पथ के साथी

Wednesday, February 11, 2026

1493

 

डॉसुरंगमा यादव की कविताएँ

 1 यूँ हीं न मिले कुछ 

 


फलक पर सितारे न यूँ ही सजे हैं

सिफ़र से शिखर तक जमाने लगे हैं

खुशियों का मौसम न यूँ ही मिला है

 बहुत पीर पर्वत उठाने पड़े हैं

 मखमल है पाँव के नीचे न यूँ ही

 धूप में पाँव अरसा तपाने पड़े हैं

 वक्त लिख रहा है जिनकी इबारत

 उन्हें वक्त से ज़ख़्म खाने पड़े हैं

किसी से मिली है    सौगात कोई

 उन्हें रास्ते खुद बनाने पड़े हैं।

 -0-

2-कर दूँ अर्पण

 

तेरे सपनों को निज पलकें दे दूँ

तेरी अभिलाषाओं को निज मन दे दूँ तेरे आँसू को निज दामन दे दूँ

तेरे पथ के काँटों को निज पाँव दे दूँ

कुछ चाहूँ, कुछ माँगूँ, तुझको अपना दे दूँ कण- कण

तेरी उड़ानों को मैं अपना साहस दे दूँ

तेरे सिर की धूप को अपना साया दे दूँ

तेरी ख़ामोशी को अपने गीत मैं दे दूँ

तेरी उलझन को मैं अपना मस्तक दे दूँ

खुद को रिक्त बनाकर, सब मनचाहा तुझको कर दूँ अर्पण।

 

 

Saturday, February 7, 2026

1492

पिता, माँ और रोने की भाषा/ डॉ. पूनम चौधरी

 


घर में

दो दर्शन थे

एक पिता

दूसरी 

माँ।

 

पिता —

व्यवस्था थे।

अनुशासन,

संयम,

और वह चुप्पी

जो अपेक्षित थी पुरुषों से,

 

पिता कहते थे—

पुरुष अगर रोए

तो समय को असहज कर देता है,

और समय

कभी भी असहज पुरुषों को माफ़ नहीं करता।

 उन्होंने सिखाया,

 सुख सार्वजनिक है दुख निजी 

 वे तार्किक थे इसलिए 

जानते थे

दुनिया सवाल नहीं पूछती,

हिसाब माँगती है।

और हिसाब देते वक़्त

आँसू

गिनती बिगाड़ देते हैं

उनकी बातों में

अनुभव था।

तर्क था

वे जानते थे

कि आँसू

तर्क को कमज़ोर कर देते हैं

और कमज़ोर तर्क

भीड़ में

कुचल दिए जाते हैं।

 

 

माँ बताती थी—

रोना भाषा का सबसे पुराना रूप है।

जब शब्द थक जाते हैं

तो आँसू

बोलने लगते हैं।

मन अगर भर जाए

तो उसे खाली करना भी

ईश्वर की तरह ज़रूरी है।

 

माँ के पास

दुख को समझने का

कोई तर्क नहीं था,

बस दो बाँहें थीं

जो फैलते ही

दुनिया को छोटा कर देती थीं।

 दोनों दर्शन घुले थे मेरे रक्त में

 मैं अवसर अनुकूल आजमाता रहा 

पिता के सामने

मेरे होंठ

हँसी का अभ्यास करते रहे—

एक सीधी रेखा,

जिसके नीचे

छुपा रहता

प्रभंजन भावनाओं का,

 

और माँ के कंधे पर

 मेरा हृदय 

एक टूटी हुई दीवार की तरह

ढह जाता

आँसू

क्रम से नहीं गिरते

वे गिरते रहते

जैसे कोई बाँध

तर्क से थककर

भावना के आगे

समर्पण कर दे।

 मां जानती थी 

 आंसुओं का मूल्य

 

पिता दूर से करते रहे आकलन

हँसी को

समझते रहे,

ताकत

उन्हें पता नहीं चला

कि यह हँसी

रोने का

सबसे सभ्य अनुवाद थी।

 

अब समझ आता है—

पिता ने मुझे

दुनिया से लड़ना सिखाया,

माँ ने

खुद से।

 

और इसलिए

मैं आज भी

भीड़ में हँसता हूँ—

ताकि पिता

मेरे भीतर

अडिग रहें।

 

और

एकांत में रोता हूँ—

ताकि माँ

मुझसे

कभी विदा न हों।

 

-0-


Saturday, January 31, 2026

1491-गीत गाते अक्षर का अपनापन

 परमजीत कौर 'रीत'


कुछ समय पहले 'प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग, भारत' द्वारा हमारे विद्यालय की ओपन लायब्रेरी के लिए बालसाहित्य की लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें भिजवाई गई। पुस्तकें इतनी आकर्षक थी कि विद्यार्थियों में इनको पढ़ने की होड़- सी लग गई। कविताओं की पुस्तकों में 'गीत गाते अक्षर '
की कविताओं को उन्होंने काफ़ी पसंद किया । कुछ  कविताओं जैसे  - हवा चली,आगे बढ़ते जाना, गाँव, जंगल, बरखा रानी, गर्मी आई, जागो, बापू जी आदि कविताओं का  उन्होंने समूह वाचन भी  किया।  मैंने भी जब इस पुस्तक को पढ़ा तो बच्चों की भावनाओं को महसूस किया। इस पुस्तक में 66 छोटी -छोटी बालकविताएँ हैं, जो बच्चों के  मनोरंजन  के साथ साथ ज्ञानवर्धन भी करती हैं। 'गीत गाते अक्षर'  पुस्तक की कुछ ऐसी ही कविताओं की बानगी देखें-

हवा चली रे! हवा चली!

धूल मिट्टी को संग उड़ाती चली.....पृ.सं-15

 मन लगाकर हमेशा करो तुम पढ़ाई।

कभी भी न करना किसी से लड़ाई।...पृ.सं-31

 

सुनो पापा! ओ मेरे पापा!

हम भी इस बार  पेड़ लगाएँगे! ...पृ.सं- 49

 जागो सूरज चाचू आए,

भागो नया उजाला लाए,......पृ.सं- 69

 काश होते जो, पंख मेरे भी दो।

मैं भी पंछियों संग, दूर देश उड़ जाता।......पृ.सं.- 82

 इस प्रकार 'गीत गाते अक्षर' पुस्तक में लेखक मनोजकुमार शिव  ने बाल मनोविज्ञान के अनुरूप  छोटी-छोटी कविताओं को रोचक एवं लयबद्ध  रूप में प्रस्तुत किया है जिससे बच्चे सहज ही इन कविताओं से जुड़ जाते हैं। इस सफलता के लिए  लेखक बधाई के पात्र  हैं।

'गीत गाते अक्षर(बाल काव्य-संग्रह ) : मनोज कुमार ‘शिव’   मूल्य 180 रुपये,  पृष्ठ: 88, संस्करणः 2024,  प्रकाशकः प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग भारत, 3/186 राजेंद्र नगर, सेक्टर 2, साहिबाबाद, गाजियाबाद  पुस्तक ravasiprempublishing@gmail.com पर संपर्क करके प्राप्त की जा सकती है।

(परमजीत कौर 'रीत', श्रीगंगानगर राजस्थान)