पथ के साथी

Saturday, August 14, 2010

आज़ादी है

आज़ादी है : रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु'

नाचो गाओ ,खुशी मनाओ- आज़ादी है

लूटो –खाओ , पियो-पिलाओ आज़ादी है

भूखी जनता टूक न मिलता आज़ादी है

छीनो -झपटो ,डाँटो –डपटो आज़ादी है

दफ़्तर-दफ़्तर ,बैठे अजगर आज़ादी है

जेब गरम है ,बिकी शरम है आज़ादी है

फ़ाइल सिसके ,बाबू खिसके आज़ादी है

सज्जन रोता , आफ़त ढोता -आज़ादी है

नोट बिछाए ,नींद न आए -आज़ादी है

गुण्डे छूटे , जीभर लूटे -आज़ादी है

छीना चन्दा ,अच्छा धन्धा -आज़ादी है

नफ़रत पलती , बस्ती जलती -आज़ादी है

पेड़ कटे हैं, खेत लुटे हैं -आज़ादी है

कपटी मुखिया ,हर घर दुखिया -आज़ादी है

जब मुँह खोलें , लटपट बोलें -आज़ादी है

सुरसा आई , बन महँगाई आज़ादी है

आज पुजारी , बने जुआरी -आज़ादी है

ढोंगी बाबा , अच्छा ढाबा -आज़ादी है

लूट मची है , छूट मची है -आज़ादी है

सब कुछ लूटा , धीरज छूटा -आज़ादी है

घोटाले हैं, दिलवाले हैं- आज़ादी है

आग-धुआँ है ,नहीं कुआँ है -आज़ादी है

गड्ढा सड़कें , चल गिर पड़के-आज़ादी है

गुरु है ढेला ,गुड़ है चेला -आज़ादी है

जाति –धर्म है , बुरे कर्म हैं-आज़ादी है

भाई-भाई , लड़ें लड़ाई - आज़ादी है

अपनी अपनी ,सबकी ढपली -आज़ादी है

कामचोर हैं ,घूसखोर हैं-आज़ादी है

चोरी करते ,ज़रा न डरते -आज़ादी है

सन्न इलाका , दिन में डाका-आज़ादी है

बन्द है चक्का, धक्कम धक्का -आज़ादी है

करते अनशन ,रोज़ प्रदर्शन -आज़ादी है

चोर लुटेरे , सबको घेरे -आज़ादी है

जागो-जागो , अब तो भागो आज़ादी है

जिसका जूता , उसका बूता -आज़ादी है

भूखे घर हैं , प्यासे दर हैं-आज़ादी है

ऊँचा झण्डा , चलता डण्डा-आज़ादी है

रहे जो भक्षक ,बने वे रक्षक-आज़ादी है

लुटा ख़ज़ाना , सबने माना -आज़ादी है

भले जेल में , बुरे खेल में-आज़ादी है

न्याय रो रहा , चोर सो रहा -आज़ादी है

क्या अब करना , जीना ? मरना-आज़ादी है

‘आओ प्यारे वीरो आओ’ -आज़ादी है

हाथ लगे जो ,सब खा जाओ -आज़ादी है

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Wednesday, August 11, 2010

भग्नमूर्ति

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
सरूप जी का मकान पूछते–पूछते मैं परेशान हो चुका था। जब किसी से पता नहीं चला तो मैं ऑटो छोड़कर उस पॉश कॉलोनी में पैदल ही चल पड़ा। चिलचिलाती धूप में मेरा सिर चकराने लगा। कंठ प्यास के मारे सूख गया। ऐसे में कहीं से एक गिलास पानी मिल जाता।
सरूप जी ने कहा था–कभी इधर आओ तो ज़रूर मिलना। घूमते–भटकते नेम प्लेट पर दृष्टि पड़ी तो जान में जान आई। आँगन में मौलसिरी का छतनार पेड़ और उसके नीचे स्थापित सरस्वती की कमनीय मूर्ति। मन शीतल हो गया।
लोहे का भारी गेट दो बार खटखटाया। नारी–कंठ की समवेत खिलखिलाहट में खटखटाहट डूबकर रह गई। तीसरी बार गेट खटखटाने पर भीतर से ऊब भरी आवाज़ आई–‘‘कौन है भाई?’’
‘‘सरूप जी घर में हैं?’’ मैं गेट खोलकर आगे बढ़ा–‘‘मैं हूँ विजय प्रकाश। लखनऊ से आया हूँ।’’
‘‘विजय प्रकाश?’’ वे बाहर आकर अचकचाए। सामने के कमरे से कुछ नज़रें मुझे घूर रही थीं।
‘‘आपने पहचाना नहीं? पिछले साल अभिनंदन–समारोह में मिले थे हम लोग।’’
‘‘अरे हाँ, याद आया। आपने अभिनंदन–पत्र पढ़ा था।’’ वे माथे की सिलवटों पर हाथ फेरते हुए बोले–‘‘बहुत अच्छा पढ़ा था भाई आपने। सुबह ही बम्बई से लौटा हूँ। ‘कला भारती’ में कल मेरा सम्मान किया गया।’’
वे वहीं खड़े–खड़े आयोजन की गतिविधियाँ सुनाते रहे। मुझे थकान महसूस होने लगी। प्यास और तेज हो गई थी ;परन्तु पानी पीने की इच्छा जैसे मर चुकी थी।
‘‘कभी लखनऊ आना हो, मेरे यहाँ ज़रूर आइए......’’ मैंने सरूप जी को अपना कार्ड देते हुए आग्रह किया।
