पथ के साथी

Wednesday, September 9, 2026

1222-भूलना सामान्य है, भूल ही जाते हैं अक्सर

डॉ. वन्दना शर्मा 

 


भूलना’ वरदान है या शाप। एक सामान्य व्यक्ति दिन में कई बार इस समस्या का सामना करता है। पाठकगण आप भी मेरी बातों से सहमत जरूर होंगे। बल्कि आप ये सोच रहे होंगे हाँ मैं भी अक्सर भूल  जाती हूँ।

सबसे ज्यादा हम जो भूलते हैं - 'समय पर दवाई खाना।' कितना ही लिखकर दे डॉक्टर, भोजन से पहले, भोजन के बाद। फिर भी भूल ही जाते हैं। कुछ व्यक्ति चश्मा सिर पर लगाकर चश्मा ढूँढते रहते हैं। कुछ अपनी छतरी भूल जाते हैं। जब घर से निकले तो बारिश हो रही थी, महोदय ने छतरी उठाई चल दिए। कहीं किसी से बात करने रुके, या किसी के पास बैठे तब तक बारिश रुक गई और बातों ही बातों में छतरी वहीं छूट गई। बच्चे कॉपी-किताब बैग में रखना भूल जाते हैं। कुछ महिलाएँ एक साथ बहुत सारे काम करती हैं। एक काम शुरू किया, बीच में दूसरा पकड़ लिया। दूध गैस पर रखकर भूल गई। कभी गैस बंद करना भूल गई। कुछ अपनी चाबी भूल जाते हैं, कुछ अपना पर्स भूल जाते हैं।

मैं आपको भूलने के कुछ किस्से साझा करना चाहती हूँ। पढ़कर आपको भी लगेगा हाँ यह हमारे साथ भी होता है। पहले मैं बता दूँ आपको, भूलना तभी होता है जब हम एक साथ कई विचार पर कार्य कर रहे होते हैं या किसी कार्य में इतना फोकस कर देते हैं कि अन्य बातें भूल जाते हैं। महान वैज्ञानिक आइंस्टीन तो अपने विचारों में इतना खोए रहते थे कि कोई अचानक से उनका नाम पूछ ले, तो वो अपना नाम भी भूल जाते थे।

पर एक बात सोचने की है, जो चीज़ें हमने बचपन में सीखी पाँच-छह साल तक, वे कभी नहीं भूलते। जैसे दो का पहाड़ा, ए बी सी डी, कोई कविता - मछली जल की... या हो सकता है जब कोई हमसे ये सब पूछता है तो हमारा दिमाग सतर्क हो जाता है, तुरंत संदेश पहुँचता है दिमाग में कि दो का पहाड़ा सुनाना है और हम सही सुना देते हैं।

एक बार एक आदमी अपने छोटे बच्चे को घुमाने ले गया पार्क में। बच्चा पार्क में अन्य बच्चों के साथ खेलने लगा। वह आदमी फोन पर किसी से बात करने लगा। बातों में इतना व्यस्त हुआ कि फोन पर बात करता हुआ घर पहुँच गया। घर पहुँचकर उसकी बीबी ने देखा, बच्चा साथ नहीं है। अपनी बीबी का क्रोधित और चिंताग्रस्त हाव-भाव देख उसने फोन काटा और उसे याद आया कि उसका बच्चा तो पार्क में ही रह गया। फिर उसके साथ क्या हुआ होगा आप कल्पना कर आनंद ले सकते हैं।

एक बार एक प्रोफेसर एक समारोह में अतिथि बनकर गए। मंच पर अन्य अतिथि भी आसीन थे। महोदय ने अपना फोन अपनी जेब में रख दिया। उनके पास बैठे महोदय फोन पर बिजी रहे और उन्होंने अपना फोन काटकर मेज पर रख दिया। उनका फोन भी रंग-रूप में महोदय के फोन जैसा ही था।

प्रोफेसर महोदय ये भूल गए कि उनका फोन जेब में है। और मेज पे रखे फोन को उठा उसे खोलने का प्रयास करने लगे। पासवर्ड होने के कारण उनसे नहीं खुला, तो उसी पास वाले महोदय से पूछने लगे – ‘‘भाई देखना फोन को क्या हो गया, हर बार पासवर्ड गलत बता रहा है, खुल ही नहीं रहा।’’ जिनका फोन था, सज्जन थे, उन्होंने पासवर्ड बता दिया। जब फोन की स्क्रीन खुली, उस पर उनका फोटो नहीं था। तब प्रोफेसर महोदय को अपनी भूल का एहसास हुआ। झेंपते हुए बोले – ‘‘बहुत अच्छा फोन है तुम्हारा।’’

