पथ के साथी

Monday, October 3, 2022

1250-दूसरे द्बारे जा नहीं सकता

 रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

 

गुलाब के अधर खुलते हैं तो

तेरे हृदय के खिलने का आभास होता है

मलय पवन के संस्पर्श से

रन्ध्र मत्त होने पर

अगुआ तेरा हर श्वास होता है ।

मुझे अपने चरणों की

धूल बन जाने दे,

फूल बनकर राह में

अपनी बिछ जाने दे ।

 

मुझे सुख है या कि दु:ख

हर्ष है या विषाद

कुछ कह नहीं सकता

तेरे सृजन पर कोई उँगली उठाए

करे विवाद , बिना बात

मैं सह नहीं सकता ।

तेरी प्रत्येक भेंट की मैंने

प्राण से स्वीकार

सोच भी नहीं सकता कि

तुझमें है कोई विकार ।

 

आँसू हो या कोई गीत

सम्पत्ति हो या कोई विपत्ति

प्रियतम! तेरी किसी  भेंट को

कभी लौटा नहीं सकता

आकर तेरे पगतल में

किसी दूसरे द्वारे जा नहीं सकता ।

(रचनाकाल;27-4-74)

Saturday, October 1, 2022

1249

 भीकम सिंह 

मन

 

मन बेईमान 

एक सफर पर नही चलता 

ढूँढता, रास्ते नित नये   

 

पहलों से ऊबकर 

करने को कुछ नया 

देखे  , अखब़ार की तहें ।

 

भरा रहे वादों से 

एकत्र करके यादों के 

गड्ढों में, बहता रहे 

 

गुमनामी में जीता 

लेकिन अभिलाषा यही 

बस , नाम चलता रहे 

 

मन बेईमान 

भले हो खामोश 

मन मेंकिन्तु कहता रहे   

-0-

2-राधे

1

हँसना उतना ज्यादा पड़ता है, ज़ख्म जितना गहरा होता है

जिंदा है बस इसी आस में  कि हर शाम के बाद सवेरा होता है

 

नकाब उतार भी दे फिर भी, सच सामने नहीं आता जहाँ में

क्या अपना,पराया, हर चेहरे के पीछे एक चेहरा होता है

 

वो गलत होकर भी सही है, मगर हम सही होकर भी हैं गलत 

क्या पूछ रहे हो, कैसे, अरे यहाँ कसूर तो बस मेरा होता है

 

क्या दुश्मन, क्या दोस्त, क्या अपना, क्या पराया सभी हैं निर्दोष

क्या खूब लूटा है जमकर हमको, वक्त भी गजब लुटेरा होता है

-0-

2-

1

चेहरे पर खामोशी दिल में बवाल था

झूठा ही सही पर मेरा यार कमाल था

घंटों नहीं बिकी वफ़ा इश्क बाज़ार में

उधर बेवफाई में जबरदस्त उछाल था

3

देखना तो था मगर उससे ख्वाब कौन माँगे

सवाल बहुत हैं मगर उससे जवाब कौन माँगे

कहा सब ने पूछ लूँ क्यों छोड़ा बीच सफर में

मगर समंदर से दरिया का हिसाब कौन माँगे

-0-

4-वक्त और वो

 

ये बुरा वक्त भी तो वक्त ही है सुधर जाएगा

लौट आएगा वो भी, जाने दो, किधर जाएगा

जितना मर्जी घूम ले वो मंजिल दर मंजिल मगर

फकत बेचैन ही रहेगा हर दम जिधर जाएगा

सभी राह बंद होगी तो वापस लौट चल देगा

आ पास मेरे, बाहों में, मोती बिखर जाएगा

अगर मिल भी जाए मंजिल उसे बीच रास्ते में

तो फिर कौन- सा, बिना उसके, राधे मर जाएगा

-0-

3- विवशता/ पूनम सैनी

 

 

