पथ के साथी

Wednesday, July 15, 2020

1017


1-रिहाई
प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'

आज, न जाने क्या बात है...
यूँ तो सब कुछ वही है
पर एक बेचैनी का एहसास है,
हर साल ही तो, आता है पतझड़
जाते हैं पत्ते, सरपट हवाएँ......
इस बार, फिर ऐसा क्या खास है?
कुछ होने को है!..... या शायद हो रहा है,
मेरी रूह को मानो, एक भीना सा आग़ाज़ है
आज न जाने क्यूँ , लयबद्ध सी हो रही हूँ मैं
कभी बेरहमी, तो कभी मुक्ति का आभास है...
बोरिया-बिस्तरा बाँध,
क्या पंछी, क्या गिलहरी
सभी दुबकने को तैयार हैं
हर तरफ, एक चला-चली का माहौल है.....।

मेरी इमारत में भी, कुछ खिड़कियाँ चर्रा रहीं हैं
ढीली सी साँकल, खुलने की हसरत जता रहीं हैं
भूली बिसरी यादों, वादों और शिकायतों के परिंदे
बरसों से कैद ,आस मुक्ति की लगाएँ बैठें हैं...
सोचती हूँ,
चित्र; प्रीति अग्रवाल
मैं भी अलविदा कह ही दूँ !
कब तक थामूँ, और क्यों थामूँ?
आज लौटा ही दूँ उन सबको
जो छटपटा रहें हैं मुझमें, रिहा होने को
आज कह ही दूँ हवाओं से -
लो! इन सब को भी उड़ा ले जाओ
संग अपने, दूर बहुत दूर.....
और, मैं भी आज उठूँ और खड़ी हो जाऊँ,
बेख़ौफ़, बिन मुखोटे, बेझिझक, बेपरवाह,
इन स्वाभिमानी, दरख़्तों की तरह !!!
-0-
2-मील का पत्थर
अर्चना राय

बेमतलब कट रही थी जिंदगी
 जिसका कोई मर्म न था

बेजान-सा था दिल
 कोई न स्पंदन था।
 तन्हा था मन
 कोई हमदम न था।
 मिलकर तुमसे.....
 लगा  लक्ष्य मिल  गया 
जीने का एक नया
 आयाम मिल गया 
साथ अपने हजारों
  सपने दे गया,
 इस बेमानी दुनिया में
 जीने के मायने दे गया 
सूने दिल को सरगम दे गया।
 तन्हा मन को गुलजार कर गया
 हाँ मैं भी हूँ, मेरा भी अस्तित्व है बाकी
 मेरे होने का एहसास भर गया
 मेरा लेखन 
 जीवन में मेरे.....
 मील का पत्थर बन गया।
-0-

3- आँखों में नमी
 मुकेश बेनिवाल
  
आँखों में नमी लेकर
मुस्कुराते तो बहुत हो
कुछ नहीं है कहकर
छुपाते तो बहुत हो
झरोखों से झाँक ही लेते हैं
ये कमबख़्त अश्क
पलकों के पर्दे
गिराते तो बहुत हो
-0-


Sunday, July 12, 2020

1016-काश उसने मुझे समझा होता !


कनिका चतुर्वेदी

काश उसने मुझे समझा होता, 
ज्यादा नहीं थोड़ा समझा होता, 
सब कुछ जानकर अनजान रहा वो,
काश उसने मुझे समझा होता !

मेरे दिल की उलझन को उसने समझा होता, 
अगर नहीं समझ रहा है, 
तो उसने मुझसे पूछा होता, 
काश उसने मुझे समझा होता !

काश उसने मुझे समझा होता, 
थोड़ा अपना बताता, थोड़ा मेरी सुनता,
इस रिश्ते को सुन्दर बनाता, 
काश उसने मुझे समझा होता !

माना की समय नहीं है उसके पास , 
पर मेरी बाते सुनने को
उसके पास समय होता, 
काश उसने मुझे समझा होता !

अगर मैं कुछ बोलती उसको, 
तो मेरी बातों पर ध्यान देता, 
कोशिश करता मुझे समझने की, 
काश उसने मुझे समझा होता !

