पथ के साथी

Tuesday, July 14, 2026

1505

 

लेखक का पाठक होना ही सृजन की दृष्टि है - ऋता शेखर ‘मधु’

 

सृजन- दृष्टि (समीक्षा- संग्रह): डॉ. शिवजी श्रीवास्तव, पृष्ठ - 192, मूल्य - 550/- , प्रकाशन - अयन प्रकाशन, उत्तम नगर, नई दिल्ली -110059

 

सृजन-दृष्टि सिर्फ एक लेखक की नहीं बल्कि उस लेखक की पुस्तक है जो एक विचारशील और सम्वेदनशील पाठक भी हैं। 33 पुस्तकों को पढ़ना और उस पर पाठकीय प्रतिक्रिया देना , लेखक के साहित्यिक अनुराग को प्रदर्शित कर रहा है। पुस्तक  के फ्लैप के एक ओर डॉ.कुँवर दिनेश सिंह जी हैं और दूसकी ओर रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'  जी हैं।


आजकल लेखक बहुत हैं; पर वैसे लेखक कम हैं, जो पाठक भी हों। पुस्तक का प्रकाशन लेखकों के लिए बड़ी बात होती है, पर उससे भी बड़ी बात होती है पुस्तक को उपहारस्वरूप किसी को देना। सबसे बड़ी बात होती है उन पुस्तकों को पढ़कर उसपर विचार रखना। किन्तु आज के व्यस्त जीवन में उपहार में मिली पुस्तकों पर धूल की परत जम जाती है, तब लेखक को पता चलता है कि पुस्तकों को पढ़कर प्रतिक्रिया के रूप में उसकी कद्र करने की आवश्यकता किसने समझी और किसने नहीं। डॉ. शिवजी श्रीवास्तव पहले से पाठकीय प्रतिक्रिया लिखते रहे हैं। उसे पुस्तक रूप में लाना उनकी सकारात्मक सोच को प्रदर्शित कर रहा। हर पुस्तक पर लेखक के विचार को समझकर अन्य पाठक भी अवश्य पुस्तक की ओर आकर्षित होंगे। समीक्षा एक गहन कार्य है। यह समकालीन साहित्यिक कृतियों का मूल्यांकन है और इसमें  पिछले दस वर्षों में छपी भिन्न-भिन्न विधाओं की पुस्तकें शामिल की गई हैं। अनुक्रम में पुस्तकों की विषय वस्तु के अनुसार शिवजी श्रीवास्तव जी की ओर से सटीक और सार्थक शीर्षक दिए गए हैं। सम्पूर्ण पुस्तक को चंद शब्दों से शीर्षक में बाँधना ,उसकी विशेषता बताना लेखक की लेखकीय परिपक्वता को दर्शाता है। अनुक्रम में सिर्फ शीर्षक है, उनसे सम्बन्धित पुस्तक और लेखकों के नाम नहीं। उन पुस्तकों के लेखकों के नाम और कृतियों का परिचय पाने के लिए आलेख तक पहुँचना आवश्यक है। मैं उन शीर्षकों के साथ लेखकों के नाम उद्धृत कर रही हूँ। ।

1 . आजादी के परवानों पर लिखी गयी पुस्तकें…

भगत सिंह के जीवन दर्शन की महत्त्वपूर्ण कृति ‘मेरे भगत सिंह’ पंकज चतुर्वेदी जी की पुस्तक है। ‘क्रांतिवीर मदारी पासा’ ब्रजमोहन जी का उपन्यास है।

 

2 . काव्य/ ग़जल कृतियों में…

अनुभव यात्रा पर आधारित काव्य कृति ‘लम्हों का सफर’ की कवयित्री डॉ. जेन्नी शबनम जी हैं। ‘भावनाओं के घरौंदे’ डॉ. कुँवर सिंह दिनेश जी द्वारा संपादित स्त्री विमर्श पर आधारित काव्य कृतियों का संकलन है। ‘तेरे इश्क़ में गिरफ्तार हुआ’ डॉ. लालित्य ललित जी का काव्य संग्रह है। वेदना की सरस रागात्मक अभिव्यक्ति ‘घुँघरी’ पारम्परिक और जापानी छंदों से डॉ. कविता भट्ट जी की काव्य-कृति है। सतरंगी सपनों की दुनिया ‘तुम सर्दी की धूप’ रामेश्वर काम्बोज जी की काव्य कृति है।

