पथ के साथी

Monday, July 26, 2021

982

 

1-सीमाओं की आँखें / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

 

आगे ही ये बढ़े कदम

पर्वत पर भी चढ़े कदम

नाप दिया है सागर को

चट्टानों पर चढ़े कदम ।

 

हर कदम की अमिट निशानी

बन जाती इतिहास है ।

 

करती तोंपें घन-गर्जन

थर्रा उठता नील गगन

रणभेरी की लय सुनकर

खिल उठता है अपना मन।

 

झड़ी गोलियों की लगती

हमे प्यारा मधुमास है ।

 

अँधड़ शीश झुकाते हैं

कुचल उन्हें बढ़ जाते हैं

मिट्टी में मिल जाते वे

जो हमसे टकराते हैं ।

 

सीमाओं की आँखें हम

यही अपना विश्वास है ।

-0-

2-स्वप्न- डॉ शिवजी श्रीवास्तव

 

एक अजीब स्वप्न देखा

मैंने कल रात

मैं आमंत्रित था एक भोज में ,

बेशुमार भीड़ थी वहाँ

आदमी बस आदमी बस आदमी

धक्कामुक्की के बाद आखिर मैंने

प्लेट उठा और 

पहुँच गया पंडाल के अन्दर 

अगणित मेजों पर सजे थे तमाम डोंगे

मैंने एक डोंगे को खोला

मैं चौंक गया

डोंगे में किताबे थीं

ढेरो किताबें

छोटी किताबें 

बड़ी किताबें

पतली किताबें

मोटी किताबें

मैंने झट दूसरे डोंगे में झाँका 

वहां भी किताबें थीं

बदहवास होकर मैंने तमाम डोंगे खोल डाले

हर डोंगे में किताबें थीं

सिर्फ किताबें

मैंने परेशानी से अपने चारों और नज़रें दौड़ाईं

मैं हैरान रह गया

लोग बड़ी तसल्ली से डोंगे खोल रहे थे

किताबें परोस रहे थे,

किताबें सूंघ रहे थे,

किताबे चख रहे थे

किताबें खा रहे थे

और शनैः शनैः खुद भी किताबों में तब्दील होते जा रहे थे

ऐसी किताबो में

जिन्हें मैं देख सकता था

छू सकता था

पढ़ सकता था

चूम सकता था,

और गले लगाकर प्यार भी कर सकता था।

 

स्वप्न टूट गया।

सोच रहा हूँ ,

काश!

सपना सच हो सकता।

-0-

 

3 - सुशीला शील राणा

1.

साँस-साँस थी देश की, कंठ-कंठ यह राग

ठंडी कैसे हो गई, देश प्रेम की आग

नेता जी को याद अब नोट-वोट का खेल

भूल गए कुर्बानियाँ, जलियाँवाला बाग

2.

अब ना ज़िक़्र शहीद का, बस गिनती में वोट

शर्मिंदा आज़ाद हम, सह लेना यह चोट

दिन-दिन ढहते जा रहे, नैतिकता के स्तंभ

खरे नकारे जब गए, सर चढ़ बोला खोट

   3. 

परख रही है ज़िंदगी, क्या किसका क़िरदार

देख रही है तेल भी और तेल की धार

बेग़ैरत मक्कारियो!  सबक रहे ये याद

धूल चटाए शाह को बुरी वक़्त की मार

4

रिश्ते-नातों को सदा, जीभर सींचो शील

रखना मन मज़बूत जब, चुभे पाँव में कील

हिल-मिल रहना प्यार से, ज्यों सरवर में हंस

खिलें कँवल विश्वास के, मन की शीतल झील

5.

