पथ के साथी

Sunday, August 18, 2019

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प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'

1-सिर्फ़ मैं

ये अहं ,
बड़ा दुखदायी है,
अजगर सी ,
कलस्याही है,

जिससे इसको 
दूध पिलाया,
समझो लिखी
जुदाई है!
                              
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2: रज़ामंदी

सोचती हूं क्या माँगू?
जो तूने ,
एक ह का
हकदार किया!

चल,
यों कर मौला-
तेरी रज़ा 
और मेरी रज़ा
एक हो जाए!

कभी तू कहे
तो मैं मान जाऊँ,
और कभी मैं कहूँ
तो तू मान जाए!!
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3-क़्त

समझने लगी हूँ
वक्त को
वक्त की नज़ाकत को !

सोचती तब भी थी
सोचती अब भी हूँ,
बस
ज़ाया हो वक़्त
ये हिमाकत नहीं!!
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4- बधाई

अम्मा जी बधाई
घर आपके,
लक्ष्मी है आई!!
अम्मा हर्षाई।

बाबा तुनके,
बोझा है ढोना
जो सारी उमर,
शर्फ़ी की बोरी
कहने से,
क्या होगा कम!!??
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5-पतंग

मैं रंगीली
और मनचली
नील गगन
की और उड़ी!

फिक्र मुझे
न धरा पड़ूँ,
न शून्य में
खो जाने का।

मैं इतराऊँ
मन मुस्काऊँ,
डोरी तेरे
हाथ थमी !!
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6- श्याम बसेरा (ब्रज भाषा में)

देख ले हरिया-
मोरे मन श्याम बसेरा,
पहले ही दीजू कहाए,
अब ब्याहे ,तो ब्याह ले!!

हरिया हासा -
ले मिल गई जोड़ी
मेरो मन भी श्याम समाए!!!
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7- मैं

ये 'मैं' की अकड़,
ये 'मैं' की तड़ी,
देखो न कितनी 
भारी पड़ी!

मकड़ी हो जैसे
जाल मे फँसी,
दुनिया ये सारी,
अकेली खड़ी!!
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8-सूझबूझ

मिल बैठ ग्वलनियाँ
करे सुझाई,
किसना नाम 
कोई मत राखियों
घनो सतावै!!

राम दुहाई!
कैसी मत बिसराई,
गाँव भर अब,
गोपाल गोविंद,
मुरारी कन्हाई!!
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