ऐसी ही एक घटना एक महाविद्यालय की है, मैंने वहाँ पाँच साल तक प्रवक्ता के रूप में कार्य किया। लंच के समय दूसरे विभाग की प्रवक्ता भी आ गई हमारे विभाग में। उन्होंने अपना बैग मेरे पास वाली कुर्सी पर रखा था। बातों ही बातों में अगले कालांश की घंटी बज गई और वे महोदया हड़बड़ी में मेरा पर्स लेकर क्लास में चली गई। जब उन्होंने पढ़ाने के लिए चश्मा निकालना चाहा पर्स से, तब अपनी भूल का एहसास हुआ। बाद में विभाग में आकर उन्होंने अपनी भूल बताई तो सब हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए।

मैं भी अक्सर कुछ चीज़ें भूल जाती हूँ। जैसे मैं कोई लिखने का काम कर रही हूँ, कहानी-कविता लिखने का और तभी मम्मी का फोन आ जाए, उनके पूछने पर –“क्या खाया आज' मुझे बहुत देर तक सोचना पड़ता है।

बचपन में भी ऐसा होता था अक्सर कोई मेहमान आया और मुझसे पूछा-बेटा आज क्या खाया?” मुझे बहुत सोचना पड़ता क्या खाया - क्या खाया। और सब हँसने लगते खाकर भी भूल जाती है क्या खाया।

जब मैं नौ साल की थी, मम्मी ने मुझे मूँग की छिलके वाली दाल लेने भेजा पड़ोस की दुकान पर। मैं याद करते हुए ही गई थी दाल का नाम;  लेकिन दुकान पर बहुत भीड़ थी। दुकानदार पहले उनको सामान देने में लगा हुआ था। मैं खड़ी उनकी बात सुन रही थी। जब मेरा नम्बर आया तो मैं भूल ही गई दाल का नाम। बहुत याद करने पर भी नहीं याद आया कौन सी दाल मंगाई थी। पुनः घर गई दाल का नाम पूछने। इस बार रटते हुए गई और सही सामान लिया।

ऐसी ही घटना तब हुई जब मैं अपने बेटे के साथ बाजार गई थी। आते हुए दर्जी की दुकान पर सूट सिलने को दिया। कपड़ा बैग से निकालते हुए चाबी वहीं मेज पर दी और घर आकर ताला खोलने के लिए जैसे ही पर्स देखा पर्स में चाबी ही नहीं मेन गेट की। मैं तो घबरा गई अब अंदर कैसे जाएँगे? तुरंत दिमाग पर जोर डाला, किस दुकान पर गए थे आते हुए अंत में। फिर याद आया -दर्जी की दुकान पर रह गई। तुरंत चाबी लेकर आई और घर में प्रवेश किया।

मुझे भीड़ से बहुत डर लगता है; इसलिए भीड़ वाले बाजार में नहीं जाती। एक दिन एक महिला मित्र के साथ सब्जी लेने गई। सब्जी तुलवाई, पैसे दिए और आगे चले गए। दुकानदार से सब्जी लेना ही भूल गई। पुनः उसी दुकान पर जाकर देखा- सब्जी वहीं रखी थी। दुकानदार ईमानदार था। पहचान लिया और सब्जी दे दी।

एक बात गौर करने की है- महिलाएँ कुछ भी भूल जाएँ; लेकिन अपना अपमान नहीं भूलतीं। जेठानी ने कब क्या कहा, सास ने कब क्या कहा- सब याद रहता है। भले ही भूलने का नाटक करें

कभी-कभी जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए पुरानी कड़वी बातों को भूलना ही बेहतर होता है। हर समय अतीत की यादों में खोए रहकर वर्तमान नष्ट करना सही नहीं है। जो बीत गया, वो बीत गया। अपने वर्तमान में ही जीना चाहिए और खुश रहने का प्रयास करना चाहिए।

नेकी कर दरिया में डाल। अर्थात् दूसरों की भलाई कर उस बात को भूल जाना चाहिए; क्योंकि अपेक्षा करोगे तो उपेक्षा होगी। निस्वार्थ होकर किसी की सहायता करें और भूल जाएँ। कभी रिश्ते निभाने के लिए दूसरों की गलतियों को भूलना ही पड़ता है। गलती शब्द से एक उदाहरण याद आया, मेरे पापा अक्सर सुनाते हैं -

