पथ के साथी

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Saturday, January 31, 2026

1491-गीत गाते अक्षर का अपनापन

 परमजीत कौर 'रीत'


कुछ समय पहले 'प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग, भारत' द्वारा हमारे विद्यालय की ओपन लायब्रेरी के लिए बालसाहित्य की लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें भिजवाई गई। पुस्तकें इतनी आकर्षक थी कि विद्यार्थियों में इनको पढ़ने की होड़- सी लग गई। कविताओं की पुस्तकों में 'गीत गाते अक्षर '
की कविताओं को उन्होंने काफ़ी पसंद किया । कुछ  कविताओं जैसे  - हवा चली,आगे बढ़ते जाना, गाँव, जंगल, बरखा रानी, गर्मी आई, जागो, बापू जी आदि कविताओं का  उन्होंने समूह वाचन भी  किया।  मैंने भी जब इस पुस्तक को पढ़ा तो बच्चों की भावनाओं को महसूस किया। इस पुस्तक में 66 छोटी -छोटी बालकविताएँ हैं, जो बच्चों के  मनोरंजन  के साथ साथ ज्ञानवर्धन भी करती हैं। 'गीत गाते अक्षर'  पुस्तक की कुछ ऐसी ही कविताओं की बानगी देखें-

हवा चली रे! हवा चली!

धूल मिट्टी को संग उड़ाती चली.....पृ.सं-15

 मन लगाकर हमेशा करो तुम पढ़ाई।

कभी भी न करना किसी से लड़ाई।...पृ.सं-31

 

सुनो पापा! ओ मेरे पापा!

हम भी इस बार  पेड़ लगाएँगे! ...पृ.सं- 49

 जागो सूरज चाचू आए,

भागो नया उजाला लाए,......पृ.सं- 69

 काश होते जो, पंख मेरे भी दो।

मैं भी पंछियों संग, दूर देश उड़ जाता।......पृ.सं.- 82

 इस प्रकार 'गीत गाते अक्षर' पुस्तक में लेखक मनोजकुमार शिव  ने बाल मनोविज्ञान के अनुरूप  छोटी-छोटी कविताओं को रोचक एवं लयबद्ध  रूप में प्रस्तुत किया है जिससे बच्चे सहज ही इन कविताओं से जुड़ जाते हैं। इस सफलता के लिए  लेखक बधाई के पात्र  हैं।

'गीत गाते अक्षर(बाल काव्य-संग्रह ) : मनोज कुमार ‘शिव’   मूल्य 180 रुपये,  पृष्ठ: 88, संस्करणः 2024,  प्रकाशकः प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग भारत, 3/186 राजेंद्र नगर, सेक्टर 2, साहिबाबाद, गाजियाबाद  पुस्तक ravasiprempublishing@gmail.com पर संपर्क करके प्राप्त की जा सकती है।

(परमजीत कौर 'रीत', श्रीगंगानगर राजस्थान)

Wednesday, February 22, 2023

1292

 

  1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

घिरँधेरा घन,हरें पतवार कैसे छोड़ दूँ।

जीना अभी, करना बहुत संसार कैसे छोड़ दूँ।

-0-

2-परमजीत कौर 'रीत'

 

ग़ज़ल -1

अँधेरों की फ़ितरत का क्या कीजिए

चिराग़ों का  क़द ही बढ़ा लीजिए 

 

इसी में सुकूँ ज़िन्दगी का असल 

दुआ लीजिए और दुआ दीजिए

 

ये ही नफ़रतों का करेंगी इलाज़ 

जड़ी-बूटियाँ प्यार की बीजिए

 

समंदर सी रख ली है ग़र तिश्नगी़

न कम होगी, सौ-सौ नदी पीजिए 

 

खुदा ! ये दुआ है करूँ बंदगी

भले मुझको कम ज़िन्दगी दीजिए

 

ग़ज़ल -2

कहाँ कोई किसी से कम यहाँ था

ग़र इक तालाब तो दूजा कुआँ था 

 

गिरा पत्ता तो हावी हैं हवाएँ 

शज़र के साथ कब वह नातवाँ था

 

उन्हीं रिश्तों को परखा दूरियों ने 

वो जिनका नाम ही नज़दीकियाँ था 

 

मुझे थी पास होने की हिदायत

उन्हें हर बार लेना इम्तिहाँ था

 

नहीं था तर्क-ए-त'अल्लुक़ ये सच, पर

पलटकर 'रीत' देखा भी कहाँ था

 

ग़ज़ल -3

दिल से मिलें ग़र लोग, याराना बनता है

तार जुड़ें बेमेल, तमाशा बनता है

 

पेट काटकर तिनका-तिनका जोड़ें तब

सिर ढकने को एक ठिकाना बनता है 

 

 पंछी, पत्ते, फूल साथ छोड़ देते जब

बूढ़े पेड़ का मौन सहारा बनता है

 

वक्त के एक इशारे पर मंज़र बदलें

खुशी की आँखों में ग़म खारा बनता है

 

कुछ तो बात है हममें, सब यह कहते हैं

यूँ ही नहीं हर कोई दीवाना बनता है 

 

धुंध भले दीवार बने रस्ता रोके

फिर भी सूरज का तो आना, बनता है 

-परमजीत कौर 'रीत'

-0-

Friday, February 4, 2022

1183

 

 

1-अफसाने -भीकम सिंह 

 

भोर-दोपहर

गोधूलि और रात

सभी के अफसाने 

 

कुछ सुलगते रहते 

कुछ गूँजकर

विस्मित करते 

 

कुछ दिलों में 

कुछ को हम

जूतों पे रखते 

 

