पथ के साथी

Friday, November 22, 2019

बुद्ध और नाचघर


 13 अक्तुबर, 2011एक पुरानी पोस्ट आपको भेंट। हरिवंशराय बच्चन जी की कविता, एक बार ज़रूर सुनिए और वाचन की उत्कृष्टता भी देखिए। निम्नलिखित लिंक क्लिक कीजिए-



Thursday, November 14, 2019

937-मन से मन का नाता


मन से मन का नाता
डॉ. सुरंगमा यादव

मैं रख लूँगी मान तुम्हारा
तुम मेरा मन रख लेना
दर्द अकेले तुम मत सहना
मुझसे साझा कर लेना
मन की बात न मन में रखना
तुम चुपके से कह देना
मैं अपना सर्वस्व लुटा दूँ
नेह तनिक तुम कर लेना
देह कभी मैं बन जाऊँगी
तुम प्राणों-सा बस जाना
तुम से ही जीवन पाऊँ मैं
साँसों की लय बन आना
अनादि प्रेम की फिर अनुभूति
अन्तर्मन को दे जाना
देह बदलकर वेश नया धर
जग में हम फिर-फिर आएँ
गीत पुरातन बही प्रेम का
फिर मिलकर हम दोहराएँ
प्रीत पुनीत करे जो जग में
विधना के मन को भाता
देह से बढ़ कर होता है
मन से मन का एक नाता
-0-

Thursday, November 7, 2019

936


1-स्मृतियों के घेरे में / कृष्णा वर्मा

जब-तब घिरे स्मृतियों का कोहरा
सन्नाटों में धड़कता मौन
पलटने लगता है अतीत के पन्ने
किसने कब क्यूँ कहाँ और कैसे को
कुरेदता मन
झाँकने लगता है बीती की तहों में
किसके छल ने डसा और
किसके व्यंग्य ने भेदी आत्मा
किसने उकेरने चाहे
मेरे तलवों की ज़मीं पर अपने नक़्शे
कौन मेरे पाँव की ज़मीं खिसकाकर
बनाने के प्रयत्न में था अपना महल
किसने चलाए मेरे वक़्त पर
तिरछे बाण और
किसने बँधाया मेरी अस्थिरता को धीर
किसके हाथों का स्पर्श दे गया
कांधे को आश्वासन
किसकी हथेली की उष्मा दे गई
अपनापे की गरमाहट मेरी ठंडी हथेली को  
किसने निभाया दिली रिश्ता और
किसने औपचारिकता
कौन था जिसने ज़ख़्मों को भरा
और किसने उन्हें कुरेदा
किसने दी भर-भर के पीड़ा और किसने हरी
आंकलन करता समीक्षा में उलझा
पगला मन भूल जाता है
कुहासे को छाँटना
अतीत की डबडबाहट में भीगी पलकें
बार-बार लग जाती है
गुलाबी डोरों के गले
कतरा-कतरा सोज़ 
उड़ेलकर कोरों के काँधों पर
छाँटना चाहती हैं तुषारावृत को
पर यादों का समंदर है कि सूखता ही नहीं
हठी स्मृतियाँ इंतिहा मजबूती से
थामे जो रहती हैं मन की अँगुली।
-0-
2-फ़ेहरिस्त -प्रीति अग्रवाल

एहसानों की फ़ेहरिस्त
बड़ी हो रही है,
माथे पे चिंता
घनी हो रही है।

अभावों में डूब
तिनके ढूँढती हूँ जब,
हौली सी आवाज़
कानों में गूँजती है तब,

मेरा खुदा सकुचाया सा
मुझसे कहे-
क्या करूँ , ये सारे,
करम हैं तेरे।

पर रुक, कुछ फ़रिश्ते
भी संग कर रहा हूँ,
हिफ़ाज़त के सारे
प्रबन्ध कर रहा हूँ।

तुझे पंखों पे बैठा,
ले जाएँगे उस पार,
लगी, तो लगी रहने दे
अभावों की कतार!!

