पथ के साथी

Monday, September 14, 2026

1525-मेरी पहचान हिन्दी

 

शशि पाधा, वर्जीनिया, यू एस ए  

 

 माँ की ममता की छाया- सी 

अधरों की  पहली भाषा है।

हिन्दी ही मेरी बाल सखा- सी 

इस जीवन की परिभाषा है

 

अक्षर-अक्षर दीप जले हैं 

अर्थ -अर्थ उजियारा है 

हाथ कलम जब- जब भी थामी 

हर शब्द को सँवारा है 

 

बोलूँ तो कितना अपनापन 

सोचूँ तो प्रेम समाया है 

सात समन्दर, पर्वत लाँघे 

भाषा ने  बाँध बनाया  है ।

 

युगों- युगों से अविरल बहती 

हिन्दी ही गंगा- धारा है 

सूर कबीरा , तुलसी मीरा

ज्ञान सभी का न्यारा है 

 

माटी की सोंधी खुशबू इसमें 

दादी की कथा कहानी है   

माँ की लोरी, सीख पिता की 

तुझसे ही सीखी - जानी है 

 

दूर देश की धरती पर जब 

मन ढूँढे कोई अपना  घर 

 तब गा लूँ कोई गीत पुराना 

बाहों में भर ले , तू आकर 

 

जब तक मन में शब्द रहेंगे 

जब तक साँसें-धड़कन हैं

ओढूँ- पहनूँ रंग तेरे ही 

 तू माथे का  चन्दन है

 

नई सदी के नए शब्द भी 

हिन्दी में आन समाए  हैं 

भरती रहती निधियाँ इसकी 

हर देस में दीप जलाए हैं

 

यही हमारी पूँजी अक्षय 

हम सब की यही धरोहर है 

हमें मिले संस्कार इसी से

हिन्दी  ही ज्ञान सरोवर है 

 

पीढ़ी बदले समय बदलता 

चाहे बदले घर परिवेश

जब तक हिन्दी संग रहेगी  

 संग रहेगा भारत देश 


कहीं  किसी भी  देश में जाऊँ 

यह मुझको पास बिठाएगी 

 उँगली थामके  मेरी यह 

  अपने घर तक  ले जाएगी



माँ की बोली, मन की भाषा 

देवों का वरदान  है हिन्दी 

मुझमें- इसमें अंतर कैसा 

मेरी तो पहचान है हिन्दी

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1524-जय हिंदी, जय जय जय हिंदी!

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव


जय हिंदी
, जय जय जय हिंदी

भारत माँ की सुन्दर बिंदी।

सबसे प्यारी भाषा हिंदी

 

सबके मन को भाती हिंदी

सब पर प्यार लुटाती हिंदी

मीठे बोल सिखाती हिंदी

सबको गले लगाती हिंदी

 

गंगाजल- सी पावन है

तुलसी की रामायन है .

है कबीर का ज्ञान यहाँ

सूरदास रसखान यहाँ

 

हिंदी का हम मान बढ़ाएँ

मिलकर इसका यश फैलाएँ

हिंदी का हम दिवस मनाएँ

एक साथ सब मिलकर गाएँ

 

जय हिंदी,

जय जय जय हिंदी!

भारत माँ की सुन्दर बिंदी।

सबसे प्यारी भाषा हिंदी

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