होती नहीं कुछ चीज़ें

बस में हमारे।

छूटती सी चली जाती है जैसे

हाथ से बालू,

नहीं बस में रोक लेना

वक्त को भी वैसे।

गहराते अंधेरे के साथ

घिरते से अनगिनत ख्याल,

पर ज़हन से निकाल पाना

नहीं बस में हमारे।

कुछ पनपते से जज़्बात,

कुछ रह- रह लौट आती यादें,

कभी एक चेहरे को याद कर

अनायास ही मुस्कुरा देना।

बेसबब सा कभी

भर आना आँखों का।

हृदय की गहराई में

उमड़ते तूफान के बीच

कौंधती बिजलियों को

काबू कर पाना।

उलझे मन से

खुद को सुलझाना।

मुश्किल है बहुत... क्योंकि

होती नहीं कुछ चीज़ें

बस में हमारे।

-0-

4-कपिल कुमार

1

डायनासोर प्रजाति की छिपकलियो!

तुमने लिखा है क्या

अपने पूर्वजों का इतिहास

या बस किया

उजाले के इर्द-गिर्द घूमने वाले

कीट-पतंगों का भक्षण,

 

वैज्ञानिक-शोध

दे रहे तर्क-वितर्क

कोई कह रहा है

धरती से उल्का पिंड के टकराने से विलुप्त हुए

किसी के सिद्धांत के सिर- पैर तक नहीं

 

दे रहे है सभी

भाँति-भाँति के सिद्धांत

ल-जुलूल सिद्धांत

जितने मुँह उतनी बातें

सभी लगे हुए है

अपने-अपने सिद्धांत को

सत्य और सटीक साबित करने में

 

किसी दिन अपने

संग्रहालयों, पुस्तकालयों में जाकर

उठा लाओ

वो सारी पांडुलिपियाँ

जो लिखी है प्रबुद्ध इतिहासकारों ने

और जलाकर राख कर दो

वो सारे फ़र्जी दस्तावेज

जो लिखे गए है

घिसे-पिटे इतिहासकारों द्वारा,

 

पटक दो इन प्रामाणिक पांडुलिपियों को

उस मेज पर

जिस पर रखे है झूठे तथ्य

और बन्द कर दो

सभी का मुँह।

2

मैं चाहता हूँ

अपने घास फूस के कच्चे घर को तोड़कर

आधुनिक शैली का भवन बनाना

मिट्टी की लिपी-पुती दीवारों पर पलस्तर चढ़ाना

फ़िर अचानक विचार आता है

 

मेरे इस घर के अंदर 

टाँड पर पड़ी जच्चा छिपकली का

जिसके सभी सगे- संबंधी जुटे है

कुआँ-पूजन की तैयारी में

आ रही है उसकी सहेलियाँ

उसको बधाई देने

 

मेरा घर तो सदियों पुराना है

लगभग दो सप्ताह पहले

इसके छप्पर में 

एक चिड़िया ने बनाया था

अपना नया घर

ब्याज पर पैसे लेकर 

या होम लोन लेकर

मैं नही चाहता

उसको उजाड़ना

 

दो बल्लियों के बीच खाली जगह में रोज मिलते है 

अजीब किस्म के दो कीट

जिनकी प्रजाति मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की

उनकी हरकतों से लगते है

प्रेमी-प्रेमिका

शायद उनको इससे सुरक्षित जगह कोई ना मिली हो

मैं नहीं चाहता

उनके वियोग का कारण बनना

 

रात को आले में जलती डिबिया के उजाले में

मैं देखता हूँ ऐसे ही असंख्य जीव

जो व्यस्त है भिन्न-भिन्न कार्यों में

छप्पर को अपनी दुनिया मानकर

मैं नही चाहता

उनको उद्विग्न करना

इसलिए मैं प्रतिदिन त्याग देता हूँ

घर तोड़ने का विचार।

-0-

 

Friday, September 30, 2022

Sunday, September 25, 2022

1246-विश्वास नहीं टूटा

 

