पथ के साथी

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Tuesday, May 26, 2026

1503-सुरभि डागर की तीन कविताएँ

 

सुरभि डागर 




1-जीवन की लहरें

 

जीवन सागर-सा गहरा है,

उसमें उठती लहरें हैं।

कभी खुशी की धूप सुनहरी,

कभी दुःखों की पहरे हैं।

कभी किनारे फूल खिलें,

कभी रास्ते काँटों वाले,

कभी हँसी के गीत मिलें,

कभी मौन के बादल काले।

लहरें रुकती कब जीवन में,

चलना ही उनका गहना है।

गिरकर फिर से उठ जाना,

यही मानव का सपना है।

आशा की छोटी-सी नौका,

हिम्मत की पतवार लिये,

मन आगे बढ़ता रहता,

नए उजाले द्वार लिये

जीवन की इन लहरों में,

जो मुस्काना सीख गया,

वह हर तूफाँ से लड़कर,

अपने भीतर जीत गया।

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2-चाँद

 


रात की शांत झील में

धीरे-धीरे उतरता है चाँद,

जैसे किसी माँ की आँखों में

ठहर जाए कोई मीठा ख़्वाब।

उसकी चाँदी-सी कोमल किरणें

छू लेती हैं सूनी राहें,

और थके हुए मन के भीतर

भर देती हैं अनकही चाहें।

कभी वह प्रेमी का संदेश है,

कभी विरह की लम्बी रात,

कभी बच्चों की भोली जिज्ञासा,

कभी कवि के मन की बात।

बादलों की ओट में छिपकर

वह जैसे खेलता हो लुकाछिपी,

धरती की हर धड़कन सुनता,

हर खिड़की पर रखता नज़रें धीमी।

चाँद केवल आकाश नहीं,

मन का उजला एक कोना है,

जहाँ अँधेरों से लड़ने को

अब भी थोड़ा सपना होना है।

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3.सूरज

 

सूरज केवल आग नहीं,

जीवन का पहला स्वर है,

जो हर सुबह

धरती की नींद सहलाकर

उम्मीदों का द्वार खोलता है।

वह खेतों में

सोने-सी फसल बनकर उतरता है,

नदियों में चमकता है,

और बच्चों की हँसी में

एक गर्म उजाला भर देता है।

कभी तपता है कठोर होकर,

मानो संघर्ष सिखा रहा हो,

तो कभी साँझ की लालिमा में

थके हुए दिन को

धीरे से विदा कहता है।

सूरज ने ही सिखाया है—

हर डूबना अंत नहीं होता,

हर अँधेरे के बाद

एक नई सुबह जन्म लेती है।

वह आकाश का यात्री है,

जो बिना रुके, बिना थके

सदियों से चल रहा है,

निरन्तर इस संसार में

 

Saturday, May 2, 2026

1502

 

 1-खुशी / सुरभि डागर

  


खुशी कोई बड़ी चीज़ नहीं,

ये तो छोटी-छोटी बातों में मिलती है,

कभी किसी की मुस्कान में,

कभी बारिश की बूँदों में खिलती है।

ये हवा के संग बहती है,

बिन आवाज़ के कहती है,

रुको ज़रा, महसूस करो,

ज़िंदगी यहीं कहीं रहती है।

न सोने में, न चाँदी में,

न ऊँचे महलों की शान में,

खुशी तो छुपी होती है-

माँ के हाथों के पकवान में।

जब दिल हल्का हो जाता है,

और मन गुनगुनाता है,

तब समझो, चुपके से

खुशी तुम्हें छूकर जाती है।

खुशी होती है बच्चों की मुस्कान में 

तो ढूँढो मत इसे दुनिया में,

ये तो तुम्हारे अंदर रहती है,

बस नज़र बदलो थोड़ी सी,

हर पल खुशी ही कहती है।

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2-पगडंडी/ सुरभि डागर

 