समझ-समझकर समझ को समझना भी

एक समझ है

समझ-समझकर जो न समझे मेरी समझ में

वो ना समझ है

और

जो गलती ही न करे,उसे भगवान कहते हैं

गलती कर जो सुधर जाए, उसे इंसान कहते हैं

गलती पर जो करे गलतीऔर अड़ जाए

उसे शैतान कहते हैं।

पाठकगण क्षमा करें- मुझे आगे क्या लिखना था, भूल गई। भूलना भी ना... बड़ा परेशान करता है। भूलकर जो भूल हुई, क्षमा करें पाठकगण।

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Saturday, September 5, 2026

1521-शिक्षक- दिवस की पीड़ा

डॉ. पूनम चौधरी



पूरे साल तौली जाती है उसकी निष्ठा,

परखी जाती है उसकी ईमानदारी,

हर रोज़ नई कसौटी पर

कसी जाती है उसकी नीयत।

 

फिर पाँच सितम्बर को

कुछ फूल और सम्मान-पत्रों के साथ

एक दिन के लिए

तय कर दिया जाता है कि

शिक्षक आदर के योग्य है।

 

अजीब है यह समय—

जहाँ इज़्ज़त भी

कैलेंडर देखकर आती है।

 

पूरे दिन

मोबाइल की स्क्रीनें जगमगाती हैं—

‘Happy Teacher’s Day’

 

संदेश, कुछ सुंदर शब्द, कुछ तस्वीरें,

कुछ औपचारिक शुभकामनाएँ—

और सबको लगता है

इतना ही पर्याप्त है।

 

शायद शिक्षक की गरिमा

इतने भर से अपनी जगह लौट आएगी,

एक दिन की शुभकामनाओं से

मिट जाएगी वर्षों की उपेक्षा।

 

जिसकी आवाज़ बरस भर

सवालों, आदेशों और जाँच के दायरे में

दबती रही,

क्या एक दिन का स्तुतिगान

उसके हिस्से का मान  लौटा सकता है?

 

एक ओर

सुविधाओं से सुसज्जित कक्षों में

निर्धारित समय,

और काम की निश्चित सीमाओं के साथ

वे बना रहे हैं मानक,

कस रहे हैं कसौटियाँ,

कर रहे हैं आकलन

उस शिक्षक का—

 

जो दुर्गम रास्तों से गुजरता हुआ,


चिलचिलाती दोपहर में

बिना पंखे, बिना बिजली

उस कक्षा में बैठा है

जहाँ हवा से पहले

बच्चों तक पहुँचती है

उनके घरों की विवशता।

 

वे बच्चे

जो सिर्फ़ पढ़ने नहीं आए—

 

किसी के घर में रोटी का प्रश्न है,

किसी के माँ-बाप मज़दूरी के लिए गए हैं,

कोई घर की कामों से बचने 

के लिए आ बैठा है,

किसी का भाई पढ़ेगा 

वो देखभाल के लिए आई है।

 

वह पढ़ाता है—

और पढ़ाते-पढ़ाते

उनकी आँखों में वह सब पढ़ता है

जो किताबों में नहीं लिखा।

वह अक्षर देता है,

तो साथ में आत्मविश्वास भी।

वह गणित सिखाता है,

तो जीवन का हिसाब भी।

वह गलती सुधारता है,

तो कभी-कभी

टूटता हुआ मन भी सँभालता है।

 

इसके अलावा भी

 उसके कामों की फेहरिस्त है लंबी —

कभी मध्याह्न भोजन की व्यवस्था,

कभी जनगणना,

कभी बी. एल. ओ.  का दायित्व,

कभी सर्वे,

कभी छूटे हुए बच्चों की तलाश,

कभी टीकाकरण की चिंता,

कभी गाँव की किसी दूसरी

सरकारी ज़िम्मेदारी का बोझ।

 

काग़ज़ और काम बढ़ते जाते हैं,

दिन छोटा पड़ता जाता है।

 

फिर भी उसके कंधों पर है जिम्मेदारी—

इन अधूरी जिंदगियों को

निपुण बनाने की।

 

