डॉ. अंजुल चौहान
ओ मेरे छायादार वृक्ष!
तुम्हारे साथ एक बार पुनः स्मृतियों में
खो जाती हूँ
अंकुरण काल से लेकर अब तक की यात्रा
दोहराती हूँ
याद है तुम्हें.....
धरती के गर्भ से ऊष्मा ले जन्मी
मै तुम्हारी छाया तले
अपरिचित ब्रह्मांड में कुछ-कुछ भयभीत
उत्सुकता भरा मेरा मन
आंखें बंद कर देखना चाह रहा था
सृष्टिकर्ता के अद्भुत रंगमंच को
अधखुली पलकों से देखने का प्रयत्न करती
और फिर सो जाती तुम्हारी
शीतल छाया में
नवजात शिशु की भाँति।
मेरे रक्षक!
सहज भाव से तुम देखते रहे
मुझे उस अवस्था में, कुछ क्षण
और फिर बाहें फैलाकर
तुमने अपनी गोद में मुझे सहेज
लिया
नन्ही- सी लता को अपना कोमल आश्रय दिया
और धीरे-धीरे तुम्हारे आलिंगन में
शैशव की किलकारियाँ भरते हुए
सुकुमारता की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी
अभिनव शब्द और
छंद गढ़ने लगी
तुम आनंदित थे और मैं भयमुक्त।
इठलाती, इतराती ,लजाती, शर्माती
मै
बढ़ने लगी उस स्वर्णिम लोक में
जो रच रहे थे तुम .....
सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए ।
उन्मुक्त पक्षी की भाँति
देशकाल की सीमाओं से परे
पलकों में कुछ स्वप्न सँजोए
अल्हड़ सी अठखेलियाँ कर रही थी .....
और नितांत शांत तुम मुझे निहार रहे थे
मौन होकर कुछ पुकार रहे थे
धीरे-धीरे स्वत: ही तुम में विस्तार पा रही थी
तुम्हारी
परिपक्वता को अपने में समा रही थी
सुन रही थी तुम्हारे प्राणों की अनसुनी
पुकार को
स्वीकार कर रही थी तुम्हारी प्रेमातुर
मनुहार को
मेरे सखा ! गर्वित थी मैं अपने सौभाग्य
पर
तुमसे मिले अप्रतिम प्रेम और मान पर
सहज
ही मै तुम्हारे गांभीर्य में डूब रही थी
तुम्हारे अस्तित्व में एकाकार हो स्वयं
को भूल रही थी
तुम्हारी टहनियों, नवांकुरित पल्लवों से लिपट लिपटकर
बहुत ऊंचाई तक आ गई हूँ
तुम्हारी जड़ों से लेकर पत्ते पत्ते पर छा गई हूँ।
पता है तुम्हें.....?
तुम्हारे साथ चलते चलते इतनी ऊँचाई तक
क्यों आ गई हूँ
ममता बन तुम पर छा गई हूँ
मेरे आधार!
तपती दुपहरी के ताप से तुम्हें बचा सकूँ
प्यार से दुलार से तुम्हारा माथा सहला सकूँ
अनगिनत
झंझावातों से लड़ सकूँ
सुख दु:ख
को सम हो सह सकूँ।
मेरे आनंद!
तुम्हारी आत्मा के संगीत पर थिरकती रहूँ
नवागत
जीवन में रंग भरती रहूँ ।
समर्पित है तुझे यह सृजन।
अर्पित है तुझे
यह नर्तन ।।
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