पथ के साथी

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Wednesday, May 5, 2021

1101-डॉ. वर्षा सिंह का जाना

 डॉ. वर्षा सिंह को शत-शत नमन!!    

गिरीश पंकज

 हिंदी गजल-गीत की दुनिया की सुप्रसिद्ध हस्ताक्षर डॉक्टर वर्षा सिंह को भी कोरोना ने निगल लिया। रात दो बजे। गत 20 अप्रैल को उनकी माताश्री डॉ विद्या मालविका का निधन हुआ था।  तब वर्षा ने अपने ब्लॉग में लिखा था,''दीपक जल कर फैलाता है/ यादों का उजियाला। माँ ने किस ममता से हमको/संघर्षों में पाला।''

सागर की रहने वाली वर्षा सिंह से मेरी कभी भेंट नहीं हुई । वे मेरी फेसबुक फ्रेंड भी नहीं थीं,


लेकिन उनकी  रचनाओं से मैं लंबे समय से परिचित रहा हूं।  मेरा सौभाग्य है कि लगभग तीन वर्ष पूर्व वर्षा जी ने अपने ब्लॉग 'ग़ज़लयात्रा'  में  16 अक्टूबर, 2018 को मेरी ग़ज़लों पर कुछ टिप्पणी की थी। उसे मैंने फिर खोजा। उसका एक अंश विनम्रतापूर्वक यहाँ  देना चाहता हूँ, ''गिरीश पंकज ऐसे रचनाकार हैं, जो अनेक सामाजिक विषयों पर अनेक विधाओं में लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं। उनका लेखन समाजोपयोगी है। जिस तरह पौधों में प्रकाश  संश्लेषण की क्रिया से जीवन को जारी रखने के लिए पोषक तत्त्वों का निर्माण होता है ,वैसे ही संवेदनाओं को जीवित रखने के लिए गिरीश पंकज की ग़ज़लों में निहित उत्प्रेरक तत्त्व प्रेरणा  स्रोत का काम करते हैं। उनकी यह ग़ज़ल देखें, जिसमें सूर्य के प्रकाश सी ऊर्जा है।..गिरीश पंकज शायरी के नए प्रतिमान गढ़ने में सिद्धहस्त हैं।'' वर्षा सिंह की यह टिप्पणी मेरे जीवन की अनमोल धरोहर बन गई है।  मैंने वर्षा जी का नंबर खोजकर उनसे बात की और धन्यवाद ज्ञापन किया।  वर्षा की बहन डॉ शरद सिंह से मेरा परिचय रहा है । अनेक मौकों पर शरद सिंह से मेरी मुलाकात भी हुई, लेकिन वर्षा जी से कभी भेंट नहीं हुई  । बावजूद इसके, उन्होंने मेरी ग़ज़लों पर लिखा। यह लिखना ही उनकी उदारता का, विशालता का परिचायक है । वर्षा सिंह का पूरा लेखन लोकमंगल, लोक कल्याण का लेखन रहा है।  उनका जाना हिंदी साहित्य की एक बड़ी क्षति है। उनको नमन करते हुए मैं उनकी एक ग़ज़ल  जो उन्होंने विश्व शांति दिवस के अवसर पर फेसबुक में पोस्ट की थी, तथा उनके ब्लॉग से एक गीत एक गीत  यहाँ  प्रस्तुत कर रहा हूँ । आप भी उनके  फ़ेसबुक/ ब्लॉग को देख कर उनके लेखन से  परिचित हो सकते हैं।

1-शुभकामना

डॉ. वर्षा सिंह

दे  रहा  मन  हो  विह्वल, शुभकामना।

नित खिले सुख का कमल, शुभकामना।

आज के  सपने  सभी साकार हों

और बिखरे हास कल, शुभकामना।

मुक्त कोरोना  से  हो  संसार  ये

हर कदम पर हों सफल, शुभकामना।

ज्योत्स्ना बिखरे सदा सुख -शांति की

है  यही  निर्मल- धवल, शुभकामना।

नित्य  ‘वर्षा’  हो  सरस आह्लाद की

पल्लवित हो नित नवल, शुभकामना !

