नज़्म/ लिली मित्रा
फिर
शाख पे रौनक है
फिर
गुलों पे जवानी है
जहद-
ए -मुसलसल के बाद
लम्हा
- लम्हा तितलियों की कहानी है
दरख्तों
की ज़ुबानी है
ख़ुश्क
हसरतों पे
बादलों
की मेहरबानी है
रेज़ा- रेज़ा
ये बारिश
सेहरा
पे बागवानी है...
गुज़रती
मसर्रत से ज़िंदगानी है
फिर
शाख पे रौनक है
फिर
गुलों पे जवानी है
-0-
रश्मि लहर
1
एक
सुबह मन को तुम्हारी झलकियाँ याद आ गईं।
सिहरती
इक साँझ की कुछ सुर्खियाँ याद आ गई।।
सुन
मेरी पदचाप खुलती खिड़कियाँ याद आ गईं।
ज़िन्दगी
रंगों से भरती तितलियाँ याद आ गईं।।
थामकर
पतवार माँझी था मगन, पर उस घड़ी,
भॅंवर
से टकरा पड़ीं कुछ कश्तियाँ याद आ गईं।।
वो
तेरी भीगी पलक,
कन्धे टिका माथा तेरा।
अनमने
अलगाव की वे सिसकियाँ याद आ गईं।।
बाद
-मुद्दत द्वार के बजने की थी आहट मिली।
भीगता
चेहरा,
वो माँ की झुर्रियाँ याद आ गईं।
2
दिल को वो देने चले ख़ुशरंग सपने आज फिर
बाग
उपवन फूल कलियां और झरने आज फिर।
दिल
में हर जज़्बा सलीक़े से सजाने के लिए
आ
गए वो दिल की चादर को बदलने आज फिर
क्यों
करें तन्हा सफ़र,
यह सोच कर दिल रुक गया
लौटकर
आ जाओ तुम भी साथ चलने आज फिर
सुरमई
उस शाम के सॅंग,
बीत जाना था मगर,
पल
मुहब्बत के चले हैं ख़ुद मचलने आज फिर
झूठ-सच
खुल जाऍंगे तो,
रंग बदलेंगे कई,
हाथ
से वादों के पन्ने,
हैं सरकने आज फिर
उॅंगलियाँ क्या
तार भी टूटे मिले हर साज़ के
जब
चले महफ़िल में उनको याद करने आज फिर
था
भँवर सागर के दिल में पर 'लहर' मासूम थी
चल
पड़ी नादाँ उदधि बाँहों में भरने आज फिर
-0-
मेरे आँगन की
किलकारी / संजय
सागर
मेरे
आँगन की किलकारी मुझसे दूर गई ।
मेरी
आँखों की छवि न्यारी मुझसे दूर गई ।
ठुमक
ठुमक कर सारे घर में खेला कौन करे ?
तुतली
भाषा की मिश्री को घोला कौन करे?
बूढ़े
बाबा को तन्हाई फिर से घूर गई।
मेरी
आँखों की छवि न्यारी मुझसे दूर गई ।।
घर
की छत पर साँझ ढले इक चिड़िया पूछ रही ।
कहाँ गई
वह गुड़िया रानी पड़िया पूछ रही ।
दादी
के चावल की थाली तुझ बिन पूर गई
मेरी आँखों की छवि न्यारी मुझसे दूर गई ।
बड़ा
खिलौना ढम-ढम वाला लेकर ढोल खड़ा ।
मोटर, गुड़िया,
मुर्गा , तुरही ढोलम पोल पड़ा।
चाचा
की आँखों से लगता ले के नूर गई ।
मेरे
आंगन की किलकारी मुझसे दूर गई ।।
रात
गए पापा की निंदिया तुझ संग भाग गई ।
तेरी
यादें बिस्तर पर भी बबुआ टाँक गईँ ।
सूनी
पलकों से आँसू की लड़ है झूल गई ।
मेरे
आँगन की किलकारी मुझसे दूर गई ।।


