पथ के साथी

Sunday, July 12, 2026

1504

1-नवगीत

मौसम   का  अभिमान /  विज्ञान   व्रत

 


पता   नहीं  अब  

क्या   कर  डाले

मौसम   का  अभिमान  

 

दहशत   में    हैं   जंगल    सारे

सहमे - सहमे     पेड़      बिचारे

                    मन  ही  मन  में

                    घुटते   हैं    बस

                    अब   इनके   अरमान 

 

जड़ी - बूटियाँ   काँप   रही   हैं

इसके   रुख़  को  भाँप  रही  हैं

                    आज  दाँव   पर 

                    लगी    हुई     है 

                    इन   सबकी   पहचान

 

पशु - पक्षी भी  बहुत  विकल हैं

सभी युक्तियाँ  आज  विफल  हैं

                    सन्नाटे में

                    और  डराएँ

                    अनचाहे  अनुमान 

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2- मन बेचारा/ डॉ.सुरंगमा यादव

 


आगत और विगत में उलझा

 वर्तमान से उदासीन मन

 कभी भविष्य के सपने गढ़ता

 कभी अतीत में ढूँढे सुख- क्षण

 जिसने पाया सहज- सहज सब

 उसको भी विश्राम नहीं है

भौतिकता की नेति-नेति में

 जाने क्या पाने की धुन में

 भटका फिरता मन बेचारा

 अधिक,अधिकतर और अधिकतम

गति का कोई ध्यान नहीं है

 हर पथ पर है गति की सीमा

 गति की लय खोना है-

  जीवन की लय  खोना

 संघर्षों के फेज़ में है जो

 सवालिया नजरों में है वो

 राह नहीं जब मिल पाती है

 खीज बहुत खुद पर आती है

  मन कितना विचलित होता है

 विश्वास नहीं खुद पर होता है

  समझेंगे दुनिया वाले

उँगली महज उठाने वाले।

-0-

2-क्षणिकाएँ/ डॉ.सुरंगमा यादव

1

जिसने होठों को सिया है

 दम घुटने का अनुभव

 उसने किया है।

2

 उजियारों के बीच खड़ा

 अँधियारों में डूबा मन

 अपनी ही छत और दीवारों से

पाता मन अपनापन

3

 चाहा बहुत भुलाना  लेकिन

 अतीत खड़ा किरदार या बन

 चोट फिर- फिर चोट पड़े तो

 कब तक बिखरेगा मन।

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3-कविता जीवन का मर्मडॉ.वंदना शर्मा

 

लिखा है क्या हाथों की लकीरों में  

छुपा है क्या इन तकदीरों में  

मिलता है वही, होता है जो नसीबों में  

सिर्फ मेहनत करने से नहीं मिलती सफलता  

खेल विधाता का कोई नहीं समझ सकता  

 

होना था जिस दिन राम का राज तिलक  

हुआ वनवास उसी दिन, लगा कैकेयी पर कलंक  

होनी थी हो गई टाल सका ना कोई  

भविष्य की गर्त में राज छिपे हैं कई  

 

चक्र है ये कर्मिक फल का  

हिसाब है ये कई जन्म का  

नहीं ज्ञात कौ-न सा कर्म  

बदल देगा अगले जन्म का मर्म  

 

रहता है इंसान इसी भ्रम  

'मैं' करता ना समझता कर्म-  

कर्ता करे ना कर सके  

बाल ना बाँका होय

 

जिसकी किस्मत महाकाल लिखे 

उसकी बिगाड़ सके ना कोई  

कब किससे कैसे मिलना है  

कर्मों का फल जरूर मिलना है  

 

दीन सेवा ही परम धर्म है  

अक्षर नाद ही परम ब्रह्म है  

तप वाणी का जिसने किया  

मोह छोड़ पर उपकार किया  

सुधारा उसने अपना कर्म है  

यही जीवन का मर्म है।

-0-डॉ. वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली 

vandna.reporter@gmail.com

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4-अनुरोध/ रश्मि लहर

 


व्यर्थ-सा लगने लगा है

     वर्जनाओं का सघन पथ

        सारथी जीवन के रथ के तुम! 

            तनिक अब ध्यान रखना।

 

हाथ में वल्गा तुम्हारे, दीखते घबराए हो तुम।

साथ में सहचर लिये पर, लग रहे अकुलाए क्यों तुम?

