स्मृतियों में बसी वह एक बस्ती
डॉ. सुरंगमा यादव
स्मृतियों में बसी वह एक
बस्ती
शहर के
बिल्कुल अंतिम छोर पर बसी वह बस्ती
एक
छोटा- सा मोहल्ला, नाम गौंटिया
सड़क के
उस पार मुस्लिम बस्ती,
सड़क के इस पार थी गौंटिया
दोनों
ही बस्तियाँ एक- दूसरे से सशंकित
सांप्रदायिक दंगों के समय
रात
भर पत्थर बरसातीं बस्तियाँ
शिक्षा
के उजाले से दूर
घूमते
रहते थे नाक बहाते मैले- कुचैले
मिट्टी
में लोटकर और मैले होते बच्चे
सड़क
पर उन्हें अकेला खेलने छोड़कर-
चूल्हा-
चौका निपटातीं निडर माताएँ
सुबह
गाय- भैंसों को चराने ले जाते
गद्दी
समुदाय के चरवाहे
शाम को
घंटी बजाते चौपायों के
लौटने से पहले नाँद सजातीं
बस्तियाँ
गद्दियों
के कुछ ही घर-
मगर
आपसी रंजिश में डूबे हाथ धोकर
बारी-
बारी से पति और कई पुत्र गँवाकर
मूरत बन
जाती स्त्रियाँ
बहुत सुंदर, लेकिन खूनी रंजिश में उजड़कर,
दण्ड भोगतीं, लाँघती
नहीं थीं जो देहरी,
अब दर -दर की ठोकरें खातीं वे
स्त्रियाँ
पत्नी
और बेटी के सामने ही
पुत्र
को माँ- बहन की गाली देकर शर्मसार करते पिता
प्रसव
के समय दाई के हवाले होकर
चीखते-
चिल्लाते हुए बच्चा जनती प्रसूताएँ
विदाई
से घंटों पहले करुण स्वर में
गा- गाकर
रोती नव विवाहिताएँ
करुण
विलाप सुनकर
विदाई
की बेला में ‘खोईंचा’ भरने के लिए
छोटी-
छोटी डलियों में
चावल व गेहूँ
लेकर आती महिलाएँ
शराब के
नशे में धुत पति से आधी रात को पिटतीं
और फिर
टीबी और शराब से
उजड़े
सुहाग के कारण
देवर को
बिठाई जाती महिलाएँ
इन्हीं
सबके बीच एक घर
घर की
दीवार से लगी एक कब्र
रात के
सन्नाटे को और भयावह बनाती कब्र
नीम का
एक घना छायादार पेड़,
जिस पर आधी रात को
उल्लू की मौसी ‘खसूटरिया’की
अपशकुनी बोली सुन
दहशत में गुजरती रात
सावन
में पींग बढ़ाती हुई
मोहल्ले
की लड़कियाँ
वहीं
पर एक लजाती- शर्माती
अपने में सकुचाती एक युवती
कोई
बंदिश नहीं;
लेकिन फिर भी सामने आने से
मिलने-मिलाने से, शब्दों को जुबाँ पर लाने से
घबराती
वह युवती
लेकिन भीतर ही भीतर आंदोलित होती
महिलाओं की दशा से आक्रोशित होकर
संकल्पों को सींचती,
आसमान छूने को कसमसाती
हमेशा अव्वल आती,
पिता का मान
बढ़ाती
और एक
दिन उस घुटन भरे माहौल से निजात पाती
अपना ही नहीं औरों का भी
सहारा बन जाती
वह युवती
आज भी किसी गंदे -पिछड़े
मोहल्ले
में दिख जाती है ऐसी कोई,
तो फिर याद आ जाती है वही युवती
गुदड़ी में छिपे लाल-सी ।

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