पथ के साथी

Saturday, February 7, 2026

1492

पिता, माँ और रोने की भाषा/ डॉ. पूनम चौधरी

 


घर में

दो दर्शन थे

एक पिता

दूसरी 

माँ।

 

पिता —

व्यवस्था थे।

अनुशासन,

संयम,

और वह चुप्पी

जो अपेक्षित थी पुरुषों से,

 

पिता कहते थे—

पुरुष अगर रोए

तो समय को असहज कर देता है,

और समय

कभी भी असहज पुरुषों को माफ़ नहीं करता।

 उन्होंने सिखाया,

 सुख सार्वजनिक है दुख निजी 

 वे तार्किक थे इसलिए 

जानते थे

दुनिया सवाल नहीं पूछती,

हिसाब माँगती है।

और हिसाब देते वक़्त

आँसू

गिनती बिगाड़ देते हैं

उनकी बातों में

अनुभव था।

तर्क था

वे जानते थे

कि आँसू

तर्क को कमज़ोर कर देते हैं

और कमज़ोर तर्क

भीड़ में

कुचल दिए जाते हैं।

 

 

माँ बताती थी—

रोना भाषा का सबसे पुराना रूप है।

जब शब्द थक जाते हैं

तो आँसू

बोलने लगते हैं।

मन अगर भर जाए

तो उसे खाली करना भी

ईश्वर की तरह ज़रूरी है।

 

माँ के पास

दुख को समझने का

कोई तर्क नहीं था,

बस दो बाँहें थीं

जो फैलते ही

दुनिया को छोटा कर देती थीं।

 दोनों दर्शन घुले थे मेरे रक्त में

 मैं अवसर अनुकूल आजमाता रहा 

पिता के सामने

मेरे होंठ

हँसी का अभ्यास करते रहे—

एक सीधी रेखा,

जिसके नीचे

छुपा रहता

प्रभंजन भावनाओं का,

 

और माँ के कंधे पर

 मेरा हृदय 

एक टूटी हुई दीवार की तरह

ढह जाता

आँसू

क्रम से नहीं गिरते

वे गिरते रहते

जैसे कोई बाँध

तर्क से थककर

भावना के आगे

समर्पण कर दे।

 मां जानती थी 

 आंसुओं का मूल्य

 

पिता दूर से करते रहे आकलन

हँसी को

समझते रहे,

ताकत

उन्हें पता नहीं चला

कि यह हँसी

रोने का

सबसे सभ्य अनुवाद थी।

 

अब समझ आता है—

पिता ने मुझे

दुनिया से लड़ना सिखाया,

माँ ने

खुद से।

 

और इसलिए

मैं आज भी

भीड़ में हँसता हूँ—

ताकि पिता

मेरे भीतर

अडिग रहें।

 

और

एकांत में रोता हूँ—

ताकि माँ

मुझसे

कभी विदा न हों।

 

-0-


Saturday, January 31, 2026

1491-गीत गाते अक्षर का अपनापन

 परमजीत कौर 'रीत'


कुछ समय पहले 'प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग, भारत' द्वारा हमारे विद्यालय की ओपन लायब्रेरी के लिए बालसाहित्य की लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें भिजवाई गई। पुस्तकें इतनी आकर्षक थी कि विद्यार्थियों में इनको पढ़ने की होड़- सी लग गई। कविताओं की पुस्तकों में 'गीत गाते अक्षर '
की कविताओं को उन्होंने काफ़ी पसंद किया । कुछ  कविताओं जैसे  - हवा चली,आगे बढ़ते जाना, गाँव, जंगल, बरखा रानी, गर्मी आई, जागो, बापू जी आदि कविताओं का  उन्होंने समूह वाचन भी  किया।  मैंने भी जब इस पुस्तक को पढ़ा तो बच्चों की भावनाओं को महसूस किया। इस पुस्तक में 66 छोटी -छोटी बालकविताएँ हैं, जो बच्चों के  मनोरंजन  के साथ साथ ज्ञानवर्धन भी करती हैं। 'गीत गाते अक्षर'  पुस्तक की कुछ ऐसी ही कविताओं की बानगी देखें-

हवा चली रे! हवा चली!

धूल मिट्टी को संग उड़ाती चली.....पृ.सं-15

 मन लगाकर हमेशा करो तुम पढ़ाई।

कभी भी न करना किसी से लड़ाई।...पृ.सं-31

 

सुनो पापा! ओ मेरे पापा!

हम भी इस बार  पेड़ लगाएँगे! ...पृ.सं- 49

 जागो सूरज चाचू आए,

भागो नया उजाला लाए,......पृ.सं- 69

 काश होते जो, पंख मेरे भी दो।

मैं भी पंछियों संग, दूर देश उड़ जाता।......पृ.सं.- 82

 इस प्रकार 'गीत गाते अक्षर' पुस्तक में लेखक मनोजकुमार शिव  ने बाल मनोविज्ञान के अनुरूप  छोटी-छोटी कविताओं को रोचक एवं लयबद्ध  रूप में प्रस्तुत किया है जिससे बच्चे सहज ही इन कविताओं से जुड़ जाते हैं। इस सफलता के लिए  लेखक बधाई के पात्र  हैं।

