पथ के साथी

Saturday, October 31, 2026

1539

 1-गीत / लिली मित्रा

 


छुपकर पलकों के पट से

ढलक गए दृग जल- से तुम

व्याकुल प्रेमिल सघन भाव से

पथ पर बिखरे हृदय कुसुम

गुंजित मउमाछी की गुनगुन

पुष्प- पुष्प के कर्णों में

जैसे तुम खुसफुस हो करते

मधु मिश्रित से वर्णो में

झंकृत सुर में होकर गुम

पथ पर बिखरे हृदय कुसुम

छुपकर पलकों के पट से

ढलक गए दृग जल से तुम

शरत् काल के श्वेत मेघ बन

पवन वेग संग उड़ते हो

थामे स्व में शिशिर आर्द्रता

लुक-छिप, लुक-छिप करते हो

थिरक उठे हैं जब खग द्रुम

पथ पर बिखरे हृदय कुसुम

छुपकर पलकों के पट से

ढलक गए दृग जल से तुम

-0-

2-चिड़ी-ताल / लिली मित्रा

 

मैने बहुत ही सामान्य-सी एक इच्छा पाली

जो लगती थी कि बहुत ही छोटी-सी बात होगी

पर ऐसा नहीं था-हाँ सच में...!

मैंने अपने आँगन की दीवार पर मिट्टी के दो पात्र रखे

उसमें भरकर रखा पानी,

और मैं हर रोज़ करने लगी प्रतीक्षा

नन्ही चिड़ियों की

कोई तो आए तपती झुलसती गर्मी में

पानी से भरे कटोरे में छपक छपक...

चीं चीं... करते हुए ख़ुद को भिगोए,

नहाए और छितरा दे ख़ूब सारा पानी चारों ओर

और भरकर तरोताज़ा उड़ान हो जाए फुर्र...

रही रोज़ ताकती-झाँकती मैं...

कभी रसोई की खिड़की से

 कभी दरवाजे की ओट से।

एक लंबी प्रतीक्षा के बाद-

अब मेरे बनाए छोटे से चिड़ी-ताल में

डुबकी मारती चिड़ियों के चहचहाते झुंड

मुझे देकर जाते हैं एक उन्मुक्त उच्छ्वास...

एक इत्मीनान- भरी मुस्कान।

मेरे मन की चिड़िया भी

नहाकर इस सौंधे पानी में

फुर्र हो जाती है इन नन्ही चिड़ियों

के साथ एक उन्मुक्त सफ़र पर

-0-

Wednesday, October 28, 2026

1538-ओ मेरे छायादार वृक्ष!

  डॉ. अंजुल चौहान

 

ओ मेरे छायादार वृक्ष!

तुम्हारे साथ एक बार पुनः स्मृतियों में खो जाती हूँ

अंकुरण काल से लेकर अब तक की यात्रा दोहराती हूँ 

याद है तुम्हें.....

धरती के गर्भ से ऊष्मा ले जन्मी 

मै तुम्हारी छाया तले

अपरिचित ब्रह्मांड में कुछ-कुछ भयभीत  

उत्सुकता भरा मेरा मन

आंखें बंद कर देखना चाह रहा था 

सृष्टिकर्ता के अद्भुत रंगमंच को

अधखुली पलकों से देखने का प्रयत्न करती

और फिर सो जाती तुम्हारी  शीतल छाया में 

नवजात शिशु की भाँति।

मेरे रक्षक!

सहज  भाव से तुम देखते रहे 

मुझे उस अवस्था में, कुछ क्षण 

और फिर बाहें फैलाकर

 तुमने अपनी गोद में मुझे सहेज  लिया

नन्ही- सी लता को अपना कोमल आश्रय दिया

और धीरे-धीरे तुम्हारे आलिंगन में 

शैशव की किलकारियाँ भरते हुए 

सुकुमारता की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी

अभिनव शब्द और  छंद  गढ़ने   लगी

तुम आनंदित थे और मैं भयमुक्त।

इठलाती, इतराती ,लजाती, शर्माती मै

बढ़ने लगी उस स्वर्णिम लोक में

जो रच रहे थे तुम .....

सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए ।

उन्मुक्त पक्षी की भाँति 

देशकाल की सीमाओं से परे

पलकों में कुछ स्वप्न सँजोए 

अल्हड़ सी अठखेलियाँ कर रही थी .....

और नितांत शांत तुम मुझे निहार रहे थे

मौन होकर कुछ पुकार रहे थे 

 धीरे-धीरे  स्वत: ही तुम में विस्तार पा रही थी

तुम्हारी  परिपक्वता  को  अपने   में  समा रही थी

सुन रही थी तुम्हारे प्राणों की अनसुनी पुकार को

स्वीकार कर रही थी तुम्हारी प्रेमातुर मनुहार को

मेरे सखा ! गर्वित थी मैं अपने सौभाग्य पर

तुमसे मिले अप्रतिम प्रेम और मान पर

सहज  ही  मै  तुम्हारे  गांभीर्य  में डूब  रही थी

तुम्हारे अस्तित्व में एकाकार हो स्वयं को भूल रही थी

तुम्हारी टहनियों, नवांकुरित पल्लवों से लिपट लिपटकर

बहुत ऊंचाई तक आ गई हूँ

तुम्हारी जड़ों से लेकर पत्ते पत्ते पर छा गई हूँ।

पता है तुम्हें.....?

