पथ के साथी

Thursday, October 15, 2026

1534

 

बूढ़ी हो गई अम्मा 

                शशि पाधा 



कुछ धीरे- धीरे चलती है 

कदम-कदम पर रुकती है 

पाँव कभी थर्राए तो 

गिर न जाऊँ, सँभलती है 

 क्या बूढ़ी हो गई अम्मा!


 बालों में चाँदी की लड़ियाँ 

अँखियाँ कुछ धुंधलाई- सी 

 गीतों की कड़ियाँ भूल गई 

 बैठी चुप झुंझलाई सी 

 

ताने बाने बुनती है

 पहेली और उलझती है

 क्या बूढ़ी हो  गई अम्मा!

            

 पास-दूर के चश्मे दोनों 

अभी तो रखे यहीं- कहीं 

 कोना-कोना छान के मारा 

लौट आई फिर वहीं- कहीं  

 

सर पर दोनों रखती है 

इत-उत ढूँढा करती है 

 क्या बूढ़ी हो गई अम्मा!

 

उसने ही चलना सिखलाया 

गाकर लोरी रात सुलाया 

मीठी चूरी बुरकी- बुरकी 

गोदी में ले रोज़ खिलाया 

 

भूख उसे कम लगती है 

थोड़ा-थोड़ा चखती है 

क्या बूढ़ी हो गई अम्मा ! 


पीहर की बातें वह हँसकर  

कितनी बार सुनाती है 

कहाँ धरा चाबी का गुच्छा 

अक्सर भूल ही जाती है 


मन की मन में रखती है 

तभी तो चुप- चुप रहती है 

क्या बूढ़ी हो गई अम्मा! 

 

सखी-सहेली तुलसी से नित 

संझा को बतियाती है 

भूली नहीं वह नियम पुराना 

दीपक रोज़ जलाती है 

 

 पूजा, अर्चन करती है 

 नेम, व्रत सब रखती है 

ना! बूढ़ी कैसे  अम्मा !

 

 यादों की बँधी  पिटारी में 

कितने वर्षों की निधियाँ

 पर कभी कहीं खो जाती है 

 उसकी अपनी ही दुनिया 

   

  सुधियों में जा बसती है   

 अपने कल से डरती है

थोड़ी बूढ़ी हो गई अम्मा।

-0-

 ईमेल-shashipadha@gmail.com

    

Sunday, October 11, 2026

1533

 

आज की स्त्री/डॉ. कनक लता 

 

आज की स्त्री

सब लौटाती है

नाप-तौलकर,

बल्कि बढ़ाकर।

समय के साथ,

कभी थोड़ा धीरे,

कभी शीघ्र,

मगर लौटाती है

सब कुछ।

पर स्त्री जात है न,

प्रवृत्ति में है -

सँजोना, सँवारना, आकार देना।

सो आपका दिया सब सँजो लेती है,

इस्तेमाल भी करती है,

कभी प्रेम से,

तो कभी मर्यादा के लिए।

पर उतना ही या उससे भी अधिक निर्मित करती है,

सृजित करती है,

सजाती है, सँवारती है, आकार देती है,

उस पर अपने प्रेम, घृणा, नफ़रत, प्रतिस्पर्धा की मुहर लगाती है,

और लौटा देती है

आपको,

आपके समाज को।

आज की स्त्री

सब लौटाती है…

Wednesday, October 7, 2026

1532

 

1- हे पुरुष!/  डॉ .अंजुल चौहान 

 


 पुरुषों ने पढ़े वेद और उपनिषद्

अहम् ब्रह्मास्मि जैसे मंत्रों से 

 सुलझाया द्वैत- अद्वैत का अज्ञान

पुराण और धर्म- ग्रंथ पढ़ 

किए यज्ञ, हवनादि अनुष्ठान 

शस्त्र- विद्या में पारंगत हो

गाण्डीव ले, किया शत्रु- मर्दन

क्रोधावेश में ताण्डव नर्तन

खगोल और भूगोल से 

नाप ली ग्रहों की गति 

धरती का आकार 

सागर का विस्तार 

रामायण में हुई वाल्मीकि की साधना फलित 

भावविभोर तुलसी ने गाया रामचरित

गीता से पाया ज्ञान- कर्मयोग 

त्रिविध तापों से वियोग 

हे महा मानव !

तुम्हारी लेखनी ने किया अद्भुत सृजन 

कभी कालिदास का शाकुन्तल 

कभी भवभूति का करुण क्रन्दन

कभी-कबीर, कभी सूर की भावांजलि 

दिनकर का ओज, कभी आँसू ,कभी गीतांजलि 

हे पुरुष !

तुम नहीं पढ़ पाए 

तो 

सिर्फ  और सिर्फ

 स्त्री- मन

और 

उसमें जन्मी असीम पीड़ा

-0-

2-खंडित मूर्तियाँ/ डॉ .अंजुल चौहान 

 

खंडित मूर्तियाँ विसर्जित कर दी जाती हैं 

साँवले-  से जल में 

चिर शांति के लिए

लेकिन

कुछ अभिशप्त मूर्तियाँ दबकर रह जाती है 

मन के खंडहर में 

जीवन से दूर

और मृत्यु से वंचित 

भटकती हैं अनन्त काल तक 

मुक्ति की अंतहीन प्रतीक्षा में ।

-0- chauhananjul22@gmail.com

-0-

आत्मग्लानि / डॉ . सोनिया रिक्खी

 


