पथ के साथी

Showing posts with label डॉ. पूर्णिमा राय. Show all posts
Showing posts with label डॉ. पूर्णिमा राय. Show all posts

Thursday, January 23, 2020

948


1-डॉ.पूर्णिमा राय

1
सहज भाव से सुख मिले,कब मनमाना रोज
बाहर काहे  ढूँढता ,भीतर ही सुख खोज।।
2
रिश्ते महकें फूल -से ,दिल में हो जब प्यार।
चंदन सी खुशबू मिले ,दूर अगर तकरार।।
3
भाई तेरे प्यार पर ,सौ जीवन कुर्बान।
माथे करती तिलक हूँ, पूरे हों अरमान।।
4
उजली-उजली धूप का, छू रहा एहसास
शीत लहर का आगमन ,प्रेम भरा विश्वास।।
5
नफ़रत की दीवार से,कैसे होगा पार।
पास नहीं जब प्रेम की, दौलत अपरंपार।।
-0-डॉ. पूर्णिमा राय, पंजाब
ईमेल :
drpurnima01.dpr@gmail.com
-0-
2-मंजूषा मन
1.
मोती जग को बाँटती, नन्ही -सी इक सीप।
उजियारे का मोल भी, नहीं माँगता दीप।।
2.
सारा जग हर्षा रहा, कलियों का यह नूर। 
पवन सुवासित कर रही, सुख देतीं भरपूर।।
3.
तृण-तृण पल-पल में रहें, मन में बसते राम।
पावन सब संसार से, राम तुम्हारा धाम।।
4.
सूरज कोने में छुपा, बैठा होकर शाँत।
सकल जीव ठिठुरे फिरें, सबके मन हैं क्लांत।।
5.
हिम कण बन गिरने लगी, हाड़ जमाती शीत।
शीतल तरल बयार भी, गाए ठिठुरे गीत।।
6.
सूरज कोने में छुपा, बैठा होकर शाँत।
सकल जीव ठिठुरे फिरें, सबके मन हैं क्लांत।।
-0-
3-सविता अग्रवाल 'सवि' (कैनेडा)
1
आसमान है सज रहा, तारों की बारात ।
पवन मगन हो नाचता, लहरें देतीं साथ ।।
मानव -जीवन बुलबुला, चार दिनों का खेल ।
बात प्रेम की बोलिए, कर लो सबसे मेल ।।
3
 धर्म- दया सबसे बड़े , कर सबका उपकार ।
गा न दुःख कभी,  नाव लगेगी पार ।।
4
पंख लगा कर प्रेम के, ऊँची  भरो उड़ान ।
वैर- द्वेष न संग धरो, होगा तेरा मान ।।
5
लेकर कुंजी प्यार की, खोलो मन के द्वार ।
साफ़ करो सब मैल को, करो दिल से बाहर ।। 
 सरिता देती ही रही, चलने की ही सीख ।
 पालन इसका जो करे,  माँगे ना वो भीख ।।
7
राम नाम मुख से कहें, फिर भी करते घात ।
मंदिर गिरिजा बैठके , चुगली करते साथ ।।
8
कल -कल पानी बह रहा ,झरने करते शोर ।
सावन की बरसात में , बगिया  नाचे मोर ।।
9
डगमग करती नाव भी ,पार लगाती छोर ।
नाविक बैठा देखता , सुख से तट की  र ।।
  -0- ईमेल : savita51@yahoo.com

4-शशि पुरवार 
1
तन को सहलाने लगी, मदमाती- सी धूप
सरदी हंटर मारती,हवा फटकती सूप 
2
दिन सर्दी के आ गए, तन को भा धूप
केसर चंदन लेप से, ख़ूब निखरता रूप  
3
पीले पत्रक दे रहे, शाखों को पैगाम
समय चक्र थमता नहीं, चलते रहना काम
4
रोज कहानी में मिला , एक नया किरदार
सुध -बुध बिसरी जिंदगी, खोजे अंतिम द्वार
5
क्या जग में तेरा बता ,आया खाली हाथ
साँसो की यह डोर भी, छोडे तन का साथ 
6
तन्हाई की कोठरी , यादें तीर कमान
भ्रमण करे मन काल का, जादुई विज्ञान 
7
जीवन के हर मोड पर, उमर लिखे अध्याय
अनुभव के सब खुश रंग, जीने का पर्याय 
8
जहर हवा में घुल गया, संकट में है जान
कहीं मूसलाधार है, मौसम बेईमान   
9
तेवर तीखे हो गए, अलग अलग प्रस्ताव
गलियारे भी गर्म हैं, सत्ता के टकराव
 10
रोज समय की गोद में, तन करता श्रम दान
मन ने गठरी बाँध ली, अनुभव के परिधान
11
नजरों से होने लगा, भावों का इजहार 
भूले -बिसरे हो गए, पत्रों के व्यवहार  
12
तनहाई डसने लगी, खाली पड़ा मकान
बूढी साँसें ढूँढती , जीने का सामान
-0-
       
                                          