तुम्हारे साथ चलते चलते इतनी ऊँचाई तक क्यों आ गई हूँ

ममता बन तुम पर छा गई हूँ

मेरे आधार!

तपती दुपहरी के ताप से तुम्हें बचा सकूँ

प्यार से दुलार से तुम्हारा माथा सहला सकूँ

अनगिनत  झंझावातों  से  लड़  सकूँ

सुख दु:ख  को  सम  हो  सह  सकूँ।

मेरे आनंद!

तुम्हारी आत्मा के संगीत पर थिरकती रहूँ 

नवागत  जीवन   में  रंग  भरती  रहूँ ।

समर्पित है तुझे यह सृजन।

अर्पित है तुझे  यह  नर्तन ।।

        -0-     

Sunday, October 25, 2026

1537

 महापर्व (सॉनेट)/अनिमा दास

 


है मन आज उदीप्त कि हुआ तुम्हारा आगमन,

जल उठें सहस्र दीप कि उज्ज्वल हुआ है गगन।

अरण्य था हृदय में कहीं, काया हुई है तपोवन,

स्मृतियों के स्फुटित शतदल में रच गया जीवन।

 

प्राण में प्रणय की धारा, प्रणय में प्रलिप्त प्रभा,

अमिय-बूँद के अर्णव की ऊर्मियों में नर्तित रंभा।

पर्वमय है समग्र सृष्टि, झंकृत है वृष्टि में छटाभा,

ओ, तंद्रित तमिस्र! देखो, तनु में आए नव गाभा।

 

ज्योतिर्मय, काव्यमय है आज स्वेच्छा का स्वर्ग,

मंत्रमुग्धा है मंदार-मंथित मृत्यु, मुदित निसर्ग।

कल्प-कल्प की कथा में है निमग्न विहग-वर्ग,

हे अयोध्या के अधिप! है यह तुम्हारा ही अभिसर्ग।

 

ध्वस्त हुआ अभिशस्ति का देह-दुर्ग, हे विशालाक्षी!

अंतर्द्वंद्व के अंधकार में आज प्रकाश ही है साक्षी।

-0-कटक, ओड़िशा

-0--0-

 

Wednesday, October 21, 2026

1536

 स्मृतियों में बसी  वह एक  बस्ती

डॉ. सुरंगमा यादव

 


