- मैं लौट आऊँगा
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
मैं चला आऊँगा
बिना साँकल बजाए
आँगन के फूलों को सहलाकर
खिड़की से होकर
बनकर हवा का झोंका,
बैठ जाऊँगा
अपनी व्हील चेयर पर
चाय के कप से उठती
भाप को पीकर
तुम्हें देखकर मुस्कुराऊँगा।
नश्वर माटी के घट से निकल
जल में पनडुब्बे की तरह
डुबकी लगाकर
मिट्टी में मिल जाऊँगा,
एक दिन चुपचाप
किसी सिन्दूरी
भोर में
फिर उग आऊँगा
कोई फूल बनकर।
उड़ूँगा आँगन में
फुलचुही बनकर
जब तुम उदास होगे,
मीठे स्वर में
तुम्हें ही पुकारूँगा-
“मैं कहीं नहीं गया
मैं नित्य हूँ, मैं शाश्वत हूँ
मैं ड्राइंगरूम की आराम कुर्सी पर
उनींदा-सा धूप सेंक रहा हूँ।”
उदास न होना
मैं कहीं नहीं गया,
बस कुछ देर को
गायब हो गया था
भूले गीत की तरह,
तुम प्रतीक्षा करना
मैं लौट आऊँगा।
(30 सितम्बर 2026)
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