उसकी दो मिनट की देरी

घड़ी देख लेती है,

उसकी एक गलती

कार्यालय तक पहुँच जाती है,

उसकी छुट्टी

बहुतों की नज़र में आ जाती है,

उसकी तनख़्वाह तो 

गाँव वालों  को भी मुँहज़बानी 

याद रखते हैं ।

 

बस भूल गए हम

कितनी बार

वह अपने हिस्से का विश्राम

किसी बच्चे की ज़रूरत पर

छोड़ आया है।

 

हाँ, शिक्षक भी मनुष्य है।

उससे भी भूल होती है।

 

जो अपने दायित्व से विमुख है,

उसे अपने भीतर

कठोरता से झाँकना चाहिए।

 

पर एक की भूल से

पूरे वर्ग की निष्ठा पर

संदेह करना भी

कहाँ का न्याय है?

 

किसी शिक्षक को

उसके वेतन से मत आँकिए,

उसकी छुट्टियाँ गिनना बंद कीजिए,

उसकी घड़ी से

मत जाँचिए उसकी उपस्थिति—

 

कभी उस बच्चे की आँख से देखिए

जिसने पहली बार

उसी के हाथों

सीखा है अपना नाम लिखना।

 

तब शायद समझ आए—

शिक्षक का सबसे बड़ा पुरस्कार

किसी मंच पर नहीं,

किसी सम्मान-पत्र में नहीं;

बल्कि बच्चे के भविष्य में लिखा होता है।

 

इसलिए इस शिक्षक दिवस

मोबाइल पर एक और शुभकामना

भेजने से पहले

अपने भीतर पूछिए—

 

क्या सचमुच हम शिक्षक का आदर करते हैं?

नहीं,

एक दिन के संदेश

एक शिक्षक का समय नहीं बदल सकते,

एक दिन की तालियाँ

उसकी परिस्थितियाँ नहीं बदल सकतीं।

 

समय तब बदलेगा

जब आदर

संदेश से निकलकर

व्यवहार में आएगा।

जब उसके अधिकारों के साथ

उसके उत्तरदायित्व की भी

न्यायपूर्ण बात होगी।

 

और जब सरकारी विद्यालय की

दूरस्थ, तपती हुई कक्षा में खड़ा शिक्षक

सिर्फ़ व्यवस्था का कर्मचारी नहीं;

बल्कि राष्ट्र के भविष्य का

विश्वस्त संरक्षक समझा जाएगा।

 

बनानी है नियमावली—

तो सरल बनाइए।

 

स्थानांतरण की नीतियाँ

सरल और पारदर्शी बनाइए।

 

पदोन्नति की व्यवस्था

न्यायपूर्ण बनाइए।

 

शिक्षकों के लिए

एक स्वस्थ शैक्षिक वातावरण बनाइए;

क्योंकि

शिक्षक को केवल

कर्तव्यों की सूची नहीं,

गरिमा के साथ काम करने का अधिकार भी चाहिए।

 

तभी असल में

हम कर पाएँगे

शिक्षक का मान।

 

और फिर नहीं बचेगी आवश्यकता

साल में एक दिन

उसके लिए मंच सजाने की—

 

क्योंकि

जिस शिक्षक का मान

हर दिन उसके काम में होगा,

उसे मान देने के लिए

एक दिन की ज़रूरत नहीं होगी।

Friday, September 4, 2026

1520

 परदेसी कान्हा/ शशि पाधा 

 


कैसा उत्सव, कैसी होली 

कान्हा तो परदेस गए 

राधा से पूछें हमजोली 

लौट आने को क्या कह ग ?


भूलके सारा साज शृंगार 

राधे ने हँसना छोड़ दिया  

कलकल बहती यमुना की  

लहरों ने बहना छोड़ दिया 


सब गैयाँ इत-उत ढूँढ रही 

किस नगर-डगर गोपाल गए 

कब लौटेंगे, क्या  बोल ग ?


सूनी- सी गलियाँ गोकुल की 

मुरझाया- सा है नंदनवन 

ग्वाल-पाल सब मौन पड़े 

निर्जन- सा लगता वृन्दावन 

 

मुरली की तानें मौन पडीं 

क्यों कान्हा इतने निठुर हुए?


मटकी में माखन दूध लिये 

आ मात यशोदा  द्वार खड़ी 

क्यों देर हुई अब आने को 

अँखियाँ डग में जडीं-जडीं 

 

 राजपाट ने कैसा बाँधा

 क्यों माँ की ममता भूल ग ?

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वर्जीनिया, यू एस ए 

Email: shashipadha@gmail.com