पथ के साथी

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Friday, January 30, 2026

1490

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मृगतृष्णा

 सुदर्शन रत्नाकर

पाठकीय प्रतिक्रिया-डॉ. सुशीला ओझा


-बहुत सुन्दर कहानी.. आज के यथार्थ को शब्दों में बुनती भावपूर्ण... बच्चों की परवरिश, पढ़ाई के बाद आदमी किस्तों में घर बनाता है.. अगर पत्नी अच्छी मिल जाती है.. गृहस्थी के पावन धूप में जलकर घर को संवारती है, निखारती है , संस्कार, परिष्कार करती है.. अर्थाभाव में भी धीरे-धीरे सुख, शान्ति श्री समृद्धि आने लगती है.. बेटे की पढ़ाई नौकरी बेटी की शादी.. सब दायित्वों से मुक्त.सेवा निवृत्त होकर  कुछ सोचने का समय मिलता है..एक मृगतृष्णा मन में बैठ जाती है.. सुख सुविधा की ओर उन्मुख होने  की फड़फड़ाहट.. सावित्री जानती हैं .अपनी धरती का सुख, अपनी माटी की सोंधी महक, अपने मुँडेर पर आते सूरज की प्रथम किरणों का अवगाहन, बाग में सुबह चिड़ियों की चहचहाहट। अभी -अ भी तो इस कलात्मक सौन्दर्य को महसूस करने का समय मिला है.. उसे  अपनी माटी में ही  सुख की अनुभूति हो रही है.. स्त्रियाँ पुरुषों से ज्यादा सहिष्णु होती है. . बेटे के पास जाने की बात पति करता है तो सावित्री अस्वीकार करती है.. पुरुष मन भावुक होता  है  राम के वनगमन का  दु:ख  दशरथ के मृत्यु का कारण हो गया.. पति मृगतृष्णा में है.. उसे नाभि की कस्तुरी की गंध  से आत्मज्ञान नहीं मिलता है.. बेटे के यहाँ जाता है जहाँ उसकी  अपनी पहचान पीले पत्तो की तरह  झरकर मिट्टी मे मिल गई है..वहाँ किसीको बाबूजी से बात करने का समय नहीं है.. बुढ़ापा में बच्चों का साथ मन को ऊर्जस्वित करता है.. जीवंतता, जिजीविषा, सकारात्मकता के अंकुरण से मन में उल्लास का अंकुरण होता है.. वहाँ जाने पर पति ठंढ़ा खाना, अपने से परस कर खाना.. सावित्री की स्मृति मलयानिल बयार की तरह वसंत का एहसास कराती है.. सावित्री कितना स्नेह, प्रेम से खिलाती थी. हमलोग मिल-बैठकर अपना दु:ख सुख साझा करते थे.. एक सकारात्मकता, प्रवाहमयता बनी रहती है.. यहाँ का जीवन यांत्रिक जीवन है.. सहृदयता, आत्मीयता, अपनत्व, मिठास की सारी अर्गलाएँ बन्द है .बर्फ की एक चादर सा ओढ़ा स्टैच्यु सा मन.. इसी उधेड़ बुन में विचारों की ठंढी उड़ान के लिए चिड़िया फलक पर उड़ने के लिए बेताब है..फलक कितना ऊँचा है उसे ज्ञान नहीं है.. मृगतृष्णा का कोई आधार नहीं है..बालुओं में चलतो रहो पानी की खोज में पिपासा शांत नहीं होती है और एक दिन पंखविहीन होकर घोसलों से दूर जीवनलीला  के अभिनय का पटाक्षेप हो जाता है.. 

Wednesday, January 1, 2025

1443

1-करो स्वागत

सुदर्शन रत्नाकर

 


बीत रहा है धीरे-धीरे

अस्तित्वहीन होता वर्ष

उखडी-उखड़ी -सी साँसें हैं

उदासी है छाई,

कहीं नहीं है हर्ष।

मौसम में नमी है

धूप भी अलसाई है

थके- थके दिन हैं,

रातों में ठंडाई है।

जीवन में उत्साह नहीं

बिछुड़ने की परवाह नहीं।

जा रहा है, तो जाने दो

जाने दो साथ में

सालभर की नकारात्मक

 सोच को

पाँवों में चुभे शूलों को

अपनी की हुई भूलों को।

विरोधियों की आवाज़ को

सड़ी -गली मान्यताओं को

पोंछ दो दर्पण पर पड़ी धूल को

जिसमें दिखाई नहीं देता

अपना ही असली चेहरा।

 

