पथ के साथी

Thursday, October 1, 2026

1531-- मैं लौट आऊँगा

 

- मैं लौट आऊँगा

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

 


मैं चला आऊँगा

बिना साँकल बजाए

आँगन के फूलों को सहलाकर

खिड़की से होकर

बनकर हवा का झोंका,

बैठ जाऊँगा

अपनी व्हील चेयर पर

चाय के कप से उठती

भाप को पीकर

तुम्हें देखकर मुस्कुराऊँगा।

 

नश्वर माटी के घट से निकल

जल में पनडुब्बे की तरह

डुबकी लगाकर

मिट्टी में मिल जाऊँगा,

एक दिन चुपचाप

किसी  सिन्दूरी भोर में

फिर उग आऊँगा

कोई फूल बनकर।

 

उड़ूँगा आँगन में

फुलचुही बनकर

जब तुम उदास होगे,

मीठे स्वर में

तुम्हें ही पुकारूँगा-

“मैं कहीं नहीं गया

मैं नित्य हूँ, मैं शाश्वत हूँ

मैं ड्राइंगरूम की आराम कुर्सी पर

उनींदा-सा धूप सेंक रहा हूँ।”

 

उदास न होना

मैं कहीं नहीं गया,

बस कुछ देर को

गायब हो गया था

भूले गीत की तरह,

तुम प्रतीक्षा करना

मैं लौट आऊँगा।

(30 सितम्बर 2026)

-0-

 

 

 

 

 

23 comments:

  1. बेहतरीन कविता, आशा का संचार करती हुई एक सुंदर भोर सी ताजी।
    सादर नमन।

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  2. हृदयस्पर्शी कविता! सपने जैसे सुखद ❤️🙏

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  3. बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने , हार्दिक बधाई आपको।

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  4. मनोभावों की अत्यंत सुंदर और सहज अभिव्यक्ति 🙏🏻

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  5. यह कैसी गहन अनुभूति वाली रचना है
    मन में एक अजीब विरक्ति सी भरती हुई.. अपना असर छोड़ती है।
    अति सुन्दर संवेदनशील रचना है।

    सादर बधाई और शुभकामनायें आदरणीय भाईसाहब।

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  6. कितनी आत्मीय कितनी सुंदर कविता

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  7. यह कविता मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक कोमल परिवर्तन के रूप में देखती है। कवि प्रियजन को सांत्वना देता है कि वह कहीं गया नहीं है, बस रूप बदलकर लौट आएगा। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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  8. जीवन में निराशा के कठिन क्षणों में,अंधियारे को दूर करती एक आस - किरण बन कर चमक उठती। कहीं दूर नहीं जाना, लौटकर अपनों में ही आना है। जीवन के प्रति ऐसे ही नज़रिए की आज आवश्यकता है।हार्दिक बधाई हिमांशु भाई।

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  9. बहुत सुन्दर... 🙏💐

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  10. संवेदनशील हृदय से निकली , ओस से भीगी भोर की ताज़गी का एहसास कराती, उत्कृष्ट कविता। जिसमें पूरा जीवन दर्शन समाया हुआ है। बहुत-बहुत बधाई भैया। सुदर्शन रत्नाकर

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  11. अति सुंदर !

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  12. आपकी अनुभूतियों ने मेरा उत्साह बढ़ाया, उसके लिए सबका आत्मीय आभार !

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  13. बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति, आपकी लेखनी को नमन

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  14. मैं रो पड़ी, बहुत मार्मिक, आपको साधुवाद

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  15. बहुत ही सुंदर और अर्थवान कविता। गहन जीवन - दर्शन को सुंदर उपमानों से अभिव्यक्त करने वाली मार्मिक कविता।
    डॉ. स्मृति शुक्ल

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  16. अत्यंत कोमल एहसासों को व्यक्त करती मार्मिक कविता, जो कहीं भीतर एक उदासी भी जगा गई...
    आपको एवं आपकी लेखनी को नमन, आदरणीय भैया जी!

    ~सादर
    अनिता ललित

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  17. कविता पढ़कर मन बहुत भावुक हो गया, सब हमेशा साथ रहें,प्रसन्न रहें।

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  18. हृदयस्पर्शी कविता.... 🌹😢 हृदय की गहराई तक पहुँच गई.... सर

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  19. अपनेपन के बंधन और विछोह के क्रंदन के साथ आसपास होने का अहसास , कविता कहीं गहरे तक भावुक करके रुला गई ।
    सादर नमन
    कमला निखुरपा
    उत्तराखंड

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  20. आप सभी का हृदयतल से आभार!

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  21. डाॅ. कुँवर दिनेश, शिमला01 October, 2026 22:55

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति - भावनात्मक भी, दार्शनिक भी! हार्दिक बधाई!💐

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  22. बहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी कविता ... हार्दिक बधाई आदरणीय भाईसाहब।।

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  23. सुंदर मर्मस्पर्शी सृजन सर🙏

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