समय की विसंगतियों से टकराती ‘सोच का मौसम गर्म है’ हरेराम समीप जी का ग़जल-संग्रह है। सामाजिक सरोकार की कविताएँ ‘आलोक के क्षणों में’ डॉ. कुँवर दिनेश सिंह जी की कविताओं का संग्रह है। वैराग्य बोध से उपजी कविताएँ ‘एक यात्रा ऐसी भी’ कैलाशनाथ खंडेलवाल जी की कविता- कृति है। ‘नहीं रहना मुझे पिंजरबद्ध’ डॉ. शिप्रा मिश्रा जी की काव्य -पुस्तक है जिसमें मुक्तिमार्ग की तलाश करती कविताएँ हैं। ‘भूल बैठा हूँ जिसे’ कुछ बेहतर ढूँढती विज्ञानव्रत जी की गजलों का संग्रह है।

 

3 . पारंपरिक छंद एवं जापानी छंदों में…

मन मल्हार गाए’ सुदर्शन रत्नाकर जी का सेदोका संग्रह है। ‘बंद कर लो द्वार’ अभिनव बिम्बों से सजा हाइकु- संग्रह है जिसके कवि रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी हैं। ताँका और सेदोका से सुसज्जित ‘तीसरा पहर’ रामेश्वर काम्बोज जी की पुस्तक है। ‘वर्ण सितारे’ ऋता शेखर मधु का हाइकु संग्रह है। वैश्विक हिन्दी हाइकु का उत्कृष्ट संकलन ‘स्वर्ण शिखर’ के सम्पादक रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी और हरदीप संधु जी हैं। सम्भावनाओं के द्वार खोलते ‘खिले हैं शब्द’ आशा पांडेय जी का प्रथम हाइकु- संग्रह है।

छंद विधान एवं सृजन पुस्तक रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की है जिसे शिवजी श्रीवास्तव जी ने छंद साधना की अनुपम कृति कहा है। भारतीय मिट्टी की सोंधी महक से सुवासित ‘प्रवासी मन’ डॉ. जेन्नी शबनम जी का हाइकु संग्रह है। पुष्पा मेहरा जी का हाइकु संग्रह ‘झील दर्पण’ सरस हाइकुओं की सुंदर झील है।

 

4 . कहानी/ लघुकथा/उपन्यासों में…

डॉ. कुँवर दिनेश सिंह का कहानी संग्रह ‘जब तक जिंदा हैं’ है। ‘पिंजड़ा’ डॉ. पूरन सिंह जी का कहानी संग्रह है। ‘लघुकथा का वर्तमान परिदृश्य’ लघुकथा समालोचना पर रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की पुस्तक है। तटस्थ समीक्षा दृष्टि की कृति ‘निकष: बत्तीस’ स्मृति शुक्ल जी की विभिन्न साहित्यिक कृतियों पर लिखी गई समीक्षाओं का संग्रह है। मुनीश त्रिपाठी जी की कृति ‘विभाजन की त्रासदी’ इतिहास के पृष्ठों का पुनर्मूल्यांकन है। ‘स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की लघुकथाएँ’ सुकेश साहनी जी की कृति है।

समकालीन ग्राम्य जीवन का अनकहा सच ‘अँगूठे पर वसीयत’ शोभनाथ शुक्ल जी का उपन्यास है। बदलाव की कहानियाँ ‘सफ़ेद गुलाब’ हरपाल सिंह ‘अरुष’ जी का कहानी संग्रह है। स्त्री जीवन के संघर्ष की कहानियाँ ‘दहलीज़ के उस पार’ लेखिका अरुण कमल जी का कहानी-संग्रह है।

मुक्तिचेता स्त्रियों की जीवन गाथाएँ ‘सपनों के ढाई घर’ रश्मि शर्मा जी का कहानी-संग्रह है।‘दोष किसका था’ सुदर्शन रत्नाकर जी की कृति है जिसमें मध्यवर्ग की व्यथा-कथा की कहानियाँ हैं।

 

