पथ के साथी

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Tuesday, December 23, 2014

दो कविताएँ




सुभाष लखेड़ा

1 - कड़ुवा सच :

उसने विकास के लिए
लोगों से  वायदे किये
जीत गया वह चुनाव 
बढ़ते गए उसके भाव 
ऊँचा हो गया जब कद  
मिला उसको मंत्री पद
उसका हो गया विकास  
सब कुछ है उसके पास 
उस जैसों की वजह से 
देश का हुआ सत्यानाश।
-0-

2 - मौत के बाद 

अपने बड़े विदा लेते रहे
हम उस पीड़ा को भोगते रहे 
जीवन -चक्र चलता रहा
उम्र का बोझ बढ़ता रहा
साल दर साल 
 " जन्म दिन मुबारक हो "
निरंतर  सुनता रहा
फिर आया वह वक़्त 
जब मिले हमें वे सभी बिछड़े वहाँ
एक दिन सभी को जाना है जहाँ।
-0-



Sunday, October 12, 2014

प्यारी -सी मुस्कान



1-आपसे अर्ज है
                       
सुभाष लखेड़ा 

सुनिए ! आपसे एक अर्ज है
ऐसा कहना मेरा फ़र्ज़ है
क्योंकि है मेरी चाह
आज से चलें नई राह
दिखे जो सामने
उसे आप दीजि
एक ऐसी सौगात
जो खरीदनी नहीं है
न आपको जाना कहीं है
रहे आपके पास दिन - रात
आप उसे दें सिर्फ एक प्यारी -सी मुस्कान
आप यदि ऐसा करेंगे
यकीन करें, खुशियों से
महक उठेगा हम सभी का  हिदुस्तान।
 -0-
2-काश !

कृष्णा वर्मा

कितने सुहाने मस्ती भरे अभ्रक- से
चमकीले दिन थे बचपन के
छोटी-छोटी चीज़ें बड़ी-बड़ी खुशियाँ
हल्के-फुलके बस्ते भारी ज्ञान
संस्कारों की छाँव तले ठुमकता था
नन्द ही आनन्द चहुँ ओर
बस्ते में होती थीं केवल
दो किताबें दो कापियाँ
एक पक्के और एक कच्चे काम की
एक टीन की रंग-बिरंगी आयताकार डिबिया
या यूँ कहें कि पेंसिलदानी
उसमे एक आधी और एक पूरी नई पेंसिल
और गढ़ने को एक शार्पनर
दो रबड़ एक इत्र से भरा खुशबूदार 
और एक सादे रंग का
कितनी खुशी बाँटते थे दोनों
एक अपनी महक से और दूजा
मेरी गलतियों को मिटा के
जहाँ ज़रा गलती हुई नहीं कि
झट से पन्ना साफ 
वह फिर नया का नया
फिर उकेरती नए शब्द
कितना भला लगता था
जीवन की सहज  कच्ची पगडंडियों पर चलना
कितनी भली बेख़बर सी थी उम्र
चिंता की परिभाषा से निपट अंजान
भरे थे जिसमें कोमल एहसास
अल्हड़ सपने जादू और सौ-सौ रंग
कोई भी गलती कितनी
आसानी से मिट जाती थी
चली ज्यों-ज्यों उम्र की पक्की राहों पे
पग-पग सोचों की खूँटी पे
टँगा पाया अनगिन प्रश्नों को
उलझ के रह गए सवालों के रेशे
खिंच गईं कई आड़ी-तिरछी लकीरें
काश! मिल जाता कोई
अब भी ऐसा रबड़ जो मिटा डालता
इन दुख चिंता भय और
नफरत की लकीरों को
साफ हो जाता हृदय का पन्ना पुन:
उस कॉपी के पन्ने की तरह ।
-0-

Sunday, July 27, 2014

अनुभवों का ताप




सुभाष लखेड़ा
  1 - सृजन

जब बर्दाश्त न हुआ
उनसे गरीबों का दर्द
उन्होंने कलम चलाई
कुछ ही देर में
वह कविता बनाई
जो आज कहीं छपी है
वे बहुत खुश हैं
गरीबी की आँच पर
उनकी पहली रोटी पकी है ।
-0-
2-देर से ही सही
   
