- मैं लौट आऊँगा
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
मैं चला आऊँगा
बिना साँकल बजाए
आँगन के फूलों को सहलाकर
खिड़की से होकर
बनकर हवा का झोंका,
बैठ जाऊँगा
अपनी व्हील चेयर पर
चाय के कप से उठती
भाप को पीकर
तुम्हें देखकर मुस्कुराऊँगा।
नश्वर माटी के घट से निकल
जल में पनडुब्बे की तरह
डुबकी लगाकर
मिट्टी में मिल जाऊँगा,
एक दिन चुपचाप
किसी सिन्दूरी
भोर में
फिर उग आऊँगा
कोई फूल बनकर।
उड़ूँगा आँगन में
फुलचुही बनकर
जब तुम उदास होगे,
मीठे स्वर में
तुम्हें ही पुकारूँगा-
“मैं कहीं नहीं गया
मैं नित्य हूँ, मैं शाश्वत हूँ
मैं ड्राइंगरूम की आराम कुर्सी पर
उनींदा-सा धूप सेंक रहा हूँ।”
उदास न होना
मैं कहीं नहीं गया,
बस कुछ देर को
गायब हो गया था
भूले गीत की तरह,
तुम प्रतीक्षा करना
मैं लौट आऊँगा।
(30 सितम्बर 2026)
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बेहतरीन कविता, आशा का संचार करती हुई एक सुंदर भोर सी ताजी।
ReplyDeleteसादर नमन।
हृदयस्पर्शी कविता! सपने जैसे सुखद ❤️🙏
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर लिखा है आपने , हार्दिक बधाई आपको।
ReplyDeleteमनोभावों की अत्यंत सुंदर और सहज अभिव्यक्ति 🙏🏻
ReplyDeleteयह कैसी गहन अनुभूति वाली रचना है
ReplyDeleteमन में एक अजीब विरक्ति सी भरती हुई.. अपना असर छोड़ती है।
अति सुन्दर संवेदनशील रचना है।
सादर बधाई और शुभकामनायें आदरणीय भाईसाहब।
कितनी आत्मीय कितनी सुंदर कविता
ReplyDeleteयह कविता मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक कोमल परिवर्तन के रूप में देखती है। कवि प्रियजन को सांत्वना देता है कि वह कहीं गया नहीं है, बस रूप बदलकर लौट आएगा। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
ReplyDeleteजीवन में निराशा के कठिन क्षणों में,अंधियारे को दूर करती एक आस - किरण बन कर चमक उठती। कहीं दूर नहीं जाना, लौटकर अपनों में ही आना है। जीवन के प्रति ऐसे ही नज़रिए की आज आवश्यकता है।हार्दिक बधाई हिमांशु भाई।
ReplyDeleteबहुत सुन्दर... 🙏💐
ReplyDeleteसंवेदनशील हृदय से निकली , ओस से भीगी भोर की ताज़गी का एहसास कराती, उत्कृष्ट कविता। जिसमें पूरा जीवन दर्शन समाया हुआ है। बहुत-बहुत बधाई भैया। सुदर्शन रत्नाकर
ReplyDeleteअति सुंदर !
ReplyDeleteआपकी अनुभूतियों ने मेरा उत्साह बढ़ाया, उसके लिए सबका आत्मीय आभार !
ReplyDeleteबहुत मार्मिक अभिव्यक्ति, आपकी लेखनी को नमन
ReplyDeleteमैं रो पड़ी, बहुत मार्मिक, आपको साधुवाद
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर और अर्थवान कविता। गहन जीवन - दर्शन को सुंदर उपमानों से अभिव्यक्त करने वाली मार्मिक कविता।
ReplyDeleteडॉ. स्मृति शुक्ल
अत्यंत कोमल एहसासों को व्यक्त करती मार्मिक कविता, जो कहीं भीतर एक उदासी भी जगा गई...
ReplyDeleteआपको एवं आपकी लेखनी को नमन, आदरणीय भैया जी!
~सादर
अनिता ललित
कविता पढ़कर मन बहुत भावुक हो गया, सब हमेशा साथ रहें,प्रसन्न रहें।
ReplyDeleteहृदयस्पर्शी कविता.... 🌹😢 हृदय की गहराई तक पहुँच गई.... सर
ReplyDeleteअपनेपन के बंधन और विछोह के क्रंदन के साथ आसपास होने का अहसास , कविता कहीं गहरे तक भावुक करके रुला गई ।
ReplyDeleteसादर नमन
कमला निखुरपा
उत्तराखंड
आप सभी का हृदयतल से आभार!
ReplyDeleteबहुत सुंदर अभिव्यक्ति - भावनात्मक भी, दार्शनिक भी! हार्दिक बधाई!💐
ReplyDeleteबहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी कविता ... हार्दिक बधाई आदरणीय भाईसाहब।।
ReplyDeleteसुंदर मर्मस्पर्शी सृजन सर🙏
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