पथ के साथी

Monday, July 6, 2020

1014-बनजारा जब लौटा घर को


बनजारा जब लौटा घर को
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

बनजारा जब लौटा घर को
         बन्द उसे सब द्वारा  मिले ।
बदले-बदले से उसको सब
         जीवन के किरदार मिले ।
नींद अधूरी हिस्से आई
सबको बाँटे थे सपने
गैर किसी को कब माना था
माना था सबको अपने ।
इन अपनों से बनजारे को
         घाव बहुत हर बार मिले ।
भोर हुआ तो बाँट दुआएँ
चल देता है बनजारा
रात हुई तो फिर बस्ती में
रुक लेता है बनजारा ।
लादी तक देकर बदले में
         सिर्फ़ दर्द -धिक्कार मिले।
आँधी, पानी, तूफ़ानों में
कब बनजारा टिकता है
मन बावरा कभी ना जाने-
छल-प्रपंच भी बिकता है ।
ठोकर ही इस पार मिली है
         ठोकर ही उस पार मिले
-0-[ शीघ्र प्रकश्य संग्रह से]

Wednesday, July 1, 2020

1013

वक़्त बोल रहा है !!
सीमा सिंघल 'सदा'

सब की बोलती बंद है इन दिनों,
वक़्त बोल रहा है ..
भय घोल रहा है!!
बड़ी ही ख़ामोशी से
कोई बहस नहीं,
न ही कोई,
सुनवाई होती है
एक इशारा होता है
और पूरी क़ायनात उस पर
अमल करती है!!!

सब तैयार हैं कमर कसकर,
बादल, बिजली, बरखा के साथ
कुछ ऐसे विषाणु भी
जिनका इलाज़,
सिर्फ़ सतर्कता है
जाने किस घड़ी
करादे, वक़्त ये मुनादी.…
ढेर लगा दो लाशों के,
कोई बचना नहीं चाहि!!
2020 फिर लौटकर
नहीं आएगा,
जो बच गया उसे
ये सबक याद रहेगा,
ज़िंदगी की डोर
सिर्फ़ ऊपरवाले के हाथ में है!!!
तुम क्या चीज़ हो 
वह तोल रहा है
वक़्त बोल रहा है !!
-0-

Tuesday, June 23, 2020

1012-पिता तो बरगद हैं


सुदर्शन रत्नाकर


पिता अब शिला की तरह
मौन रहते हैं
कहते कुछ नहीं,
पर सहते बहुत हैं
शिथिल होते शरीर और
चेहरे की झुर्रियों के नीचे
भावनाओं के सोते बहते हैं
जिसका नीर आँखों से बहता है।
कहाँ गई वह कड़क आवाज़ और
रौबीला चेहरा,चमकती आँखें
जिन्हें देख, ख़ौफ़ से भर जाता था मैं।
लेकिन पिता के प्यार -भरे शब्द
सिर पर रखा स्नेहिल हाथ
और गोद में उठा लेना
आज भी याद आता है मुझे
उनके कदमों की आवाज़ सुन
सहम जाना
फिर भी उनके आने की प्रतीक्षा करना
कंधे पर चढ़ना और उनकी पॉकेट से
टॉफ़ियाँ लेकर भाग जाना
भूलता ही नहीं मुझे।
उँगली पकड़कर मेले में जाना
पिता का खिलौने दिलाना,
उनका टूट जाना,मेरा रोना
और खिलौने दिलाने का प्रण
कितने सुखद होते थे क्षण।

बड़े हुए तो बदल गए
पिता और मैं,
विचार और विचारधाराा ।
वे बरगद  हो गए,
और मैं नया उगा कीकर का पेड़
मैं उनकी ख़ामोश आँखों के ख़त
पढ़ नहीं पाता
बुलाने पर भी पिता के पास
नहीं जाता;
पर वे आज भी अपनी छाया के
आग़ोश में लेने के लिए
बाँहें  फैलाए बैठे हैं
लेकिन मेरी ही क्षितिज को छूने की
अंतहीन यात्रा ,स्थगित नहीं होती
न मैं बच्चों का हुआ, न पिता का हुआ
और वह बरगद की छाया
प्रतीक्षा करते थक गई है।

अब मेरे भी बाल पकने लगे हैं
मेरे भीतर भी जगने लगा है
ऐसा ही एहसास ।
मैंने  जो बोया था
वही तो काटूँगा
वक्त तो लौटेगा नहीं
पिता तो बरगद है  और मैं कीकर
न टहनियाँ हैं, न छाया है फिर
कौन आएगा मेरे पास
कौन आएगा मेरे पास?
-0-

Sunday, June 21, 2020

1011-पिता



1-सविता अग्रवाल 'सवि' कैनेडा

मस्तिष्क में बल भर
विपदाओं से लड़ते
सरदी के मौसम में
निरंतर चलते
अपने अस्तित्व को सँभाले
बच्चों की परवरिश करते
अपने ध्येय पर अडिग
मीलों दूर चलते
पैसा -पैसा बचाते
और हम सब पर लुटाते
क्यों न सोचा कभी
अपने लि तुमने
सर्दी में गर्म जूता बनाने का
मख़मली बिस्तर और बिछौने का
लम्बे दिनों में भी
न तुमने आराम किया
बच्चों की खुशहाली के लि
दिन- रात काम किया
याद है मुझे वह दिन
जब स्कूल पिकनिक के लि
तुमसे पैसे माँगे थे
विपदाओं के लि रखे जो
थोड़े से पैसे थे
माँ से कहकर तुमने
वही दिलवा थे
मेरे मुख पर मुस्कराहट देख
तुम भी मुस्करा थे
आज पीछे मुड़कर सोचती हूँ
तो लगता है
कितने इरादे थे तुम में
सबको खुश रखने के
वादे थे तुम में
आदर्श जीवन हमको सिखा ग
पिता ! तुम संसार से विदा क्यों ले गए ?
हमारे बीच से अलग क्यों हो गए ?
जीने के लि हमें अकेला छोड़ ग
अकेला छोड़ गए।

