पथ के साथी

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Saturday, February 9, 2019

877


अब तुम याद नहीं आते....
डॉ.पूर्वा शर्मा


जीवन में ऐसा मोड़ आ गया है
कि अब तुम याद नहीं आते,
आज भी भोर किरण धरा-मुख चूमती है                       
पुरवाई हौले से छूकर तन को सहलाती है
पर अब तुम याद नहीं आते,
पलाश पर बैठी कोयल मीठे गीत सुनाती है
रंग-बिरंगे कुसुम क्यारियों को सजाते हैं 
पर अब तुम याद नहीं आते,
वर्षा की बूँदों से महकी मिट्टी मन को महकाती है
चाँदनी में नहाई धरा खिलखिला के दमकती है
पर अब तुम याद नहीं आते,
पर अब तुम याद नहीं आते, नहीं आते...
तुम ही बताओ तुम्हें याद कैसे करूँ ?
तुम्हें भूलूँ, तभी तो याद करूँ
तुम्हें भूल ही नहीं पाती क्योंकि
बसे हो मुझमें यूँ मुझसे ज्यादा तुम कि  
प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में तुम ही महकते
हरेक धड़कन में तुम ही धड़कते  
इन नैनों में भी केवल तुम ही बसते
कण-कण में बस तुम ही तुम समाते
प्रतिपल सिर्फ तुम मेरे ही साथ रहते 
बसे हो मेरी आत्मा में कुछ इस तरह  
कि तुम्हें भुलाना अब असंभव है
तुम्हें याद करूँ भी तो कैसे?
तुम्हें भूल ही नहीं पाती
तो याद भी नहीं कर पाती
इसलिए अब मैं यही हूँ कहती
कि अब तुम याद ही नहीं आते
-0-
2-अनिता मंडा
1
हाँडी भीतर ऊँट को, ढूँढ रहा संसार।
ऐसी ही गत प्रीत की, पतझड़ हुई बहार।।
2
मुस्कानों का आवरण, भीतर सौ-सौ घात।
होने लगे बसंत में, पीले पीले पात।।
2
मल्लाहों के पास है, कश्ती बिन पतवार।
और दिखायें ख़्वाब वो, कर लो दरिया पार।।
3
होठों पर हैं चुप्पियाँ, भीतर कितना शोर।
सूरज ढूँढे खाइयाँ, आए कैसे भोर।।
4
परछाई है रात की, बुझी बुझी सी भोर।
उजियारे के भेष में, अँधियारे का चोर।।
5
जुगनू ढूँढे भोर में, पतझड़ में भी फूल।
कुदरत के सब क़ायदे, लोग गए हैं भूल।।
6
प्रतिलिपियाँ सब नेह की , दीमक ने ली चाट।
पांडुलिपि धरे बैर की, बेच रहे हैं हाट।।
7
सूनी घर की ड्योढियाँ, चुप हैं मंगल गीत।
जाने किस पाताल में, शरणागत है प्रीत।।

-0-


Saturday, October 27, 2018

855


सार / ललित छन्द 
1- ज्योत्स्ना प्रदीप 
1
चंदा -सी काया हर घर में, बाट चाँद की जोहे ।
निशिकर  आया नभ में देखो ,नयनों को वो सोहे ।
चाँद विभा का खुद प्रेमी हैं, प्रेम न उसका दूजा l
युग बदला हो चाहे कितना, निशिकर सबने  पूजा !
2
छलनी लेकर हाथों में प्रिय ,तुमको नैन निहारे l
झरे ओज चंदा से प्यारा, तेरी आँखों वारे l
छलनी से पूजा है तुमको, छन- छन छने अँधेरे l
छलना ना जीवन में सजना, सुख -दुख  तेरे -मेरे !
3
दीप -दीप से जग रौशन है, मन में पर अँधियारा, 
कोना-कोना मन का चमके , हो ऐसा उजियारा I
अँधियारी रातों को  मिलकर, भोर बना लो प्यारी, 
 नेह बना लो दिनकर -सा तुम, हर मन हो सुखकारी।
4
 कोमल मन तितली -सा  है राहें बड़ी कँटीली, 
जिस पर नेह लुटाया मन से, आँखें उस पल गीली, 
छल -बल से ना चलता जीवन, जीत तो मन की होती, 
टहनी पर कितने काँटे हों, कलियाँ पर ना रोतीं !
-0-
2-अनिता ललित
 1.
तुमसे ही जीवन में मेरे, पल-पल के उजियारे 
तुमसे ही माथे का सूरज, सजे माँग में तारे 
तुम्हीं आस, विश्वास तुम्हीं हो , तुमसे सपने सारे 
दुनिया सारी एक तरफ़ है, तुम प्राणों  से प्यारे ।। 
2.
चाँद गगन में आज खिला है, केसरिया- सा न्यारा
मेरे मन-आँगन में जैसे, साँवरिया है प्यारा ।
नयनों में है छवि रुपहली , तन-मन मैंने हारा
अर्पित मेरा जीवन प्रियवर , जनम-जनम है वारा ।
-0-
3-पूर्वा शर्मा
1
शरण तुम्हारी  आऊँ गुरुवर, आशीष सदा पाऊँ ।
राह दिखाते तुम ही पग-पग, और कहाँ मैं जाऊँ ।
 बिखरा देते ज्ञान की ज्योति, फिर उजियारा पाऊँ ।
 गुरु -शरण से सफल है  जीवन, गुरु महिमा ही गाऊँ ।।
2
मैं ना जानूँ कैसे भाँपे, यह मन ख़ुशबू तेरी ।
तेरे आने से पहले ही, महकीं बातें तेरी ।
तेरे क़दमों की आहट से, थमती धड़कन मेरी ।
 प्रेम-गीत   की धुन पर देखो, चलतीं साँसें मेरी ।।
-0-