कुछ पिस्सुओं-से

चिपके रहते 

कुछ शिशुओं-से रोते 

 

कुछ अछूत

खीज़ पैदा करते

कुछ लम्बे चुम्बन भरते 

 

कुछ धर्म उकेरते

कुछ मुँह फेरते

निरपेक्ष दिखा करते 

 

कुछ उलझ

स्वार्थ की डोर से 

बेबसी में सुलझा करते 

 

कुछ क्षितिज पार के 

असीमित 

कुछ गिन लो पोर  पे

 

अफसाने -

हमारे 

और आपके 

-0-

2-शारदे जी की वंदना -परमजीत कौर 'रीत

 

ओ! माँ! वाणी , विनती सुन लो, द्वार तुम्हारे आए हैं

बुद्धि विवेक की याचना करने हाथ पसारे आए हैं

 

हे! करुणा की सागर मैया  दया दृष्टि हम पर डालो 

ज्ञान भरी लहरों को पाने मूढ़ किनारे आए हैं

 

हर दुर्गुण से दूर रहें और सद्गुण हर  अपनाएँ

बस इतनी सी कामना लेकर लाल तुम्हारे आए हैं

 

सन्मार्ग पे चलते जाएँ डगमग न हों पाँव कभी

ऊबड़-खाबड़ राहों पर बस तेरे सहारे आए हैं

 

दोष पराये ढूँढके हँसना जगती की है 'रीत' ये माँ !

तव चरणों की गंगा में  तन-मन को पखारे आए हैं

-0-
3-क्यों रोता सारी रैन है-  निधि भार्गव मानवी

 

 

बोल मेरे व्याकुल मनुआ तू , इतना क्यों बेचैन है ।

दिन भर खोया खोया रहता,रोता सारी रैन है ।।

 

सबको सब कुछ नहीं मिलता इस मायावी संसार में

सदा उजाले न रहते रे, कुदरत के व्यवहार में

होंठ मचलते कुछ कहने को, सहमें सहमे बैन हैं

दिन भर खोया-खोया रहता, रोता सारी रैन है

 

मनचाहा यदि मिल भी गया रे, तो ही क्या हो जाएगा।

हाथ  पसारे  आया  था  तू, हाथ पसारे जाएगा।।

एक घड़ी को भी रे पगले, क्यों न तुझको चैन है

दिनभर खोया-खोया रहता, रोता सारी रैन है ।।

 

कर्म का लेखा अरे अभागे,जैसे-तैसे काट ले ।

अपने जीवन की ये खाई, किसी जुगत से पाट ले ।।

किस उलझन में फँसा हुआ तू,भीगे-भीगे नैन हैं ।

दिन भर खोया खोया रहता,रोता सारी रैन है ।।

 

जो मिला जितना भी मिला उतने में ही संतोष कर ।

कोसा मत कर परिस्थितियों को, ईश्वर पे मत दोष धर ।

पडे़ भोगनी पी बावरे, विधना की यह दैन है ।

दिन भर खोया खोया रहता,रोता सारी रैन है ।।

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Thursday, April 22, 2021

1092-

 आपके   शीघ्र स्वस्थ होने की कामना के साथ  -सहज साहित्य परिवार

परमजीत कौर रीत


कोविड पोजिटिव होकर अस्पताल में भर्ती हूँ ऐसे में एक बार फिर अपनी पसंदीदा किताबें पढ़ने का अवसर मिला है। समीक्षा लिखने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है
   बस अपनी वर्तमान स्थिति में बनजारा मन' पढ़ते समय जो विचार आ रहे हैं वो प्रस्तुत कर रही हूँ -

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बनजारा मन

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बनजारा मन समसामयिक जीवन का गहन दस्तावे है । अपनी वर्तमान स्थिति के अनुरूप मुझे इसमें अनेक सकारात्मक रचनाओं ने प्रेरित किया है जिंदगी की जंग और कठिन काल में हौसला बढ़ाया है ; इसके लिए बनजारा मन की तहेदिल से आभारी हूँ।

वैसे तो अनेक रचनाएँ अलग-अलग रूपों में महत्वपूर्ण हैं पर यहां मैं कुछ कविताएँ रेखांकित कर रही हूँ जो जिजीविषा में प्राण और निराशा में आशा का संचार कर रही है-

-तूफ़ानों से डर कैसा

चलना है बस चलना है। ( पेज19)

 

-छोटी सी

अंजुरी में हम

सारा आकाश भरें। ( पेज24)

 

-आएँ/

कितनी भी बाधाएँ/

हम मुस्काएँ । ( पेज 42)

 

-मुसीबत कभी जब हम पर पड़ी

 ज़िन्दगी सचमुच सरल हो गई।  ( पेज 59)

 

-जीवन के अँधेरों में/

बाधा बने घेरों में/

 सभी द्वारे दीपक/जलाए रखना।  ( पेज69)

 

-चुप रहती है फिर भी बहुत बोल जाती है/

बनी मन की अथाह गहराई है बूँद । ( पेज 78)

 

-हार नहीं मानती है चिड़िया ।( पेज 98)

और ऐसी ही अनेक रचनाएँ हैं जो   संघर्ष के इस काल में जीवन की जंग को जीतने की प्रेरणा दे रही हैं।

आदरणीय भाई साहब रामेश्वर काम्बोज जी का हार्दिक आभार है कि उनकी पुस्तक 'बनजारा मन' की रचनाओं ने मुझ जैसे साधारण पाठक में  आशा और प्रेरणा  जगाने का पुनीत कार्य किया है

-सादर-

---परमजीत कौर 'रीत'