-0-

2-(विश्व कविता दिवस पर प्रस्तुत एक गीत)

-डॉ. वर्षा सिंह

 

आज चलो गाएँ ज़रा, धरती के गीत।।

          धरती के गीत, धरती के गीत।।

 

गीत प्रतिबंधों के, गीत अनुबंधों के

गीत संबंधों के, गीत रसगंधों के

आज चलो गाएं ज़रा, धरती के गीत।।

           धरती के गीत,धरती के गीत ।।

 

अलसाई रात के, अँगड़ाती भोर के

नदिया के पानी में,उठती हिलोर के

शरमाते चंदा के, रंगराते सूरज के

अम्बर में उड़ते पंछियों के शोर के।

 

गीत कुछ उपवन के, गीत कुछ मधुबन के

गीत कुछ देहरी के, गीत कुछ आँगन के

आज चलो गाएँ ज़रा,धरती के गीत।।

          धरती के गीत,धरती के गीत ।।

 

किशोरी झरबेरी के, बूढ़े बबूल के

हवाओं में झूलते बरगद के मूल के

बाँस के, कपास के,युवा अमलतास के,

अरहर के, मेथी के, इमली के फूल के

 

गीत कुछ तरुवर के, गीत गुलमोहर के

गीत कुछ पतझर के, गीत कुछ अंकुर के

आज चलो गाएँ ज़रा, धरती के गीत।।

           धरती के गीत,धरती के गीत।।

 

लहराते सागर के, नैया के, पाल के

खेत - खलिहान के, पगडंडी, चौपाल के,

बादल के, ‘वर्षा’ के, गागर के, निर्झर के,

तृप्ति के, प्यास के, धूल के, गुलाल के,

 

गीत बौछार के, गीत कुछ प्यार के

गीत  त्योहार के, गीत अभिसार के

आज चलो गाएँ ज़रा, धरती के गीत ।।

           धरती के गीत,धरती के गीत ।।

(https://varshasingh1.blogspot.com)

Monday, March 8, 2021

1058- नारी

 1-गिरीश पंकज

मुक्तक

1


मुझे दासी न समझो तोतले तुम बोल मत समझो।

मैं हूँ धरती मुझे कमजोर या बेमोल मत समझो।

जहाँ होती है नित पूजा हमारी, देवता रमते।

मैं हूँ औरत मुझे तुम देह का भूगोल मत समझो।

2

मैं हूँ औरत जो सृष्टि को बनाने में सहायक है।

इसे मैं नित सँवारूँ इसलिए दिखती ये लायक है।

मुझे मैली न करना मैं किसी मंदिर की मूरत हूँ,

जिसे वरदान दे दूँ एक दिन बनता वो नायक है।

3

अगर मैं ना रहूँ तो सृष्टि का शृंगार कैसे हो।

हृदय धड़के न लोगों का कहो फिर प्यार कैसे हो।

मुझे जो मारते नादान हैं, बुद्धि नहीं उनमें।

भला औरत बिना संसार का विस्तार कैसे हो।

4

जो हर औरत में अपनी माँ-बहिन का ध्यान रक्खेगा।

वही इंसान स्त्री का सदा सम्मान रक्खेगा।

जो हैं गुंडे-मवाली मातृ-शक्ति खाक समझेंगे,

मगर है नेक इंसाँ तो हमेशा ज्ञान रक्खेगा।

5

वो है सुंदर , बड़ी कोमल,  लगे देवी उतर आई।

बिना उसके कभी क्या ज़िन्दगी में बात बन पाई।

उसे कुचलो, न मसलो, है कली खुशबू लुटाएगी,

अगर हो साथ नारी ज़िन्दगी तब नित्य सुखदाई।

-0-


2-जानकी बिष्ट वाही

1-बारिश और बचपन

 