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

टूट गए सब बन्धन, पर विश्वास नहीं टूटा।

छूटे पथ में सब साथी, विश्वास नहीं छूटा॥

ठेस लगी बिंधे मर्म को,आँसू बह आए ।

कम्पित अधर व्यथा चाहकर भी न कह पाए ।

साथ निभाने वाले पलभर संग न रह पाए ।

            कष्ट झेलने का मेरा अभ्यास नहीं छूटा ।

छूटे पथ में सब साथी, विश्वास नहीं छूटा॥

पथ की बाधा बनकर बिखरे थे, जो-जो भी शूल ।

आशा की मुस्कान से खिले, पोर-पोर में फूल ।

            खिसकी धरा पगतल से, आकाश नहीं छूटा।

छूटे पथ में सब साथी, विश्वास नहीं छूटा॥

थीं रुकी उँगलियाँ कुपित समाज की मुझ पर आकर

अपने मन का संचित कूड़ा, फेंक दिया  लाकर ।

मुड़ी प्रहार की प्रबल नोंकें, मुझसे टकराकर ॥

            रोदन ने मथ दिए प्राण, पर हास नहीं छूटा ।

छूटे पथ में सब साथी, विश्वास नहीं छूटा॥

कभी पतझर कभी आँधी बन, सूने जीवन में ।

चुभ-चुभकर उतरी बाधाएँ, विमर्दित मन में ।

मिटे अनेक प्रतिबिम्ब बन नयनों के दर्पन में।

            टूटी आस की डोर, किन्तु प्रयास नहीं टूटा।

छूटे पथ में सब साथी, विश्वास नहीं छूटा॥

(8-4-1974: वीर अर्जुन दैनिक, दिल्ली, 9 फ़रवरी 1975)

Monday, September 19, 2022

1245-तेरा पावन प्यार।

 

रश्मि विभा त्रिपाठी

1
तुम बोलो सुनती रहूँ
, मधुरिम ये आवाज।
तुमसे ही तो है सधासाँसों का यह साज।।
2
तकिया तेरी बाँह का, थपकी देते हाथ।
मेरे सुख की नींद का, कारण तेरा साथ।।
3
मेरे दुख से हो दुखी, ढूँढा तुरत निदान।
पाया तेरे रूप मेंज्यों मैंने भगवान।।
4
उल्टा पड़ता आज तोलू का हर इक दाँव।
तेरा प्यार मुझे हुआवट की प्यारी छाँव।।
5
धन- दौलत, पद, नाम की, कैसी है दरकार।
मुझको बरकत दे रहातेरा पावन प्यार।।
6
घोर अँधेरे में धरेरोज दुआ के दीप।
प्रेम तुम्हारा चाँद- सा, चमका सदा समीप।।
7
इसीलिए तो कट गएबाधाओं के जाल।
तुमने छोड़ा ही नहीं, मेरा कभी खयाल।।
8
कैसे मिलता है तुम्हें, मेरे मन का हाल।
दूरी अपने बीच की, धरती से पाताल।।
9
सरगम मेरी साँस कीछेड़ सुनाते राग।
तुमने मन का कर दिया, हरा- भरा यह बाग।।
10
करते हो नित नेम से,  मेरी खातिर जाप।
मीत मुझे लगता नहीं, तभी समय का शाप।।
11
चुभ सकता है क्या भला, मुझको कोई शूल।
मीत तुम्हारा प्यार येहै पूजा का फूल।।

Thursday, September 8, 2022

1243

 