अचानक आज न जाने क्यों
मैं अपने बारे में सोचने लगा
वर्षों तक मैं अपने को छोड़
शेष लोगों के बारे में सोचता रहा
मुझे सभी में कमियाँ र आती रहीं
मैंने उनके लिए कड़वी बातें कहीं
मुझे उनमें  स्वार्थ नज़र आता था
मुझे उनकी प्रशंसा खलती रही
मैंने उनके बारे में गलत बातें  कहीं
जब मैंने खुद के बारे में सोचना शुरू किया
जान गया मैंने दुनिया को कुछ भी नहीं दिया
अगर कभी कुछ दिया
सिर्फ एक व्यवसायी की तरह दिया
जो दिया उसके बदले कुछ लिया
मैं बातें करने में माहिर होता गया
सच तो यह है कि मैं जो दिखता हूँ
वह सभी कुछ नकली है
मैं अपने स्वार्थ साधता रहा 
मेरा यही रूप असली है
शुक् है कि देर से ही सही
मैं खुद को पहचान गया
खुशी है  मैं आपको न सही
खुद को तो जान गया ।
-0-
2- रेखा रोहतगी
1-विरोध

उसके कंधे से कंधा मिलाकर
मैं चल सकूँ
इसके लिए
उसने हर संभव प्रयास किया
और मुझे चलना सिखाया
पर यह क्या  ?
मैं तो उससे आगे निकल गई
अब- ?
अब उसे यह ज़राभाया
मेरे विरोध में
सबसे पहले वही आगे आया
-0-
2- तुम नही हो तो


तुम नहीं हो तो
मौसम खुला है
और वातावरण शांत है
     न संवाद है
   न परस्पर विवाद है
न कोई अपवाद है
तुम  .............
मिलने की न व्यग्रता है
बिछुने की न आशंका है
प्रतीक्षा भी अब  समाप्त है
तुम................
  न बिंदिया है
न चूडियाँ हैं
न पायल की झंकार का  व्यवधान है
तुम नहीं हो तो
व्यस्तताओं के बीच भी
अवकाश ही अवकाश है
मौसम खुला है
और वातावरण  शांत है
तुम नही हो तो
मन में मेरे न कोई संताप है
तुम्हारी दी गई दृष्टि
तुम्हारे नेह की वृष्टि
तुम्हारी रचित सृष्टि
सभी कुछ तो मेरे साथ है
तुम नही हो तो
तुम्हें  सोचने को
और
तुम्हें  याद करने को
मेरे पास समय पर्याप्त  है
तुम नहीं हो तो
मौसम खुला है
वातावरण शांत है ।
        -0-


3-पुष्पा मेहरा


पिता की स्मृति में

 कल-कल, छल-छल नदिया समान
 था प्यार पिता का,
 थकी न कभी अनुपम, अगाध -
 वात्सल्य-धार- उनके हृदय की
 फूल- बिछौना थी कोमल वह -
 गोद पिता की ।

 बिना-बताए  मन की बातें
 सदा समझने वाले
 अभिलाषाओँ की एक डाल पे
 सौ-सौ फूल खिलाते ।

 मेरे बचपन की  भोली बातें
 अक्सर हँस-हँस मुझे बताते
 माँ के साथ मिल-बैठ कर
 मेरा बचपन  मुझको  याद दिलाते ।

 दुखों के साये से बचाते,
 सुख के मोती रोज़ लुटाते,
 व्यस्त जीवन की धूपा-छाहीं में
 वे सदा मुसकाते रहते 
 जान न पाई मैं -
 पिता की बगिया में जन्मा,
 वह प्यारा मृगछौना बचपन
 कब और कहाँ मुझसे बिछुड़ गया!

 बढ़े कदम, पा लक्ष्य- सुदृढ़
 ले दूरदॄष्टि पिता की
 पथ के बीच सँभल मैं-
 पा गयी लक्ष्य भी ।

 गहन चिंतन, अनुभव - आलोड़न
 से निखरा उनका जीवन -
 त्याग-प्रेम के अनुबंधों का
 प्यारा सा संगम ,
 स्नेह-धार से आप्लावित था
 रिश्तों का पूरा आँगन ।

 बट-वृक्ष समान सघन यादो का साया
 मेरे माथे के श्रम-बिंदु
 आज भी पौंछने को
 आतुर लगता ।

 हे पिता ! तुम्हें देवता कहूँ
 या देवतुल्य कहूँ
 यह अबतक समझ न पाई मैं -
 पर  मन - दर्पण में सम्पूर्ण तुम्हारा-
 झलमल-झलमल जो झलक रहा
 उसकी कांति मुझको
 रह-रह यह अहसास कराती है-
 हे पिता ! तुम देवतुल्य नहीं
 देव-रूप में जन्मे थे ।

 कर्मरथ चढ़े  परसेवा , परोपकार में
 सदा तुम समय का मूल्य चुकाते थे

 तुम्हारी यादों की अक्षुण्ण ज्योति
 मन की देहरी पर
 अब तक रोज़ जलाती हूँ
 मधु-भावों का नैवेद्य सदा
 श्रद्धा से  अर्पित करती हूँ ।
 -0-