पथ के साथी

Wednesday, October 21, 2026

1536

 स्मृतियों में बसी  वह एक  बस्ती

डॉ. सुरंगमा यादव

 


स्मृतियों में बसी  वह एक  बस्ती

 शहर के बिल्कुल अंतिम छोर पर बसी  वह  बस्ती

 एक छोटा- सा मोहल्ला, नाम  गौंटिया 

 सड़क के उस पार मुस्लिम बस्ती,

सड़क के इस पार थी गौंटिया 

 दोनों ही बस्तियाँ एक- दूसरे से सशंकित

 सांप्रदायिक दंगों के समय

 रात भर  पत्थर बरसातीं  बस्तियाँ 

 शिक्षा के उजाले से दूर

 घूमते रहते थे नाक बहाते मैले- कुचैले

 मिट्टी में लोटकर और मैले होते बच्चे

  सड़क पर उन्हें अकेला खेलने  छोड़कर-

 चूल्हा- चौका निपटातीं निडर  माताएँ

 सुबह गाय- भैंसों को चराने ले जाते

 गद्दी समुदाय के चरवाहे

 शाम को घंटी बजाते चौपायों के

लौटने से पहले नाँद  सजातीं  बस्तियाँ

 गद्दियों  के कुछ ही  घर-

 मगर आपसी रंजिश में डूबे  हाथ धोकर

 बारी- बारी से पति और कई पुत्र गँवाकर

 मूरत बन जाती स्त्रियाँ

बहुत सुंदर, लेकिन खूनी रंजिश में उजड़कर,

दण्ड भोगतीं, लाँघती नहीं थीं जो देहरी,

अब दर -दर की ठोकरें खातीं  वे  स्त्रियाँ

 पत्नी और बेटी के सामने ही

 पुत्र को माँ- बहन की गाली देकर शर्मसार करते पिता

 प्रसव के समय दाई के हवाले होकर

 चीखते- चिल्लाते हुए  बच्चा जनती प्रसूताएँ 

 विदाई से घंटों पहले करुण स्वर में

 गा- गाकर रोती नव  विवाहिताएँ

 करुण विलाप सुनकर

 विदाई की बेला में ‘खोईंचा’  भरने के लिए

 छोटी- छोटी डलियों में

चावल व गेहूँ  लेकर आती महिलाएँ

 शराब के नशे में धुत पति से आधी रात को पिटतीं

और  फिर टीबी और शराब से 

 उजड़े सुहाग के कारण

 देवर को बिठाई जाती महिलाएँ

 इन्हीं सबके बीच एक घर

 घर की दीवार से लगी एक कब्र

 रात के सन्नाटे को और भयावह बनाती कब्र

 नीम का एक घना छायादार पेड़,

जिस पर आधी रात को

उल्लू की मौसी ‘खसूटरिया’की

अपशकुनी बोली सुन

दहशत में गुजरती रात 

 सावन में पींग  बढ़ाती हुई

 मोहल्ले की लड़कियाँ

 वहीं पर  एक लजाती- शर्माती

अपने में सकुचाती एक युवती

 कोई बंदिश नहीं; लेकिन फिर भी सामने आने से

मिलने-मिलाने से, शब्दों को जुबाँ पर लाने से

  घबराती वह युवती

लेकिन भीतर ही भीतर आंदोलित होती

महिलाओं की दशा से आक्रोशित होकर

 संकल्पों को सींचती,

आसमान छूने को कसमसाती

हमेशा अव्वल आती,

पिता का मान  बढ़ाती

और एक  दिन उस घुटन भरे माहौल से निजात पाती

अपना ही नहीं औरों का भी 

सहारा बन जाती  वह युवती

आज भी किसी गंदे -पिछड़े

 मोहल्ले में दिख जाती  है ऐसी कोई,

तो फिर याद आ जाती  है वही युवती 

गुदड़ी में छिपे लाल-सी ।

 

Monday, October 19, 2026

1535

 

डॉ. वंदना शर्मा

 


करूँ कैसे आभार मेरे महादेव,

आपने हर पल सँभाला मुझे।

हर मुसीबत से निकाला मुझे,

पथ मेरे कँटीले थे पथरीले थे,

कभी गिरने न दिया मुझे।

 