1-दोहे- रश्मि विभा त्रिपाठी

1

मन की वीणा पे हुआ, स्वत्व तुम्हारा मीत।

धड़कन में तुम गूँजते, बनकरके संगीत।। 

2

जोड़ दिया तप से सदा, मन का टूटा तार।

मेरी साँसों का तभी , बजने लगा सितार।।

3

पढ़ लेते इक साँस में, इन होठों का मौन।

सच बतलाओ आज ये, आखिर तुम हो कौन।।

4

तुम्हें जुबानी याद है, मेरा सारा हाल।

भाव तुम्हारे हो गए, अब गुदड़ी के लाल।।

5

जीवन में अब क्या बचा, टूट गई हर आस।

साँस तुम्हीं पर ही टिकी, तुम रखना विश्वास।।

6

नीरवता में हास का, बज उठता है  साज।

जिस पल आकर तुम मुझे, देते हो आवाज।।

7

तुमने समझाया मुझे, जीवन का यह मूल।

मौसम ने डपटा बहुत, डरा न खिलता फूल।।

8

बड़े बेतुके लग रहे, राहों के ये शूल।

मेरे गजरे में गुँथे, आशीषों के फूल।।

9

प्रियवर तुम जीते रहो, खिलो सदा ज्यों फूल।

जग- जंगल में ना चुभे, तुमको कोई शूल।।

10

पता नहीं कैसी खिली, अब दुनिया में धूप।

पलक झपकते बदल रहा, सब रिश्तों का रूप।।

11

जग- जंगल में मैं चलूँ, पकड़े तेरा हाथ।

विपदा दम भर रोक ले, छोड़ूँगी ना साथ।।

-0-

2-कपिल कुमार

1

ठण्डी-ठण्डी पवनें

धीरे-धीरे गिरतीं

बारिश की बूँदें

टपरी पर चाय पीते लोग 

हाथ में सिगरेट थामें

चौराहे से गुजरते

प्रेमी जोड़े

हवा में हाथ फैलाते

जोर-जोर से चिल्लाते

"वाह! मौसम" 

वही दूसरी ओर

एक दम्पती

जिसका अठारह-उन्नीस वर्ष का

नौजवान लड़का

उसी चौराहे पर

सड़क दुर्घटना में मारा गया है।

उनके लिए

बारिश की बूँदें

मानो

शरीर पर गिरते अंगारे,

ठण्डी-ठण्डी पवन

ज्येष्ठ की लू। 

2

मौन! 

किसलिए साधा है

यदि तुम अनभिज्ञ हो

तुम्हें उत्सुक होना चाहिए

अंतर ढूँढने में

क्या अंतर है

मूक रहने

और

मूकबधिर होने में। 

3

मेरी सोचो

कितने दिन लगाए

हिम्मत जुटाने में

तुम्हें तो बस

प्रेम-प्रस्ताव पर

हाँ! कहना है। 

4

दफ़्तर के ज्यादातर

हुनरमंद कर्मचारी

जकड़े हुए मिले

दासता की बेड़ियों में

उनका

गलत और सही का

तार्किक निर्णय

दबा हुआ है

वेतनमान

प्रलोभन राशि के

मलबे तले। 

Wednesday, September 7, 2022

1242-तम की पूजा करने वालो

 रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'                                        [20-03-1077 , स्मारिका देहरादून, अप्रैल 77] में प्रकाशित


Monday, September 5, 2022

1241

 

गीत मैं गाता रहा - सॉनेट 

मूल ओड़िआ सॉनेट - मानस रंजन महापात्र

 


चलता रहा मैं एकाकी ढूँढने एक नव प्रभात

पथ हुआ प्रलंबित जीवन रह गया असमाप्त 

पूर्ण हो यह जीवन -की याचना यहीं तुम्हारे द्वार 

तुम रहे किसी निभृत मंदिर में बन अपरिचित अवतार

 

गतिहीन हुए मेरे कर-पद,शीश भी हुआ क्लांत अमाप 

परिचित थे जितने सब लौट गए साथ लिए अनुताप

थी कभी पुलक प्रेम की ..था कितना आनंद उल्लास

सबकुछ हुआ अंत,हुआ शून्य.. रह गया कुछ प्रतिभास

 

यह कैसा विचित्र दिवस है..घोर तमाच्छन्न है गमथ 

क्यों मिला विराग प्रेम-सरि में तुम्हारी क्यों हुआ विपथ

किया था अतीव प्रेम जीवन से किंतु रहा  वह उदासीन 

इससे पूर्व था पूर्ण-रिक्त मैं,अब हुआ पुनः मैं दीन-हीन।

 

 

है ज्ञात मुझे,ऊषा है एक तृषित नीलाम्बरी खगिनी

तथापि क्यों मैं गा रहा हूँ अनवरत प्रकाश  की गीत- रागिनी?

-0-


हिंदी अनुवाद - अनिमा दास,कटक, ओड़िशा