तारे चूनर टाँकके, रजनी हुई विभोर

करे ठिठोली चंद्रमा, बदरा भी मुँहजोर

चंचल चपला दामिनी, करती है भयभीत

चल चलते हैं चाँदनी, धरती के उस छोर

-0-

4- हस्ताक्षर हैं पिता

डॉ. लता अग्रवाल

 

चली आती थीं

सायकिल पर

होकर सवार

खुशियाँ,

शाम ढले

नन्हे-नन्हे उपहारों में

संग पिता के

घर का उत्सव थे पिता ।

 

संघर्षों के

आसमान में

बरसती बिजलियों से

लेते लोहा

ऐसी अभेद्य  दीवार थे पिता ।

 

चिंताओं के कुहरे से

पार ले जाते

अनिश्चय के भँवर में

हिचकोले लेती

नाव के कुशल पतवार थे पिता ।

 

चहकते रहते थे रिश्ते

महकती थी

उनसे प्रेम की खुशबू

सम्बन्धों के लि

ऐसी कुनकुनी धूप थे पिता ।

 

जिन्दगी की

कड़ी धूप में

नहला देते

अपने स्नेह की

शीतल छाँह से

ऐसे विशाल बरगद थे पिता ।

 

घर -भर को

नया अर्थ देते

जिन्दगी के

रंगमंच के

अहम किरदार थे पिता ।

 

हर परीक्षा में

हमारी

सफलता -असफलता की

रिपोर्ट कार्ड के

महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे पिता । 

                                                                              

आज

उत्सव के अभाव में

गहरा सन्नाटा है घर में

चहुँ ओर

कड़कती हैं बिजलियाँ ।

जीवन नैया

फँसी है  भँवर में

कुनकुनी धूप के अभाव में

दीमक खा गई

रिश्तों को

एक अहम किरदार के बिना

सूना है

जीवन का रंगमंच

सफलता असफलता के

प्रमाणपत्र

बेमानी है

एक अदद हस्ताक्षर के

बिना ।

-0-

डॉ. लता अग्रवाल , 73 यश विला, भवानी धाम-फेस-1 , नरेला शंकरी , भोपाल-262041

Thursday, July 22, 2021

980

 

1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

 1


मैं तेरे मन में रहूँ, जैसे तन में साँस।

जब तक ये जीवन  रहेरखना अपने पास।

2

तेरे नैनों में रहूँ , बनकर गीली कोर।

पलकें चूमूँ  प्यार से, बनकर उजली भोर।।

-0-

2-माटी और मन / डॉ . महिमा श्रीवास्तव

 माटी सी देह


माना

माटी में मिल जानी है

कनपटी पर सफेदी,

आँखों के नीचे स्याही

फीकी होती रंगत

मरालग्रीवा पर सिलवटें।

सन्त जीवन से

विदा हो चुका है

पर इस मन का क्या

ये तो सावन में अब भी

गुनगुनाता है बारहमासी

विरह का रं

उतरा ही नहीं

मिलन का रं

कभी चढा नहीं।

कुलाँचे भरता मन

कभी बचपन की

उजली हँसी बिखेरता

तो कभी किशोर- सा

मचल उठता बेकाबू।

लिखता मिटाता  संदेश

झिझकते तारुण्य सा

शरीर समय की मार से

बिखरता दर्पण निहार

मन हँस- हँस -के झेलता

उम्र ढलने के प्रहार।

 -0-

 34/ 1, सर्कुलर रोड, मिशन कंपाउंड के पास, अजमेर( राज.)--305001

Email: jlnmc2017@gmail.com

 -0-

2-साँवरे के रंग / पूनम सैनी

 


मैं साँवरे के रंग राची होके बाँवरिया

मैं साँवरे के संग नाची,पहनी पायलिया

 

घिर-घिर आए मेघा चमकी बिजुरिया

मैं साँवरे के संग नाची,पहनी पायलिया

 

पेड़,पशु झूमे सारे ताल-तलैया

मैं साँवरे के संग नाची,पहनी पायलिया

 

सज-धज नाथ शम्भू,नाचे ता थैया

मैं साँवरे के संग नाची,पहनी पायलिया

 

गोपियाँ चकोर भई, चाँद साँवरिया

मैं साँवरे के संग नाची,पहनी पायलिया

 