मैं नादान थी समझ न पाई,

हर संघर्ष को दुःख ही समझा।

आग से तपाकर निखारा मुझे,

मैंने हमेशा गलत ही माँगा,

आपने वो दिया जो मेरे लिए सही था।

 

सभी के मुखौटे उतर गए जब,

झूठे रिश्तों के भँवर से निकाला मुझे।

प्रभु दुनिया से तो अकेला कर दिया,

आप साथ रहना, न अकेला करना मुझे।

 

इतनी कृपा और करना प्रभु,

किसी के दुःख का कारण न बनूँ।

दुःख देना तो सहने की शक्ति भी देना,

राह दिखाना कभी टूटने न देना।

 

तेरा नाम ही अब सहारा है मेरा,

तू ही भरोसा तू पालनहार है मेरा।

तेरा नाम ही बस रटती जाऊँ,

सुबह-शाम तुझे ही गाऊँ।

 

ले ले शरण अब अपनी कृपालु,

है नमन बारम्बार तुझे हे दयालु।

 

Thursday, October 15, 2026

1534

 

बूढ़ी हो गई अम्मा 

                शशि पाधा 



कुछ धीरे- धीरे चलती है 

कदम-कदम पर रुकती है 

पाँव कभी थर्राए तो 

गिर न जाऊँ, सँभलती है 

 क्या बूढ़ी हो गई अम्मा!


 बालों में चाँदी की लड़ियाँ 

अँखियाँ कुछ धुंधलाई- सी 

 गीतों की कड़ियाँ भूल गई 

 बैठी चुप झुंझलाई सी 

 

ताने बाने बुनती है

 पहेली और उलझती है

 क्या बूढ़ी हो  गई अम्मा!

            

 पास-दूर के चश्मे दोनों 

अभी तो रखे यहीं- कहीं 

 कोना-कोना छान के मारा 

लौट आई फिर वहीं- कहीं  

 

सर पर दोनों रखती है 

इत-उत ढूँढा करती है 

 क्या बूढ़ी हो गई अम्मा!

 

उसने ही चलना सिखलाया 

गाकर लोरी रात सुलाया 

मीठी चूरी बुरकी- बुरकी 

गोदी में ले रोज़ खिलाया 

 

भूख उसे कम लगती है 

थोड़ा-थोड़ा चखती है 

क्या बूढ़ी हो गई अम्मा ! 


पीहर की बातें वह हँसकर  

कितनी बार सुनाती है 

कहाँ धरा चाबी का गुच्छा 

अक्सर भूल ही जाती है 


मन की मन में रखती है 

तभी तो चुप- चुप रहती है 

क्या बूढ़ी हो गई अम्मा! 

 

सखी-सहेली तुलसी से नित 

संझा को बतियाती है 

भूली नहीं वह नियम पुराना 

दीपक रोज़ जलाती है 

 

 पूजा, अर्चन करती है 

 नेम, व्रत सब रखती है 

ना! बूढ़ी कैसे  अम्मा !

 

 यादों की बँधी  पिटारी में 

कितने वर्षों की निधियाँ

 पर कभी कहीं खो जाती है 

 उसकी अपनी ही दुनिया 

   

  सुधियों में जा बसती है   

 अपने कल से डरती है

थोड़ी बूढ़ी हो गई अम्मा।

-0-

 ईमेल-shashipadha@gmail.com

    

Sunday, October 11, 2026

1533

 

आज की स्त्री/डॉ. कनक लता 

 

आज की स्त्री

सब लौटाती है

नाप-तौलकर,

बल्कि बढ़ाकर।

समय के साथ,

कभी थोड़ा धीरे,

कभी शीघ्र,

मगर लौटाती है

सब कुछ।

पर स्त्री जात है न,

प्रवृत्ति में है -

सँजोना, सँवारना, आकार देना।

सो आपका दिया सब सँजो लेती है,

इस्तेमाल भी करती है,

कभी प्रेम से,

तो कभी मर्यादा के लिए।

पर उतना ही या उससे भी अधिक निर्मित करती है,

सृजित करती है,

सजाती है, सँवारती है, आकार देती है,

उस पर अपने प्रेम, घृणा, नफ़रत, प्रतिस्पर्धा की मुहर लगाती है,

और लौटा देती है

आपको,

आपके समाज को।

आज की स्त्री

सब लौटाती है…

Wednesday, October 7, 2026

1532

 