किस सोच में खड़ी
क्या कोई असमंजस,
इक फ़रिश्ते ने पूछा
काम से रुककर।

अभाव जितने,
उनसे दुगुने फ़रिश्ते,
कर्ज़ कैसे अदा हो
ये दुविधा बड़ी है !

मुस्कुराया और सुझाया,
है यह भी तो सम्भव,
तू फ़रिश्ता थी हमारी
जन्मों जन्म तक!!

एहसान तेरे
चुकाए जा रहे हैं,
कर्ज़ न कि तुझ पर
चढ़ाये जा रहे हैं ।

ऐसा तो पहले
सोचा ही नहीं था,
खुश हुई मैं,
और मेरा खुदा भी खुश था!!!
-0-
3-दोहा /मंजूषा मन

दूर बसे परदेस तुम, मिलने की क्या आस।
माँगूँ निशदिन ये दुआ, आ जाओ अब पास।।
-0-

Sunday, November 3, 2019

935-पतझड़ को सांत्वना


सविता अग्रवाल 'सवि' (कैनेडा)

गर्मी का मौसम जाते ही
वसुधा में भी थी हरियाली
छायाचित्र; प्रीति अग्रवाल
बैठा सूरज देख रहा सब
सूझी उसको एक ठिठोली
भर- भर कर पिचकारी रंग की
ऊपर से ही दे दे मारी
कहीं गुलाबी, पीला, नीला,
लाल, जामुनी रंग बिखेरा
कलाकार की कलाकृति-सा
कैनवास पर चित्र उकेरा  
देख- देखकर क दूजे को
वृक्ष खुद से ही शरमा
लेकर बारिश की कुछ बूँदें
धो -धो तन को खूब नहा
रगड़ा तन को इतना तरु ने
पत्ता भी क टिक ना पाया
हो क्रोध में लाल और पीला
जाकर सूरज से वह बोला-
खेल खेलकर तुमने होली
अपना तो आनंद मनाया
पर मेरी हालत तो देखो
तिरस्कृत करके मुझे रुलाया
धरती पर अब कोई मुझको
देख नहीं खुश होता है  
मानव की जर्जर काया से
मेरी उपमा करता है
पतझड़ में आक्रोश था इतना
कचहरी में सूरज को लाया
इलज़ाम लगा उसने इतने
सुनकर सब, सूरज मुस्काया
छोड़ -छाड़कर जिरह कचहरी
सूरज पतझड़ के संग आया
गले लगाया, चूमा माथा
पतझड़ को उसने सहलाया
छोड़ क्रोध, अब सोचो तुम भी
कितने रंग दिए हैं तुमको
देख तुम्हारे रंग अनोखे
जग सारा कितना हर्षाया
बोला सूरज पतझड़ से तब
समझो मेरी भी मजबूरी
शरद ऋतु से किया है वादा
उसको भी है मुझे निभाना
धरती पर कुछ दिन उसको भी
अपना है आधिपत्य जमाना
तुमसे भी मैं वादा करता
नया नाम मैं तुमको दूँगा 
खोया जो तुमने अपना है
सब कुछ मैं वापिस कर दूँगा
बसंत नाम से तुम फिर आकर
धरा पर जाने जाओगे
नव पत्तों और नव कलियों- संग
खिल खिलकर हँस पाओगे
बनकरके ऋतुओं का राजा
जग में पूजे जाओगे
देखूँगा मैं ऊपर से ही
जब स्वयं पर तुम इतराओगे।
          -सविता अग्रवाल ‘सवि’ (कैनेडा)
 दूरभाष : (९०५) ६७१ ८७०७ 
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Friday, October 18, 2019

934

[डॉ .सुधा गुप्ता  हिन्दी काव्य-जगत् की वह अकेली रचनाकार हैं , जिन्होंने हाइकु को जिया है  तथा हिन्दी -काव्य-जगत् को ऊँचाई प्रदान की है। इन्हें विश्व के श्रेष्ठ रचनाकारों में रखा जा सकता है। कुछ चुने हुए हाइकु प्रस्तुत हैं]