Tuesday, July 24, 2018

831


कमबख्त़ पुराने दोस्त
पूर्वा शर्मा

यादों की सूखी फसल को
फिर से लहलहाता कर गए
कल कुछ कमबख्त़ पुराने दोस्त मिल गए
फिर जी गया मैं इस ज़िन्दगी को
वो कुछ हसीं पल याद दिला गए
कल कुछ कमबख्त़ पुराने दोस्त मिल गए

दिल की तंग गलियों में
वे कमबख्त़ फिर से समा गए
कल कुछ कमबख्त़ पुराने दोस्त मिल गए
मुस्कराहट कम ही नहीं होती
ऐसी दवा वे सभी मुझे दे गए
कल कुछ कमबख्त़ पुराने दोस्त मिल गए

न जाने कौन-सा अर्क, कौन-सा इत्र
वे शीशी भर उड़ेल गए  
कल कुछ कमबख्त़ पुराने दोस्त मिल गए
महकता रहा रातभर मैं
और सुबह उनके ख़्वाब महका गए
कल कुछ कमबख्त़ पुराने दोस्त मिल गए
कमबख्त़ पुराने दोस्त क्या मिले
मुझ कमबख्त़ को भी गुलज़ार कर गए
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Friday, March 23, 2018

810

1-मै लिखती नहीं 
मंजु मिश्रा ( कैलिफ़ोर्निया)

मै लिखती नहीं
जीती हूँ 
अपने अहसास !
घूँट घूँट पीती हूँ
अपना आस-पास ...

बूँद भर ख़याल 
छलक छलक कर 
कब नदी बन गये 
पता ही नहीं चला !

और फ़िर
कागज की छाती पर 
दौड़ते भागते 
ये स्याही की नदी, 
कब समंदर बन गयी
ये भी कहाँ जान पाई मै !

मै तो बस 
अपने आप में गुम
अन्दर ही अन्दर 
तलाशती रही 
अपना वजूद
और रचती रही 
शब्दों के पुल 
जीवन पर करने को 
जो न जाने कब कविता बन गये.......

-0-
2-अब की
डॉ सुषमा गुप्ता

शाम ढले
पीछे आँगन में बिसरी चारपाई पर
यूँ ही अलसाए गुम थे
अरसे पुराना चाँद उतरा
मेरे घुटने पर ठुड्डी टिकाए बैठ गया ।
आँखें मुस्काईं
तो चाँद ने चश्मा उतार कर रख दिया मेरे आँचल पर
मैंने झट धुँधली कर ली आँखें अपनी
कहा..
बेज़ारी का  ख़त बाँचना छोड़ दिया कब का मैंने ...
जाओ महबूब
अब की आओ तो ज़िंदा आँखों के साथ आना ।
-0-
-     3-पूर्वा शर्मा
आज चन्द्र भी लजा रहा
लुक-छिप के वो रिझा रहा
प्रियतम से मिलकर है आया
तभी तो उस पल दिख ना पाया
प्रेम अगाध वो पाकर आया
रंग प्रीत का ऐसा छाया 
श्वेत वर्ण से हुआ है मुक्त
रक्तिम दिखे लाज से युक्त
पाकर प्रीत हुआ है पूर्ण
प्रकट हुआ है अब सम्पूर्ण ।
-0-रचना(31 जनवरी 2018)