5 . नवगीतों में…

आम आदमी की व्यथा कथा ‘रोटी का अनुलोम विलोम’ शिवानन्द जी सहयोगी जी का नवगीत संग्रह है। ‘सृजन-दृष्टि’  पुस्तक पढ़ते हुए एक साथ कई लेखकों की पुस्तकों से रु-ब-रु होना अनमोल अनुभव है। मूल्यांकन के साथ- साथ प्रकाशक, पृष्ठ, मूल्य और संस्करण वर्ष का संकलन करने के लिए डॉ. शिवजी श्रीवास्तव जी साधुवाद के पात्र हैं। मुझे यह पुस्तक उपहार स्वरूप मिली है और इसमें मेरी पुस्तक ‘वर्ण सितारे’ का भी ज़िक्र होना मेरे लिए हर्ष की बात है। इसके लिए बहुत बहुत आभार। आगे भी यह सृजन दृष्टि बनी रहे।

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Sunday, July 12, 2026

1504

1-नवगीत

मौसम   का  अभिमान /  विज्ञान   व्रत

 


पता   नहीं  अब  

क्या   कर  डाले

मौसम   का  अभिमान  

 

दहशत   में    हैं   जंगल    सारे

सहमे - सहमे     पेड़      बिचारे

                    मन  ही  मन  में

                    घुटते   हैं    बस

                    अब   इनके   अरमान 

 

जड़ी - बूटियाँ   काँप   रही   हैं

इसके   रुख़  को  भाँप  रही  हैं

                    आज  दाँव   पर 

                    लगी    हुई     है 

                    इन   सबकी   पहचान

 

पशु - पक्षी भी  बहुत  विकल हैं

सभी युक्तियाँ  आज  विफल  हैं

                    सन्नाटे में

                    और  डराएँ

                    अनचाहे  अनुमान 

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2- मन बेचारा/ डॉ.सुरंगमा यादव

 


आगत और विगत में उलझा

 वर्तमान से उदासीन मन

 कभी भविष्य के सपने गढ़ता

 कभी अतीत में ढूँढे सुख- क्षण

 जिसने पाया सहज- सहज सब

 उसको भी विश्राम नहीं है

भौतिकता की नेति-नेति में

 जाने क्या पाने की धुन में

 भटका फिरता मन बेचारा

 अधिक,अधिकतर और अधिकतम

गति का कोई ध्यान नहीं है

 हर पथ पर है गति की सीमा

 गति की लय खोना है-

  जीवन की लय  खोना

 संघर्षों के फेज़ में है जो

 सवालिया नजरों में है वो

 राह नहीं जब मिल पाती है

 खीज बहुत खुद पर आती है

  मन कितना विचलित होता है

 विश्वास नहीं खुद पर होता है

  समझेंगे दुनिया वाले

उँगली महज उठाने वाले।

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2-क्षणिकाएँ/ डॉ.सुरंगमा यादव

1

जिसने होठों को सिया है

 दम घुटने का अनुभव

 उसने किया है।

2

 उजियारों के बीच खड़ा

 अँधियारों में डूबा मन

 अपनी ही छत और दीवारों से

पाता मन अपनापन

3

 चाहा बहुत भुलाना  लेकिन

 अतीत खड़ा किरदार या बन

 चोट फिर- फिर चोट पड़े तो

 कब तक बिखरेगा मन।

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3-कविता जीवन का मर्मडॉ.वंदना शर्मा

 

लिखा है क्या हाथों की लकीरों में  

छुपा है क्या इन तकदीरों में  

मिलता है वही, होता है जो नसीबों में  

सिर्फ मेहनत करने से नहीं मिलती सफलता  

खेल विधाता का कोई नहीं समझ सकता  

 

होना था जिस दिन राम का राज तिलक  

हुआ वनवास उसी दिन, लगा कैकेयी पर कलंक  

होनी थी हो गई टाल सका ना कोई  

भविष्य की गर्त में राज छिपे हैं कई  

 

चक्र है ये कर्मिक फल का  

हिसाब है ये कई जन्म का  

नहीं ज्ञात कौ-न सा कर्म  

बदल देगा अगले जन्म का मर्म  

 

रहता है इंसान इसी भ्रम  

'मैं' करता ना समझता कर्म-  

कर्ता करे ना कर सके  

बाल ना बाँका होय

 

जिसकी किस्मत महाकाल लिखे 

उसकी बिगाड़ सके ना कोई  

कब किससे कैसे मिलना है  

कर्मों का फल जरूर मिलना है  

 

दीन सेवा ही परम धर्म है  

अक्षर नाद ही परम ब्रह्म है  

तप वाणी का जिसने किया  

मोह छोड़ पर उपकार किया  

सुधारा उसने अपना कर्म है  

यही जीवन का मर्म है।

-0-डॉ. वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली 

vandna.reporter@gmail.com

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4-अनुरोध/ रश्मि लहर

 


व्यर्थ-सा लगने लगा है

     वर्जनाओं का सघन पथ

        सारथी जीवन के रथ के तुम! 