‘‘ज़रूर–ज़रूर...’’ उन्होंने कार्ड जेब में रखते हुए कहा।
‘‘अच्छा चलता हूँ जी।’’ मैंने अभिवादन की मुद्रा में हाथ जोड़े।
‘‘अच्छा!’’ कहकर उन्होंने जमुहाई ली।
मेरे मस्तिष्क में धुआँ–सा उठा। चलते समय मैंने एक दृष्टि सरस्वती की मूर्ति पर डाली। आँखों के आगे धुँधलापन छा गया। मूर्ति का केवल धड़ दिखाई दे रहा था। मैंने आखें मलीं पर बहुत प्रयास करने पर भी मूर्ति का सिर नहीं दिखाई दिया।
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Tuesday, August 10, 2010

दिल का दरिया

जितना बाँटा दिल का दरिया

उतना जीवन हो गया सागर ।

कोई बूँद ले अन्तर क्या है

चाहे कोई भर ले गागर ।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Thursday, August 5, 2010

तूफ़ान

ज़िन्दगी में अगर कोई तूफ़ान न होता।

तो मेरा ये सफ़र कभी आसान न होता।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Sunday, June 27, 2010

कितना अच्छा होता !


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

कितना अच्छा होता !जो तुम

यूँ बरसों पहले मिल जाते

सच मानो इस मन के पतझर-

में फूल हज़ारों खिल जाते

खुशबू से भर जाता आँगन ।

कुछ अपना दुख हम कह लेते

कुछ ताप तुम्हारे सह लेते

कुछ तो आँसू पी लेते हम

कुछ में हम दो पल बह लेते

हल्का हो जाता अपना मन ।

तुमने चीन्हें मन के आखर

तुमने समझे पीड़ा के स्वर

तुम हो मन के मीत हमारे

रिश्तों के धागों से ऊपर

तुम हो गंगा -जैसी पावन ।

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Sunday, June 20, 2010

प्यार को जो देख पाते


जन्मः ५ सितंबर लखनऊ में
शिक्षाः स्नातक साइंस, परास्नातक हिन्दी
विधाएँ: बालकथा , कहानी , कविता
रेडियो कवयित्री २००४ से अब तक, रेडियो सलाम नमस्ते और फ़नएशिया पर कविता पाठ, मंच संचालन मनोरंजन (फ्लोरिडा) तथा संगीत में रुचि। रेडियो (ह्यूस्टन) पर भी कविता पाठ।
आजकल डालस (यू.एस.ए) में निवास
[आज के दौर में जो अधिकतम कविताएँ लिखी( रची नहीं) जा रही हैं, वे भावशून्य और प्रभावशून्य ही अधिक हैं ।वास्तविक कविता तो वह है , जिसे रचनाकार अपने प्राणों के स्पर्श से जीवन प्रदान करता है । रचना श्रीवास्तव की अधिकतर कविताएँ पाठक को बहुत गहरे तक उद्वेलित कर देती हैं। उनकी ‘प्यार को जो देख पाते’ इसी तरह की कविता है । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’]
प्यार को जो देख पाते:रचना श्रीवास्तव
भैया ...
काश तुम समझ पाते
पापा की झिड़कियों में था
तुम्हारा ही भला
उनके गुस्से में छुपे
प्यार को जो देख पाते
तो शायद
तुम घर छोड़ कर नहीं जाते
पापा के ठहाकों से
जो गूँजता था घर कभी
आज उनकी
बोली को तरस जाता है
तुम्हारे कमरे मे
बैठे न जाने क्या
देखते रहते हैं
अकेले में कई बार
बातें करते हैं
पापा अब बुझ से गए हैं
उनकी डाँट को
गाँठ बाँध लिया
पर न देखा की
तुम्हारी सफलता को
"मेरे बेटे ने किया है
बेटे को मिला है"
कह के
सब को कई बार बताते थे
तुम्हारे सोने के बाद
तुम्हें कई बार
झाँक आते थे
क्यों नहीं
देखा तुम ने
कि खीर पापा कभी
पूरी कटोरी नहीं खाते थे
तुम्हारी पसंद के
फल लाने
कितनी दूर जाते थे
अपने वेतन पे लिया कर्ज़
तुम्हारी मोटर साईकिल लाने को
काम के बाद भी किया काम
तुम्हें मुझे ऊँची शिक्षा दिलाने को
तुमने उन्हें दिया
मधुमेह, उच्च रक्तचाप,
छुप के रोती
आँखों को मोतिया
ले ली उनकी मुस्कान
उनकी बातें
उनका गर्व से उठा सर
और सम्मान
यदि तुम ये सब जानते
तो शायद नहीं जाते
आ जाओ
इस से पहले
के कहीं देर न हो जाए
पितृ दिवस पर तो पिता को
बेटे का उपहार दे जाओ
तुम आ जाओ…
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Saturday, June 5, 2010