Sunday, June 9, 2019

907-रंग न उतरे प्रीत का



डॉ.पूर्णिमा राय ,पंजाब 

कान्हा तेरी प्रीत ही है जीवन आधार
रंग भरो बस प्रेम का, क्षणभंगुर संसार ।।

कमलनयन के प्रेम में, राधा है बेचैन
मीरां बनकर घूमती,चाहे हर पल प्यार।।

बाट जोहते नैन हैं ,हाल हुआ बेहाल
दर्शन दे दो साँवरे ,लीला अपरम्पार।।

स्वार्थ -भरी जीवन डगर ,मोह लोभ की धूप
मन सुमिरन औ' कर्म से श्याम मिले साकार।।

उदित सूर्य मेंपूर्णिमामुख पर है मुस्कान 
रंग न उतरे प्रीत का, जीवन -नैया पार।।

Wednesday, October 3, 2018

848


डॉ.पूर्णिमा राय
 1
बोएँ शिक्षा -बीज सब ,पाएँगे फल चार।
उज्ज्वल मानवता बने,सपने हों साकार।।
2
साक्षर बनके कर रहे,भारत नाम महान।।
खान गुणों की है बने, ज्ञानी विद्वान।।
3
पावन भावों से भरी, ये रेशम की डोर।
भाई के बिन बहन की, कैसे हो नव भोर।।
4
रंग-बिरंगी ही चमक ,फैली चारों ओर।
बहन-प्रेम के सामने,चलता किसका जोर।।
5
सावन की बरसात में, रहना मत अब दूर।
सासों में तुम हो बसे ,तुम्हीं आँख के नूर।।
6
पुरवैया मोहक चले, मेरे मनमीत।
ने डोर ही बाँधती ,तेरी-मेरी प्रीत।।
7
प्रीत महक से खिल उठे,प्रतिपल  मेरी  साँस।
तृप्ति मिले जब रूह को,रहे कोई प्यास।।
8
नतमस्तक होकर मिले,मात-पिता का प्यार।
दिल दुखाना भूल से ,करना सद्व्यवहार।।
9
जो आशा मन में रहे,मिल जा मन मीत।
कानों में रस घोलता,कोयल- सा संगीत।।
10
धीरे-धीरे पग बढ़े, अपनी मंजिल ओर।
मिले नहीं ठहराव से,खुशी भरी नव भोर।।    
-0-  डॉ.पूर्णिमा राय,
इमेल-drpurnima01.dpr@gmail.com
वेबसाइट-www.achintsahitya.com


Tuesday, February 20, 2018

801


कविताएँ-
3-ये गूँगी मूर्तियाँ-मंजु मिश्रा

ये गूँगी मूर्तियाँ
जब से बोलने लगी हैं
न जाने कितनों की
सत्ता डोलने लगी है
जुबान खोली है
तो सज़ा भी भुगतेंगी
अब छुप छुपा कर नहीं
सरे आम…
खुली सड़क पर
होगा इनका मान मर्दन
कलजुगी कौरवों की सभा
सिर्फ ठहाके ही नहीं लगाएगी
बल्कि वीडियो भी बनाएगी
अपमान और दर्द की इन्तहा में
ये मूर्तियाँ
फिर से गूँगी हो जाएँगी
नहीं हुईं तो
इनकी जुबानें काट दी जाएँगी
मगर अपनी सत्ता पर
आँच नहीं आने दी जाएगी
-0-
1- तुम्हारे सपनों में -मंजूषा मन

नींद में अधखुली पलक को
थोड़ा और ऊपर उठा
हो जाऊँगी शामिल
तुम्हारे सपनों में...

तुम किसी झाड़ी से तोड़ लेना
एक जंगली गुलाब,
मैं तुम्हें दूँ एक मुट्ठी झरबेरी के बेर,

थककर किसी झील के पानी में
मुँह धो मिल जाये ऊर्जा,
तमाम दिन झुलूँ झूला
तुम्हारी बाहों का..

एक पूरी रात
तुम्हारे सपने में 
जी लूं एक पूरा दिन
तुम्हारे साथ।
-0-
2. मंजूषा मन


सारे कसमें और वादे धरे रह गए ।
अश्क आँखों में मेरी भरे रह गए ।

जिस्म के जख्म तो थे गए फिर भी मिट,
रूह के जख्म आखिर हरे रह गए ।

उसके जुल्मो सितम का हुआ ये असर,
थोड़े ज़िंदा बचे कुछ मरे रह गए ।
-0-
3- ए राही !!!
डॉ.पूर्णिमा राय

ए राही !!!
मानव जीवन है अलबेला 
है हर इक इन्सान अकेला
चाहे नित नवीन मंजिल को
बीतती नहीं दुख की बेला!!
भास्कर नव किरणें फैलाता है
भँवरा फूलों पर मँडराता है
कुदरत का मधुरिम सौन्दर्य
जीवन उपवन महकाता है!!
मधुरिम रिश्तों की अभिलाषा
मन में जगाती नई आशा
डग भरता राही जल्दी से
छा ना जाये कहीं निराशा!!
सुख वैभव इकट्ठे करता है
आकाश उड़ाने भरता है
औरों को सुख देने खातिर
हरपल विपदाएँ सहता है!!
पत्तों की मन्द सरसराहट
पंछियों की सुन चहचहाहट
बीती बातों की स्मृतियों से
आए अधर पर मुस्कुराहट!!
-0-