2-परमजीत कौर 'रीत'

कितने भी मजबूत भले हों,नाज़ुक जाँ हो जाते हैं 
माँ के बाद पिता अक्सर, बच्चों की माँ हो जाते हैं 

हर बात सोचने लगते हैं, सोते-से जगने लगते हैं 
हर आहट पर चौंके-चौंके,वो  चौखट तकने लगते हैं 
इस-उसके आने-जाने तक,जो फ़िक्र में ही डूबे रहते 
उस हरे शज़र के चिंता में, यूँ पात सूखते- से लगते
सूरज बन तपने वाले फिर, शीतल छाँ हो जाते हैं  
माँ के बाद पिता अक्सर,बच्चों की माँ हो जाते हैं 


माला के मोती बँधे रहें ,खुद धागा बनके रहते हैं 
हर खींच-तान को आँखों की, कोरों से देखा करते हैं 
इक वक्त था सबकी आवाजें,नीची थी उनकी बोली से।
इक वक्त जो उनकी वाणी में,झर-झरते हैं पीड़ाओं के।
खुद में कर-करके फेर-बदल,घर से दुकाँ हो जाते हैं 
माँ के बाद पिता अक्सर ,बच्चों की माँ हो जाते हैं 
-0-
( 15 अगस्त 2018 को आकाशवाणी सूरतगढ़ के 'महिला जगत' की काव्य गोष्ठी में प्रसारित)

Friday, June 19, 2020

1010




1-कृष्णा वर्मा
1-कैसी यह जंग


कैसी यह जंग
कौन निगोड़े की
बददुआ कबूल हुई
वीरान हो रहा संसार
घर-घर पसरा दुख
रोने वालों से
छीन लिए उसने
सुकून भरे काँधे
उदासियों से
छीन लिया गले लग
ग़म हलका करने का अख़्तिया
हौसलों से छीन लिया
क़दम से क़दम मिलाकर
बढ़ने का जुनून
सफलताओं से छीन लिये
पीठ पर शाबाशी-भरे
हाथों की थपकियाँ
कैसी यह जंग
ख़ूनी रिश्तों को घेरा
खलाओं ने
जीवन और मृत्यु
खड़े हैं स्तब्ध
न जन्मे का स्वागत
न मरे को अलविदा
काल की रुखाई ने
छीन लिया अपनापा
किसे ख़बर कब थमेगा
यह अज़ाब का सिलसिला।
-0-

2-इंतकाम

दर्द जब हद से गुज़र जाए तो
ज़ुबान से विदा ले लेते हैं शब्द
और पनाह लेने लगती हैं
होंठों पे ख़ामोशियाँ
दर्द की बाढ़ में उफनता इंतकाम
तोड़ता है जब चुप्पियों का बाँध
तो लग जाती है गूँगे शब्दों को ज़ुबान
तल्खियों के सैलाब में डूब जाता है वजूद
नस-नस पोर-पोर में भर जाता है ज़हर
और टूट पड़ता रिश्तों पर क़हर
ढह जाते हैं ताल्लुक
तड़क जाते हैं रिश्ते
रिस जाता है अपनापा
ऐसी पड़ती हैं दरारें कि
सिकुड़ नहीं पातीं दूरियाँ
डूब के रह जाते हो तुम ऐसे तालाब में
जिसका कोई किनारा नहीं होता
बेहतर है
माफी का लंगर डालकर
निकाल लो
इंतकाम के भँवर में गहरे उतरती
रत की शिला को।
-0-
2- शशि पाधा
1-सीमाओं का रुदन  (मौन श्रद्धांजलि !)
  
सुनी किसी ने मौन सिसकियाँ 
सीमाएँ जब रोती हैं ।
वीर शहीदों की बलिवेदी 
अश्रु जल से धोती हैं ।
सीमाएँ तब रोती हैं ।

जिस माटी ने पाला-पोसा 
उस पे तन-मन वार दिया 
अंतिम साँसों की वेला में 
उसने प्यार दुलार दिया 
अमर सपूतों को भर गोदी 
 श्रद्धा माल पिरोती हैं ।
 सीमाएँ भी रोती हैं ।

छल का राक्षस करता तांडव 
रक्त नदी की धार चली  
नत मस्तक हैं उन्नत पर्वत 
माँग सिंदूरी गई छली 
 शून्य भेदती बूढ़ी ऑंखें 
          आँचल छोर भिगोती हैं ।
           सीमाएँ तब रोती हैं ।

धीर बाँध अब टूटे उनके 
ढाढ़स कौन बंधाएगा 
कोई गाँधी बुद्ध महात्म
जाने कब तक आएगा 
गिरह बाँधे बीज अमन के 
 मन मरुथल में बोती हैं ।
  सीमाएँ भी रोती हैं ।

शीशों के घर रहने वालो 
काँच-काँच अब बिखरेगा 
भारत माँ की रक्षा करने 
सिंह प्रतिकारी गरजेगा  
गगन भेदती ललकारों में   
            देती आज चुनौती हैं ।
           सीमाएँ क्यों रोती हैं !!!
-0-