नाग नथैया मोहन,मुरली बजैया

मैं साँवरे के संग नाची,पहनी पायलिया

-0-

Monday, July 12, 2021

1123

1- भीकम सिंह

पेड़-1

 


पेड़ की बात

बड़ी बात है

पर्यावरण में

कार्बन-हरण में

और मुस्कानों  में 

 

मानव

जिन्दा है

अस्तित्व के साथ

आज -

पेड़ों की वजह से

सही मायने में  

-0-

 

पेड़-2

 

 

पेड़ बेगुनाह

मगर बन्दी हैं

दिन-माह,

वर्षों से

किसी पहाड़

अथवा

मैदान पर,

पत्तियों में बस

एक ही मलाल 

 

आँधी क़ातिल




पत्तियों को चूमा

मोड़ा

तोड़ा

टहनियों को

भरे के बाहों  में

कहीं का ना छोड़ा

फिर भी

हो ग बहाल 

-0-

 

पेड़-3

 

 

इस वर्ष

बड़ी तेजी से

लौटा है पतझड़

बसंत का

हकदार बनने

बदलने पेड़ों के खाते 

 

रोष

नाराज़गी

बेचारगी

मुस्कुराहट

ॠतुऐं सब दिखा चुकी

मौसम के नाते  

 

पेड़ों का

मन

हुआ विवश

पत्तियों ने भी

ओढ़ लिये

मुरझाए-से छाते 

-0-

 

2-कृष्णा वर्मा

1-अनोखी यात्रा


लेखनी को विश्राम नहीं

यह कैसी यात्रा

राहत का कोई निशान नहीं

भूली है क़लम आज

मंगल -कलश पर

सुखपूरित शब्दों से

स्वस्तिक रचना

पल-पल पूर रही

पीड़ा बेबसी में डूबे

विनम्र श्रद्धांजलियों- संग

ओम शांति के काले आखर

भूल गई लिखना

गुलाबी पंक्तियाँ

न छन्द, शिल्प का ख़्याल

न मात्राओं की गणना

निरंतर उडेल रही

खारी अनुभूतियों से रची

समीक्षाएँ

कैसे वाद-विवादों में आज

घेरा विक्षिप्त हवाओं ने

मरे सब मेले तमाशे

रोए आवारगी

अपनों से भयभीत हुए

हँसी ठठ्ठे -कहकहे

कौन जाने कब भरेगा

काल का उदर

कब थमेंगी कलमें

परसने से अवसाद।

-0-

2-रस्म-रिवाज़

 

किस संगदिल की मानसिकता ने

गढ़े होंगे यह रस्म-रिवाज़

शादी के नाम का ठप्पा एक अंगूठी

जिसे पहनाकर सिकोड़ दिए जाते हैं

उस नामुराद तंग दायरे में

स्त्री के ख़्वाब उसकी चाहतें उसका वजूद

कई बार नज़रों में चुभती हुई को

उतार फेंकने की चाह

यकायक कर देती है दिल को ख़ौफजदा

सहमकर स्वयं ही रुक जाता है

निगोड़ा दाया हाथ

स्त्री ने ही तो दिए स्त्री को

थरथराते कमज़ोर संस्कार

सुना-सुनाकर अपशकुनी के किस्से

इस छोटे से पिंजरे में कैसे

ख़ुद को तोड़ मरोड़कर

पूरी तरह से समाई होने को

मिटाती चलती है अपने वजूद के निशान

इस निर्जीव पत्थर जड़े छल्ले को

क्यों दे दी इतनी औक़ात

जो पल-पल याद दिलाती है

बंधन में बँधी स्त्री को उसकी औक़ात।

2

प्रत्येक परिस्थितियों के गर्भ से

लम्हा-लम्हा उगते विचारों को

सँजोती पिरोती हूँ

अमुक कथन में

तो क्यों तिरछा-सा कुछ

शूल-सा कसकता है

धुँआता है सुलगता है

भीतर अंगार- सा

साँसों की पसली पर

दुख की आप्त व्यथा

के दबाव से

घिरने लगती हूँ

सघन अंधकार में।