूलता

   ठाँव वही फिर ढूँढता

   बेचारा एकाकी मन

    -0-  वर्जीनिया, यू एस ए ,  shashipadha@gmail.com

2-

2-वर्तमान के दाग़/ डॉ.सुरंगमा यादव

 

बिना दवा के मर जाते हैं, कितने ही बीमार

कहीं नोट गद्दों में भरकर, सोते जिम्मेदार

हाय गरीबी ! उठी न डोली, देखो फिर इस बार

कबाड़ तक में जलते देखे, नोटों के अंबार


न्याय तुला पर धन- बल भारी, किससे करें पुकार

कोर्ट -कचहरी के चक्कर में, बिक जाते घर-द्वार

लगे मुखौटे कई- कई, पहचान हुई दुश्वार

बड़े निवाले खाने वाले, बच जाते हर बार

वर्तमान के दाग़ छिपाए, जाते बारम्बा

इतिहासों के काले पन्ने, दिखलाकर सौ बार

 

-0-

Friday, August 21, 2026

1514-वह स्त्री है

 

[आपने स्त्री जीवन के संघर्ष को पीड़ा को समझा अपने शब्दों से उसके मौन स्वर को मुखरित किया। साधुवाद आदरणीय। उसी कविता की अंतिम पंक्ति से जोड़कर मैंने-‘ स्त्रीहै’  कविता अभी लिखी है।]

 

  स्त्री है /  डॉ. वंदना शर्मा 

  


वह निष्प्राण- सी है अपनी मर्यादाओं के कारण

लेकिन मरती नहीं है

क्योंकि स्त्री है 

सृजन करती है दर्द सहकर 

विनाश भी कर सकती है महाकाली बनकर 

वह  शक्ति है जग की 

उसकी जिजीविषा को कोई नहीं हरा सकता 

समाज ने डाली बेड़ियाँ पैरों में उसके 

ताकि उसकी उड़ान रोक सके; 


पर बहती हवा को
 

कौन रोक पाया है आज तक 

उसके लिए कोई व्रत नहीं रखा जाता 

कोई मन्नत नहीं माँगी जाती 

फिर भी वह  जीती है ज्यादा 

बो जाते हैं बेटे उग आती हैं बेटियाँ 

स्प्रिंग देखा है कभी आपने 

जितना दबाओं उतना उछलता है 

स्त्री की असीम शक्ति से डर 

लगाई पाबंदी पुरुष समाज ने 

पर वह  शक्ति और अधिक मुखरित हुई 

अपनी राह खुद बनाई 

वह  चांद पर जा वापिस आई 

हर अभेद क्षेत्र में परचम लहराया 

नभ अपने कदमों में झुकाया 

क्योंकि व स्त्री है 

हार नहीं सकती 

परिस्थितियाँ अनुकूल भले न हो 

वह  ड़ना जानती है 

वह  स्त्री है 

हर सीमा से परे 

हर बाधा उससे डरे 

वह  कुछ भी कर सकती है 

शक्ति बिना शिव अधूरे 

शक्ति से हो सारे कार्य पूरे 

कण- कण में व्याप्त है जो

जो ऊर्जा, जो प्राण है 

वह  स्त्री है

-0-

Thursday, August 20, 2026

1513-फिर भी अपना मुलुक है प्यारा

  रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’




 

माना भारी धूल धुआँ है

भीड़भाड़ है, चिल्लपों है

हॉर्न गरजते हैं वाहनों के

गुत्थम-गुत्था पैदल चलते

फिर भी अपना मुलुक है प्यारा

 

आ गए जिस दूर देश में

यहाँ  चुप्पी सब अनजाने- से

न कहकहे, ऊँची आवाज़ें

लगते सब ये बेगाने- से

 

शिष्टाचार, झूठी मुस्कानें

मौन यहाँ का बड़ा है गहना

हरियाली में बंजर बनकर

हम सीखे कब गुमसुम रहना

 

खुली हवा है चुप दीवारें

दीवारों से कब दर्द झाँकता

खिड़की बंद है, बंद दरवाज़े

किसकी पीड़ा कौन आँकता

-0-

Wednesday, August 19, 2026

1512-स्त्री

 

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

 


मरती है स्त्री

सुबह -शाम

घुट-घुटकर

अटकती हैं साँसें पसलियों में

दर्द बन जाता शिलालेख

सूखे अधरों का

किससे कहें, कैसे कहें

मर्यादा के ताले

जड़े हैं प्रत्येक शब्द पर

'किस पथ जाऊँ?'

