1-कैसे बुद्ध हो पाऊँगी
डॉ.
अंजुल चौहान
रात्रि के उस प्रहर में
तुम्हारा इस तरह से
निरपराध मुझे
छोड़कर जाना
मेरे अनन्य प्रेम और समर्पण को
विरक्त हो, त्याग कर जाना
कसकता है आज भी .......
क्या उस क्षण
तुम्हारे नेत्र सजल न हुए होंगे
तुम्हारे
संचरणशील चरण न थमे होंगे
सप्तपदी के वचन कैसे विस्मृत हो
गए
बोलो न, मेरे बोधिसत्व !
तुम कैसे इतने विरक्त
हो गए?
यदि सचमुच, यह जगत्
क्षणिक
है मिथ्या है
तो यह ज्ञान भी मै तुमसे ही पाना चाहती हूँ
हां .....मैं भी तुम्हारी भाँति
तथागत होना चाहती हूँ
पर बताओ मेरे अनश्वर प्रेम !
मैं तुम्हें कैसे त्याग पाऊँगी...?
तुम्हें तज कर
मैं कैसे बुद्ध हो पाऊँगी.......
-0-
2-घर वापस आओगे
डॉ.
अंजुल चौहान
तुम्हें समर्पित श्वेत पुष्प कुछ
रोली ,अक्षत,
चंदन
श्वास -श्वास पर तुम्हें पुकारूँ
करूँ
अनवरत वंदन
अपना सत्य तुम्हीं जानो
पर मेरा सत्य यही है
तुमको पाकर, मैं खो जाऊँ
मेरा अमरत्व
यही है
कर्म स्वधर्म सब तुम्हें समर्पित
मैं तो बस ये जानूँ
मेरी गाथा का आदि अंत
तुम ही हो इतना मानूँ
अपने देवालय को तजकर
कहीं और क्यों जाऊँ
जपूँ
मंत्र मैं तुम्हें.....
तुम्हीं से, तुमको ही पा जाऊँ
मुझ बिन अर्थहीन जीवन को
कैसे जी पाओगे
कंचन की नगरी में कब तक
खुद को भरमाओगे
आते हैं भगवान ....
अतः, तुम
स्वयं लौट आओगे
सुनो..... ....द्वारिकाधीश !
राम बन घर वापस आओगे ।।
-0-
