1-गीत / लिली मित्रा
छुपकर पलकों के पट से
ढलक गए दृग जल- से तुम
व्याकुल प्रेमिल सघन भाव से
पथ पर बिखरे हृदय कुसुम
गुंजित मउमाछी की गुनगुन
पुष्प- पुष्प के कर्णों में
जैसे तुम खुसफुस हो करते
मधु मिश्रित से वर्णो में
झंकृत सुर में होकर गुम
पथ पर बिखरे हृदय कुसुम
छुपकर पलकों के पट से
ढलक गए दृग जल से तुम
शरत् काल के श्वेत मेघ बन
पवन वेग संग उड़ते हो
थामे स्व में शिशिर आर्द्रता
लुक-छिप, लुक-छिप करते हो
थिरक उठे हैं जब खग द्रुम
पथ पर बिखरे हृदय कुसुम
छुपकर पलकों के पट से
ढलक गए दृग जल से तुम
-0-
2-चिड़ी-ताल / लिली मित्रा
मैने बहुत ही सामान्य-सी एक इच्छा पाली
जो लगती थी कि बहुत ही छोटी-सी बात होगी
पर ऐसा नहीं था-हाँ सच में...!
मैंने अपने आँगन की दीवार पर मिट्टी के दो पात्र रखे
उसमें भरकर रखा पानी,
और मैं हर रोज़ करने लगी प्रतीक्षा
नन्ही चिड़ियों की
कोई तो आए तपती झुलसती गर्मी में
पानी से भरे कटोरे में छपक छपक...
चीं चीं... करते हुए ख़ुद को भिगोए,
नहाए और छितरा दे ख़ूब सारा पानी चारों ओर
और भरकर तरोताज़ा उड़ान हो जाए फुर्र...
रही रोज़ ताकती-झाँकती मैं...
कभी रसोई की खिड़की से
कभी दरवाजे की ओट से।
एक लंबी प्रतीक्षा के बाद-
अब मेरे बनाए छोटे से चिड़ी-ताल में
डुबकी मारती चिड़ियों के चहचहाते झुंड
मुझे देकर जाते हैं एक उन्मुक्त उच्छ्वास...
एक इत्मीनान- भरी मुस्कान।
मेरे मन की चिड़िया भी
नहाकर इस सौंधे पानी में
फुर्र हो जाती है इन नन्ही चिड़ियों
के साथ एक उन्मुक्त सफ़र पर
-0-