जकड़ी हैं बेड़ियाँ

हर निर्णय पर।

 

घर लौटना लगता है -

किसी जंगली जानवर की

गुफा में उतरना

गुर्राहट  से कानों का सुन्न होना

जलती नफ़रत- भरी आँखों का

रोम -रोम में गड़ना

मुँह से निकलते झाग

और बदबू का झोंका

नथुनों को चीरता -सा।

 

दफ़्तर की हाड़तोड़ थकान

निकम्मे लोगों का साथ

अधमरा कर देता है

फ़ाइलों में जूझते शरीर को,

बॉस की लपलपाती जीभ

कैक्टस के काँटों -सी आँखें

और लार से भीगे भद्दे होंठ

जिनके बीच घिरी वह

पल -प्रतिपल मरती है।

वह जाए, तो कहाँ जाए

घर और बाहर के रौरव नरक

उसे कई-बार मारते हैं,

वह फिर-फिर जिन्दा हो उठती है

साँस लेने के लिए।

उसकी रातें

अतीत के सपनों को उधेड़ते

भीग जाती हैं

घर में होते हुए भी

वह भयभीत हिरनी -सी

कभी बचपन की स्मृतियों

कभी युवावस्था के

उड़ते आँचल को

अनुराग-भरे मन से

केवल कल्पनाओं में जीती है

कभी इस गुंजलक से निकलकर

रात भर छटपटाती है,

वह जीवित है, पर जी नहीं पाती है

वह निष्प्राण-सी है,

पर अपनी मर्यादाओं के कारण

 मर भी नहीं पाती है

-0-

Tuesday, August 18, 2026

1511

 

भोजपुरी गीत/ डॉ. शिप्रा मिश्रा 

 


 1- जा रे बदरवा

 

जा रे बदरवा सनेसवा ले जा रे!

कारे बदरवा सनेसवा ले जा रे!

अबकी सावन घर आजा ओ सइयाँ! आजा!

 

अमुवा के डढ़िया हिड़ोलवा डलाइल

हरी- हरी चूड़ियाँ आ चुनरी ओढ़ाइल!

हिड़ोलवा हमें नाहीं भावे ओ बिदेसिया आजा!

 

सखी सब झुलुआ घुमरी परावे हो!

मुँहवा झुराइल देखी के चिढ़ावे हो!

अब कइसे धीर धरी बोल निरमोहिया आजा!

 

बरसे बदरिया त कड़के बिजुरिया हो!

गतर -गतर सिहरेला धड़केला छतिया हो!

भय लागे पिया बिनु कटे नाहीं रतियाँ आजा! 

 

देसवा के ओरी-छोरी देखी के बदरिया हो!

हमरा बोला के ले जा अपनी नगरिया हो!

बिना तोहरे कइसे काटीं भरल जवनिया आजा!

 

2 सुन हो कन्हाई

 

उठाव ना कन्हाई गगरी बड़ी भारी

दुनिया परल बा भरम के मझारी। 

 

नन्ही चुकी गोड़ हमर नन्ही चुकी हाथ बा

अगड़ी पिछाड़ी कवनो संगी ना साथ बा

संझा होई त घरवा चहुँपेम अबेरी।

अंखिया खोल ना कन्हाई!

 

चढ़ल जवानी हमार लचकत कमरिया

गरजे बदरिया आजु चमकत बिजुरिया

बजरी दुल्हवा हमरा दी बड़ी गारी।

 

आइल बुढ़ारी त अँखिया धुधुआई

देह के मोटरिया अब नाहीं ढोवाई

मउत सउतिया हमके घर से निकारी।

सँवार ना कन्हाई!

 

मटिया के देह ह ई पनिया परान बा

धरती अकासे में दुनिया हरान बा

तोहरा के छोड़ अउरी के सँवारी।

 

डॉ. शिप्रा मिश्रा 

शिक्षण एवं स्वतंत्र लेखन 

बेतिया, प० चम्पारण, बिहार 

Monday, August 17, 2026

1510

 मनवा हरसे/  शीला मिश्रा



बाग-बगीचा सब है हरसे।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

सूनी सूनी काली रतियाँ।
बरसन रहतीं मोरी अँखियाँ।।
कँगना चूड़ी रूठीं मुझसे ।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

बहुत सताये तेरी सुधियाँ
मीठी मीठी प्यारी बतियाँ।।
आँखों का कजरा है तरसे
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

महके महके फूल व कलियाँ।
  झूला झूलें मेरी सखियाँ।।
वन उपवन कैसे हैं हरसे।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

सखियाँ पहनें लहंगा चनियाँ।
चूड़ी से सजाई कलइयाँ।।
सजने को आतुर हूँ कबसे।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

सखियाँ खींचें मेरी बहियाँ।
तेरे बिन ना भाये सइयाँ।।
आ जाओ तो मनवा हरसे
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

-0-



Friday, August 14, 2026

1509-मेरे उत्तराखण्ड

 प्रदीप रावत

 


आया था तुमसे मिलने.