 एक दिन कॉलेज के बाहर, 

इक चाय की टपरी में ,

अपने  सहयोगियों के साथ बैठे 

हम पीने को चा,

जिसमें जश्न की थी चाह ।


तभी आया इक 

10-12 वर्षीय  बालक ।

आँखो में असहजता ,

हाथों में उठाए ट्रे में 

छह गिलास चा  ।



तभी फिसली ट्रे 

और फिसली चा 

सीधी पहुँची टेबल की 

प्रमुख सीट पर बैठी

 मैडम के पैरों पर ।



परंतु उस से भी अधिक 

तेजी से इक हाथ 

हवा में लहराया,

इक जोरदार थप्पड़ 

बालक के कोमल

गाल से जा टकराया ।


सन्न थे हमारे शरीर 

और आँसुओं से 

डबडबा रही थी 

मेरी आँखें और 

उस मासूम की आँखें ।



दूसरी टेबल पर,

आस - पास बैठे 

विद्यार्थियों ने  उस मासूम 

को गले लगाया ,

चुप करवाया ।


परन्तु हमारे 

तन को

जैसे साँप 

सूँघ गया ।

थोड़ी देर बाद ही होश आया ।


मैडम आप पर 

नहीं गिरी चा।

बच्चे के कोमल मन व 

आत्मसम्मान पर गिरी थी आपकी चाह।

 

दुकानदार भौचक था

उसे ही उपदेश सुनाया

छोटे बच्चे को क्यों काम पर लगाया।



पर पढी -लिखी मैडम को 

न कोई पाठ पढ़ाया

इस आत्मग्लानि ने मुझे 

आज तक न मन का चैन दिलाया ।

कब तक हम शक्तिशाली के

समक्ष चुप रहेंगे।

अपनी ही आत्मा को कचोटते रहेंगे।

इतने वर्षों से

इस आत्मग्लानि से 

निकलने का रास्ता खोजते खोजते,

समय पर बोलने का महत्त्व 

समझ में आया।

Thursday, October 1, 2026

1531-- मैं लौट आऊँगा

 

- मैं लौट आऊँगा

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

 


मैं चला आऊँगा

बिना साँकल बजाए

आँगन के फूलों को सहलाकर

खिड़की से होकर

बनकर हवा का झोंका,

बैठ जाऊँगा

अपनी व्हील चेयर पर

चाय के कप से उठती

भाप को पीकर

तुम्हें देखकर मुस्कुराऊँगा।

 

नश्वर माटी के घट से निकल

जल में पनडुब्बे की तरह

डुबकी लगाकर

मिट्टी में मिल जाऊँगा,

एक दिन चुपचाप

किसी  सिन्दूरी भोर में

फिर उग आऊँगा

कोई फूल बनकर।

 

उड़ूँगा आँगन में

फुलचुही बनकर

जब तुम उदास होगे,

मीठे स्वर में

तुम्हें ही पुकारूँगा-

“मैं कहीं नहीं गया

मैं नित्य हूँ, मैं शाश्वत हूँ

मैं ड्राइंगरूम की आराम कुर्सी पर

उनींदा-सा धूप सेंक रहा हूँ।”

 

उदास न होना

मैं कहीं नहीं गया,

बस कुछ देर को

गायब हो गया था

भूले गीत की तरह,

तुम प्रतीक्षा करना

मैं लौट आऊँगा।

(30 सितम्बर 2026)

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Tuesday, September 29, 2026

1530

 

1-कैसे बुद्ध हो पाऊँगी

डॉ. अंजुल चौहान 

 

रात्रि के उस प्रहर में

तुम्हारा इस तरह से

निरपराध मुझे 

छोड़कर जाना

मेरे अनन्य प्रेम और समर्पण को

विरक्त हो, त्याग कर जाना

कसकता है आज भी .......

क्या उस क्षण

तुम्हारे नेत्र सजल न हुए होंगे

तुम्हारे  संचरणशील चरण न थमे  होंगे

सप्तपदी के वचन कैसे विस्मृत हो  गए

बोलो न, मेरे बोधिसत्व !

तुम कैसे इतने विरक्त  हो गए?

यदि सचमुच, यह जगत्

क्षणिक  है  मिथ्या है

तो यह ज्ञान भी मै तुमसे ही पाना चाहती हूँ

हां .....मैं भी तुम्हारी भाँति 

तथागत होना चाहती हूँ

पर बताओ मेरे अनश्वर प्रेम !

मैं तुम्हें कैसे त्याग पाऊँगी...?

तुम्हें तज कर

मैं कैसे बुद्ध हो पाऊँगी.......

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2-घर वापस आओगे

डॉ. अंजुल चौहान 

 

तुम्हें समर्पित श्वेत पुष्प कुछ

रोली ,अक्षत, चंदन

श्वास -श्वास पर तुम्हें पुकारूँ

करूँ अनवरत वंदन

अपना सत्य तुम्हीं जानो

पर मेरा सत्य यही है

तुमको पाकर, मैं खो जाऊँ

मेरा अमरत्व  यही है

कर्म स्वधर्म सब तुम्हें समर्पित

मैं तो बस ये जानूँ

मेरी  गाथा का आदि अंत

तुम ही हो इतना मानूँ

अपने देवालय को तजकर 

कहीं और क्यों जाऊँ

जपूँ मंत्र मैं तुम्हें.....

तुम्हीं से, तुमको ही पा जाऊँ

मुझ बिन अर्थहीन जीवन को

कैसे जी पाओगे

कंचन की नगरी में कब तक

खुद को भरमाओगे 

आते हैं भगवान ....

अतः, तुम स्वयं लौट आओगे 

सुनो..... ....द्वारिकाधीश !

राम बन घर वापस आओगे ।।

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