'गीत गाते अक्षर(बाल काव्य-संग्रह ) : मनोज कुमार ‘शिव’   मूल्य 180 रुपये,  पृष्ठ: 88, संस्करणः 2024,  प्रकाशकः प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग भारत, 3/186 राजेंद्र नगर, सेक्टर 2, साहिबाबाद, गाजियाबाद  पुस्तक ravasiprempublishing@gmail.com पर संपर्क करके प्राप्त की जा सकती है।

(परमजीत कौर 'रीत', श्रीगंगानगर राजस्थान)

Friday, January 30, 2026

1490

कहानी सुनने के लिए नीचे दिए गए  लिंक को क्लिक कीजिएगा-

मृगतृष्णा

 सुदर्शन रत्नाकर

पाठकीय प्रतिक्रिया-डॉ. सुशीला ओझा


-बहुत सुन्दर कहानी.. आज के यथार्थ को शब्दों में बुनती भावपूर्ण... बच्चों की परवरिश, पढ़ाई के बाद आदमी किस्तों में घर बनाता है.. अगर पत्नी अच्छी मिल जाती है.. गृहस्थी के पावन धूप में जलकर घर को संवारती है, निखारती है , संस्कार, परिष्कार करती है.. अर्थाभाव में भी धीरे-धीरे सुख, शान्ति श्री समृद्धि आने लगती है.. बेटे की पढ़ाई नौकरी बेटी की शादी.. सब दायित्वों से मुक्त.सेवा निवृत्त होकर  कुछ सोचने का समय मिलता है..एक मृगतृष्णा मन में बैठ जाती है.. सुख सुविधा की ओर उन्मुख होने  की फड़फड़ाहट.. सावित्री जानती हैं .अपनी धरती का सुख, अपनी माटी की सोंधी महक, अपने मुँडेर पर आते सूरज की प्रथम किरणों का अवगाहन, बाग में सुबह चिड़ियों की चहचहाहट। अभी -अ भी तो इस कलात्मक सौन्दर्य को महसूस करने का समय मिला है.. उसे  अपनी माटी में ही  सुख की अनुभूति हो रही है.. स्त्रियाँ पुरुषों से ज्यादा सहिष्णु होती है. . बेटे के पास जाने की बात पति करता है तो सावित्री अस्वीकार करती है.. पुरुष मन भावुक होता  है  राम के वनगमन का  दु:ख  दशरथ के मृत्यु का कारण हो गया.. पति मृगतृष्णा में है.. उसे नाभि की कस्तुरी की गंध  से आत्मज्ञान नहीं मिलता है.. बेटे के यहाँ जाता है जहाँ उसकी  अपनी पहचान पीले पत्तो की तरह  झरकर मिट्टी मे मिल गई है..वहाँ किसीको बाबूजी से बात करने का समय नहीं है.. बुढ़ापा में बच्चों का साथ मन को ऊर्जस्वित करता है.. जीवंतता, जिजीविषा, सकारात्मकता के अंकुरण से मन में उल्लास का अंकुरण होता है.. वहाँ जाने पर पति ठंढ़ा खाना, अपने से परस कर खाना.. सावित्री की स्मृति मलयानिल बयार की तरह वसंत का एहसास कराती है.. सावित्री कितना स्नेह, प्रेम से खिलाती थी. हमलोग मिल-बैठकर अपना दु:ख सुख साझा करते थे.. एक सकारात्मकता, प्रवाहमयता बनी रहती है.. यहाँ का जीवन यांत्रिक जीवन है.. सहृदयता, आत्मीयता, अपनत्व, मिठास की सारी अर्गलाएँ बन्द है .बर्फ की एक चादर सा ओढ़ा स्टैच्यु सा मन.. इसी उधेड़ बुन में विचारों की ठंढी उड़ान के लिए चिड़िया फलक पर उड़ने के लिए बेताब है..फलक कितना ऊँचा है उसे ज्ञान नहीं है.. मृगतृष्णा का कोई आधार नहीं है..बालुओं में चलतो रहो पानी की खोज में पिपासा शांत नहीं होती है और एक दिन पंखविहीन होकर घोसलों से दूर जीवनलीला  के अभिनय का पटाक्षेप हो जाता है.. 

Tuesday, January 27, 2026

1489

 

महकें बन गणतंत्र की क्यारी

 - हरी राम यादव    सूबेदार मेजर (नरेरी)

  


तंत्र हमारा तन्मयता से सुने
,

   जन गण के मन की पुकार।

हर दीन हीन गरीब को मिले,

   उसका मौलिक अधिकार।

उसका मौलिक अधिकार,

   धार नीर की सबके घर हो।

भोजन भवन की सुविधा से,

   हर भारतवासी का मन तर हो ।

मिले सुविधा सबको पढ़ने की,

   अवसर सबको मिले समान।

सब बीमारों को मिले दवाई,

   तभी बढ़ेगा गणतंत्र का मान ।।

 

बोलने की बनी रहे आजादी,

   इस पर न कोई पहरा हो ।

सहमति असहमति सुनने में,

   देश का कोई तंत्र न बहरा हो।

देश का कोई तंत्र न बहरा हो,

   अपनी हद में सब काम करें।

भारत का भाग्य निर्माता बन,

   हाथ बटाएं और नाम करें।

सबको सबका हक मिले 'हरी',

   हुकूमत में हो सबकी भागीदारी।

सब अपने को कहें भारतीय

   महकें बन गणतंत्र की क्यारी।।

-0-

      बनघुसरा, अयोध्या <

   7087815074