रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
मरती है स्त्री
सुबह -शाम
घुट-घुटकर
अटकती हैं साँसें
पसलियों में
दर्द बन जाता शिलालेख
सूखे अधरों का
किससे कहें, कैसे कहें
मर्यादा के ताले
जड़े हैं प्रत्येक शब्द
पर
'किस पथ जाऊँ?'
जकड़ी हैं बेड़ियाँ
हर निर्णय पर।
घर लौटना लगता है -
किसी जंगली जानवर की
गुफा में उतरना
गुर्राहट से कानों का सुन्न होना
जलती नफ़रत- भरी आँखों
का
रोम -रोम में गड़ना
मुँह से निकलते झाग
और बदबू का झोंका
नथुनों को चीरता -सा।
दफ़्तर की हाड़तोड़ थकान
निकम्मे लोगों का साथ
अधमरा कर देता है
फ़ाइलों में जूझते शरीर को,
बॉस की लपलपाती जीभ
कैक्टस के काँटों -सी आँखें
और लार से भीगे भद्दे होंठ
जिनके बीच घिरी वह
पल -प्रतिपल मरती है।
वह जाए, तो कहाँ जाए
घर और बाहर के रौरव नरक
उसे कई-बार मारते हैं,
वह फिर-फिर जिन्दा हो उठती है
साँस लेने के लिए।
उसकी रातें
अतीत के सपनों को उधेड़ते
भीग जाती हैं
घर में होते हुए भी
वह भयभीत हिरनी -सी
कभी बचपन की स्मृतियों
कभी युवावस्था के
उड़ते आँचल को
अनुराग-भरे मन से
केवल कल्पनाओं में जीती है
कभी इस गुंजलक से निकलकर
रात भर छटपटाती है,
वह जीवित है, पर जी नहीं पाती है
वह निष्प्राण-सी है,
पर अपनी मर्यादाओं के कारण
मर भी नहीं पाती है
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