बचपन में जब बजता घण्टा छुट्टी का

बाहर हो रही होती  बारिश झमाझम 

सखियों- संग उसे  लगता  नहीं कि 

गल जाएँगे कागज़ की मानिंद

मिट्टी की सौंधी खुशबू 

सीधे तर कर देती मन

बस्ते को फ्रॉक के अंदर कर

छाते को बंद कर

छप-छप करते गड्ढों में भरे पानी में

न जाने  कौन- सी सरगम पर नाचता मन

टक्कर देते मोती से दाँत कौंधती चपला को

खिल-खिल करती निगौड़ी हँसी से

चिहुँक जाते ओट  में खड़े लोग

अचकचाते ,देखते ,सोचते जब तक

लड़कियाँ निकल जाती सामने से

पहुँचती जब घर 

बस्ता सँभालती ,निचोड़ती फ्रॉक

खोलती छाता ईमानदारी से

पूछती माँ,  अरे ! भीगी कैसे

ज़माने भर की मासूमियत  ओढ़

बोलती -मालूम नहीं मुझे

पूछ लो  खुद बारिश से 

माँ दिखाती आँखें

पर मुस्कुराते उनके होंठ

छाता बंद कर बोलती-

चल, बदमाश कहीं की,

जल्दी से बदल लें कपड़े 

नहीं तो लग जाएगी सर्दी

अब वर्षों हो गए बारिश में भीगे

यादों के बक्से को दिखा देती है

अक्सर चमकीली,रूपहली धूप

बारिश अब भी होती है,

बिजली अब भी चमकती है

गड्ढों में पानी अब भी भरता है

ओट में लोग अब भी होते हैं खड़े

बस मन ही नहीं मचलता

लगता है बचपन ले गया  अपने संग

वो खुशी मासूमियत- भरी

-0-

2-दुःख की एक नदी

 

दुःख की एक नदी

जो जन्म से

मृत्यु तक जाती है।

और भरी रहती है

आँसुओं के सैलाब से

फिर भी ज़िंदगी की

मजबूत डोर पकड़े 

तूफानों से ओ झंझावतों से

टकराती चोट खाती 

थपेड़ों से लड़ती

जिन्दा रहती है

जिन्दा रखती है, परम्पराओं को

और जिन्दा रखती है, उन रिश्ते -नातों को

जो उसके जन्म के कम 

ब्याह के ज्यादा हैं।

दिए की कँपकँपाती लौ की तरह

जलती दूसरों के लिए ताउम्र  है।

औरत , तुम दुनिया की नज़रों में  बहुत हो  कमजोर

पर अपनी नजरों में  बहुत मज़बूत।

तभी तो तुम जी पाती हो

इस एक जनम में 

कई जनमों के स्वप्न

तुम्हारा निर्णय

सदियों को विस्मित कर देता है

जो  राम और दुष्यंत समझ न पाए

या  यशोधरा के प्रश्नों द्वारा बुद्ध  को कर देता है निरुत्तर

यह स्वाभिमान 

ईश ने भरा था तुमको रचते हुए

यही संकल्प,तुम्हारी नाज़ुक देह को

फौलाद- सा बना देता है

जीवन -मरण की पगडंडी पर

-0- नोएडा-201301,उत्तर प्रदेश (jankiwahie@gmail.com>)

-0-

3- प्रियंका गुप्ता

1-लड़कियाँ

 


लड़कियाँ

जो कविताएँ लिखती हैं

डायरी में छिपाकर;

अपनी आत्मा के एक टुकड़े को

सूरज की रोशनी से बचाकर

रखती हैं...

