पथ के साथी

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Wednesday, March 4, 2026

1497

 

जन्मों का गठबंधन / अनिता ललित

 

बोली मुस्कान, आँसू से,

एक दिन आकर -

क्यों आते हो तुम -अँखियों में भर-भर?

होकर के मजबूर, मैं जाती हूँ बिखर!

 

बोला आँसू -

तुम आओ जो खिल-खिल कर,

मैं भी तो हो जाऊँ बेघर!

दया तुम्हें न आए मुझपर?

दुख की गगरी संग मेरे -जब नैनों में भर-भर आती,

मेरे घर भी, उस पल हर सू -बहारें ही बहारें छातीं!

लेकिन जैसे ही चौखट पर, दबे पाँव से तुम आतीं -

देख के तुमको झूम ही जाती! दुनिया मुझको भूल ही जाती!

दुनिया में सबको -तुम प्यारी! अदा तुम्हारी सबसे न्यारी,

ओढ़ा तुम्हारी चादर मुझको -ज़ालिम! साँसें रोके मेरी!

 

 

उलझे दोनों आपस में -हुई खट्टी-मीठी तक़रार!

फिर मिल बैठे, लगे सोचने -होता ऐसा आख़िर क्योंकर?

दोनों जब जज़्बात के बस में –

फिर दुश्मनी क्यों, है आपस में?

देख नम मुस्कान की आँखें, आँसू हौले से मुस्काया,

दोनों के शिक़वों का उसको, राज़ समझ में अब आया!

 

थाम हाथ मुस्कान का, आँसू फिर उस से बोला -

अँखियों में, जब मैं भर आता -मुझमें वजूद तेरा मुस्काता!

जब भी तुम, लब पर लहराती -अँखियों से मैं बह-बह जाता!

तुम मेरी! मैं तेरा! दोनों हम -

एक-दूजे के पूरक हैं हम!

ग़र तुम न हो -क्या हस्ती मेरी?

जो मैं नहीं -क्या क़दर तुम्हारी?

 

दुनिया क्या जाने साथ निभाना, ये ठहरी बेईमान!

ग़रज़-परस्त, मतलबी, यहाँ के - हैं सारे इंसान!

अपने झूठे सुख-दुःख में ये -हमको लाठ बनाए है!

कभी सजाए, कभी बहाए, जी भर हमें नचाए है !

ग़ुलाम सही हालात के हैं हम -मगर अधूरे अलग-अलग हम!

अपना तो, अनूठा बंधन -

ये है -जन्मों का गठबंधन!

-0-

 

Sunday, May 9, 2021

1103-माँ

 1-माँ अब कुछ कहती नहीं!

                  -अनिता ललित

(यह कविता मैंने तब लिखी थी, जब माँ जीवित थीं और कई बीमारियों की तक़लीफ़ से जूझ रहीं थीं! उनकी वह बेबसी मुझसे देखी नहीं जाती थी! उनके पास जाकर कुछ दिन रहकर, उनके साथ वक़्त बिताकर, जो कुछ भी उनके लिए कर सकती थी, मैंने किया! सोते समय भी वह मेरा हाथ पकड़े रहतीं थीं, किसी छोटे बच्चे की तरह –यह याद करके मेरी आँखों में आज भी आँसू आ जाते हैं! जनवरी, सन् 2019 में वो इस दुनिया को अलविदा कह गईं! ईश्वर से प्रार्थना है, वे जहाँ भी हों, सुक़ून से हों, सुख में हों!)

 

माँ अब कुछ कहती नहीं!


लगता है, वह जीती नहीं!

ख़ाली, वीराँ आँखों से

वो बस देखा करती है;

चीख़ उठे कभी –

अनायास ही –

घुटतीं हों साँसे जैसे!

या -

कचोटता हो दर्द कोई,

भीतर ही भीतर उसको -

बयाँ नहीं कर पाती जिसको!

पीड़ा अन्दर पीते-पीते,

लगता है, वो रीत गई!

थी जीवन से भरपूर कभी जो –

वो माँ! -अब कुछ कहती नहीं,

लगता है, वह जीती नहीं!

 

जब से होश संभाला मैंने

माँ को बस, चलते देखा है!

घर के कोने-अतरे तक को -

उसको चमकाते देखा है!

