पथ के साथी

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Tuesday, June 9, 2020

1004



हरियाली फूल मौसम
रचना श्रीवास्तव


हरियाली फूल मौसम और आसमान
मुँडेरें इनकी हैं जीवन का उपमान

धरती के मुखड़े पर
बादल की छाँव
आज देखा शहर में
हँसता एक गाँव
लौट आ घर को ,
भटके मेरे अरमान
हरियाली फूल मौसम और आसमान

नदी के आँगन फिर
उतरा आज चाँद
भागे तारे
अम्बर की खिड़की फाँद
चौखट पर इनकी
उगता नहीं अभिमान
हरियाली फूल मौसम और आसमान

इंद्रधनुष ने दिए
हवा को अपने रंग
खेतों की चूनर
लहराई उनके संग
इनके तले ही
पलते मेरे अरमान
हरियाली फूल मौसम और आसमान।   
  [ चित्र; प्रीति अग्रवाल]

Wednesday, February 5, 2020

953-सैनिक की पाती


रचना श्रीवास्तव 

मेरे लहू की गर्मी से जब बर्फ पिघलने लगे
पानी जब लाल रंग में बहने लगे 
तब समझ लेना तेरा एक और बेटा शहीद हो गया 
तेरी रक्षा की खातिर एक और हमीद खो गया 

लौटना चाहता हूँ घर मैं भी माँ पर देश को मेरी जरूरत है 
सिखाया था तूने ही इस माँ से पहले वह माँ है 
मारते हैं सैनिक ही चाहे इस पार  हो या उस पार 
फिर है ये कौन जो बीज नरत के बो गया 

तिरंगे में लिप लौटूँ, तो गले मुझको लगा लेना 
आँसू एँ आँखों में तो आँचल में उनको समा लेना 
मान से उठे पिता के मस्तक पर तिलक लगा देना 
हर जाता सैनिक रख बंदूक पर सर सो गया। 

सावन की हरियाली जब घर तेरा महकाए 
राखी पर जब बहन कोई घर लौटकर आए 
यादों के झुरमुट से तब चेहरा मेरा झाँकेगा 
समय की धार ने था जिसको अभी धो दिया ।


Saturday, August 29, 2015

बहना मेरी



1-कमला निखुर्पा
1
लुटाती रही 
बचपन की मस्ती
कितनी सस्ती ।
2
मीठी मिसरी
कभी मिर्ची -सी तीखी
बहना मेरी ।
3
हुए पराए
माँ के कोख जाए
कच्चे धागे ।
4
नेह की  डोर
अनजाना बंधन 
मन विभोर ।
-0-
2-रचना श्रीवास्तव
1
चाँद सजाये
भाई तेरा ये घर
तारों के संग
2
ख़ुशी के दीप
सजाये बहन ये
भाई के लिए
3
जीवन धूप
साया बन बादल
संग में चले
4
डरती नहीं
कठनायों से मैं
तुम  जो संग
5
आशीष -साया
स्नेह की रौशनी हो
घर में तेरे
6
घागा नहीं
विश्वाश है मेरा ये
रक्षा करोगे
7
करूँ गलती
तो,माफ़ भी करोगे
जानती हूँ मेँ
-0-
3-डॉ जेन्नी शबनम
1
नेह की डोर
बिछड़े अपने को
खींच ही लाई !
2
पावन सूत
बाँध देता बंधन
रहे जो दूर !
3
छोड़ो संताप
काहे करे विलाप
भइया आया !
4
नहीं छूटता
राखी याद दिलाता
मन का नाता !
5
भले न आना
पर न बिसूरना
नेह का नाता !
6
टीस दे जाती
बचपन की यादें
राखी जो आती !
7
दुआ ही देंगे
आओ कि नही आओ
भइया मेरे !
8
पैसे ने तोड़े
कच्चे धागे-से नाते
राखी ने जोड़े !
-0-
4-हरकीरत हीर
1
रिश्तों का प्यार
लिए आया है द्वार
राखी त्योहार।
2
राखी है भाई
लिये बहना आई
बाँधे कलाई।
3
छूटे न कभी
तेरा मेरा ये प्यार
भैया हमार
4
राखी की मौली
लिए आई बहना
अक्षत - रोली।
5
रक्षा बंधन
इक पाक त्योहार
जैसे चंदन। 
6
हिस्सा न पैसा
सुख- दुःख में रहें
साथ हो ऐसा ।
7
है अनमोल
रिश्ता पैसों से भैया
इसे न तोल ।
8
राखी बँधाने
आसमाँ से उतरे
चाँद सितारे ।
-0-

Sunday, June 28, 2015

चटकती है चट्टानें



1-रचना श्रीवास्तव
1
पर्वत का
वृक्षों से है प्रेम अटल
होतें है जुदा तो
सूखते हैं पेड़
टूटता है दिल पर्वत का
शायद इसीलिए
चटकती है चट्टानें
होता है भूस्खलन
-0-
2-सुनीता अग्रवाल
1-इच्छाएँ

इच्छाओ की कलम से
लिखी किताब जिंदगी की
भरती नही
-0-
2-भूख

भूख
बन जा इबादत
या की हवस
तृप्त न होती
-0-
3-कतरन
उनसे पूछिये
कतरनों का मोल
जिनके हिस्से आती हैं
उतरन केवल
-0-
4-मोमबत्तियाँ


