पथ के साथी

Monday, August 17, 2026

1510

 मनवा हरसे/  शीला मिश्रा



बाग-बगीचा सब है हरसे।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

सूनी सूनी काली रतियाँ।
बरसन रहतीं मोरी अँखियाँ।।
कँगना चूड़ी रूठीं मुझसे ।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

बहुत सताये तेरी सुधियाँ
मीठी मीठी प्यारी बतियाँ।।
आँखों का कजरा है तरसे
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

महके महके फूल व कलियाँ।
  झूला झूलें मेरी सखियाँ।।
वन उपवन कैसे हैं हरसे।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

सखियाँ पहनें लहंगा चनियाँ।
चूड़ी से सजाई कलइयाँ।।
सजने को आतुर हूँ कबसे।
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

सखियाँ खींचें मेरी बहियाँ।
तेरे बिन ना भाये सइयाँ।।
आ जाओ तो मनवा हरसे
झूम- झूमकर मेघा बरसे।।

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