पथ के साथी

Friday, October 18, 2019

934

[डॉ .सुधा गुप्ता  हिन्दी काव्य-जगत् की वह अकेली रचनाकार हैं , जिन्होंने हाइकु को जिया है  तथा हिन्दी -काव्य-जगत् को ऊँचाई प्रदान की है। इन्हें विश्व के श्रेष्ठ रचनाकारों में रखा जा सकता है। कुछ चुने हुए हाइकु प्रस्तुत हैं]


डॉ .सुधा गुप्ता
1
गूँगी सुबह
बहरी दोपहरी
अन्धी है रात ।
2
चन्द तिनके
चिड़िया का हौसला
बना है घर ।

ओम चैतन्य शर्मा

3
चाँद जो आया
बल्लियों उछला है
झील का दिल ।
4
चुप है नदी
कुछ भी न कहती
बस, बहती ।
 5
जमी है झील
शिकारे सहमे -से
खड़े हैं मौन।
6
जागी जो कली
‘राम-राम सहेली’-
धूप  से बोली ।
7
तट पे जलीं ।
धू-धूकर आशाएँ
नदी उदा।
8
तारों की  हँसी
हँसता है आकाश
लगती भली ।
 9
ताल भरा है
फैले जल-कुन्तल
तैरती मीन ।
10
सयानी बया
जुगनू से रौशन
घर को किया ।
11
हँसता प्रात
दोपहर झींकती
शाम छींकती ।
12
हवा ने आके
कान में कुछ कहा
नीम नाचता ।
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Saturday, October 12, 2019

933-मेपल से भी कभी पूछना

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’


बाहर भीतर कोलाहल है
ढेर गरल, कुछ गंगाजल  है।
सबको में पहचानूँ कैसे
सबके द्वार मची हलचल है।


दर्पण-सा मन बना ठीकरा
जग में माटी के चोले का ।
दो कौड़ी भी दाम मिला ना
अरमानों के इस झोले का।

बरसों बीते पत्र पुराने
झोले में थे खूब सँभाले
जिनका अता-पता ना जाने
उनको कैसे करें हवाले।

छाया-हिमांशु
कोई तो बस दो पल दे दे
खुद से ही कुछ कर लें बातें
अब उनसे क्या कहना हमको
दी जिस-जिसने काली रातें

मेपल से भी कभी पूछना
निर्जन वन है कैसे भाया
पतझर जब आ बैठा द्वारे
कैसे उसने पर्व मनाया!
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