डॉ .सुधा गुप्ता
1
गूँगी सुबह
बहरी दोपहरी
अन्धी है रात ।
2
चन्द तिनके
चिड़िया का हौसला
बना है घर ।

ओम चैतन्य शर्मा

3
चाँद जो आया
बल्लियों उछला है
झील का दिल ।
4
चुप है नदी
कुछ भी न कहती
बस, बहती ।
 5
जमी है झील
शिकारे सहमे -से
खड़े हैं मौन।
6
जागी जो कली
‘राम-राम सहेली’-
धूप  से बोली ।
7
तट पे जलीं ।
धू-धूकर आशाएँ
नदी उदा।
8
तारों की  हँसी
हँसता है आकाश
लगती भली ।
 9
ताल भरा है
फैले जल-कुन्तल
तैरती मीन ।
10
सयानी बया
जुगनू से रौशन
घर को किया ।
11
हँसता प्रात
दोपहर झींकती
शाम छींकती ।
12
हवा ने आके
कान में कुछ कहा
नीम नाचता ।
-0-




Saturday, October 12, 2019

933-मेपल से भी कभी पूछना

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’


बाहर भीतर कोलाहल है
ढेर गरल, कुछ गंगाजल  है।
सबको में पहचानूँ कैसे
सबके द्वार मची हलचल है।


दर्पण-सा मन बना ठीकरा
जग में माटी के चोले का ।
दो कौड़ी भी दाम मिला ना
अरमानों के इस झोले का।

बरसों बीते पत्र पुराने
झोले में थे खूब सँभाले
जिनका अता-पता ना जाने
उनको कैसे करें हवाले।

छाया-हिमांशु
कोई तो बस दो पल दे दे
खुद से ही कुछ कर लें बातें
अब उनसे क्या कहना हमको
दी जिस-जिसने काली रातें

मेपल से भी कभी पूछना
निर्जन वन है कैसे भाया
पतझर जब आ बैठा द्वारे
कैसे उसने पर्व मनाया!
-0-

Monday, September 23, 2019

932-हिम्मत हमारी


 रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

1
पता चला कोई मुझसे  क्यों दूर था।
बुरा न सोचा कभी ,इतना कुसूर था।
2
पीठ में खंज़र मारा और  फिर हँस दिए।
दोस्ती का यह सिला कोई आपसे सीखे।
3
आँधियाँ, और लहरें तोड़ती किश्ती
चाहकर हिम्मत हमारी तोड़ ना पाई।
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Monday, September 16, 2019

931


भावना सक्सैना

सपने बीजते हैं...

सड़क किनारे 
उग आई बस्तियों में भी 
होते हैं वही सुख-दु: 
सपने, आस-उम्मीदें।

  चित्र; प्रीति अग्रवाल,
आसमाँ को काटती
ईंटों पर धरी टीन 
कतर नहीं पाती 
पंख सपनों के।

टीन- तले पसरी भूमि 
होती नहीं है परती।
उसमें गिरे स्वेद-कण
बीजते, पनप जाते हैं

बाँस के कोनों पर बँधे 
तिरपाल की टप-टप से
नम भूमि में जन्म लेती है 
असीम संभावनाएँ

झिंगोले में पड़े बूढ़े पंजर
होते हैं सपनों की कब्रगाह
आँखें मगर उलीच पाती नहीं
भविष्य की संभावनाएँ

अनकही दास्ताँ दर्द की
देती है दंश बार-बार
उफनते हैं सीने में
अधूरे ख्वाबों के खारे समंदर

मेहनतकश बाजुएँ
झोंक देती हैं जान,
हार जाती हैं अक्सर
करते बुर्जुआ बुर्जों का निर्माण।

फिर भी सपने बीजते
पनपते रहते हैं
जीते रहने के लिए
हौसला मन को दिए रहते हैं।

-0-