1- हे पुरुष!/  डॉ .अंजुल चौहान 

 


 पुरुषों ने पढ़े वेद और उपनिषद्

अहम् ब्रह्मास्मि जैसे मंत्रों से 

 सुलझाया द्वैत- अद्वैत का अज्ञान

पुराण और धर्म- ग्रंथ पढ़ 

किए यज्ञ, हवनादि अनुष्ठान 

शस्त्र- विद्या में पारंगत हो

गाण्डीव ले, किया शत्रु- मर्दन

क्रोधावेश में ताण्डव नर्तन

खगोल और भूगोल से 

नाप ली ग्रहों की गति 

धरती का आकार 

सागर का विस्तार 

रामायण में हुई वाल्मीकि की साधना फलित 

भावविभोर तुलसी ने गाया रामचरित

गीता से पाया ज्ञान- कर्मयोग 

त्रिविध तापों से वियोग 

हे महा मानव !

तुम्हारी लेखनी ने किया अद्भुत सृजन 

कभी कालिदास का शाकुन्तल 

कभी भवभूति का करुण क्रन्दन

कभी-कबीर, कभी सूर की भावांजलि 

दिनकर का ओज, कभी आँसू ,कभी गीतांजलि 

हे पुरुष !

तुम नहीं पढ़ पाए 

तो 

सिर्फ  और सिर्फ

 स्त्री- मन

और 

उसमें जन्मी असीम पीड़ा

-0-

2-खंडित मूर्तियाँ/ डॉ .अंजुल चौहान 

 

खंडित मूर्तियाँ विसर्जित कर दी जाती हैं 

साँवले-  से जल में 

चिर शांति के लिए

लेकिन

कुछ अभिशप्त मूर्तियाँ दबकर रह जाती है 

मन के खंडहर में 

जीवन से दूर

और मृत्यु से वंचित 

भटकती हैं अनन्त काल तक 

मुक्ति की अंतहीन प्रतीक्षा में ।

-0- chauhananjul22@gmail.com

-0-

आत्मग्लानि / डॉ . सोनिया रिक्खी

 


 एक दिन कॉलेज के बाहर, 

इक चाय की टपरी में ,

अपने  सहयोगियों के साथ बैठे 

हम पीने को चा,

जिसमें जश्न की थी चाह ।


तभी आया इक 

10-12 वर्षीय  बालक ।

आँखो में असहजता ,

हाथों में उठाए ट्रे में 

छह गिलास चा  ।



तभी फिसली ट्रे 

और फिसली चा 

सीधी पहुँची टेबल की 

प्रमुख सीट पर बैठी

 मैडम के पैरों पर ।



परंतु उस से भी अधिक 

तेजी से इक हाथ 

हवा में लहराया,

इक जोरदार थप्पड़ 

बालक के कोमल

गाल से जा टकराया ।


सन्न थे हमारे शरीर 

और आँसुओं से 

डबडबा रही थी 

मेरी आँखें और 

उस मासूम की आँखें ।



दूसरी टेबल पर,

आस - पास बैठे 

विद्यार्थियों ने  उस मासूम 

को गले लगाया ,

चुप करवाया ।


परन्तु हमारे 

तन को

जैसे साँप 

सूँघ गया ।

थोड़ी देर बाद ही होश आया ।


मैडम आप पर 

नहीं गिरी चा।

बच्चे के कोमल मन व 

आत्मसम्मान पर गिरी थी आपकी चाह।

 

दुकानदार भौचक था

उसे ही उपदेश सुनाया

छोटे बच्चे को क्यों काम पर लगाया।



पर पढी -लिखी मैडम को 

न कोई पाठ पढ़ाया

इस आत्मग्लानि ने मुझे 

आज तक न मन का चैन दिलाया ।

कब तक हम शक्तिशाली के

समक्ष चुप रहेंगे।

अपनी ही आत्मा को कचोटते रहेंगे।

इतने वर्षों से

इस आत्मग्लानि से 

निकलने का रास्ता खोजते खोजते,

समय पर बोलने का महत्त्व 

समझ में आया।