रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
माना भारी धूल धुआँ है
भीड़भाड़ है, चिल्लपों है
हॉर्न गरजते हैं
वाहनों के
गुत्थम-गुत्था पैदल
चलते
फिर भी अपना मुलुक है
प्यारा
आ गए जिस दूर देश में
यहाँ चुप्पी सब अनजाने- से
न कहकहे, ऊँची आवाज़ें
लगते सब ये बेगा- से
शिष्टाचार, झूठी मुस्कानें
मौन यहाँ का बड़ा है
गहना
हरियाली में बंजर बनकर
हम सीखे कब गुपसुम
रहना
खुली हवा है चुप
दीवारें
दीवारों से कब दर्द
झाँकता
खिड़की बंद है, बंद दरवाज़े
किसकी पीड़ा कौन आँकता
-0-

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