नए वर्ष का अभिनंदन करो

पुराने को भूल जाओ

नव उमंग, नव क्रांति

मिटाकर मन की भ्रांति

करो स्वागत, उगती नव किरणों का

फैला दें जो उजास

नव आशाओं का।

-0-


2-पाहुन/-शशि पाधा

 

द्वारे इक पाहुन है आया

सुख सपनों की डलिया लाया 

 

आशाओं की हीरक मणियाँ 

विश्वासों की झिलमिल लड़ियाँ 

प्रेम-प्यार के बन्दनवार

सजी-सजी हर मन की गलियाँ 

 

मंगल दीप जलें देहरी पर

किरणों ने नवरंग बिखराया

 दूर दिशा से पाहुन  आया 


नया सवेरा, नई ऊषा में

जीवन की उमंग नई

समय की धारा के संग बहती

जीवन की तरंग नई


राग रंग से रंगी दिशाएँ

इन्द्र धनु से थाल सजाया

  नव वर्ष द्वारे है आया 

          

धरती ,सागर, नदिया पर्वत

स्वागत’ ’स्वागत’ बोल रहे

आगत के कानों में पंछी

नव कलरव रस घोल रहे

  रोम-रोम बगिया का पुलकित

   सृष्टि ने नवगीत है गाया

  नव पाहुन द्वारे पर आया।

-0-

3-नववर्ष!

डॉ.सुरंगमा यादव

इक्कीसवीं सदी अबचौबीस बरस की हो ली

पच्चीसवें    वसंतीसपनों ने   आँखें खोलीं

खोने की है कसक  तोपाने का सुकूँ भी है

छूने को आसमाँ हैमन में  जुनून भी है

नववर्ष तू  दिलों मेंसंकल्प ऐसा भरना

मुट्ठी में कर लें सागर,मन में गुमान हो ना।

 

 


Wednesday, October 4, 2023

1375

 सुदर्शन रत्नाकर की छोटी कविताएँ



 1-अनुभूति

 

प्यार,

प्यार से छू लो तो

कलियाँ

निखर आएँगी

मौसम की

पत्तियाँ हैं

लहराने दो

पतझ

आने पर स्वयं ही

बिखर जाएँगी।

-०-

 

 

2. प्रतीक्षा

 

मैं बरसों से प्रतीक्षा कर रही हूँ

उस उजली धूप और

हरी दूब के लिए,

जहाँ एक नदी बहती हो

और मैं भी हिमखंड -सी पिघलती

नदी बन जाऊँ।

निरन्तर गतिशील बहती

अँजुरी -अँजुरी प्यार बाँटती

सागर की गहराइयों में

कहीं खो जाऊँ ।

-०-

 

 

 

3- 55-एक नदी एहसास की

 

एक नदी बाहर बहती है रिश्तों की

एक नदी भीतर बहती है एहसासों की

नदी के भीतर कुछ द्वीप हैं, बंधनों के

कुछ बंधन हैं काँटों के

कुछ रिश्ते हैं फूलों के

मैंने जीवन में जो बोया है

उसको ही काटा है

दुख झेला है, सुख बाँटा है

अपनों का दिया विष पी-पीकर

अमृत के लिए मन तरसा है।

-०-

 

4. काश

 

काश मैं पाखी होती

और

आसमान में उड़ती रहती

काश

मैं मछली होती तो

सागर में तैरती रहती

पर

मैं तो आदमजाहूँ

और

धरती पर चल भी नहीं सकती।।

-०-

5-उधार की जिंदगी

 

 घोंसला बनाने की चाह में

 जिंदगी भर वह

जिंदगी को ढोता रहा

पर

 न तो उसे जिंदगी मिली

और

 न घोंसला।

टूटता रहा

वह पल-पल

जीता रहा उधार की जिंदगी।

-०-

6- दिवास्वप्न

    

मैंने देखा, एकांत -निर्जन स्थान पर

पेडों के झुरमट के बीच

मौलसिरी के फूलों से लदी एक पर्णकुटीर है

जिसमें मैं शांत भाव से बैठी हूँ।

झरने के निर्मल जल का, कल- कल करता स्वर

पक्षियों का कलरव

मेरी आत्मा को आह्लादित कर रहा है

 कंकरीट से बने इस शहर में,

इस दिवास्वप्न का एहसास

कितना सुखद है, इसे मैं ही जानती हूँ।

-०-

 