            तनिक अब ध्यान रखना।

 

हाथ में वल्गा तुम्हारे, दीखते घबराए हो तुम।

साथ में सहचर लिये पर, लग रहे अकुलाए क्यों तुम?

 

ज्ञात तुमको हो ग हैं

     दुःसह सच संबंध के पर;

        हो सके तो समर्पण की 

            वेदना का मान रखना।

 

सुर तुम्हीं ने तो दिया था, स्वप्न की उद्विग्न लय को।

फिर नया जीवन दिया था, शुष्क- सी निस्तेज वय को।

 

तोड़ सकते तंतु हो विश्वास के

     अनुबंध के पर;

         प्रणय के मृतवत अधर पर

            चेतना का गान रखना।

 

सारथी जीवन के रथ के तुम, तनिक अब ध्यान रखना।।

सारथी जीवन के रथ के तुम, तनिक अब ध्यान रखना।।

 

-0- इक्षुपुरी कॉलोनी, लखनऊ-226002

मोबाइल नंबर -9794473806

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Tuesday, May 26, 2026

1503-सुरभि डागर की तीन कविताएँ

 

सुरभि डागर 




1-जीवन की लहरें

 

जीवन सागर-सा गहरा है,

उसमें उठती लहरें हैं।

कभी खुशी की धूप सुनहरी,

कभी दुःखों की पहरे हैं।

कभी किनारे फूल खिलें,

कभी रास्ते काँटों वाले,

कभी हँसी के गीत मिलें,

कभी मौन के बादल काले।

लहरें रुकती कब जीवन में,

चलना ही उनका गहना है।

गिरकर फिर से उठ जाना,

यही मानव का सपना है।

आशा की छोटी-सी नौका,

हिम्मत की पतवार लिये,

मन आगे बढ़ता रहता,

नए उजाले द्वार लिये

जीवन की इन लहरों में,

जो मुस्काना सीख गया,

वह हर तूफाँ से लड़कर,

अपने भीतर जीत गया।

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2-चाँद

 


रात की शांत झील में

धीरे-धीरे उतरता है चाँद,

जैसे किसी माँ की आँखों में

ठहर जाए कोई मीठा ख़्वाब।

उसकी चाँदी-सी कोमल किरणें

छू लेती हैं सूनी राहें,

और थके हुए मन के भीतर

भर देती हैं अनकही चाहें।

कभी वह प्रेमी का संदेश है,

कभी विरह की लम्बी रात,

कभी बच्चों की भोली जिज्ञासा,

कभी कवि के मन की बात।

बादलों की ओट में छिपकर

वह जैसे खेलता हो लुकाछिपी,

धरती की हर धड़कन सुनता,

हर खिड़की पर रखता नज़रें धीमी।

चाँद केवल आकाश नहीं,

मन का उजला एक कोना है,

जहाँ अँधेरों से लड़ने को

अब भी थोड़ा सपना होना है।

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3.सूरज

 

सूरज केवल आग नहीं,

जीवन का पहला स्वर है,

जो हर सुबह

धरती की नींद सहलाकर

उम्मीदों का द्वार खोलता है।

वह खेतों में

सोने-सी फसल बनकर उतरता है,

नदियों में चमकता है,

और बच्चों की हँसी में

एक गर्म उजाला भर देता है।

कभी तपता है कठोर होकर,

मानो संघर्ष सिखा रहा हो,

तो कभी साँझ की लालिमा में

थके हुए दिन को

धीरे से विदा कहता है।

सूरज ने ही सिखाया है—

हर डूबना अंत नहीं होता,

हर अँधेरे के बाद

एक नई सुबह जन्म लेती है।

वह आकाश का यात्री है,

जो बिना रुके, बिना थके

सदियों से चल रहा है,

निरन्तर इस संसार में