लड़कियाँ

जो कविताएँ लिखती हैं

बन्द रखती हैं खुद को

एक खोल में

डरती हैं वो

क्योंकि जानती हैं

कविता लिखना पाप है

इस दुनिया की निग़ाह में

इसलिए अक्सर

अंदर ही अंदर मर जाती हैं वो

चुपचाप

और कोई जान भी नहीं पाता

उन लड़कियों को

जो सबसे छुपाकर

लिखती हैं कविताएँ...।

-0-

2-मुखौटा

 

औरतें-

कभी नहीं मरती

वो बस रूप बदलती हैं

नानियों और दादियों ने भी

माँ और बुआ को दे दिया

अपना रूप 

और अब धीरे-धीरे

माँ चढ़ाने लगी हैं

अपने चेहरे का 

एक नायाब मुखौटा 

मेरे चेहरे पर;

पर मैं

रूप बदलना नहीं चाहती

इनकार करती हूँ मैं

किसी भी मुखौटे से

क्योंकि

मुखौटों में

दम घुटता है मेरा

और मैं

बस ज़िंदा रहना चाहती हूँ...।

-0-

3-शायद

 

औरतें

हँसती नहीं हैं

न ही जश्न मनाती है

एक और औरत के

जन्मने पर;

वे तो बस

मातमी सूरत लिये आती हैं

और

तसल्ली देकर चली जाती हैं;

एक औरत के जन्म पर

अपराधिनी होती है

दूसरी औरत

उसके चारों ओर

या तो अदालती कुनबा होता है

या फिर 

कुछ रुदालियाँ;

एक औरत

दूसरी औरत के जन्मने पर

अफ़सोस करती है

किसी भी मर्द से ज़्यादा

जैसे डरती हो

कि

जिस मुट्ठीभर आसमान का सपना

उसकी आँखों में पला

और फिर मरा था

वो कहीं इस नई औरत के 

हिस्से न आ जाए

अफ़सोस उस औरत के जन्मने पर नहीं

अपना आसमान छिनने के भय से है 

शायद...।

-0-

4-ज्योत्स्ना प्रदीप

 क्षणिकाएँ


1-निशान

 

तुमने उसे

नहीं छुआ

वो ये तो बताती है

मगर  तेरी निगाहों  के

बेरहम नश्तरों के,

मन पर लगे निशान,

वो आज भी

लोगों को दिखाती है।

 

2-अनुभूति

 

उसकी कोख में

उग रही,

उजली किरण की

अनुभूति 

काश!

भावी पिता को भी

 छूती।

 

3-बेबसी 

 

अपनी

नन्ही गुड़िया को,

आया को सौंपते हुए

माँ की बेबसी थी

 सीली -सीली 

मुन्नी की आस

गीली।

4- लड़कियाँ

 

तुम आकाश को

छू  रही हो 

लोग हैरान!

आकाश भी  बड़े

अदब से लिख लेता है..

अपने नीले,

अन्तहीन पृष्ठ पर

ऐसी लड़कियों के नाम!

5-हदें 

 

उस लड़की को 

आँकना  मत

मर्यादित है 

सहनशील भी 

पर...

बाढ़ आने पर तो

हदें पार करती

है 

एक छोटी सी 

शान्त  झील  भी।

-0-

5-अर्चना राय

स्त्री


आशा का दामन थाम कर मैं ,

हर रोज़ थोड़ा -थोड़ा जी लेती हूँ।

 छाई उदासियों में भी... 

हल्का-सा मुस्कुरा लेती हूँ। 

टूटे सपनों को समेटकर

 फिर आशाओं की माला गूँथ लेती हूँ ।

  निराशाओं के भँवर में भी... 

 हौसले को फिर पतवार बनाती हूँ ।

जीवन- नैया को बीच मझधार  से

पार किनारे की ओर चलाती हूँ।

 अँधेरा तो बहुत गहन होता है।

 पर उजाले के लिए... 

 एक दीया ही काफी होता है ।

वैसे ही... 

जीवन में रोशनी के लिए भी

 एक आशा का उजाला ही काफी होता है।

हाँ, मैं स्त्री हूँ... सोचकर ही

सहस्र सूर्यों- सा तेज

अपने भीतर समाहित पाती हूँ।

-0-