जब बाते इतनी बिगड़ गई, 
लगा जैसे सब बदल जाएगा, 
तो अपना समय निकाल कर
उसने मुझे समझाया होता, 
काश उसने मुझे समझा होता !

अगर सच में चाहता वो, 
ये सब कुछ होने ही न देता, 
और एक बार प्यार से मुझसे बोलता, 
कि  आई लाइक यू, 
काश उसने मुझे समझा होता !

करने लगा हूँ मैं तुमसे प्यार, 
अब कभी भी न करना दूर जाने की बात, 
डरता हूँ मैं तुम्हे खोने से, 
काश उसने मुझे समझाया होता, 
काश उसने मुझे समझा होता !

एक बार कोशिश तो करता, 
अपना मुझको मानता अगर, 
मुझसे बात को करता सही, 
चाहे समय नहीं उसके पास, 
पर समय निकलता तो सही, 
मुझ पर अपना हक रखता, 
अपना बनाने की कोशिश करता तो सही, 
काश उसने मुझे समझा होता !

जब सब बिखरने जा रहा, 
तभी उसने बात की तो होती, 
बोलता मुझसे न करो ऐसा, 
मुझसे अलग न हो तुम, 
अगर ऐसा करना ही था मुझे, 
तो साथ तुम्हारा मैं क्यों चुनता, 
काश उसने मुझे समझा होता !

एक बार कॉल लगाता तो सही, 
एक बार बात करता तो सही, 
अगर चाहता था वो मुझको, 
एक कोशिश रोकने की करता तो सही, 
काश उसने मुझे समझा होता !

फिर चाहे कैसे भी निकले, 
अपना समय निकालता तो सही, 
थोड़ी अपनी बोलता, थोड़ी मेरी सुनता तो सही 
एक बार और कोशिश करता तो सही, 

अगर  मुझे वो चाहता है, 
काश वो मुझे समझा होता !
काश वो मुझे समझा होता !!
-0-
शिक्षा: एम कॉम,बी एड(अन्तिम वर्ष)
सम्पर्क:74, चौबे जी का बाग़, फ़िरोज़ाबाद(उ प्र)-283203

Friday, July 10, 2020

1015


1-शहर सयाने
डॉ. सुरंगमा यादव

शहर हो गए हैं बड़े ही सयाने
मिलेंगे ना तुमको यहाँ पर ठिकाने
फटी हैं बिवाई, पड़े कितने छाले
सिकुड़ती हैं आँतें, मिले ना निवाले
है लंबा सफर,ना गाड़ी ना घोड़ा
कहाँ जाएँ अपना जीवन बचाने
श्रमिक जो ना होंगे, तो कैसे चलेंगी
तुम्हारी मिलें, कारखाने,  खदानें
तुम्हारे लिए खून इनका है पानी
भरे इनके दम पर तुम्हारे खजाने
इन्होंने बनाए नर्म रेशम के कपड़े
मगर इनके तन को मिलते ना लत्ते
सैकड़ों जोड़ी जूता जिन्होंने बनाए
रहे पाँव नंगे  बीते   ज़माने
ये   बच्चे,   ये बूढ़े और नारियाँ
उठाते  हैं   कितनी दुश्वारियाँ
समय आज कैसा कठिन आ गया
छिनी रोजी रोटी खोए  ठिकाने।
-0-
2-आग कैसी लगी 
रमेशराज
जल गयी सभ्यता, आज पशुता हँसे।
दोष जिनमें नहीं
गर्दनों को कसे, आज फंदा हँसे।
नागफनियाँ सुखी 
नीम-पीपल दुःखी, पेड़ बौना हँसे।
सत्य के घर बसा
आज मातम घना, पाप-कुनबा हँसे।
बाप की मृत्यु पर
बेटियाँ रो रहीं, किन्तु बेटा हँसे।
-0-
3- जीवन व्यथा
सविता अग्रवाल 'सवि' कैनेडा  

