पथ के साथी

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Wednesday, July 16, 2014

तीन कविताएँ( पीपल तू जीवंत है)



तीन कविताएँ
-मंजुल भटनागर
1
पीपल तू जीवंत है
सदियों से
देता  प्राण वायु
जग  उपकृत है.
तू है सृष्टि- बीज 
रहेगा  मेरे बाद भी
तू अमरत्व है
मेरी रचना की अंतर्दृष्टि दे 
स्निग्ध संवेदना भरता.
 मूक सवांद बन
लहलहाता किसलय 
विश्व  प्रागंण में
तू बोधिसत्व बन बुद्धत्व
रचता बिखेरता लावण्य.
-0-
2
पीपल मन हारे
कुछ पत्ते झरे
कुछ शेष रहे सहारे
घनी छाँव ओढ़ती 
छिप  रही धूप भी
सूरज निहारे
पीपल मन हारे .

भोर हुए कोंपल खिली
ओस दमकी पात झरी 
दूर श्याम श्वेत रंग 
धूप किरण झाँक रही
खटोले पड़ गए पीपल द्वारे
हवा भी सील गई
खिलखिलाता बसंत प्यारे
पीपल मन हारे .

मधुमास छटा सौंधी 
पीपल निहारता प्रेमी
पपीहे की मिलन चाह
मन ही मन भाँपता 
प्रीतम की राह तके
आहटें जगा रही भाव कुछ न्यारे
पीपल मन हारे .
-0-
3
पीपल की फुनगी पर
नीलकंठ का जोड़ा
जब  नीड़ नया  बुनता है तृण  से
तब भोर उगे पीपल अक्सर बातें करता है मुझसे.
लहरों सी  उठती गिरती  डाली जब 
सन्देश क्षितिज का  लाती है
पीपल के पत्तो की शहनाई
बिसमिल्ला खाँ  की याद दिला जाती है
शाम ढले तोतों का झुण्ड
जब पत्तों  में छिप जाता है
रोज सवेरे गुड़हल फल चख
दूर गगन  उड़ जाता है
हुक्के की गुड गुड में, जब रोज चौपालें  सजती है
बैठ उसी के नीचे महुआ
रोज एक कहानी गुनती है

सावन में जब झूले  पड़ते हैं
पींगों में , ख़्वाब रोज नए सजते हैं .
शाम ढले तब प्रेम कहीं जग जाता है ......
एक नई इबारत
पत्तों के झुरमुट पर लिख जाता है 
तब पीपल अक्सर बातें करता है मुझसे
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Sunday, July 28, 2013

मंजुल भटनागर की दो कविताएँ

मंजुल भटनागर  की दो कविताएँ
1-पेड़ की दुनिया
मंजुल भटनागर

वो जो देते हैं
साया चिड़ियों को
घर बनाने का
वो उस घर का किराया नहीं लेते
यह पेड़ ही हैं -----
जो बसा लेते हैं पूरी दुनिया
अपने साये तले
पर भूल के भी अहसान
जतलाया नहीं करते
हम जलातें हैं चिरागों को
अपने घर के लिए
यह रौशनी कभी
चाँद सितारें नहीं लेते
वो जो चलतें हैं
रास्ते खुद बन जाते हैं
पर किसी राह को
वो अपना नहीं कहते .
2- ख़त
आसमाँ से पिघल कर बादल
गर मेरे घर पे न
आए होते
मैंने भी कुछ सपनें
हसीं सजाएँ न होते
एक बारिश ने
जिन्हें डूबा दिया
काश किसी ने वो घर
बनाए न होते ,
डूबता शहर
न डूबता मकान होता
न जाने कितने मासूम
इसने दबाए न होते
हमने भी किसी दरख़्त पर
आसरा लिया होता
जलजले के ख़त
यदि हमें आए होते । 

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Wednesday, July 10, 2013

नदियाँ बस खामोश


मंजुल भटनागर

समुन्दर उछाल मारता ,
कहता बरबाद दरीचों का अफ़साना
नदियाँ बस खामोश हैं ।

शहर लापता थे
घरौन्दे जमींदोज़
वो कौन लापता था ,पता चला आया जब होश
समुन्दर उछाल मारता,
नदियाँ बस खामोश हैं ।

बोधिसत्व भी जल उठा ,
लहू बन कैनवस रंग चुका
यह कौन दर्द बाँट रहा , प्रकाश- पुंज ढाँप रहा
फिर भी बुद्ध खामोश है ।

फुहारें हैं, सावन पुरजोर है
रास्तों में उगी टहनियों की कहानी कुछ और है
फूल तो खिलें हैं कई ,जो बिछड गए
उनकी निशानियाँ कुछ और हैं

आँखें इंतज़ार करतीं ,जुबाँ कुछ बोलती है
नश्तर चुभते जब सुर्खियाँ कुछ और बोलतीं
जो गुजरे उस जमीं से पुरुषार्थी
कुर्बानियाँ उनकी कुछ और बोलतीं
समुन्दर उछाल मारता ,
नदियाँ बस खामोश हैं।
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