हर हादसे के बाद

जल उठती है मोमबत्तियाँ

पर पिघला नही पाती

इंसानियत और न्याय की धमनियों में जमे

रक्त के थक्के को

हताश,बुझी मोमबत्तियाँ

करने लगती है इन्तजार

फिर किसी कली के मसले जाने का
-0-

Sunday, May 12, 2013

कुछ खट्टे सपने


[रचना श्रीवास्तव मूलत: कवयित्री हैं । आपकी संवेदनाओं की गहराई, भाषा के अनुरूप अभिव्यक्ति  हर पंक्ति को बेजोड़ बना देती है । मातृ-दिवस के इस अवसर पर माँ के विभिन्न रूपों को भावपूर्ण अभिव्यक्ति देती , दिल को छूने वाली  छह छोटी बेजोड़ कविताएँ! रामेश्वर काम्बोज]
रचना श्रीवास्तव
1
कल रात
कुछ खट्टे सपने
पलकों में उलझे थे
झड रही थी उनसे
भुने मसालों की खुशबू
माँ ने शायद फिर
आम का आचार
डाला होगा
2
मेरे माथे पर
हल्दी कुमकुम का टीका  है
कल मेरे सपने में
शायद फिर से आई थी माँ
3
आज
उस पुराने बक्से में
मिली माँ की
कुछ धुँधली साड़ियाँ
जिनका एक कोना
कुछ चटकीला था
जानी  पहचानी
गंध से भरा हुआ l
काम करते- करते
अक्सर यहीं
हाथ पोंछा करती थी माँ l
4
माँ की आँखों में
पलते रहे
बच्चों के सपने
पर बड़े हो कर
बच्चों की  आँखें
देखती रही केवल अपना -अपना ही सपना
माँ के ख्वाबों के लिए
उनमे कोई जगह न थी ;
परन्तु
माँ की मोतियाबिन्द- भरी आँखें
आज भी
देख रहीं है
अपने बच्चों का सपना 
5
 उनके कुछ कहते ही
एक भारी  रोबीली आवाज
और कुछ कटीले शब्द
यहाँ वहाँ उछलने लगे
रात मैने  देखा
माँ
अपनी ख्वाहिशों पर
हल्दी- प्याज का लेप लगा रही थी
6
'नहीं जी ऐसा नहीं है '
आज माँ ने कहा था
जीवन भर
पिता के सामने 'हूँ ','हाँ '
करते ही सुना था
शायद
अब उसे
बड़े हुए बच्चों का
सहारा मिल गया था
-0-

Tuesday, March 26, 2013

फागुन की झोली से


1-रचना श्रीवास्तव
फागुन की झोली से
उड़ने लगे रंग

मौसम के भाल पर
इन्द्रधनुष चमके 
गलियों और चौबारों के
मुख भी दमके
चूड़ी कहे साजन से
मै  भी चलूँ संग

पानी में घुलने लगे
टेसू के फूल
 नटखट उड़ाते चलें
पाँवो से घूल
 लोटे में घोल रहे
बाबा आज भंग ।

सज गई रसोई आज
पकवान चहके
हर घर मुस्काते चूल्हे
हौले से दहके
गोपी कहे कान्हा से
न करो मोहे तंग  ।
-0-
2-अनिता ललित
पूनम के चाँद पर.. आया निखार,
आया फाल्गुन आया.. आया होली का त्योहार !
नीले, पीले ,लाल, गुलाबी...रंगों की बौछार,
खुशबू टेसू के फूलों की...लाई संग बहार...!

दिल में उमंग उठी ... महकी बयार
अँखियाँ छलकाए देखो ...प्रीत-उपहार !

भूलो सभी बैर, मिटे गर्द-गुबार
भर पिचकारी मारो... नेह अपार !

फुलवारी रंगों की.. साथी फुहार
एक रंग रंगे ... आज हुए एकसार !

रंग-रंगोली हो या दीप-दीपावली...
दिल यही बोले...जब हों साथ हमजोली...

तुम हो तो....
हर रात दीवाली
हर दिन अपनी होली है....

-0-
अनुभूति में डॉ  ज्योत्स्ना शर्मा  के दोहे पढ़ने के लिए
आप  होली के रंग को क्लिक कीजिए !
-0-

दोहे :-डॉ सरस्वती माथुर
1
रिश्तों में कुछ दूरियाँ, होली कम कर जाय
मिलते हैं नजदीक से, प्रेम पनपता जाय !
2
जग-आँगन में गूँजती, फागुन की पदचाप
कहीं फाग के गीत हैं, कहीं चंग पर थाप !
 3
फागुन गाए कान में, होली वाले राग
साजन की पिचकारियाँ, बुझे न मन की आग !
 4
राधा-कान्हा साथ में, मन में आस अनंत
नाच रहीं हैं गोपियाँ, झूमें फाग दिगंत !
5
साजन की बरजोरियाँ, प्रीत-प्रेम के रंग
भीग रही हैं गोरियाँ, नैना बान-अनंग !
   -0-