खाना-कपड़े-झाड़ू-बर्तन

उसके हाथ खिलौने थे!

सबकी चीज़ जगह पर मिलती

माँ, पर, एक जगह न टिकती!

वो माँ! –अब कुछ कहती नहीं 

लगता है वो जीती नहीं!

 

माँ के हाथों का खाना

जिसने खाया, उसने जाना –

वह स्वाद अनोखा, प्यार अनूठा –

मन को करता आज भी मीठा !

सबको करके तृप्त सदा ही

वह कुछ खाती-पीती थी!

लेकिन, कभी-कभी, थक कर माँ -

भूखी ही सो जाती थी!

 

आँधी-तूफ़ाँ या बरसात

सब उससे घबराते थे!

कड़ी धूप में साया देती -

माँ! आँचल में भर लेती थी!

कितनी भी हो कठिन समस्या –

माँ! सब हल कर देती थी!

 

आज विवश हो उम्र के हाथों

बीमारी, लाचारी में –

घर के सूने कमरे में,

बेतरतीब से कोने में -

निपट अकेली पड़ी हुई माँ -

बस! रोती है, सिसकती है!

साँसों से जैसे थक चुकी है!

माँ अब कुछ कहती नहीं!

लगता है, वह जीती नहीं!

 

जितने मुँह में दाँत नहीं,

उससे ज़्यादा छाले हैं !

पेट की आग जलाती है!

जो दे दो –खा लेती है!

खाती क्या –निगलती है!

न खाने का स्वाद रहा,

न जीने का चाव रहा !

खाती है –तो जिंदा है!

जिंदा है –तो खाती है!

माँ अब कुछ कहती नहीं !

लगता है, वह जीती नहीं !

अब शायद –

जीने की चाहत भी नहीं!

-0-

अनिता ललित ,1/16 विवेक खंड ,गोमतीनगर ,लखनऊ -226010

ई मेल: anita.atgrace@gmail.com

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2-माँ

डॉ. सुरंगमा यादव

माँ है तो घर हँसता
माँ से ही घर में व्यवस्था
उसका मृदु स्पर्श
पल में दुःख हरता
आँखों से बहता
ममता का सोता
माँ के बिन खाली-खाली
मन रह -रह रोता
माँ है तो हर नखरा
वरना कौन मन रखता !
माँ मंगल रोज मनाती
मुझे अपनी उमर लगाती
डर जाऊँ जब अंधियारे से
झट से गले लगाती
माँ के आँचल से मुँह पोंछना
अब भी बड़ा सुहाता
रोज -रोज की फरमाइश
माँ पूरा करने को तत्पर
माँ का  मन ज्यों नवनीत नवल
पल में द्रवित हो जाता
माँ नहीं तो अब कोई भी
कहता न थक कर आयी  हो
बालों में उंगली की थिरकन
अब दूर करेगा
कौन थकन!
आशीषों से अपने
जीवन में सुख-समृद्धि भरती
अपनी खुशियों से बेपरवाह
सबकी खुशियों में खोई रहती
अपना दुःख कहे नहीं
औरों का बिन कहे समझ लेती
'माँ' एक अक्षर का शब्द मात्र
जिसमें ब्रह्माण्ड समाया
उसकी ममता पाने को
खुद ईश जगत में आया
माँ जीवन की किलकारी
आँसू पर मुस्कान सजाती
जो माँ का मान नहीं करते
वे समझो बड़े अभागे
माँ की सेवा से विरत रहें
अपनी दुनिया में खोये हैं
कल क्या हो किसने जाना
आज दुआओं से उसकी
निज दामन भर लो!

-0-

3-नींद की मीठी झपकी माँ

  डॉ.महिमा श्रीवास्तव

 

 

