1-आई है दिवाली / डॉ. वंदना शर्मा
आई है दिवाली
जेब हुई खाली
हम मिडिल क्लास की
कैसे बने दिवाली
घर को सजाऊँ
दीए भी जलाऊँ
कोई मुझे बताए
पटाखे फूँकने को
पैसे कहाँ से लाऊँ
धनतेरस से शुरू होकर
भाई दूज तक रहती
खर्चे की भरमार
कहीं गिफ्ट, कहीं मिठाई
कैसे निभे व्यवहार
भाभी रूठे कभी
कभी रूठे ननद
कैसे दोनों को मनाऊँ
मैं अकेली कैसे
पल में मायके
पल में ससुराल
पहुँच कैसे जाऊँ
आई है दिवाली
सिर्फ बच्चों की
माँ तो थकती है
रसोई में, पूजन में
कैसे मन को समझाऊँ
कैसे त्योहार मनाऊँ
-0-Vandna. reporter@gmail.con
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2- त्योहार का अगला दिन / डॉ. कनक लता
दिवाली, होली, क्रिसमस
या ईद,
कितना अजीब होता है
त्योहार का
अगला दिन।
आधी जली हुई बाती, बिखरी- सी रंगोली,
उदास-सा गुलाल, रंगों के बोझिल-से निशान,
रमज़ान के ख़त्म होने पर
वो खाली-सा दिन,
क्रिसमस के बाद कैरल की धीमी होती धुन,
सब कितना अजीब होता है,
कितना अजीब होता है
त्योहार का
अगला दिन।
मंद पड़ता उत्साह,
बुझा हुआ-सा मन,
धूमिल-सी दुकानें,
बाज़ार का सूनापन,
सब कितना अजीब होता है,
कितना अजीब होता है
त्योहार का
अगला दिन।
कितना सुंदर होता
अगर हर दिन त्योहार होता,
हर दिन वही उमंग, वही तरंग।
पर मनुष्य का स्वभाव
और प्रकृति का नियम,
वहाँ तो अनुकूलन होता है,
एक जैसी गति का अनुकूलन,
एक जैसे बहाव का,
एक जैसे दुःख का,
एक जैसे सुख का अनुकूलन।
और अनुकूलन में उत्कंठा कहाँ,
रोमांच कहाँ,
उल्लास भी नहीं रह जाता।
फिर भी अजीब होता है,
बहुत अजीब होता है
त्योहार का
अगला दिन।
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