[आपने स्त्री जीवन के संघर्ष को पीड़ा को समझा अपने
शब्दों से उसके मौन स्वर को मुखरित किया। साधुवाद आदरणीय। उसी कविता की अंतिम
पंक्ति से जोड़कर मैंने-‘ वह स्त्री‘है’ कविता अभी
लिखी है।]
वह स्त्री है / डॉ.
वंदना शर्मा
वह निष्प्राण- सी है अपनी मर्यादाओं के कारण
लेकिन मरती नहीं है;
क्योंकि वह स्त्री है
सृजन करती है दर्द सहकर
विनाश भी कर सकती है महाकाली बनकर
वह शक्ति है जग की
उसकी जिजीविषा को कोई नहीं हरा सकता
समाज ने डाली बेड़ियाँ पैरों में उसके
ताकि उसकी उड़ान रोक सके;
पर बहती हवा को
कौन रोक पाया है आज तक
उसके लिए कोई व्रत नहीं रखा जाता
कोई मन्नत नहीं माँगी जाती
फिर भी वह जीती है ज्यादा
बोए जाते हैं बेटे उग आती हैं बेटियाँ
स्प्रिंग देखा है कभी आपने
जितना दबाओं उतना उछलता है
स्त्री की असीम शक्ति से डर
लगाई पाबंदी पुरुष समाज ने
पर वह शक्ति और अधिक मुखरित
हुई
अपनी राह खुद बनाई
वह चांद पर जा वापिस आई
हर अभेद क्षेत्र में परचम लहराया
नभ अपने कदमों में झुकाया
क्योंकि वह स्त्री है
हार नहीं सकती
परिस्थितियाँ अनुकूल भले न हो
वह लड़ना जानती है
वह स्त्री है
हर सीमा से परे
हर बाधा उससे डरे
वह कुछ भी कर सकती है
शक्ति बिना शिव अधूरे
शक्ति से हो सारे कार्य पूरे
कण- कण में व्याप्त है जो
जो ऊर्जा, जो प्राण है
वह स्त्री है।
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यथार्थ सत्य का उद्घाटन करती सुंदर कविता।
ReplyDeleteस्त्री की शक्ति से ही संसार गतिमान है.,वह मुखर होकर यह स्वीकारती
ReplyDeleteनहीं पर अब समय आ गया है कि वह यह जताये किन्तु मर्यादा में रहकर
। सुन्दर सृजन
शीला मिश्रा ,भोपाल।