स्मृतियों में बसी  वह एक  बस्ती

 शहर के बिल्कुल अंतिम छोर पर बसी  वह  बस्ती

 एक छोटा- सा मोहल्ला, नाम  गौंटिया 

 सड़क के उस पार मुस्लिम बस्ती,

सड़क के इस पार थी गौंटिया 

 दोनों ही बस्तियाँ एक- दूसरे से सशंकित

 सांप्रदायिक दंगों के समय

 रात भर  पत्थर बरसातीं  बस्तियाँ 

 शिक्षा के उजाले से दूर

 घूमते रहते थे नाक बहाते मैले- कुचैले

 मिट्टी में लोटकर और मैले होते बच्चे

  सड़क पर उन्हें अकेला खेलने  छोड़कर-

 चूल्हा- चौका निपटातीं निडर  माताएँ

 सुबह गाय- भैंसों को चराने ले जाते

 गद्दी समुदाय के चरवाहे

 शाम को घंटी बजाते चौपायों के

लौटने से पहले नाँद  सजातीं  बस्तियाँ

 गद्दियों  के कुछ ही  घर-

 मगर आपसी रंजिश में डूबे  हाथ धोकर

 बारी- बारी से पति और कई पुत्र गँवाकर

 मूरत बन जाती स्त्रियाँ

बहुत सुंदर, लेकिन खूनी रंजिश में उजड़कर,

दण्ड भोगतीं, लाँघती नहीं थीं जो देहरी,

अब दर -दर की ठोकरें खातीं  वे  स्त्रियाँ

 पत्नी और बेटी के सामने ही

 पुत्र को माँ- बहन की गाली देकर शर्मसार करते पिता

 प्रसव के समय दाई के हवाले होकर

 चीखते- चिल्लाते हुए  बच्चा जनती प्रसूताएँ 

 विदाई से घंटों पहले करुण स्वर में

 गा- गाकर रोती नव  विवाहिताएँ

 करुण विलाप सुनकर

 विदाई की बेला में ‘खोईंचा’  भरने के लिए

 छोटी- छोटी डलियों में

चावल व गेहूँ  लेकर आती महिलाएँ

 शराब के नशे में धुत पति से आधी रात को पिटतीं

और  फिर टीबी और शराब से 

 उजड़े सुहाग के कारण

 देवर को बिठाई जाती महिलाएँ

 इन्हीं सबके बीच एक घर

 घर की दीवार से लगी एक कब्र

 रात के सन्नाटे को और भयावह बनाती कब्र

 नीम का एक घना छायादार पेड़,

जिस पर आधी रात को

उल्लू की मौसी ‘खसूटरिया’की

अपशकुनी बोली सुन

दहशत में गुजरती रात 

 सावन में पींग  बढ़ाती हुई

 मोहल्ले की लड़कियाँ

 वहीं पर  एक लजाती- शर्माती

अपने में सकुचाती एक युवती

 कोई बंदिश नहीं; लेकिन फिर भी सामने आने से

मिलने-मिलाने से, शब्दों को जुबाँ पर लाने से

  घबराती वह युवती

लेकिन भीतर ही भीतर आंदोलित होती

महिलाओं की दशा से आक्रोशित होकर

 संकल्पों को सींचती,

आसमान छूने को कसमसाती

हमेशा अव्वल आती,

पिता का मान  बढ़ाती

और एक  दिन उस घुटन भरे माहौल से निजात पाती

अपना ही नहीं औरों का भी 

सहारा बन जाती  वह युवती

आज भी किसी गंदे -पिछड़े

 मोहल्ले में दिख जाती  है ऐसी कोई,

तो फिर याद आ जाती  है वही युवती 

गुदड़ी में छिपे लाल-सी ।

 

Monday, October 19, 2026

1535

 

डॉ. वंदना शर्मा

 


करूँ कैसे आभार मेरे महादेव,

आपने हर पल सँभाला मुझे।

हर मुसीबत से निकाला मुझे,

पथ मेरे कँटीले थे पथरीले थे,

कभी गिरने न दिया मुझे।

 

मैं नादान थी समझ न पाई,

हर संघर्ष को दुःख ही समझा।

आग से तपाकर निखारा मुझे,

मैंने हमेशा गलत ही माँगा,

आपने वो दिया जो मेरे लिए सही था।

 

सभी के मुखौटे उतर गए जब,

झूठे रिश्तों के भँवर से निकाला मुझे।

प्रभु दुनिया से तो अकेला कर दिया,

आप साथ रहना, न अकेला करना मुझे।

 

इतनी कृपा और करना प्रभु,

किसी के दुःख का कारण न बनूँ।

दुःख देना तो सहने की शक्ति भी देना,

राह दिखाना कभी टूटने न देना।

 

तेरा नाम ही अब सहारा है मेरा,

तू ही भरोसा तू पालनहार है मेरा।

तेरा नाम ही बस रटती जाऊँ,

सुबह-शाम तुझे ही गाऊँ।

 

ले ले शरण अब अपनी कृपालु,

है नमन बारम्बार तुझे हे दयालु।

 

Thursday, October 15, 2026

1534

 

बूढ़ी हो गई अम्मा 

                शशि पाधा 



कुछ धीरे- धीरे चलती है 

कदम-कदम पर रुकती है 

पाँव कभी थर्राए तो 

गिर न जाऊँ, सँभलती है 

 क्या बूढ़ी हो गई अम्मा!


 बालों में चाँदी की लड़ियाँ 

अँखियाँ कुछ धुंधलाई- सी 

 गीतों की कड़ियाँ भूल गई 

 बैठी चुप झुंझलाई सी 

 

ताने बाने बुनती है

 पहेली और उलझती है

 क्या बूढ़ी हो  गई अम्मा!

            

 पास-दूर के चश्मे दोनों 

अभी तो रखे यहीं- कहीं 

 कोना-कोना छान के मारा 

लौट आई फिर वहीं- कहीं  

 

सर पर दोनों रखती है 

इत-उत ढूँढा करती है 

 क्या बूढ़ी हो गई अम्मा!

 

उसने ही चलना सिखलाया 

गाकर लोरी रात सुलाया 

मीठी चूरी बुरकी- बुरकी 

गोदी में ले रोज़ खिलाया 

 

भूख उसे कम लगती है 

थोड़ा-थोड़ा चखती है 

क्या बूढ़ी हो गई अम्मा ! 


पीहर की बातें वह हँसकर  

कितनी बार सुनाती है 

कहाँ धरा चाबी का गुच्छा 

अक्सर भूल ही जाती है 


मन की मन में रखती है 

तभी तो चुप- चुप रहती है 

क्या बूढ़ी हो गई अम्मा! 

 

सखी-सहेली तुलसी से नित 

संझा को बतियाती है 

भूली नहीं वह नियम पुराना 

दीपक रोज़ जलाती है 

 

 पूजा, अर्चन करती है 

 नेम, व्रत सब रखती है 

ना! बूढ़ी कैसे  अम्मा !

 

 यादों की बँधी  पिटारी में 

कितने वर्षों की निधियाँ

 पर कभी कहीं खो जाती है 

 उसकी अपनी ही दुनिया 

   

  सुधियों में जा बसती है   

 अपने कल से डरती है

थोड़ी बूढ़ी हो गई अम्मा।

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