Tuesday, June 23, 2020

1012-पिता तो बरगद हैं


सुदर्शन रत्नाकर


पिता अब शिला की तरह
मौन रहते हैं
कहते कुछ नहीं,
पर सहते बहुत हैं
शिथिल होते शरीर और
चेहरे की झुर्रियों के नीचे
भावनाओं के सोते बहते हैं
जिसका नीर आँखों से बहता है।
कहाँ गई वह कड़क आवाज़ और
रौबीला चेहरा,चमकती आँखें
जिन्हें देख, ख़ौफ़ से भर जाता था मैं।
लेकिन पिता के प्यार -भरे शब्द
सिर पर रखा स्नेहिल हाथ
और गोद में उठा लेना
आज भी याद आता है मुझे
उनके कदमों की आवाज़ सुन
सहम जाना
फिर भी उनके आने की प्रतीक्षा करना
कंधे पर चढ़ना और उनकी पॉकेट से
टॉफ़ियाँ लेकर भाग जाना
भूलता ही नहीं मुझे।
उँगली पकड़कर मेले में जाना
पिता का खिलौने दिलाना,
उनका टूट जाना,मेरा रोना
और खिलौने दिलाने का प्रण
कितने सुखद होते थे क्षण।

बड़े हुए तो बदल गए
पिता और मैं,
विचार और विचारधाराा ।
वे बरगद  हो गए,
और मैं नया उगा कीकर का पेड़
मैं उनकी ख़ामोश आँखों के ख़त
पढ़ नहीं पाता
बुलाने पर भी पिता के पास
नहीं जाता;
पर वे आज भी अपनी छाया के
आग़ोश में लेने के लिए
बाँहें  फैलाए बैठे हैं
लेकिन मेरी ही क्षितिज को छूने की
अंतहीन यात्रा ,स्थगित नहीं होती
न मैं बच्चों का हुआ, न पिता का हुआ
और वह बरगद की छाया
प्रतीक्षा करते थक गई है।

अब मेरे भी बाल पकने लगे हैं
मेरे भीतर भी जगने लगा है
ऐसा ही एहसास ।
मैंने  जो बोया था
वही तो काटूँगा
वक्त तो लौटेगा नहीं
पिता तो बरगद है  और मैं कीकर
न टहनियाँ हैं, न छाया है फिर
कौन आएगा मेरे पास
कौन आएगा मेरे पास?
-0-

Friday, May 1, 2020

981-बहुत याद आती है

(विदेश में रह रहे एक मज़दूर की मनोव्यथा का वर्णन)
 सुदर्शन रत्नाकर


जब भी मै , तपती दोपहरी में
चारकोल- सने पाँवों से
चलता हूँ या
ऊँचाइयों पर टँगी
टूटी कड़ियों को जोड़ता हूँ,
जहाँ नीचे झाँकने पर भी
रूह काँपती है।
गहरे कुओं में उतरता हूँ
ज़िंदगी का भार ढोने के लिए
ज़िंदगी से लड़ता हूँ।
तब मुझे मेरा बेटा याद आता है,
जो अपनी भोली बातों से मुझे चेताता है
अपना ध्यान रखना पापा,
आपकी कमी महसूसता हूँ मैं
बच्चे जब चलते हैं अपने पापा के साथ
पकड़कर उनका हाथ
मैं उन्हें चुपके से देखता हूँ,
वे उनके मज़बूत कंधों पर झूलते हैं
तब मुझे आपकी बहुत याद आती है।
तुम तो दूर हो पापा
बतियाता हूँ माँ के संग
कभी करता नहीं उन्हें तंग
पर पापा तुम जल्दी आना
मुझे बहुत याद आती है।

परिवार से दूर रहकर
क़ीमत जानता हूँ
परिवार का क्या महत्त्व है
मानता हूँ
जिसका बोझ अकेली पत्नी उठाती है
मेरे बिन हर कष्ट झेलती है
दंश तन्हाई का सहती है।
मेरे बूढ़े माँ-बाप को भी सम्भालती है
फिर भी खुश रहती है
माथे पर शिकन नहीं लाती है।
पर उसके मन में एक डर
समाया रहता है,
परिवार के लिए विदेश में रहते हो
अकेले ही कष्ट सहते हो
पत्र लिखती है, तो देती है हर बार ज्ञान
देखोजी, तुम रखना अपना ध्यान
तुम हो तो है दुनिया
तुम बिन सब टूट जाएँगे
ज़िंदगी के सब रंग,बदरंग हो जाएँगे।

चोट लगती है तो बूढ़ी माँ याद आती है
बचपन में ज़रा-सा गिर भी जाता था तो
माँ भागकर आँचल में छुपा लेती थी
माथे को चूमकर मुझे बहलाती थी

सच में पाकर माँ का स्पर्श
भूल जाता था पीड़ा का दंश।
अब गिरता हूँ तो स्वयं ही उठता हूँ