खड़े जहाँ पर ठूँठ



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

खड़े जहाँ पर ठूँठ

कभी यहाँ

पेड़ हुआ करते थे।

सूखी तपती

इस घाटी में कभी

झरने झरते थे ।

छाया के

बैरी थे लाखों

लम्पट ठेकेदार ,

मिली-भगत सब

लील गई थी

नदियाँ पानीदार ।

अब है सूखी झील

कभी यहाँ-

पनडुब्बा तिरते थे ।

बदल गए हैं

मौसम सारे

खा-खा करके मार

धूल -बवण्डर

सिर पर ढोकर

हवा हुई बदकार

सूखे कुएँ ,

बावड़ी सूखी

जहाँ पानी भरते थे ।

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Sunday, May 9, 2010

मेरी माँ

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

चिड़ियों के जगने से पहले

जग जाती थी मेरी माँ ।

ढिबरी के नीम उजाले में

पढ़ने मुझे बिठाती माँ ।

उसकी चक्की चलती रहती

कोई गीत न गाती माँ ।

गाय दूहना, दही बिलोना

सब कुछ करती जाती माँ ।

सही वक़्त पर बना नाश्ता

जीभर मुझे खिलाती माँ ।

घड़ी नहीं थी कहीं गाँव में

समय का पाठ पढ़ाती माँ ।

छप्पर के घर में रहकर भी

तनकर चलती –फिरती माँ ।

लाग –लपेट से नहीं वास्ता

खरी-खरी कह जाती माँ ।

बड़े अमीर बाप की बेटी

अभाव से टकराती माँ ।

धन –बात का उधार न सीखा

जो कहना कह जाती माँ

अस्सी बरस की इस उम्र ने

कमर झुका दी है माना ।

खाली बैठना रास नहीं

पल भर कब टिक पाती माँ ।

गाँव छोड़ना नहीं सुहाता

शहर में न रह पाती माँ ।

यहाँ न गाएँ ,सानी-पानी

मन कैसे बहलाती माँ ।

कुछ तो बेटे बहुत दूर हैं

कभी-कभी मिल पाती माँ ।

नाती-पोतों में बँटकर के

और बड़ी हो जाती माँ ।

मैं आज भी इतना छोटा

कठिन छूना है परछाई ।

जब –जब माँ माथा छूती है

जगती मुझमें तरुणाई ।

माँ से बड़ा कोई न तीरथ

ऐसा मैंने जाना है ।

माँ के चरणों में न्योछावर

करके ही कुछ पाना है ।

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Sunday, April 18, 2010

वक़्त नहीं


प्रस्तुति- पंकज चतुर्वेदी
हर खुशी है लोगों के दामन में,
पर एक हँसी के लिए वक़्त नहीं.
दिन रात दौड़ती दुनिया में,
ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं
माँ की लोरी का एहसास तो है,
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं
सारे नाम मोबाइल में हैं,
पर दोस्ती के लिए वक़्त नहीं
गैरों की क्या बात करें,
जब अपनों के लिए ही वक़्त नहीं
आँखों में है नींद बड़ी,
पर सोने का वक़्त नहीं
दिल है गमों से भरा ,
पर रोने का भी वक़्त नहीं.
पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े,
कि थकने का भी वक़्त नहीं
पराये एहसासों की क्या कद्र करें,
जब अपने सपनों के लिए ही वक़्त नहीं .
तू ही बता अए ज़िन्दगी !
इस ज़िन्दगी का क्या होगा,
कि हर पल मरने वालों को,
जीने के लिए भी वक़्त नहीं.........