मंदिर में ऊँचे घंटे- सी
दूर है मंज़िल पास नहीं
उछल- उचककर पहुँच ना पाऊँ
पाँव हैं छोटे, पहुँच ना पाऊँ
भटक रही हूँ दिशाहीन- सी
कौन दिशा को मैं अपनाऊँ
संबंधों की गठरी थामे
खोल-खोलकर गिनती जाऊँ
किससे नाता पक्का जोड़ूँ ?
किस नाते को मैं सरकाऊँ
शशोपंज में पड़ी हुई हूँ
किससे सच्ची प्रीत लगाऊँ ?
ठोकर खाऊँ और गिर जाऊँ
उठकर पूरी सँभल ना पाऊँ
कैसी व्यथा भरी जीवन में
किसको जाकर मैं बतलाऊँ ?
    -0-

Monday, July 6, 2020

1014-बनजारा जब लौटा घर को


बनजारा जब लौटा घर को
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

बनजारा जब लौटा घर को
         बन्द उसे सब द्वारा  मिले ।
बदले-बदले से उसको सब
         जीवन के किरदार मिले ।
नींद अधूरी हिस्से आई
सबको बाँटे थे सपने
गैर किसी को कब माना था
माना था सबको अपने ।
इन अपनों से बनजारे को
         घाव बहुत हर बार मिले ।
भोर हुआ तो बाँट दुआएँ
चल देता है बनजारा
रात हुई तो फिर बस्ती में
रुक लेता है बनजारा ।
लादी तक देकर बदले में
         सिर्फ़ दर्द -धिक्कार मिले।
आँधी, पानी, तूफ़ानों में
कब बनजारा टिकता है
मन बावरा कभी ना जाने-
छल-प्रपंच भी बिकता है ।
ठोकर ही इस पार मिली है
         ठोकर ही उस पार मिले
-0-[ शीघ्र प्रकाश्य संग्रह से]

Wednesday, July 1, 2020

1013

वक़्त बोल रहा है !!
सीमा सिंघल 'सदा'

सब की बोलती बंद है इन दिनों,
वक़्त बोल रहा है ..
भय घोल रहा है!!
बड़ी ही ख़ामोशी से
कोई बहस नहीं,
न ही कोई,
सुनवाई होती है
एक इशारा होता है
और पूरी क़ायनात उस पर
अमल करती है!!!
…
सब तैयार हैं कमर कसकर,
बादल, बिजली, बरखा के साथ
कुछ ऐसे विषाणु भी
जिनका इलाज़,
सिर्फ़ सतर्कता है
जाने किस घड़ी
करादे, वक़्त ये मुनादी.…
ढेर लगा दो लाशों के,
कोई बचना नहीं चाहिए!!
2020 फिर लौटकर
नहीं आएगा,
जो बच गया उसे
ये सबक याद रहेगा,
ज़िंदगी की डोर
सिर्फ़ ऊपरवाले के हाथ में है!!!
तुम क्या चीज़ हो 
वह तोल रहा है
वक़्त बोल रहा है !!
-0-

Tuesday, June 23, 2020

1012-पिता तो बरगद हैं


सुदर्शन रत्नाकर


पिता अब शिला की तरह
मौन रहते हैं
कहते कुछ नहीं,
पर सहते बहुत हैं
शिथिल होते शरीर और
चेहरे की झुर्रियों के नीचे
भावनाओं के सोते बहते हैं
जिसका नीर आँखों से बहता है।
कहाँ गई वह कड़क आवाज़ और
रौबीला चेहरा,चमकती आँखें
जिन्हें देख, ख़ौफ़ से भर जाता था मैं।
लेकिन पिता के प्यार -भरे शब्द
सिर पर रखा स्नेहिल हाथ
और गोद में उठा लेना
आज भी याद आता है मुझे
उनके कदमों की आवाज़ सुन
सहम जाना
फिर भी उनके आने की प्रतीक्षा करना
कंधे पर चढ़ना और उनकी पॉकेट से
टॉफ़ियाँ लेकर भाग जाना
भूलता ही नहीं मुझे।
उँगली पकड़कर मेले में जाना
पिता का खिलौने दिलाना,
उनका टूट जाना,मेरा रोना
और खिलौने दिलाने का प्रण
कितने सुखद होते थे क्षण।