पहाड़ों से निकलते

फेनिल, खुशी के झरने

जैसी थी मेरी माँ ।

टैगोर की गीतांजलि-सी

काव्य की सौगात

ही थी मेरी माँ ।

जलतरंग -सी बजती

चूड़ियों से भरी गोरी कलाई

माखन मिश्री- सी थी माँ ।

मेरी बाट निहारने वाली

चंपा -चमेली की

बगिया जैसी थी मेरी माँ ।

झिरमिर बारिश से

नम हुई माटी की

सौंधी खुशबू  जैसी

मेरी सखी थी माँ ।

मधुमालती की बेल- सी

मेरे मन के द्वार को

घेरे रहती  थी माँ ।

जाड़े में नर्म रजाई- सी

मुझे अपने में समेट लेती

ममता की बाहों सी माँ ।

गोभी गाजर के अचार के

मसालों से सने हाथों वाली

स्वादों का संसार थी माँ ।

सपने में दिखने वाली

जादुई छड़ी लिये

सोनपरी जैसी थी माँ ।

पुस्तकों पर थका

सिर रखे हुए

मीठी नींद की झपकीजैसी ही थी माँ।

 -0- Email: jlnmc2017@gmail.com

      8118805670

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Tuesday, February 16, 2021

1051

 1-अनिता ललित

1

तारों की छाँव


फूलों का आशियाना
चाँद का साथ
चाँदनी का तराना~
सब हैं साथ
फिर क्या बात!
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2-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

 

बड़े जतन से

जीवन भर जो, बाँधी थी

बीच बाट में-

गठरी अपनी छूट गई ।

 

डोर बाँध हम

छत को छूने वाले थे

संगी -साथी

कुछ तो दिल के काले थे

किसने काटे

छोर कि डोरी टूट गई ।

 

हम गगरी में

भरकर गंगाजल लाए

‘घट पापों का’

कहकर कुछ थे चिल्लाए

सबने फेंके

पाथर गगरी फूट गई ।

 

घर-द्वार छिना

छाँव नीम की, बाट छुटी

बेचा सबने

हमको जिसमें हाट लुटी

मिली शराफ़त

वही हमीं को, लूट गई ।

 

काज़ी तुम हो

दण्ड हमारे नाम लिखो !

भोर उन्हें दो

हमें आखिरी शाम लिखो

अपना क्या दुख

हमसे क़िस्मत रूठ गई ।

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Tuesday, August 25, 2020

1025

 1-समय

कृष्णा वर्मा

 

समय बड़ा बलवान रे भैया

किसको दें इल्ज़ाम रे भैया

 

सतरंगी सपने थे पाले

वक़्त कर गया पल में काले

सींचा जिन्हें अमी  देकरके

वही दे गए दिल पे छाले।

 

आँखों में आँसू के धारे

वही दे गए जो थे प्यारे

उनको कुछ अहसास नहीं

झाग हुए हम पी-पी खारे।

 

दुख की लम्बी साँझ दे गए

हाथ ग़मों की  झाँझ दे गए

ऐसी पीड़ा शूल दे गए

ख़्वाब सभी निर्मूल हो गए।

 

हाथों से पतवार खो गई

नैया भी मझधार हो गई

कौन सुने अब किसे पुकारें

रह गए कितने दूर किनारे

पता न हम बेहोश थे भैया

या किस्मत का दोष था भैया

दिल में बचा मलाल रे भैया

समय बड़ा बलवान रे भैया।

 

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2-अनिता ललित

 

पराए देश,

जो लगे अकेला

लाज़िम ही है!

अपनों में रहके भी

जो अकेलापन झेले –उसका क्या?

 

क्यों होता ऐसा -जिसका नाम

आपकी साँसें, हर पल गुने,

उसके लिए –आपका होना ...

बस! होना है!

दाल, चावल, रोटी –

ज्यों खाना ही है!

 

क्या चाहिए इस दिल को?

क्यों है इतना भारी –

जब है ख़ाली-ख़ाली!

 

क्यों इतनी अपेक्षाएँ?

जो दुःख पहुँचाती ख़ुद को?

ख़यालों का जंगल, सवालों के तूफ़ान, चु

भते काँटों -सी बातें –

ये कैसी बेचैन शख़्सियत है?

कहाँ गया वो सुकूँ का ख़ज़ाना?

यह कैसी दहशत सवार है मन में?

ये डर –खो देने का!

बार-बार खोने के बाद, फिर से खो देने का?

 

अपना था क्या, जिसे पा लेने की ज़िद है?

साथ लाये थे क्या, जिसे बाँधने का जुनूँ है?

सभी रिश्ते-नाते, ज़ेवर की तरह –

कुछ वक़्त तन-संग सजें,

फिर कुछ सिमटें, कुछ टूटें,

कुछ बोझ की तरह छूटें!

अपना साथ, ख़ुद अपने सिवा -

किसी ने कभी, निभाया है क्या?

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