पत्नी का प्यार नहीं
माँ का दुलार नहीं।।

बापू जब ख़त भेजते हैं
आँसुओं से शब्द भीगते हैं
कंधे मेरे हो गए हैं शिथिल
बोझ उठा सकते नहीं
तेरे कंधों का सहारा है
चोटिल करना नहीं
इनके बिना गुज़ारा नहीं
मेरी दुआएँ तेरे साथ हैं
अब यही मेरे पास हैं।

सब की बहुत याद आती है
पिता के कंधे नहीं
बच्चों की मनुहार नहीं
अपनी धरती नहीं
अपना आसमान नहीं
जीना इतना आसान नहीं
पर मुझे जीना है उनके लिए
जिनके साथ बँधा है मेरा जीवन
दूर रहकर आशाओं के दीप जलाने हैं
उनकी मुस्कानें बनी रहें
अपने जीवन की साँसें बचानी है.
-0-

Tuesday, February 12, 2019

879




सुदर्शन रत्नाकर
1
इससे पहले कि
फ़ासले बढ़ते जाएँ
तुम्हारे और मेरे बीच
आओ, तन्हा होने से पहले
मन की दूरियाँ मिटा दें।
2
वक्त ने चेताया था
पर हम ही नहीं सम्भले
और दूरियाँ बढती गईं
पर्वतों, नदियों और
हमारे बीच।
3
तुम भी तन्हा हो
मैं भी तन्हा हूँ
चाँद भी तन्हा है
यादें भी तन्हा हैं
चलो चाँदनी में बैठे
और सब एक हो जाएँ।
4
जीवन भर
मोमबत्ती- सी जलती रही
क्षण क्षण पिघलती रही
अंतिम छोर तक पिघली,
मोमबत्ती की सीमा रेखा थी
जली, पिघली और
अस्तित्वहीन हो गई।।
5
उडना है तो
पंख खोलने होंगे
वरन् , उड़ना तो क्या
धरा के भी नहीं रहोगे
बिना पंख खोले
औंधे मुँह ही गिरोगे ।

-0-ई-29, नेहरू  ग्राउण्ड,फ़रीदाबाद -121001
मो. 9811251135



Sunday, March 25, 2018

811

1-मुक्तक
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु'
हमको कुछ पता नहीं खुशी कहाँ ले जाएगी।
साँझ को तेरी मिली कमी कहाँ ले जाएगी।
आसमाँ से जो गिरा,उसको उठाता कौन है
जिसे किनारा न मिला,  नदी कहाँ ले जाएगी


-0-[ 25 मार्च-18]


2-नन्ही गौरैया
सुदर्शन रत्नाकर

वह जो भूरे-पीले पंखों वाली
     नन्ही गौरैया
हर रोज आती थी
मेरे आँगन में
अब आती नहीं
सूरजमुखी का पराग
चुन चुन खाती नहीं
न ही पेड़ की फुनगी पर
बैठ कर, झूला झूलती है
बैठी रहती है छत की मुँडेर पर
सूर्य उगने के इंतज़ार में, क्योंकि
मेरे घर के सूरजमुखी मुरझा गए हैं
और दीमक लगे पेड़ की शाखाएँ
सूख गई हैं, इसलिए
वो जो पीले भूरे पंखों वाली
नन्ही गौरैया
मेरे आँगन में आती थी
अब आती नहीं।।
-0-
-29, नेहरू ग्राउण्ड ,फ़रीदाबाद 121001
मो.. 9811251135
-0-
3-कविता
 चन्द्रबली शर्मा
1
है विकलता आज कैसी,मैं समझ कब पा रहा हूँ।
भग्न हृदय से मानस-पटल पर,छवि तेरी बना रहा हूँ।
पर न जाने पूर्ण क्यों वह,हो नहीं मुझसे रही है।
तू नहीं रूठी कभी पर,रूठ छवि तेरी रही है।
 2
सोचता हूँ मन भरम जाए किसी विध आज मेरा।
क्या पता आए तेरा सन्देश लेकर शुभ-सवेरा।
और भी कुछ ना सही, कुछ तो अवधि अल्प होगी
रात्रि तेरी विरह-दुःख में,ना मुझे शत-कल्प होगी।
 3
छवि ही तेरी रूठी नहीं,रूठा सभी संसार मुझसे।
नींद रूठी,चैन रूठा और रूठा प्यार मुझसे।
किन्तु मुझको है नहीं,चिन्ता किसी के भी टूटने की
है नहीं शंका तनिक भी,प्रिय तुम्हारे रूठने की।
 4
बस यही मैं सोचता हूँ,कैसे तुमको ये कहूँ
बसते हैं तन-मन में मेरे,तेरी साँसों के सुमन
तू अगर रूठी रही तो,सब बिखर ही जाएँगे
उजड़े उपवन में भला फिर,भौंरे क्या गा पाएँगे।
 -0-