पथ के साथी

Wednesday, October 7, 2026

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1- हे पुरुष!/  डॉ .अंजुल चौहान 

 


 पुरुषों ने पढ़े वेद और उपनिषद्

अहम् ब्रह्मास्मि जैसे मंत्रों से 

 सुलझाया द्वैत- अद्वैत का अज्ञान

पुराण और धर्म- ग्रंथ पढ़ 

किए यज्ञ, हवनादि अनुष्ठान 

शस्त्र- विद्या में पारंगत हो

गाण्डीव ले, किया शत्रु- मर्दन

क्रोधावेश में ताण्डव नर्तन

खगोल और भूगोल से 

नाप ली ग्रहों की गति 

धरती का आकार 

सागर का विस्तार 

रामायण में हुई वाल्मीकि की साधना फलित 

भावविभोर तुलसी ने गाया रामचरित

गीता से पाया ज्ञान- कर्मयोग 

त्रिविध तापों से वियोग 

हे महा मानव !

तुम्हारी लेखनी ने किया अद्भुत सृजन 

कभी कालिदास का शाकुन्तल 

कभी भवभूति का करुण क्रन्दन

कभी-कबीर, कभी सूर की भावांजलि 

दिनकर का ओज, कभी आँसू ,कभी गीतांजलि 

हे पुरुष !

तुम नहीं पढ़ पाए 

तो 

सिर्फ  और सिर्फ

 स्त्री- मन

और 

उसमें जन्मी असीम पीड़ा

-0-

2-खंडित मूर्तियाँ/ डॉ .अंजुल चौहान 

 

खंडित मूर्तियाँ विसर्जित कर दी जाती हैं 

साँवले-  से जल में 

चिर शांति के लिए

लेकिन

कुछ अभिशप्त मूर्तियाँ दबकर रह जाती है 

मन के खंडहर में 

जीवन से दूर

और मृत्यु से वंचित 

भटकती हैं अनन्त काल तक 

मुक्ति की अंतहीन प्रतीक्षा में ।

-0- chauhananjul22@gmail.com

-0-

आत्मग्लानि / डॉ . सोनिया रिक्खी

 


 एक दिन कॉलेज के बाहर, 

इक चाय की टपरी में ,

अपने  सहयोगियों के साथ बैठे 

हम पीने को चा,

जिसमें जश्न की थी चाह ।


तभी आया इक 

10-12 वर्षीय  बालक ।

आँखो में असहजता ,

हाथों में उठाए ट्रे में 

छह गिलास चा  ।



तभी फिसली ट्रे 

और फिसली चा 

सीधी पहुँची टेबल की 

प्रमुख सीट पर बैठी

 मैडम के पैरों पर ।



परंतु उस से भी अधिक 

तेजी से इक हाथ 

हवा में लहराया,

इक जोरदार थप्पड़ 

बालक के कोमल

गाल से जा टकराया ।


सन्न थे हमारे शरीर 

और आँसुओं से 

डबडबा रही थी 

मेरी आँखें और 

उस मासूम की आँखें ।



दूसरी टेबल पर,

आस - पास बैठे 

विद्यार्थियों ने  उस मासूम 

को गले लगाया ,

चुप करवाया ।


परन्तु हमारे 

तन को

जैसे साँप 

सूँघ गया ।

थोड़ी देर बाद ही होश आया ।


मैडम आप पर 

नहीं गिरी चा।

बच्चे के कोमल मन व 

आत्मसम्मान पर गिरी थी आपकी चाह।

 

दुकानदार भौचक था

उसे ही उपदेश सुनाया

छोटे बच्चे को क्यों काम पर लगाया।



पर पढी -लिखी मैडम को 

न कोई पाठ पढ़ाया

इस आत्मग्लानि ने मुझे 

आज तक न मन का चैन दिलाया ।

कब तक हम शक्तिशाली के

समक्ष चुप रहेंगे।

अपनी ही आत्मा को कचोटते रहेंगे।

इतने वर्षों से

इस आत्मग्लानि से 

निकलने का रास्ता खोजते खोजते,

समय पर बोलने का महत्त्व 

समझ में आया।