 

ज्ञात तुमको हो ग हैं

     दुःसह सच संबंध के पर;

        हो सके तो समर्पण की 

            वेदना का मान रखना।

 

सुर तुम्हीं ने तो दिया था, स्वप्न की उद्विग्न लय को।

फिर नया जीवन दिया था, शुष्क- सी निस्तेज वय को।

 

तोड़ सकते तंतु हो विश्वास के

     अनुबंध के पर;

         प्रणय के मृतवत अधर पर

            चेतना का गान रखना।

 

सारथी जीवन के रथ के तुम, तनिक अब ध्यान रखना।।

सारथी जीवन के रथ के तुम, तनिक अब ध्यान रखना।।

 

-0- इक्षुपुरी कॉलोनी, लखनऊ-226002

मोबाइल नंबर -9794473806

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Tuesday, May 26, 2026

1503-सुरभि डागर की तीन कविताएँ

 

सुरभि डागर 




1-जीवन की लहरें

 

जीवन सागर-सा गहरा है,

उसमें उठती लहरें हैं।

कभी खुशी की धूप सुनहरी,

कभी दुःखों की पहरे हैं।

कभी किनारे फूल खिलें,

कभी रास्ते काँटों वाले,

कभी हँसी के गीत मिलें,

कभी मौन के बादल काले।

लहरें रुकती कब जीवन में,

चलना ही उनका गहना है।

गिरकर फिर से उठ जाना,

यही मानव का सपना है।

आशा की छोटी-सी नौका,

हिम्मत की पतवार लिये,

मन आगे बढ़ता रहता,

नए उजाले द्वार लिये

जीवन की इन लहरों में,

जो मुस्काना सीख गया,

वह हर तूफाँ से लड़कर,

अपने भीतर जीत गया।

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2-चाँद

 


रात की शांत झील में

धीरे-धीरे उतरता है चाँद,

जैसे किसी माँ की आँखों में

ठहर जाए कोई मीठा ख़्वाब।

उसकी चाँदी-सी कोमल किरणें

छू लेती हैं सूनी राहें,

और थके हुए मन के भीतर

भर देती हैं अनकही चाहें।

कभी वह प्रेमी का संदेश है,

कभी विरह की लम्बी रात,

कभी बच्चों की भोली जिज्ञासा,

कभी कवि के मन की बात।

बादलों की ओट में छिपकर

वह जैसे खेलता हो लुकाछिपी,

धरती की हर धड़कन सुनता,

हर खिड़की पर रखता नज़रें धीमी।

चाँद केवल आकाश नहीं,

मन का उजला एक कोना है,

जहाँ अँधेरों से लड़ने को

अब भी थोड़ा सपना होना है।

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3.सूरज

 

सूरज केवल आग नहीं,

जीवन का पहला स्वर है,

जो हर सुबह

धरती की नींद सहलाकर

उम्मीदों का द्वार खोलता है।

वह खेतों में

सोने-सी फसल बनकर उतरता है,

नदियों में चमकता है,

और बच्चों की हँसी में

एक गर्म उजाला भर देता है।

कभी तपता है कठोर होकर,

मानो संघर्ष सिखा रहा हो,

तो कभी साँझ की लालिमा में

थके हुए दिन को

धीरे से विदा कहता है।

सूरज ने ही सिखाया है—

हर डूबना अंत नहीं होता,

हर अँधेरे के बाद

एक नई सुबह जन्म लेती है।

वह आकाश का यात्री है,

जो बिना रुके, बिना थके

सदियों से चल रहा है,

निरन्तर इस संसार में

 

Saturday, May 2, 2026

1502

 

 1-खुशी / सुरभि डागर

  


खुशी कोई बड़ी चीज़ नहीं,

ये तो छोटी-छोटी बातों में मिलती है,

कभी किसी की मुस्कान में,

कभी बारिश की बूँदों में खिलती है।

ये हवा के संग बहती है,

बिन आवाज़ के कहती है,

रुको ज़रा, महसूस करो,

ज़िंदगी यहीं कहीं रहती है।

न सोने में, न चाँदी में,

न ऊँचे महलों की शान में,

खुशी तो छुपी होती है-

माँ के हाथों के पकवान में।

जब दिल हल्का हो जाता है,

और मन गुनगुनाता है,

तब समझो, चुपके से

खुशी तुम्हें छूकर जाती है।

खुशी होती है बच्चों की मुस्कान में 

तो ढूँढो मत इसे दुनिया में,

ये तो तुम्हारे अंदर रहती है,

बस नज़र बदलो थोड़ी सी,

हर पल खुशी ही कहती है।

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2-पगडंडी/ सुरभि डागर

 

पगडंडी कोई साधारण रास्ता नहीं होती,

यह उन कदमों की कहानी होती है

जो बार-बार चलकर उसे जन्म देते हैं।

यह चौड़ी सड़कों की तरह घमंडी नहीं होती,

न ही उस पर शोर-शराबा होता है।

यह चुपचाप खेतों के बीच से निकलती है,

पेड़ों की छाँव में खुद को छिपाती है,

और हर मोड़ पर कोई नई बात कह जाती है।

पगडंडी पर चलते हुए

मन भी हल्का हो जाता है,

जैसे हर कदम के साथ

चिंताएँ पीछे छूटती जाती हैं।

यह हमें सिखाती है

कि मंज़िल तक पहुँचने के लिए

हमेशा बड़े रास्तों की ज़रूरत नहीं होती,

कभी-कभी छोटे, सरल रास्ते भी

सबसे सुंदर सफर बन जाते हैं।

पगडंडी गाँव की धड़कन होती है,

जहाँ हर कदम में अपनापन है,

और हर मोड़ पर एक नई याद छिपी है।

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