पथ के साथी
Saturday, January 10, 2009
अधिकारियों की हड़ताल
अधिकारियों की एक हड़ताल ने पूरे देश को बन्धक बना लिया है । करोड़ों लोगों को हैरान और परेशान करने वाले ये अधिकारी लगता है देश और जनता दोनों दे भी ऊपर हो गए हैं । ऑटोचालक से लेकर दफ़्तर जाने वाले सभी कर्मचारी परेशान ,एम्बुलेंस से अस्पताल जाने वाले परेशान : अधिकारियों का वेतन जो नहीं बढ़ा । इस तरह के आतंकवादी अधिकारी अपने वेतन को बढ़ाने के लिए पूरे देश को ही ब्लैकमेल करने पर तुले हैं ।इन्हें जो भी दण्ड दिया जाए वह कम है । क्या इन्हें रोटी के लाले पड़ गए हैं ? यदि नहीं तो इन्हें किसी की रोटी से खेलने का अधिकार किसने दिया ? क्या ये उन रोटी से वंचित रहने वाले ऑटोचालकों या अन्य कर्मियों की रोज़ी का खमियाज़ा भुगतेंगे ? दफ़्तरों के नुकसान का हिसाब-किताब देंगे ? नहीं ,तो क्यों नहीं ?इन्हें इनका प्रस्तावित वेतन देकर देश की सीमा पर भेज देना चाहिए तब इनको मालूम होगा कि नौकरी क्या चीज़ है । वातानुकूलित कक्ष में बैठकर ऐसा मज़ाक करना आसान लगता है । इन अड़ियल अधिकारियों के साथ वही व्यवहार होना चाहिए जो आतंकवादियों के साथ होता है ,क्योंकि इनका व्यवहार उनसे भी बदतर है ।
इस देश में ऐसे भी अधिकारी हैं ,जिनकी केवल सालाना वेतन-वृद्धि 36 लाख तक या ज़्यादा भी है ; जबकि भारत के महामहिम राष्ट्रपति जी का वार्षिक वेतन भी इतना नहीं है । ।आखिर जनता के पैसे पर ये लोग कब तक मौज़ करते रहेंगे ?
भाषा के बल पर उन्नति
Monday, December 15, 2008
अविश्वस्ते न विश्वसेत्
अविश्वस्ते न विश्वसेत्
पाकिस्तान पर भरोसा न कर हमें अपनी कार्यनीति व्यावहारिक और सुदृढ़ बनानी चाहिए ।ज़रदारी जी सुबह जो बयान ज़ारी करते हैं ,शाम होने तक उस से मुकर जाते हैं ।वे वहाँ की आम जनता के प्रति ज़वाबदेह न होकर सेना और आइ एस आई के प्रति ज़्यादा ज़वाबदेह हैं ।लगता है आज न सेना उनका हुक़्म मानने को तैयार है और न आई एस आई ।आतंकवादियों का और इस गुप्तचर शाखा का नाखून और मांस का रिश्ता है ।ऐसे हालात में ये इन तीनों में से किसी के भी विरुद्ध नहीं जा सकते ।जिस दिन विरोध में जाएँगे ,उस दिन किसी दूसरे देश में जाकर ठिकाना ढूँढ़ना पड़ेगा;पाकिस्तान का अतीत इसी बात की पुष्टि करता है। ऐसी कौन -सी लोकतान्त्रिक सरकार रही है ,जिसने फ़ौज़ के सामने घुटने न टेके हों ?कोई माँ अपने पोषित बच्चे को मार सकती है क्या?फ़िर हम पाकिस्तान से कैसे उम्मीद लगाए हुए हैं कि वह अपने आतंकी बच्चे को मारे ।क्या पालकर पहलवान इसलिए बनाया था कि भारत के कहने पर उसे मार दे ?पाकिस्तान का फ़ौजी शासक यह काम नहीं कर पाया तो बेचारे ज़रदारी क्या खाकर यह काम करेंगे ?हम भारतवासी इस ग़लतफ़हमी से निकलें और खुद कठोर एवं कूटनीतिक क़दम उठाएँ ।
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'