पगडंडी कोई साधारण रास्ता नहीं होती,

यह उन कदमों की कहानी होती है

जो बार-बार चलकर उसे जन्म देते हैं।

यह चौड़ी सड़कों की तरह घमंडी नहीं होती,

न ही उस पर शोर-शराबा होता है।

यह चुपचाप खेतों के बीच से निकलती है,

पेड़ों की छाँव में खुद को छिपाती है,

और हर मोड़ पर कोई नई बात कह जाती है।

पगडंडी पर चलते हुए

मन भी हल्का हो जाता है,

जैसे हर कदम के साथ

चिंताएँ पीछे छूटती जाती हैं।

यह हमें सिखाती है

कि मंज़िल तक पहुँचने के लिए

हमेशा बड़े रास्तों की ज़रूरत नहीं होती,

कभी-कभी छोटे, सरल रास्ते भी

सबसे सुंदर सफर बन जाते हैं।

पगडंडी गाँव की धड़कन होती है,

जहाँ हर कदम में अपनापन है,

और हर मोड़ पर एक नई याद छिपी है।

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Friday, June 27, 2025

1470

 

गाँव  में क्या रखा है 

सुरभि डागर 

 


 

 गाँव  में रखा ही क्या है 

छुपा रखा है एक माना 

लोग कहते हैं गाँव  में क्या रखा है 

गाँव  में मेरे बचपन की सुनहरी यादें 

गर्मी में तारों की छाँव में लगी मच्छरदानी।

बिस्तर पर दादी विजना डुलाती

साथ में सुनाती  कहानी ।

सुनते-सुनते  कहानी न जाने 

मैं कब सो जाती।

रूठने पर माँ ,दादी मुझे मनाती

अपने हाथों से निवाला खिलाती

उस वक्त को तलाशता मेरा मन

लोग कहते हैं पुराने वक्त में क्या रखा है

गाँव  की मिट्टी में बसा है मेरा बचपन

लोग कहते हैं गाँव  में क्या रखा है 

घर से राह में  झाँकते  झरोखे ,

कहीं नीम की ठंडी हवा के थे झोंके

चौपाल में होते थे दादा,ताऊ,चाचा

घर के मुखिया और काका।

कुओं से वहता ,वरहो में पानी

पेड़ों पर आम से भरी होती डाली,

खेतों की छटा होती थी निराली

पगडंडियों पर घूमती थी घसियारी

पुराने बक्सों को तलाशती मेरीआँखे,

उन पुराने बक्सों में बन्द है एक माना।

लोग कहते हैं गाँव  में क्या रखा है 

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Thursday, September 5, 2024

1430

 

समय शिक्षक/ सुरभि डागर 

 


 

रिक्त पात्र हो तब भी 

शिक्षा ही भरपूर बनाती है

कठिन राह हो जीवन में 

गुरु की याद दिलाती है 

हैं शिक्षक अनेकों जग में

वक्त से बड़ा न शिक्षक कोई।

राम चले थे जब वन को 

गुरु शिष्ठ ने ज्ञान दिया

समय कठिन था  फिर भी

गुरु के शब्दों को मान दिया 

मर्यादा पुरुषोत्तम बने राम 

शबरी, अहल्या, केवट तक को 

उसी राम ने तार दिया ।

जिसकी धनुर्विद्या के आगे

रावण भी था  हार गया।

 गुरु द्रोण से लेकर  शिक्षा

अर्जुन ने  राष्ट्र-उद्घार किया।

बने गुरु जब सुदर्शनधारी

पार्थ को गीता - सार दिया।।

माँ जीजाबाई बनी गुरु तो

शिवा कोर्म आधार दिया

 

 

Saturday, August 17, 2024

1427

1-सावन में फोन/ सुरभि डागर 

 


साँवली बदली छम- छम 

सावन में बरस उठी 

कहीं आती ताज़े घेवर की

 मीठी सुगन्ध से महकते

गलियारे।

तभी बज उठी मेरे फोन की घंटी-

चली आओ लाडो,

झूमते सावन में 

आ गई सब सखियाँ तुम्हारी,

है मेरा आँगन सूना सावन में 

तुम्हारे बिन लाड़ली 

खनकाओ मेरे आँगन में

हरे काँच की चूड़ियाँ

मेहंदी की सुगंध से महका दो 

बाबुल की बगिया।

पील में खाली पड़े हैं 

रेशम डोर के झूले 

ताक रहे राह तुम्हारे आने की

पंचरंगी  बूटेदार साड़ी पहन ले

आओ सावन को मेरे भवन में 

दादी गा रही हैं सावन के मधुर गीत 

बेटी झूलन को चली जाओ 

हिंडोला झालर का ,चंदन की पटली धरी 

बटी धरी है रेशम डोर ,

हिंडोला झालर का।

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2-अर्चना राय


 

1-बेटी

 

बधाई हो! 