तुम्हारा हाल पूछने.

न चिड़िया की चहचहाहट

न ही दोस्त तुम मिले....

हर आँगन , हर घोसला ,

हर खेत तुम्हारे  मुझे सूने मिले..

कभी आँगन महकता था फूलों से

अब वे सारे फूल मुझे मुरझाए मिले

हर पत्ता , हर डाल सूखे

हर धारा , हर नौला सब सूखे ही रहे।

कभी चौपालों का भरा था हर आँगन

आज सब वे आँगन मुझे झाड़ों से पटे दिखे...

मेरे दोस्त मेरे हमदम

मेरे उत्तराखण्ड

मुझे तेरे हर दरवाजे बंद मिले....

-0-

पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड


Wednesday, August 12, 2026

1508

 नज़्म/ लिली मित्रा

 


फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है

जहद- ए -मुसलसल के बाद

लम्हा - लम्हा तितलियों की कहानी है

दरख्तों की ज़ुबानी है

 

ख़ुश्क हसरतों पे 

बादलों की मेहरबानी है

रेज़ा- रेज़ा ये बारिश

सेहरा पे बागवानी है...

गुज़रती मसर्रत से ज़िंदगानी है

 

फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है

-0-

रश्मि लहर 


1

एक सुबह मन को तुम्हारी झलकियाँ याद आ गईं।

सिहरती इक  साँझ की कुछ सुर्खियाँ याद आ गई।।

 

सुन मेरी पदचाप खुलती खिड़कियाँ याद आ गईं।

ज़िन्दगी रंगों से भरती तितलियाँ याद आ गईं।।

 

थामकर पतवार माँझी था मगन, पर उस घड़ी,

भॅंवर से टकरा पड़ीं कुछ कश्तियाँ याद आ गईं।।

 

वो तेरी भीगी पलक, कन्धे टिका माथा तेरा।

अनमने अलगाव की वे सिसकियाँ याद आ गईं।।

 

बाद -मुद्दत द्वार के बजने की थी आहट मिली।

भीगता चेहरा, वो माँ की झुर्रियाँ याद आ गईं।

2


दिल को वो देने चले ख़ुशरंग सपने आज फिर

बाग उपवन फूल कलियां और झरने आज फिर।

 

दिल में हर जज़्बा सलीक़े से सजाने के लिए

आ गए वो दिल की चादर को बदलने आज फिर 

 

क्यों करें तन्हा सफ़र, यह सोच कर दिल रुक गया

लौटकर आ जाओ तुम भी साथ चलने आज फिर

 

सुरमई उस शाम के सॅंग, बीत जाना था मगर,

पल मुहब्बत के चले हैं ख़ुद मचलने आज फिर

 

झूठ-सच खुल जाऍंगे तो, रंग बदलेंगे कई,

हाथ से वादों के पन्ने, हैं सरकने आज फिर

 

उॅंगलियाँ क्या तार भी टूटे मिले हर साज़ के

जब चले महफ़िल में उनको याद करने आज फिर

 

था भँवर सागर के दिल में पर 'लहर' मासूम थी

चल पड़ी नादाँ उदधि बाँहों में भरने आज फिर

-0-

मेरे आँगन की किलकारी  / संजय सागर 

 


 

मेरे आँगन की किलकारी मुझसे दूर गई ।

मेरी आँखों की छवि न्यारी मुझसे दूर गई ।

 

ठुमक ठुमक कर सारे घर में खेला कौन करे ?

तुतली भाषा की मिश्री को घोला कौन करे?

बूढ़े बाबा को तन्हाई फिर से घूर गई।

मेरी आँखों की छवि न्यारी मुझसे दूर गई ।।

 

घर की छत पर साँझ ढले इक  चिड़िया पूछ रही ।

हाँ गई वह गुड़िया रानी पड़िया पूछ रही ।

दादी के चावल की थाली तुझ बिन पूर गई

 मेरी आँखों की छवि न्यारी मुझसे दूर गई ।

 

बड़ा खिलौना ढम-ढम वाला लेकर ढोल खड़ा ।

मोटर, गुड़िया, मुर्गा , तुरही ढोलम पोल पड़ा।

चाचा की आँखों से लगता ले के नूर गई ।

मेरे आंगन की किलकारी मुझसे दूर गई ।।

  

रात ग पापा की निंदिया तुझ संग भाग गई ।

तेरी यादें बिस्तर पर भी बबुआ टाँक गईँ 

सूनी पलकों से आँसू की  लड़ है झूल गई ।

मेरे आँगन की किलकारी मुझसे दूर गई ।।