बड़े हुए तो बदल गए
पिता और मैं,
विचार और विचारधाराा ।
वे बरगद  हो गए,
और मैं नया उगा कीकर का पेड़
मैं उनकी ख़ामोश आँखों के ख़त
पढ़ नहीं पाता
बुलाने पर भी पिता के पास
नहीं जाता;
पर वे आज भी अपनी छाया के
आग़ोश में लेने के लिए
बाँहें  फैलाए बैठे हैं
लेकिन मेरी ही क्षितिज को छूने की
अंतहीन यात्रा ,स्थगित नहीं होती
न मैं बच्चों का हुआ, न पिता का हुआ
और वह बरगद की छाया
प्रतीक्षा करते थक गई है।

अब मेरे भी बाल पकने लगे हैं
मेरे भीतर भी जगने लगा है
ऐसा ही एहसास ।
मैंने  जो बोया था
वही तो काटूँगा
वक्त तो लौटेगा नहीं
पिता तो बरगद है  और मैं कीकर
न टहनियाँ हैं, न छाया है फिर
कौन आएगा मेरे पास
कौन आएगा मेरे पास?
-0-

Sunday, June 21, 2020

1011-पिता



1-सविता अग्रवाल 'सवि' कैनेडा

मस्तिष्क में बल भर
विपदाओं से लड़ते
सरदी के मौसम में
निरंतर चलते
अपने अस्तित्व को सँभाले
बच्चों की परवरिश करते
अपने ध्येय पर अडिग
मीलों दूर चलते
पैसा -पैसा बचाते
और हम सब पर लुटाते
क्यों न सोचा कभी
अपने लिए तुमने
सर्दी में गर्म जूता बनाने का
मख़मली बिस्तर और बिछौने का
लम्बे दिनों में भी
न तुमने आराम किया
बच्चों की खुशहाली के लिए
दिन- रात काम किया
याद है मुझे वह दिन
जब स्कूल पिकनिक के लिए
तुमसे पैसे माँगे थे
विपदाओं के लिए रखे जो
थोड़े से पैसे थे
माँ से कहकर तुमने
वही दिलवाए थे
मेरे मुख पर मुस्कराहट देख
तुम भी मुस्कराए थे
आज पीछे मुड़कर सोचती हूँ
तो लगता है
कितने इरादे थे तुम में
सबको खुश रखने के
वादे थे तुम में
आदर्श जीवन हमको सिखा गए
पिता ! तुम संसार से विदा क्यों ले गए ?
हमारे बीच से अलग क्यों हो गए ?
जीने के लिए हमें अकेला छोड़ गए
अकेला छोड़ गए।

2-परमजीत कौर 'रीत'

कितने भी मजबूत भले हों,नाज़ुक जाँ हो जाते हैं 
माँ के बाद पिता अक्सर, बच्चों की माँ हो जाते हैं 

हर बात सोचने लगते हैं, सोते-से जगने लगते हैं 
हर आहट पर चौंके-चौंके,वो  चौखट तकने लगते हैं 
इस-उसके आने-जाने तक,जो फ़िक्र में ही डूबे रहते 
उस हरे शज़र के चिंता में, यूँ पात सूखते- से लगते
सूरज बन तपने वाले फिर, शीतल छाँ हो जाते हैं  
माँ के बाद पिता अक्सर,बच्चों की माँ हो जाते हैं 


माला के मोती बँधे रहें ,खुद धागा बनके रहते हैं 
हर खींच-तान को आँखों की, कोरों से देखा करते हैं 
इक वक्त था सबकी आवाजें,नीची थी उनकी बोली से।
इक वक्त जो उनकी वाणी में,झर-झरते हैं पीड़ाओं के।
खुद में कर-करके फेर-बदल,घर से दुकाँ हो जाते हैं 
माँ के बाद पिता अक्सर ,बच्चों की माँ हो जाते हैं 
-0-
( 15 अगस्त 2018 को आकाशवाणी सूरतगढ़ के 'महिला जगत' की काव्य गोष्ठी में प्रसारित)