आपके घर  बेटी आई है। 

सुनकर दिल कुछ

दरक- सा गया

मन के गहरे बैठी पैठ

 कि बेटे संपत्ति और.. 

 बेटियाँ जिम्मेदारी

होती हैं। 

सोच मन कसक- सा उठा

 

 मान उसे अपनी जिम्मेदारी 

 बस निभाता रहा... 

छूना चाहती थी आसमान

और मैं उसे धरती पर 

बाँधने में लगा रहा। 

पर तोड़ हर जंजीर

उसे तो उड़ना था। 

उड़ी और ऐसे उड़ी कि

आसमान को ही उसने

 अपनी धरती बना लिया

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2 - स्त्री

 

तुम्हारे पास सपने थे

तुम्हारे पास इच्छाएँ थीं

उम्मीदें थीं

हौसला था

साहस था

पता नहीं कैसे तुमने

किसी और का 

अनुसरण स्वीकारा होगा

Thursday, June 20, 2024

1423

 तहजी़ब सुरभि डागर

 


नुमाइश है हजारों पर ना

नुमाइश जिस्म  की ना कीजि

पुरखों ने जो दी सौगात

उस इज्जत की लिहाज़ तो कीजि

हजारों सालों में कमाई दौलत

यूँ ना सरेआम तो कीजि

कहीं बहके कदम,थाम लो

जाम का प्याला अगर हाथ हो तो

याद अपने बाप की पगड़ी को कीजि

बढ़ती नापाक हरकतें

आजादी के नाम खुद को

बर्बाद ना कीजि

पैदा हुई लक्ष्मी बाई, जीजाबाई  हाँ

तहजीब अपने मुल्क की देख लीजिए।

नुमाश है हजारों पर ना

नुमश अपनी ना  कीजिए।

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2-तुम्हारा प्यार रचती हूँ

प्रणति ठाकुर


मन में मैं तुमको हजारों बार रचती हूँ
 

तुम्हारा प्यार रचती हूँ..

जब क्षितिज के छोर से, रश्मियों के डोर से,

भोर मदमाती है आती तितलियों के ताल पर,

हर कली के भाल पर,

स्नेह का कुमकुम लगाती

ज़िन्दगी की आस बनकर,

प्रेम का विश्वास बनकर

जब रवि लिखता है पाती

तब प्रिये मैं भाव बनकर,

भूमि के कण में बिखरकर,

प्रेम का अनुपम अतुल आधार रचती हूँ....

तुम्हारा प्यार रचती हूँ....

 

इन्द्रधनुषी पंख लेकर

 नाचता है जब मयूरा

मोरनी के प्रेम को ही

 बाँचता है जब मयूरा 

जब दृगों से मोर के यूँ

प्रेम का अमृत है झता

देख अकलुष इस सुधा को,

प्रेम की इस सम्पदा को,

मैं भी साथी प्रेम का उद्गार रचती हूँ...

तुम्हारा प्यार रचती हूँ....

 

चाँद की चाहत कुमुदिनी

 के हृदय का द्वार खोले 

चाँदनी का प्यार पाकर

उदधि भी लेता हिलोरें 

सींचकर अमृत सुधाकर

बस निशा में प्यार घोले 

चाँद का उत्सर्ग पाकर,

उस मधुर पल में समाकर,

चाँद सा निर्मल - धवल अभिसार रचती हूँ..

तुम्हारा प्यार रचती हूँ.....

 

तुम हमारे प्रेम जीवन

की मधुर सी कल्पना हो

आँसुओं से जो रची जाती

वो ही  तो अल्पना हो

तुम हमारे प्राण के आधार मन की प्रेरणा हो

हूँ तुम्हारे बिन अधूरी,

पर बनी मीरा तुम्हारी,

वेदनाओं का विकल संसार रचती हूँ...

तुम्हारा प्यार रचती हूँ...

मन में मैं तुमको हजारों बार रचती हूँ 

तुम्हारा प्यार रचती हूँ.....

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