पथ के साथी

Tuesday, September 29, 2026

1530

 

1-कैसे बुद्ध हो पाऊँगी

डॉ. अंजुल चौहान 

 

रात्रि के उस प्रहर में

तुम्हारा इस तरह से

निरपराध मुझे 

छोड़कर जाना

मेरे अनन्य प्रेम और समर्पण को

विरक्त हो, त्याग कर जाना

कसकता है आज भी .......

क्या उस क्षण

तुम्हारे नेत्र सजल न हुए होंगे

तुम्हारे  संचरणशील चरण न थमे  होंगे

सप्तपदी के वचन कैसे विस्मृत हो  गए

बोलो न, मेरे बोधिसत्व !

तुम कैसे इतने विरक्त  हो गए?

यदि सचमुच, यह जगत्

क्षणिक  है  मिथ्या है

तो यह ज्ञान भी मै तुमसे ही पाना चाहती हूँ

हां .....मैं भी तुम्हारी भाँति 

तथागत होना चाहती हूँ

पर बताओ मेरे अनश्वर प्रेम !

मैं तुम्हें कैसे त्याग पाऊँगी...?

तुम्हें तज कर

मैं कैसे बुद्ध हो पाऊँगी.......

-0-

 

2-घर वापस आओगे

डॉ. अंजुल चौहान 

 

तुम्हें समर्पित श्वेत पुष्प कुछ

रोली ,अक्षत, चंदन

श्वास -श्वास पर तुम्हें पुकारूँ

करूँ अनवरत वंदन

अपना सत्य तुम्हीं जानो

पर मेरा सत्य यही है

तुमको पाकर, मैं खो जाऊँ

मेरा अमरत्व  यही है

कर्म स्वधर्म सब तुम्हें समर्पित

मैं तो बस ये जानूँ

मेरी  गाथा का आदि अंत

तुम ही हो इतना मानूँ

अपने देवालय को तजकर 

कहीं और क्यों जाऊँ

जपूँ मंत्र मैं तुम्हें.....

तुम्हीं से, तुमको ही पा जाऊँ

मुझ बिन अर्थहीन जीवन को

कैसे जी पाओगे

कंचन की नगरी में कब तक

खुद को भरमाओगे 

आते हैं भगवान ....

अतः, तुम स्वयं लौट आओगे 

सुनो..... ....द्वारिकाधीश !

राम बन घर वापस आओगे ।।

-0-

14 comments:

  1. बहुत ही यथार्थवादी कविताएं...👏👏
    बहुत सुन्दर... 👏👏🙏

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    1. हृदय से आभार कि आपने शब्दों के इस संसार को अपना स्नेह प्रदान किया।

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  2. बहुत सशक्त रचनाएँ। बधाई डॉ. अंजुल जी

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    1. आपके अमूल्य शब्दों के लिए हृदयतल से आभार।🙏🏻

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  3. डॉ. अंजुल चौहान की ये दो कविताएँ भक्ति और विरह के दो छोर हैं। एक कविता में मीरा-भाव है - "तुम्हें समर्पित श्वेत पुष्प कुछ रोली, अक्षत, चंदन" में पूर्ण समर्पण है। द्वारिकाधीश को "राम बन घर वापस आओगे" कहना आत्मा-परमात्मा के मिलन की पुकार है।

    दूसरी कविता यशोधरा का विलाप है - "रात्रि के उस प्रहर में तुम्हारा इस तरह से निरपराध मुझे छोड़कर जाना" बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण पर प्रश्न उठाती है। "मैं तुम्हें कैसे त्याग पाऊँगी... मैं कैसे बुद्ध हो पाऊँगी" में नारी-हृदय की वेदना और दर्शन का द्वंद्व है। दोनों में भाषा सरल, भाव गहन हैं। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

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    1. रचना पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया मेरे लिए केवल प्रशंसा नहीं, अपितु सृजन-पथ का संबल है।
      आपके अमूल्य शब्दों के लिए हृदयतल से आभार।

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  4. वाह बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी सृजन 🙏💐

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    1. इस आत्मीय प्रोत्साहन के लिए हृदय से धन्यवाद एवं आभार।,🙏🏻

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  5. बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति । हार्दिक बधाई । सुदर्शन रत्नाकर

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  6. आत्मीय सराहना एवं प्रोत्साहन के लिए हृदय तल से आपका आभार 🙏🏻

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  7. Bht Sundar ❤️

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  8. अत्यंत मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी रचना! हर शब्द में प्रेम और विरह की गहराई झलकती है। अद्भुत अभिव्यक्ति! ❤️🌸

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  9. अद्भुत रचना! प्रेम, विरह और वैराग्य के बीच यशोधरा के अंतर्मन की पीड़ा को जिस गहराई से शब्द दिए गए हैं, वह मन को भीतर तक छू जाती है। अंतिम पंक्तियाँ तो जैसे पूरी कविता का सार बन गईं—“तुम्हें तज कर मैं कैसे बुद्ध हो पाऊँगी…”। सचमुच, अत्यंत हृदयस्पर्शी। 🙏🌸

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  10. बहुत सुंदर और भावपूर्ण रचना। समर्पण और प्रतीक्षा को जिस सहजता से शब्द मिले हैं, आख़िरी पंक्तियाँ मन में ठहर जाती हैं। 🙏🌸

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